Sep 30, 2010

धर्मांध प्रदेश


जनता ने महसूस किया वह  एक ऐतिहासिक भूल थी तथापि फैसला आया  कि वह धार्मिक उन्माद फैलाने वालों को संरक्षण प्रदान नहीं करेगी.जनता के इस निर्णय से उन्माद फैलाने वालों में बेचैनी फैल गयी और वे हुआं- हुआं करने लगे...


अजय प्रकाश

घटना प्राचीन है वर्णन अर्वाचीन। बहुत समय पहले की बात है,उस समय दक्षिण एशिया में एक धर्मदेश था। उस धर्म देश में धर्मांध लोग अपने-अपने धर्म के प्रति अंधभक्ति रखते। धर्मांध जन सामान्यतया एक-दूसरे के प्रति सहिष्णुता का परिचय देते। कभी-कभार मच्छरदानी के अंदर से या कमरे के ‘बिलोक’ से अपने धर्म को श्रेष्ठ साबित करने के चक्कर में दो-दो हाथ कर लेते। बाद में वे अफसोस भी करते। इस तरह वे अपने देश की दो महान नदियों के नाम पर बनी संस्कøति को समृद्ध करते।

प्रदेश में ज्ञानवान, ओजवान तथा बुद्धिमान लोगों की भी एक प्रजाति बसती, जो अनुदान, महादान या इसी तरह का कोई और दान लेकर देशभर में सहिष्णुता, सौहार्द बनाये रखने के लिए ‘कलमिया कसरत’ करते। जब कभी उन्हें यह लगता कि जनता ने उनको विलुप्त प्राय मान लिया है तो वे दो चार दिन जिंदाबाद-मुर्दाबाद की मौसमी कसरत भी कर लिया करते। इस प्रकार धर्मांध प्रदेश की जनता सुख-चैन से रहा करती।


धर्मान्धियों  की जीत और जश्न: मगर अब अफ़सोस भी
 परंतु एक अप्रत्याशित घटना ने धर्मांध प्रदेश समेत पूरे ‘धर्मदेश’ का ढांचा बदल कर रख दिया।

कुछ साल पहले हुई एक घटना की सुनवायी चल रही थी। मामला एक धार्मिक संप्रदाय द्वारा दूसरे धार्मिक संप्रदाय की धर्मस्थली को ढहाये जाने का था। वैसे इस घटना के बाद धर्मांध जनता ने महसूस किया कि यह एक ऐतिहासिक भूल थी तथापि जनता ने यह फैसला किया कि वह धार्मिक उन्माद फैलाने वालों को संरक्षण प्रदान नहीं करेगी,जिसकी वजह से धार्मिक उन्माद फैलाने वालों में बेचैनी फैल गयी और वे हुआं-हुआं करने लगे.

जनता को उनकी प्रत्येक घोषणाओं,वायदों में धार्मिक उन्माद की ही बू आती। वह जहाँ भी जाते लोग अपनी जमात में लोग उन्हें शामिल नहीं करते.अतः इस संकट से उबरने के लिए धर्मांवादियों ने चिंतन बैठक की। जिसमें यह फरमान जारी किया गया कि ‘जनता का संरक्षण प्राप्त करने के लिए जनता से सच्चाई बयान करो।’

अतः सुनवायी के दौरान उन्मादी धर्मोन्मादी प्रमुख ने कहा-‘हे धर्मदेश की धर्मांध जनता!हम तुच्छ इंसानों में यह शक्ति कहां कि जो इतना बड़ा फसाद करायें। धर्म देश के मुक्त होने के पहले या बाद में जितने भी बंटवारे,दंगे, कत्लेआम हुए उसके हम साधन मात्र थे, साध्य होने की कूवत हममें कहां है? वह सब तो उस परमपिता परवदिगार---की बदौलत हो पाया। हे महान जनता,इसके साक्ष्य इतिहास से लेकर वर्तमान तक में भरे पड़े हैं। पिछले वर्षों में हमारे द्वारा कराये गये कत्लेआम की प्रेरणा भी वहीं से प्राप्त हुई थी।

अतः मैं महामहिम उच्चतम न्यायालय में पूर्ण आस्था रखते हुए गीता की कसम खाकर कहता हूं कि ‘मस्जिद हमने नहीं उसी ने गिरायी 'एक्ट आफ गॉड।’

धर्मोन्मादी की उक्त बातें सुनकर जनता की ओर से तत्काल एक सभा बुलायी गयी। जिसमें यह प्रस्ताव पारित हुआ कि ‘प्रदेश में ही नहीं, देश में ही नहीं दुनिया में चैन की जिंदगी बसर करने वाली जनता को बेचैन करने वाले मूल तत्व का पता चल गया है। अतः हम प्रदेश वासियों का नैतिक कर्तव्य है,चाहे वह स्त्री हो या पुरुष,बच्चा हो कि बूढ़ा, ‘उसको’ ढूंढ़ने में मदद करे।

प्रदेश भर की जनता एकजुट होकर उसकी तलाश में जुट गयी। बच्चों,महिलाओं और पुरुषों की अलग-अलग टीमें बनायी गयीं। महिलाओं-बच्चों ने अपने घर में बने आस्थागृहों को तोड़ा, घर में लगे कैलेण्डरों, फोटो आदि को फांड़-फूड़, कूंच-कांचकर देखा कहीं उस आस्तीन के सांप का पता नहीं चला। बड़ों ने बड़े-बड़े स्थलों को ढहाया, नेव तक खोद डाले गये। इस प्रकार धर्मांध प्रदेश में ही नहीं पूरे ‘धर्म -देश’ में धर्म विशेष के धार्मिक स्थलों का सफाया कर दिया गया।

इस महाभियान में पूरे ‘धर्म देश’ की जनता शामिल हो गयी थी। परंतु पता न चल पाने के कारण लोग मायूस थे।

अब सन्यासी नहीं बनेंगे दंगाई:  खेलेंगे-देखेंगे खेल
पुनः सभा बुलायी गयी। ‘परवदिगार’ को गिरफ्तार किये जाने की तरकीबों पर सलाह-मशविरा हुआ। अंत में तय हुआ चूंकि धर्मदेश की जनता सदियों से यह सुनती आ रही है कि सभी धर्मों के ईश्वर एक होते हैं,लोगों ने सिर्फ उच्चारण की सुविधा के अनुसार अलग-अलग नाम रखे हुए हैं। हो न हो ‘वह’ जरूर किसी बिरादर आस्था की जगह पर छुपा होगा। अतः धर्मदेश की जनता सर्वसम्मति से यह निर्णय लेती है कि देश में स्थित इस तरह की सभी संस्थाओं को नष्ट कर दिया जाये और ‘परमपिता’ जनता की अदालत में पेश किया जाये,जहां ‘पैगम्बर’ के लिए फांसी की सजा मुकम्मल की गयी है। इसको अंजाम देते हुए इस बात का विशेष ध्यान रखा जाये कि जो लोग जिसमें आस्था रखते हों उनको ही (विशेष रूप) उनके स्थलों को नष्ट करने की इजाजत दी जाये।

चूंकि इन स्थलों में वैसे तामझाम नहीं थे इसलिए जनता ने इनका काम कम समय में ही तमाम कर दिया।

इन सबके बाद जो हुआ वह कहीं अधिक दिलचस्प था। इन स्थलों के ध्वसत होने के बाद धर्मांध प्रदेश के लोगों ने अपने प्रदेश का नाम बदल देने का फैसला किया तथा ‘जिम्मेदार’ संस्था को आवेदन लिखा। इसके बारे में लोगों का कहना था कि वे अब हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई, से ‘इंसान’ हो गये हैं। अब वे नये तरह के कायदे-कानून बनायेंगे।

स्त्रियां अब सड़कों पर चलते समय किसी तरह का चिरकुट नही ओढ़ा करतीं। बच्चे आपस में मिल-जुलकर खेला-पढ़ा करते। लोग संगीत, साहित्य, कला, खेल में रुचि लेने लगे। और इस प्रकार ‘भगवान’ धीरे-धीरे इतिहास की किताबों में दर्ज हो गया।

लेकिन अचानक एक सुबह भारी भीड़ प्रदेश की तरफ बढ़ती हुई दिखी। प्रदेश की जनता ने उनको पहचान लिया।

लोग कहने लगे, ‘वो देखो-इनमें तो दाढ़ी वाले, चुरकी वाले, पगड़ी वाले सभी एक साथ हैं---ये तो सभी एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं।’
ये तो नारे भी लगा रहे हैं----तख्ती पर कुछ---‘हमारे धार्मिक अड्डों को बसाओ,हम ईश्वर के प्रतिनिधि हैं।’
मगर ये अजायबघर से बाहर कैसे आये?इनको तो बच्चों के मनोरंजन के लिये रखा गया था-बाशिंदे सोचने लगे।

फिर लोगों ने सोचा जब ये आ ही गये हैं तो इनको सुधारगृहों में डाल दिया जाय तथा श्रम करके उपार्जन करने की मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा दी जाय। लोगों के इस फैसले के बाद से खबर लिखे जाने तक सबकुछ ठीक-ठाक होने की सूचना है और सरकार है कि फिर अमन बहाली नहीं कर पा रही है.  

Sep 29, 2010

'प्रधानमंत्री बाबरी विध्वंस टाल सकते थे'


बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद पीवी नरसिंह राव सरकार से इस्तीफा देने वाले कैबिनेट मंत्री माखनलाल फोतेदार से अजय प्रकाश की बातचीत




बाबरी मस्जिद विध्वंस कांड की जांच कर रहे लिब्रहान आयोग ने कभी आपको गवाह के तौर पर बुलाया ?

सत्रह वर्षों की जांच प्रक्रिया के दौरान आयोग ने अगर एक दफा भी मुझे बुलाया होता तो रिपोर्ट में यह जानकारी सार्वजनिक हुई होती। उन्होंने क्यों नहीं बुलाया यह बताने में मेरी दिलचस्पी नहीं है। मैं इतना भर कह सकता हूं कि अगर कोई बात इस संदर्भ में आयोग ने हमसे की होती तो तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव का जो सुघड़ चेहरा रिपोर्ट पेश होने के बाद देश के सामने उजागर हुआ है,वह सबसे अधिक दागदार होता।

आप मानते हैं कि संघ और भाजपा विध्वंस के लिए जितने जिम्मेदार हैं उससे कत्तई कम दोषी नरसिंह राव नहीं हैं?

मैं तुलनात्क रूप से विध्वंस की जिम्मेदारी नरसिंह राव पर तो नहीं डालता,लेकिन मानता हूं कि राव चाहते तो वो उस धार्मिक उन्माद को टाल सकते थे जिसकी वजह से मस्जिद टूटी और देश एक बार फिर आजादी के बाद दूसरी बार इतने बड़े स्तर पर सांप्रदायिक धड़ों में बंट गया।

नरसिंह राव कैसे टाल सकते थे?

राव से हमने जून में ही कहा था कि जो लोग इस बलवे का माहौल बना रहे हैं,उनसे आप शीघ्र  बात कीजिए। मेरा जाती तजुर्बा है कि ये मसले कोई भी अदालत तय नहीं कर सकती। यह बात चूंकि मैंने कैबिनेट में कही थी इसलिए उन्होंने मान ली। लेकिन दूसरे ही दिन मेरी अनुपस्थिति में कई दौर की बैठकें चलीं और तय हो गया कि छह दिसंबर तक कुछ भी नहीं करेंगे,जब तक अदालत का फैसला नहीं आ जाता।
क्या नरसिंह राव को स्थिति बेकाबू होने का अंदाजा नहीं था?

अंदाजा क्यों नहीं था। मैं नवंबर में उत्तर प्रदेश के दौरे पर गया था। साथ में प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी भी थे। पूर्वी और पष्चिमी उत्तर प्रदेके पांच जिलों में जलसे किये। गोरखपुर से लेकर गाजियाबाद तक मुस्लिमों के बीच जो भय का माहौल दिखा वह हैरत में डालने वाला था। हमारे साथी और कांग्रेसी नेता नारायण दत्त तिवारी ने एक चर्चा के दौरान मुझे बताया कि कल्याण सिंह का मेरे घर के बगल में एक घर है। वहां जोर-शोर से रंगाई-पुताई का काम चल रहा है और सभी कह रहे हैं कि जैसे ही 6 दिसंबर को मस्जिद टूटेगी, वे इस्तीफा यहीं बैठकर देंगे। नारायण दत्त ने जोर देकर कहा कि मैं कई बार राव साहब से कह चुका, जरा आप भी उनका ध्यान इन तैयारियों की तरफ दिलाइए। सुनने में ये बातें गप्प लग सकती हैं,लेकिन इस तरह की हर जानकारियों समेत वहां हो रहे हर महत्वपूर्ण घटनाक्रमों की जानकारी राव तक हर समय पहुंचायी।

यानी तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के इस्तीफे की तैयारी पहले से थी?

बिल्कुल। हमने यही बात तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंहराव से भी कही कि कल्याण सिंह इस्तीफा लेकर बैठे हुए हैं ,वह सिर्फ मस्जिद ढहने के इंतजार में हैं। अगर अपने चाल में वे कामयाब होने के बाद इस्तीफा सौंपते  तो सिवाय अफसोस और दंश  झेलने के हमारे मुल्क के पास क्या बचेगा।

कांग्रेस सरकार को इस तैयारी की जानकारी कितने महीने पहले से थी?

बाकी की तो छोड़िए,6दिसंबर को ग्यारह बजे दिन में मेरे पास एक वकील दोस्त का फोन आया कि पहली गुंबद कारसेवकों ने ढहा दी है। उसके ठीक बाद प्रेस ट्रस्ट के विशेष संवाददाता हरिहर स्वरूप का फोन आया कि कारसेवक मस्जिद में घुसने लगे हैं। फिर मैंने तत्काल नरसिंह राव से बात की और कहा कि जो हमने पहले कहा,वह तो हो नहीं पाया लेकिन अब भी समय है कि सरकार को तुरंत बर्खास्त कर हथियारबंद फौंजें तैनात कर दीजिए। अभी सिर्फ एक ही गुंबद टूटा है। हम मस्जिद को बचा ले गये तो भविष्य हमें इस रूप में याद रखेगा कि एक लोकतांत्रिक सरकार ने हर कौम को बचाने की कोशिश की।
शायद आप उस दिन इस सिलसिले में राष्ट्रपति  से भी मिले थे?

जब साफ़ हो गया कि प्रधानमंत्री कान नहीं दे रहे हैं तो तत्कालीन राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा से मैं साढे़ पांच बजे शाम को मिलने गया। मैं उनसे कुछ कहता,उससे पहले ही वे बच्चों की तरह फूट-फूट कर रोने लगे। बातचीत में उन्होंने बताया कि अभी राज्यपाल आये थे लेकिन वे बता रहे थे कि नरसिंह राव ने उन्हें निर्देश दिया है कि वह तब तक बर्खास्तगी रिपोर्ट उत्तर प्रदेश सरकार को न भेजें जब तक वे नहीं कहते। इसी बीच राष्ट्रपति के पास संदेश आया कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने इस्तीफा दे दिया।

बहरहाल शाम छह बजे कैबिनेट की आकस्मिक बैठक में मुझे पता चला कि मस्जिद गिरा दिये जाने के अपराध में कल्याण सिंह सरकार को बर्खास्त किया जा रहा है। तब मैंने कहा कि उसने अपना काम पूरा करके सरकार के मुंह पर इस्तीफा फेंक दिया है।

नरसिंह राव कैबिनेट में और कौन मंत्री थे, जिन्होंने आपका बाबरी मस्जिद मसले पर आपका साथ दिया था?

नाम मैं किसी का नहीं ले सकता। मगर इतना तो था ही जब कभी भी मैंने यह मसला कैबिनेट के बीच या मंत्रियों से आपसी बातचीत में लाया तो किसी ने कभी विरोध नहीं किया।

नरसिंह राव की भूमिका का जो सच इतना बेपर्द रहा है,वह जांच करने वाले कमीशन लिब्रहान को क्यों नहीं सूझा?

मैं सिर्फ इतना कहता हूं कि यह आयोग नरसिंह राव की संदिग्ध भूमिका को झुठला नहीं सकता।

कहा जा रहा है कि कभी कांग्रेस नेतृत्व के साथ बैठने वाले फोतेदार हाशिये पर हैं। इसलिए नरसिंह राव पर आपकी बयानबाजी राजनीतिक लाभ की जुगत भर है?
अगर इस जुगत से समाज के सामने एक सच खुलता है तो हमें कहने वालों की कोई परवाह नहीं है।


Sep 28, 2010

पहाड़ से पनाह मांगते लोग


बारिश की मार ने राज्य के हर गांव में हाहाकार मचा रखा है। बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे हैं,किसान खेतों से महरूम हैं,बुजुर्ग  घरों में जान बचाकर दुबके हैं जो कभी भी  ध्वस्त हो सकते हैं।  मुनाफाखोरी की चिंता से लकदक   विकास ने पहाड़ के जनजीवन को किस कदर तबाह किया है,उन पहलुओं को उजागर करती उत्तराखंड   से एक रिपोर्ट  

सुनीता भट्ट

‘हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए, अब हिमालय से कोई गंगा  निकलनी चाहिए।’ लोगों के दर्द को आवाज देने वाली ये पंक्तियां हिमालयवासियों के लिए अब अधिक पीर देने वाली साबित हो रही हैं। बंगाल की खाड़ी से इस साल उठे प्रचंड मानसून से लोग इतने दुखी हैं कि वे विकराल हो चुकी नदियों से थमने की प्रार्थना कर रहे हैं।

गंगा, यमुना, मंदाकिनी, पिंडर, सरयू, धौली, काली, कोसी, रामगंगा समेत तमाम नदियों ने प्रलयंकारी रूप धारण किया हुआ है। विद्युत परियोजनाएं ठप पड़ी हैं,जो बन रही थीं,वे मलबे के ढेर में तब्दील हो चुकी हैं। टिहरी झील का जलस्तर पहाड़ ही नहीं,मैदानों तक को आतंकित किए हुए है। गर्मी में ऊंचे पहाड़ों पर प्रवास के लिए लोग नीचे के गांवों में नहीं आ पा रहे हैं,जबकि सर्दी शुरू होने से वहां बर्फवारी होने वाली है और ऐसे परिवारों में बूढ़े, महिलाएं और जानवर भी  हैं।


 जगह-जगह टूटी जीवन की डोर                                          फोटो- जनपक्ष  

कई दिनों से पहाड़ में अखबार नहीं पहुंच सके हैं और रेडियो- टीवी  बंद पड़े हैं। सैकड़ों गाड़ियां रास्तों में अटकी हैं। परिवहन व्यवस्था लड़खड़ाने की वजह से लोग अपने परिजनों का हाल जानने नहीं पहुंच पा रहे हैं। राज्य की प्रतियोगी परीक्षाएं टालनी पड़ी हैं,जबकि बाहरी राज्यों में हुई परीक्षाओं से उत्तराखण्ड के कई अभ्यर्थी वंचित रह गये हैं। अधिकतर क्षेत्रों में लंबे समय से रसोई गैस की आपूर्ति नहीं हो सकी है,जबकि ईंधन की लकड़ी सूखने का नाम नहीं ले रही। छुट्टी का वारंट लेकर निकले सैकड़ों सैनिक स्टेषनों पर दिन काट रहे हैं।

उन्नीस सितंबर को हुई अतिवृश्टि से इस पहाड़ी राज्य के 60 लोगों की जान चली गई। बारिश से लगभग 175 लोग काल-कवलित हो चुके हैं,सैकड़ों लोग लापता हैं और 1200लोग गंभीर  रूप से घायल हैं। एक अनुमान के मुताबिक राज्यभर में सात हजार से अधिक पशु मारे जा चुके हैं,जबकि राष्ट्रीय पार्कों में मारे गए वन्यजीवों की गणना नहीं की जा सकी है। आठ हजार परिवारों को सुरक्षित स्थानों पर ले जाकर शिविरों और स्कूलों में ठहराया गया है। राज्य में 30 हजार हैक्टेअर कृषि भूमि  नष्ट हुई है।

बारिश की मार ने पर्वतीय राज्य के हर गांव-तोक में हाहाकार मचा रखा है। बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे हैं,किसान खेतों से महरूम हैं,बच्चे-बुजुर्ग ऐसे घरों में जान बचाकर दुबके हैं जो कभी भी  ध्वस्त हो सकते हैं। बीमारों को अस्पतालों तक नहीं ले जाया जा सकता। जिन गांवों में लोग हताहत हैं, उन्हें बाहर निकालना सेना के लिए मुश्किल है। कई गांवों में तो दर्जनों मृतकों की चिताएं साथ जलीं।

सड़कें ध्वस्त होने से गांवों के साथ कस्बों,नगरों तक में दाल-रोटी का संकट है। बड़े इलाके में दूध और राशन नहीं पहुंच रहा है। बिजली गायब है, जबकि दुकानों से डीजल, पैट्रोल, केरोसिन, सब्जियों, दालों का कोटा खत्म हो चुका है। अस्पतालों में दवाएं नहीं हैं। सैकड़ों मोबाइल टावर ध्वस्त हो गए हैं,जहां मोबाइल काम कर भी  रहे हैं,वहां बैटरी जवाब दे चुकी है। ऊंचे पहाड़ों में पर्वतारोहण पर गए यात्रियों की कोई खबर नहीं है,जबकि हजारों तीर्थयात्री रास्तों में फंसे हुए हैं।

अतिक्रमण का परिणाम: सबकुछ तहस-नहस                      फोटो- जनपक्ष  

गेहूं-चावल लेकर सेना के जो हैलीकॉप्टर राहत कार्य में लगे हैं,बादलों की घनी चादर लगने से घूमकर वापस लौट रहे हैं। पूरे पहाड़ में पेयजल लाइनें ध्वस्त होने से पीने के पानी का संकट है। डाक सेवायें बाधित होने से मनीऑर्डर व्यवस्था ठप है। जिला मुख्यालयों समेत राजधानी के आसपास के गांवों का भी  संपर्क आपस में कटा हुआ है। सेब की खेती को बाजार तक ले जाने वाले मार्ग टूटने से वह रास्ते में खडे ट्रकों में सड़ रही है। खड़ी फसलें और खेत  पूरी तरह से चौपट हो चुके हैं। सिंचाई नहरें सिरे से गायब हैं। खेतों और पहाड़ों में जहां-तहां दरारें हैं। घोड़ों-खच्चरों पर लदकर पहुंच रहा महंगा सामान लोग खरीद नहीं पा रहे हैं। मुनस्यारी और मोरी जैसे पिछड़े क्षेत्रों में प्याज 150 तथा टमाटर 80 रुपए किलो बिक रहा है। अल्मोड़ा जैसी जगह में तो एक अंडे की कीमत 12रुपए तक वसूली जा रही है। आपदा से निबटने को केन्द्र से भेजी गई एनडीआरएफ की टीम हरिद्वार और ऋषिकेश से ऊपर जाने का साहस नहीं जुटा पा रही है।

अधिकतर जिलों में बारिश का पुराना रिकॉर्ड टूट गया है। राज्य में इस समय 1300से अधिक सड़कें पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हैं। इनमें राष्ट्रीय राजमार्गों समेत लोनिवि की सड़कें शामिल हैं। कोई  सड़क ऐसी नहीं बची है जो कम से कम चार-पांच जगह से न टूटी हो। सड़कों की मरम्मत को गए 125बुलडोजर मलबे के बीच फंसे हैं। अंतरराष्ट्रीय सीमाओं और हिमाचल को जोड़ने वाली सड़कों समेत चारधाम यात्रा मार्ग ठप पड़े हैं। सीमावर्ती जिलों में बने सैन्य
शिविर तक बारिश से नहीं बच पाए।

आपदा की मार
  • आपदा से बागेश्वर के सुमगढ़ गांव में बादल फटने से 18 स्कूली बच्चों की मृत्यु
  • प्रदेश भर में जनजीवन पूरी तरह से अस्त-व्यस्त, अब तक 175 मौतें, 1200 घायल, सैकड़ों लापता
  • अल्मोड़ा के बाल्टा और देवली गांव में एक ही दिन में 43 लोगों की बादल फटने से मौत
  • पर्वतारोहण पर गए एक कर्नल और मेजर की एवलांस में मौत, एक गायब
  • पर्वतारोहण पर गए अलग-अलग अभियानों में फ्रेंच, ऑस्ट्रियन, कजाक, ब्रिटिश दल मार्गों में फंसे
  • चिन्यालीसौंड़ के 15 गांव टिहरी झील में समाए, सैकड़ों लोग बेघर हो गये
  • चारधाम यात्रा को निकली 340 बसें जगह-जगह यात्रा रूट में अटकीं, हजारों यात्री फंसे
  • श्रीनगर में आईटीबीपी के जवान शिविर ध्वस्त होने से फंसे, उन्हें मुश्किल से निकाला जा सका
  • गौला में जीप गिरने से सात लोगों की मौत, अलकनंदा में एक टूरिस्ट बस और पुलिस जीप गिरी
  • 11 पर्वतीय जिलों समेत 2 मैदानी जिलों हरिद्वार और उधमसिंहनर में भारी नुकसान
मूसलाधार बारिश से 2500पेयजल लाइनें टूट गई हैं। तीन हजार से अधिक गांवों में पीने का पानी नहीं हैं। यहां के लोग बारिश का पानी उबालकर पी रहे हैं। 3000 नहरें, 1000 विद्युत लाइनें और हजारों बिजली के पोल ध्वस्त हुए हैं। हरिद्वार में रेलवे ट्रैक  पर मलवा आने से चार दिन तक रेल सेवाएं बाधित रहीं। हल्द्वानी में जलस्तर बढ़ने से नदी का पानी रेलवे ट्रैक पर आ गया। कई दिनों तक जौलीग्रांट हवाई अड्डे से उड़ानें नहीं भरी जा सकीं। आठ सौ से अधिक स्कूल भवन  क्षतिग्रस्त घोशित कर दिए गये हैं, जबकि 200 से अधिक गांवों को स्थायी रूप से विस्थापित करने की चुनौती है। टिहरी बांध के सहयोगी कोटेश्वर बांध समेत दो दर्जन से अधिक जलविद्युत परियोजाएं क्षतिग्रस्त हो गई हैं। प्रदेश  सरकार ने 25000 करोड़ से अधिक के नुकसान का आकलन किया है।

मानसरोवर में फंसे यात्री                                             

बारिश के नुकसान का वास्तविक आकलन होना अभी शेष है। लोगों को राहत देने के लिए मिले धन को मानवीय संवेदना और ईमानदारीपूर्वक खर्च करने की जरूरत है। साथ ही प्रदेश के विकास के लिए दूरगामी नीति बनाना आवश्यक है। तबाही बनकर आयी बारिश  विवेकहीन रूप से बना दी गयीं तमाम सड़कों पर प्रश्नचिह्न तो लगाती ही है,वहीं बड़ी जलविद्युत परियोजनाओंके खतरे से भी आगाह करा  रही है। एक तरफ नदियां अपने तट वापस मांग रही हैं, तो  चोटियों में बसे सैकड़ों गांवों को सुरक्षित स्थानों पर बसाने की  जिम्मेदारी सरकार के सामने है। जाहिर है ऐसे में आम नागरिकों का दायित्व भी  सरकार और मशीनरी से कुछ कम नहीं है।

 (लेखिका सामाजिक सरोकारों से जुड़ी पत्रकार हैं, उनसे sunitabhatt10@gmail.com  पर संपर्क किया जा सकता है)



Sep 26, 2010

बीमारी बांचती, लुटेरों की कहानी


सुबह उठने पर नाक से कोयला निकलता है और रहने के  कुछ महीनों  में तपेदिक . यह वही क्षेत्र है जहां ट्रांजिस्टर बजाना मना है पर विस्फोट करने वाले ठेकेदार कहते हैं उनके पास क़ानूनी अधिकार है.अवैध खनन से बिन्ध्य  इलाके की पहाड़ियां गायब होती जा रहीं और सरकार है कि  पर्यावरणीय संकट पर सख्त कानून बनाने की बात कर रही है.उत्तर प्रदेश के बिन्ध्य क्षेत्र से लौटकर...

दिनकर कपूर

सोनभद्र,मिर्जापुर,चन्दौली का क्षेत्र विन्ध्य पहाडियों के प्राकृतिक सौन्दर्य के लिए प्रसिद्ध था। आज इन जनपदों  के पहाड़ी इलाकों में पर्यावरण व जल का गहरा संकट पैदा हो गया है। क्षेत्र में जहरीले पानी से मौतें हो रही हैं, किसानी बर्बाद हो रही है, जंगल काटकर वीरान किये जा रहे है, पत्थरों  और पहाड़ियों को तोड़ा जा रहा है। उत्तर पद्रेश सरकार को सबसे ज्यादा राजस्व देने वाले इस क्षेत्र में यह सब इसलिए हो रहा है क्योंकि शासन-प्रशासन की मदद से मौत के सौदागर अपने मुनाफे के लिए लूटने में लगे है।

एक सरकारी रिपोर्ट के अनुसार सोनभद्र व मीरजापुर जनपदों में मात्र 279क्रशर प्लांट ही वैध हैं, बाबजूद इसके हजारों की संख्या में अवैध क्रशर रात दिन पहाड़ों को तोड़ने में लगे हुए है। यहां तक कि सेंचुरी एरिया व वाइल्ड जोन में ,जहां ट्रांजिस्टर बजाना भी मना है,वहां खुलेआम विस्फोट किये जा रहे हैं। क्रशरों के चलते पूरे इलाके की पहाड़ियां गायब होती जा रही जो आने वाले समय में बड़े पर्यावरणीय संकट को जन्म देंगी।


बिन्ध्य की उजडती पहाड़ियां: कहाँ करें गुहार

आजादी के साठ वर्षो बाद भी यहां के ग्रामीण बरसाती चुओं, बांधों, नालों और सिचांई कूपों से पानी पीने को मजबूर है। मीरजापुर,सोनभद्र,चन्दौली में छाया पानी का संकट प्राकृतिक नहीं बल्कि प्रशासनिक व सरकारी लापरवाही की वजह से है। यह क्षेत्र डार्क जोन के मानकों को पूरा करता है परन्तु इस पूरे क्षेत्र में भूगर्भ में पेयजल के लिए संरक्षित जल का दोहन औद्योगिक समूहों द्वारा किया जा रहा है। चुनार के ही इलाके में जेपी औद्योगिक समूह बिजली उत्पादन के लिए जमीन से प्रतिदिन 3000किलोलीटर पानी निकाल रहा है। जिसकी वजह से आसपास के गांवों में पेयजल का जर्बदस्त संकट पैदा हो गया है।
जेपी समूह पानी निकालने का जो तर्क देता है,वह यह है कि कभी यूपी सीमेन्ट कारर्पोरेशन को 3000किलोलीटर पानी निकालने का आदेश था,जो उसे फैक्ट्री खरीदने पर समझौते में मिला है। इस समझौते की आज कोई वैधता नहीं हैं क्योंकि  यदि यह आदेश था भी तो मात्र पेयजल की जरूरतों को पूरा करने के लिए था न कि बिजली उत्पादन के लिए। जल संकट से निजात दिलाने के नाम पर जो चैकडैम भी बनाएं गए,वह भी भ्रष्ट्राचार की भेंट चढ़ गए। 

 म्योरपुर ब्लाक के बेलवादह, खैराही, किरबिल, कुलडोमरी, सांगोबांध, चौगा, पाटी जैसे गांवो के 21 स्थानों की जांचकर आयुक्त ग्राम्य विकास ने खुद स्वीकार किया था कि चेकडैम बनाने में अनियमितता बरती गयी है और बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार हुआ है। लेकिन आश्चर्य है कि इस घोटाले को पकड़ने वाले और दोषी अधिकारियों के निलम्बन की संस्तुति करने वाले आयुक्त का तो तबादला हो गया पर घोटाले बाजों का एक दिन के लिए भी निलम्बन नहीं हुआ। हैण्डपम्पों को भी तय सरकारी मानक से काफी कम स्तर पर ही बोर किया गया है,परिणामतः जलस्तर नीचे जाते ही हैण्डपम्प बेकार हो जा रहे है।

रेणू नदी पर बने रिहंद बांध का पानी जहरीला है,यह बात स्वयं मुख्य चिकित्साधिकारी-सोनभद्र की जांच के बाद आयी रिपोर्ट से प्रमाणित हुआ है। पिछले वर्ष अक्टूबर माह में इस जलाशय के किनारे बसे कमरीडाड़ व लभरी गाढ़ा गांव में 28बच्चों और ग्रामवासियों की मौतें  इस पानी को पीने के चलते हुई। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इसे संज्ञान में लेकर कार्यवाही की बात भी कही है, लेकिन कनौरिया कैमिकल्स, हिण्डालकों, हाईटेक कार्बन, रेनूसागर व विभिन्न विद्युत परियोजनाओं द्वारा कचरा डालकर इसे जहरीला बनाने का खेल जारी है। साथ ही उच्च न्यायालय के आदेशों की भी अवहेलना कर लीज के बगैर या अन्यत्र की लीज लेकर नदियों के पेट से जेसीबी मषीनों द्वारा खुलेआम बालू निकाला जा रहा है। 

अवैध खनन के खिलाफ मोर्चा: सोनभद्र में प्रदर्शन
 सोनभद्र की सोन नदी को बंधक बना लिया गया है। एक ही उदाहरण से स्थिति की गम्भीरता को समझा जा सकता है। चोपन ब्लाक के अगोरी किले का क्षेत्र कैमूर सेन्चुरी एरिया में आता है। इस किले के सामने सोन नदी पर पुल व सड़क बनाकर नदी की धार मोड़ दी गयी है और जेसीबी मशीन लगाकर बड़े पैमाने पर बालू का खनन चौबीस घंटे  किया जा रहा है।
जनदबाव में जिन फैक्ट्रियों में ईएसपी लगाया गया है,उसका भी समुचित अनुपालन नहीं होता है। मिर्जापुर के चुनार में जेपी समूह की सीमेन्ट फैक्ट्री द्वारा खुलेआम कोयला व सीमेन्ट उड़ाया जा रहा है,जिसके चलते नुआंव,बकियाबाद, सोनाउर जैसे गांवो के किसानों की फसल नष्ट हो गयी है। इसी तहसील के धौवां व बड़ागांव जैसे गांवो में लौह अयस्क से लोहा बनाने वाली फैक्ट्रीयों के द्वारा फैलाएं प्रदूषण से आम नागरिको का जीवन संकटग्रस्त हो चला है रोज सुबह सोकर उठने पर ग्रामीणों के नाक से कोयला निकलता है।

वाराणसी जिले के रामनगर औद्योगिक क्षेत्र में जयलक्ष्मी सीमेंट फैक्ट्री, पशुपति सीमेंट फैक्ट्री, तिरनैनी सीमेंट फैक्ट्री, एसए स्पंज फैक्ट्री,बाबा विश्वनाथ स्पंज फैक्ट्री,लोलारक प्लास्टिक फैक्ट्री में ईएसपी मशीनें लगी ही नहीं है। परिणामस्वरूप चंदौली जनपद के पटनंवा,सेगंर, हमीदपुर, गोपालपुर, कटरिया, मिर्जापुर जनपद के देवरिया, तारामढना गांव में फैल रहे प्रदूषण के कारण किसानों की फसल बर्बाद हो रही है।

पर्यावरण विभाग ने सोनभद्र में 264व मीरजापुर में मात्र 15क्रशर प्लांट को ही अनुमति प्रदान की है। किसी भी खदान व स्टोन कर्टर के सामने बोर्ड नहीं लगा है और जहां बोर्ड है भी वह लोगों में भ्रम पैदा करने के लिए है। सोनभद्र के सलखन गांव में राकेश गुप्ता ने क्रशर पर रजिस्ट्रेशन नम्बर लिखा है जबकि सूची में उसका नाम है ही नहीं। इन पहाड़ों के आसपास आबादी बसी हुई है। इन क्रशरों द्वारा पर्यावरण मानकों को न पूरा करने की वजह से न केवल पानी का संकट व खेती  की बर्बादी हो रही है बल्कि बड़े पैमाने पर लोग तपेदिक जैसी बिमारियों के शिकार हो रहे है।


जेपी कंपनी: लूट के लिए कुख्यात

मिर्जापुर के अहरौरा के सोनपुर गांव में बसपा के राजगढ़ विधायक अनिल मौर्या द्वारा लगाये गये क्रशर प्लान्ट की तो बस्ती के निकट ही ब्लास्टिंग करायी जा रही है। उससे उड़ रही घूल ने ग्रामवासियों को टीबी का बड़े पैमाने पर शिकार बना लिया है। जनमोर्चा की टीम ने वहां जाकर देखा कि दलित जाति के एक ही परिवार के दो भाई छैवर व जय सिंह की टीबी से मौत हो गयी और बालकिशुन, राधेश्याम, मल्लां, रामधनी, शारदा, जसवन्त, बल्ली जैसे दर्जनों दलित परिवार टीबी के मरीज बन जिन्दगी और मौत से जूझ रहे है,जबकि इस क्रशर  प्लान्ट का नाम भी वैध क्रशरों में नहीं है।

एक तरफ सरकारी मिलीभगत से वन के सेन्चुरी एरिया तक में खनन की खुले है तो आदिवासी समाज के लोकतांत्रिक अधिकारों से बेदखल किया जा रहा है। लम्बे संघर्षों के बाद जंगल की जमीन पर पुश्तैनी अधिकारों की बहाली के लिए बने वनाधिकार कानून की अवहेलना करते हुए उपजिलाधिकारियों द्वारा वनाधिकार समितियों द्वारा सत्यापित आदिवासियों के दावों को बड़े पैमाने पर खारिज किया जा रहा है। अब तक इस इलाके में करीब साठ हजार के भी ऊपर वनाधिकार दावों को खारिज कर दिया गया है, जो इस कानून की ही मूल भावना के खिलाफ है।

(लेखक जन संघर्ष मोर्चा के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं, इनसे dinkarcpiml@rediffmail.com    पर संपर्क किया जा सकता है)
 
 

Sep 24, 2010

अपना नाम कल वियतनाम आज कश्मीर

वरवर राव


अब तक तो इतना ही समझते थे कि

ईंट का जवाब पत्थर हो सकता है

आज हमारे बच्चे सिखा रहे हैं कि

फौज़ का भी जवाब पत्थर हो सकता है

गोली का जवाब घाटी से

कर्फ्यू  का जवाब खुले मैदान में कद़म उठाने वाली

महिलाएं ही दे सकती हैं

दमन का जवाब आजादी की मांग से ही दिया जा सकता है

आपने कहीं देखा है



हमारे देश, हमारे लोग, झील, नदी, पहाड़

घाटी और

सुन्दर जीवन, वन एक तरफ

और साठ साल से कानून और सेना के कब्ज़े में

छीन ली गई सत्ता एक तरफ

अपना नाम अगर कल वियतनाम हो तो आज कश्मीर है

और  आज भी नक्सलबाड़ी  के साथ  मुक्ति हमारा नारा है.



क्रांतिकारी कवि वरवर राव विप्लव रचयिता संघम के संस्थापक सदस्य हैं .हथियारबंद जनसंघर्षों के पक्षधर होने की वजह से उन्हें अबतक छह वर्ष कारावास में गुजारने पड़े हैं. कारावास के अनुभव पर  उनकी लिखी 'जेल डायरी'  प्रकाशित हुई है.  





Sep 21, 2010

किसके दर जाएँ चित्रकार


कला के क्षेत्र में राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त स्वतंत्र चित्रकार   76वर्षीय वेद नैयर और 64वर्षीय गोगी सरोजपाल ये जानना चाहते हैं कि आखिर उनका अपराध क्या है?प्रख्यात साहित्यकार स्व.यशपाल की भतिजी गोगी और वेद नायर ने दिल्ली के राज्यपाल को पत्र भी लिखा,थाने में कई बार तहरीरें दीं और मीडिया से भी मदद की गुहार की. रहने के लिए  गया नया फ्लैट और पड़ोसी के रूप में मिला एक वकील,इन कलाकारों की जिंदगी में कितनी मुश्किलें लेकर आया है बता रही हैं लेखिका विपिन चौधरी

विपिन  चौधरी

प्रसिद्ध अमेरिकन नर्तकी तव्याला थर्प सही कहती हैं कि 'कला ही वह माध्यम है जिसके ज़रिये हम अपने घर को छोडे बिना कहीं दूर जा सकते हैं।'सच है कोई भी कला का किनारा पूरी तरह से डूब कर ही मिलता है। एक कलाकार ताउम्र दुनिया के तमाम प्रपंचो से दूर रह कर चुपचाप अपने काम मे लीन रहता है। लेकिन,हमारे समाज में कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनसे किसी की शांति देखी नहीं जाती।

गोगी सरोजपाल और वेद नायर: कौन देगा साथ

किसी तरह का दया धर्म,इन्सानिंयत और बडे-बुज़ुर्ग का लिहाज़ इनके नज़दीक कोई मायने नहीं रखता। ऐसे ही लोग आजकल अपना सिक्का चला रहे हैं और भले लोग बेवजह इनका निशाना बन जाते है और बुजुर्ग और अकेले होने की कारण आसानी से 'सोफ्ट टार्गेट'बन जाते हैं। देश के दो नामचीन चित्रकार गोगी सरोज़पाल और वेद नैयर आजकल ऐसे ही लोगों के निशानें पर हैं और अपनी भलमनसाहत की सजा भुगत रहे है।


वेद नैयर और गोगीसरोजपाल ये जानना चाहते हैं कि आखिर उनका अपराध क्या है,उन्हें किस गुनाह की सज़ा मिल रही है,क्या दोनों की सज़ा केवल इतनी है कि वे इस लोकतंत्र में खुली साँस लेने की गुस्ताखी कर रहें हैं। शायद वे नहीं जानते की शांति पाने के लिये मुआवजा देना होता है और उन्होनें दिया भी,पिछले एक साल से उन्होनें अपनी बरसों से जमा की हुई शांति को खो दिया है। बरसों से वे अपने स्टुडियों में शांति और पुरसकून के साथ काम करते रहे हैं पर पिछले एक साल से इनके मकान के ऊपर रह रहे एक भले आदमी ने अपने जैसे ही कुछ खुराफाती लोगों के साथ आपसी मिलीभगत से उनकी शांति भंग कर दी है।

मोहित चौधरी नामक इस आदमी ने,गोगी जी से उनके मकान वाला हिस्सा बेचनें की जिद की और उनके मना करने पर शुरू हुआ उसके द्वारा तंग करने का अंतहीन सिलसिला,इसी क्रम में मोहित चौधरी नामक इस शख्स ने बदतमीज़ी की सारी हदें पार कर दी। इन दोनों कलाकारों पर भारी इन घटनाओं को कोई भी जानकार आपसी झगडें की बात कह कर आसानी से किनारा कर सकता हैं। पर ऐसा करने वालों को यह सोचना होगा कि कल वे भी इन्हीं परिस्तिथियों का शिकार बन सकते हैं।


कला एक व्यक्तिपरक माध्यम है। कोई भी व्यक्ति अपने भीतर मौजूद स्याही में ढूबो-ढूबो कर खूबसूरत अभिव्यक्ती को आकार देने का काम करता है जबकि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार की हालत यह है कि कब किस कलाकार का काम देश की सरकारों के आँख की किरकरी बन जाये कहा नहीं जा सकता। सलमान रशदी और तसलीमा नसरीन को चैन से बैठने नहीं दिया जा रहा और यही हाल एमएफ़ हुसैन जैसे नामचीन कलाकारों का भी है और गोगी जैसी कलाकार को जीवन के इस पडाव पर इस कदर परेशान होना पड रहा है ये सब घटनायें हमारी सामाजिक व्यवस्था की करूण गाथा की एक बार फिर पोल खोलती हैं.

इससे साफ उजागर होता है कि हमारे आस पास गुण्डा तत्व इस कदर हावी है और समाज में उसे पूरी छुट है कि वह किसी बुजुर्ग मकान मालिक को उसके ही घर से बहार निकालने की कोशिश करे और समाज के बाकि लोग भी उन्हीं बदमाश लोगो का समर्थन करें .यह कोई एक बार की घटना नहीं है बल्कि हररोज़ परेशान करने के नये-नये तरीके इजाद किये जाते हैं। कहने को हमारे भारतीय समाज को सहिष्णु,दयालु और महापरोपकारी कहा जाता है पर हम देखते हैं कि किस तरह दुसरे को मुसीबत में देख कर हम कैसे कन्नी काट कर निकल जाते हैं क्योकि जोखिम उठाना हमारे बूते से बाहर की बात है।

जब तस्लीमा जैसी लेखिका की पुस्तकें प्रतिबंधित की जाती है,हुसैन की पेंटिग जलायी जाती है और गोगी और वेद के जीवन की शांति भंग की जाती है तो हमारी अंतरात्मा  में कोई हलचल नहीं होती। जब लोकतंत्र में कदम-कदम पर सेंसर लगा हो तो इस आज़ादी के मायने क्या हैं। गोगी को नज़दीक से जानने वाले जानते हैं कि वे कितनी जिंदादिल,बिंदास और बङे दिल की मल्लिका हैं पर आजकल ज़ोर से ठहाके लगाने के बाद भी उनके चेहरे से उदासी छंटती हुई नहीं दिखाई पङती। उस दिन देर शाम जब मैं गोगी जी से उनके घर,ईस्ट ऑफ़ कैलाश से वापिस आ रही थी तब दिवाकर बनर्जी की फिल्म 'खोसला का घोसला' और अश्विनी-चौधरी की 'धूप' मेरे मानस पटल पर गोते लगा रही थी।

चित्रकार वेद

दोनों फिल्मों में एक सीधा-साधा आदमी अपनी ही ज़मीन पाने के लिये कार्यालयों और थानों में चक्कर काटता रहता है। आज की तारीख में वे दोनों कलाकार भी पुलिस के चक्कर काट रहे हैं पर किसी ठोस कार्यवाही का आश्वासन तक उन्हें नहीं मिल पाया है। सीनियर सिटीज़न फोरम और अनेकों दूसरी जगह जा रहें हैं पर मामला हर बार उन्हीं लोकल पुलिस थाने के पास जा कर अटक जाता है, जहाँ कुछ माहिर खिलाडी बैठे हैं जो अपनी मनमानी करने के अभ्यस्त हैं।

हमारे देश में मानवाधिकारों का ज़ोरो-शोरों से डंका पिटा जाता है,पर हकीकत यह है कि वहाँ सिर्फ शिकायतों का अम्बार इक्कठा होता रहता है,वहाँ किसी प्रकार की मदद की उम्मीद करना बेमानी है। कई मामलों में मानवाधिकार संस्था यह कह कर अपने हाथ खडे कर देती है कि उसके पास अपनी कोई सेना नहीं है और शिकायतें बहुत हैं । तब ये संस्थाऐं महज़ शिकायतें दर्ज करने का दफ्तर बन कर रह जाती हैं उन सरकारी कार्यालयों की तरह जहाँ फाईलों का अम्बार लगा होता है और यहाँ बैठे कई घाघ अधिकारी आर टी आई जैसे सशक्त कानून से भी पीछा छुडाने के तरीके ढूंढ लेते हैं।


वे जानते हैं,उनकी लगाम कसने वाला कोई नहीं,तो इस तरह के मसलों की सुनवाई आखिर कैसे हो। कहीं कोई ठोस सज़ा का प्रावधान नही है। ऐसा अक्सर होता है कि लडकी शिकायत करती है तब भी ससुराल वाले जमानत पर छूट जाते हैं और फिर जुल्म ढाहते हैं। सरकार केवल कानून बना कर अपने कर्तव्यों से मुक्ति पा लेती है।सरकारी कर्मचारी ही जनता को परेशान करने लगे तो फिर न्याय की आस किससे की जाये। क्या कोई स्थायी हल नहीं है?पुराने जमाने में राजा के दरबार में एक बङा सा घंटा लगा होता था,जिसको न्याय की चाह होती उसकेउ घंटा बजाने पर उसे राजा के सामने पेश किया जाता पर आज के जमाने में जनता के सेवक कहलाने वालों तक जनता की गुहार नहीं पहुँच पाती।


न जाने किस तहखाने में वे अपने को समेटे रहते हैं,उनसे मिलने से पहले उनके चाटुकारों से जुझना पडता है और मिलने के बाद मंत्रीगण फाईल उन्हीं चाटुकारों को थमा देते हैं। तब एक सभ्य समाज का नागरिक,सभी तरह के कानून होते हु्ए भी आफिस, थाने- कचहरियों के चक्कर काट कर थक हार कर अपने घर लौटता है और यह कहते हुए अपने जूते के तसमे खोलते हुए कहता है कि इस देश का कुछ नहीं हो सकता और जब कोई नागरिक समाजिक व्यवस्था से लड-भिड कर निराशावादी में पहुँच कर ये वाक्य बोलनें को मज़बूर हो उठता है तब-तब इस लोकतंत्र देश की अंतरात्मा को ठेस पहुँचती है


(कवि विपिन चौधरी साहित्यिक और सामाजिक मसलों पर लिखती हैं,इनसे vipin.choudhary7@gmail.com पर संपर्क  किया जा सकता है.)

Sep 19, 2010

अबकी झांसे में नहीं आयेंगे लोग


अयोध्या के मंदिरों में हनुमान चालीसा के पाठ हो रहे हैं। मोबाइल फोन पर एसएमएस भेजे जा रहे हैं। हिन्दुत्ववादी संगठनों के नेताओं के बयान आ रहे हैं। विश्व हिन्दू परिषद् के अध्यक्ष अशोक सिंघल का कहना है कि अयोध्या स्थित कारसेवकपुरम में मंदिर निर्माण हेतु पत्थर तराशे जा रहे हैं।


संदीप  पाण्डेय  

बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद अयोध्या विवाद पर 24सितम्बर को सम्भावित फैसले के मद्देनजर हिन्दू  साम्प्रदायिक ताकतों ने पुनः अयोध्या में राम मन्दिर का राग अलापना शुरू कर दिया है। जबकि हम सब जानते हैं कि वर्ष 1992में बाबरी मस्जिद विध्वंस व राम मंदिर निर्माण के मुद्दे ने देश की राजनीति को बहुत नुकसान पहुंचाया है।

आम जनता के मुद्दों जैसे गरीबी, बेरोजगारी, किसानों की समस्या, संसाधनों की कमी, भ्रष्टचार आदि को काफी पीछे ढकेल दिया। इस भावनात्मक मुद्दे में लोगों को उलझाकर जन विरोधी आर्थिक नीतियां लागू कीं गईं जिसका फायदा पूंजीपति वर्ग व देशी-विदेशी कम्पनियों को हो रहा है,किन्तु आम जनता परेशान है। यह तो गनीमत है कि 2004 में राष्ट्रीय लोतांत्रिक गठबंधन चुनाव हार गया और संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार बनी, नहीं तो हालत और भी खस्ता होती।

कम से कम सूचना के अधिकार,राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी, वन अधिकार व आने वाले खाद्य सुरक्षा अधिनियमों से ऐसा प्रतीत तो होता है कि सरकार आम जनता के मुद्दों के प्रति भी थोड़ा-बहुत सोचती है। वरना राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन की सरकार तो शायद हमें राम मंदिर व रामसेतु के अलावा कुछ सोचने ही नहीं देती।

दूसरी तरफ बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद ही इस देश में श्रंखलाबद्ध बम धमाके व आतंकवादी कार्यवाइयों को अंजाम दिया जाने लगा। इस लिहाज से बाबरी मस्जिद ध्वंस भारत में आतंकवादी घटनाओं की जननी है। वैसे भी संविधान की रक्षा की शपथ खाकर तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने लोकतंत्र की खुलेआम धज्जियां उड़ाईं। हालाँकि  बीच में ऐसा भ्रम फैलाया गया था कि इस्लामिक संगठन भारत में आतंकवादी कार्यवाइयों को अंजाम दे रहे थे, किन्तु अब जबकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से सम्बन्धित अभिनव भारत का नाम मालेगांव, हैदराबाद की मक्का मस्जिद, अजमेर व समझौता एक्सप्रेस जैसे बम कांडों में आ रहा है तो ऐसा प्रतीत होता है कि भारत को इस्लामिक से ज्यादा हिन्दू  आतंकवाद ने क्षति पहुंचाई है।

क्या करें उन  नेताओं का जो बाँटते हैं लोग
शक की बुनियाद पर तमाम मुस्लिम नौजवान  जेलों में कैद हैं, किन्तु दिनदहाड़े बाबरी मस्जिद गिराने वाला एक भी व्यक्ति जेल में नहीं है। यह विभिन्न सरकारों व शासन-प्रशासन के साम्प्रदायिक चरित्र का भी द्योतक है।

असल में साम्प्रदायिक विचारधारा का लोकतंत्र से कोई तालमेल हो ही नहीं सकता, चूंकि यह विचारधारा संकीर्णता की परिचायक है। बल्कि साम्प्रदायिकता की परिणति सिर्फ फासीवादी सोच में ही हो सकती है। यह ख़ुशी की बात है कि जनता ने साम्प्रदायिक विचारधारा को उत्तर प्रदेश में नहीं,बल्कि पूरे देश में नकारा है। हम उम्मीद करते हैं कि जनता दोबारा साम्प्रदायिक शक्तियों के झांसे में नहीं आएगी। राजनीतिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए धार्मिक भावनाओं का दोहन पूर्णतया अनैतिक है।

देश के नागरिकों को,अयोध्या विवाद पर न्यायालय का जो भी फैसला आए उसका सम्मान करना चाहिए। जो पक्ष फैसले से संतुष्ट न हो, वह सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है। किन्तु सड़क पर उतरकर किसी भी किस्म का शक्ति प्रदर्शन या लोगों की धार्मिक भावनाओं को भड़काने की कोशिश असंवैधानिक कार्यवाही होगी। मंदिर निर्माण को लेकर संघ परिवार से जुड़े संगठनों ने तमाम किस्म की कवायदें शुरू कर दी हैं।

अयोध्या के मंदिरों में हनुमान चालीसा के पाठ हो रहे हैं। मोबाइल फोन पर एसएमएस भेजे जा रहे हैं। हिन्दुत्ववादी संगठनों के नेताओं के बयान आ रहे हैं। विश्व हिन्दू परिषद् के अध्यक्ष अशोक  सिंघल का कहना है कि अयोध्या स्थित कारसेवकपुरम में मंदिर निर्माण हेतु पत्थर तराशे जा रहे हैं। कायदे से अभी जबकि न्यायालय का फैसला भी नहीं आया है और यह तय नहीं है कि मंदिर बनेगा भी अथवा नहीं, इस किस्म की कार्यवाइयां व बयान न्यायालय की अवमानना माने जाने चाहिए और न्यायालय को इनका संज्ञान लेना चाहिए।

देश व अयोध्या की आम जनता के लिए बाबरी मस्जिद-राम जन्म भूमि कोई मुद्दा ही नहीं है। यह संघ परिवार ने जबरदस्ती देश के ऊपर थोपा है। अयोध्या के आम लोगों से बातचीत कर पता चलता है कि यहां लोग इस मुद्दे से कितने परेशान हैं। अयोध्या का आम जन-जीवन प्रभावित हुआ है। लगातार सुरक्षा बलों की उपस्थिति से यहां तनाव बना रहता है। जब-तब कर्फ्यू लगने की आशंका अलग रहती है।

 विवादित स्थल के रामलला को छोड़ अन्य मंदिरों में दर्शन हेतु आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या में गिरावट आई है, जिससे अयोध्या की अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई है। अयोध्या में बड़ी संख्या में लोगों की आजीविका मंदिरों पर निर्भर है। इनमें चढ़ने वाले फूलों की खेती से लेकर पूजा-पाठ की सामग्री के निर्माण के काम में लगे तमाम लोग शामिल हैं जिनमें कुछ मुसलमान परिवार भी हैं।

हम उत्तर प्रदेश सरकार से उम्मीद करते हैं कि जो भी इस मुद्दे का राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश करे, उसके साथ सख्ती से पेश  आएगी। हम यह खतरा नहीं मोल उठा सकते कि संघ परिवार के लोगों को देश में दंगे भड़काने की छूट दी जाए। देश में धर्मनिरपेक्ष लोग और  मुसलमान,जो भी फैसला आएगा उसे मानने को तैयार बैठे हैं। किन्तु संघ परिवार के अचानक सक्रिय होने से ऐसा मालूम पड़ता है कि यदि फैसला इनके अनुकूल न गया तो वे उसे नहीं मानेंगे।

मंदिर निर्माण तैयारी के दो दशक : फैसले पर उम्मीद
 यदि केन्द्र व राज्य सरकार इनके साथ सख्ती से निपटती है और आम हिन्दू इन्हें अपनी धार्मिक भावनाओं के साथ खिलवाड़ नहीं करने देता है तो देश का महौल शांत बना रहेगा एवं साम्प्रदायिक सदभावना सुरक्षित रहेगी। असल में राम मंदिर निर्माण का मुद्दा संघ परिवार के गले की हड्डी बन गया है। इस मुद्दे का इस्तेमाल भारतीय जनता पार्टी की राजनीति को बढ़ाने के लिए ही किया गया।

यदि संघ परिवार का उद्देश्य वाकई मंदिर निर्माण होता तो वह उस किस्म की राजनीतिक दृढ़ता दिखा सकता था जैसी मायावती ने दिखाई है,जिन्होंने राज्य की राजधानी में सरकारी जमीन पर पेड़ काटकर,जनता के धन से कानून बनाकर दलित स्मारकों का निर्माण करा दिया है। परंतु संघ परिवार का उद्देश्य कभी मंदिर निर्माण रहा ही नहीं है। उन्हें तो सिर्फ इस मुद्दे का राजनीतिक दोहन करना है,जो मंदिर बन जाने पर संभव न होगा। यदि संघ परिवार वाकई अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण चाहता है तो वह इसे कारसेवकपुरम की भूमि पर क्यों नहीं बना लेता?

क्या जरुरी है कि मंदिर विवादित स्थल पर ही बने? विश्व हिन्दू परिषद् के स्वामित्व वाली जमीन पर राम मंदिर बनाकर इस विवाद को भी हमेशा-हमेशा के लिए विराम दिया जा सकता है।


(लेखक मैग्सेसे पुरस्कार विजेता और सामाजिक कार्यकर्ता हैं, उनसे  ashaashram@yahoo.com पर संपर्क  किया  जा   सकता  है.)  


Sep 18, 2010

हमें हिंदू नहीं, कट्टर हिंदू चाहिए: राजेश बिडकर


इलाहाबाद हाईकोर्ट 24 सितंबर को अयोध्या के विवादित स्थल के मालिकाना हक को  लेकर फैसला सुनाने वाली है. ऐसे समय में 'भगवा बिग्रेड'मध्य प्रदेश में ‘हिंदू योद्धा भर्ती
अभियान’ चला रही है. इससे भगवाधारियों की नीयत को बड़े आसानी से समझा जा सकता है.वहीं इस मसले पर कांग्रेस नीत केंद्र सरकार और भाजपा की मध्य प्रदेश सरकार की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है.'जर्नलिस्ट्स यूनियन फॉर सिविल सोसायटी' (जेयूसीएस)  की दिल्ली इकाई के स्वतंत्र पत्रकार विजय प्रतापने 'भगवा बिग्रेड'के नेता राजेश बिडकर से उनके मोबाइल नंबर 09977900001  पर 17 सितंबर को सुबह 9.29 बजे और 9.32 बजे, दो बार बातचीत की. स्वतंत्र पत्रकार शाह आलम ने भी 11.45 बजे राजेश बिडकर से बात की. पेश है बातचीत का पूरा ब्योरा. 


विजय: हैलो !

राजेश बिडकर: वन्दे मातरम !

विजय: भगवा बिग्रेड से बोल रहे हैं क्या?

राजेश बिडकर: हां,

विजय: कौन बोल रहे हैं?

राजेश: राजेश बिडकर।

विजय: अच्छा, राजेश जी, मैं विजय प्रताप बोल रहा हूं।

राजेश: कहां से?

विजय: मैं दिल्ली से बोल रहा हूं...

राजेशः कहां से...

विजय: दिल्ली से बोल रहा हूं। मेरे एक साथी ने आपके बारे में बताया था। वो आप लोगों के संगठन से जुड़ रहा है। आपके संगठन से जुड़ने के लिए क्या करना पड़ेगा।

राजेश: आप कहां से बोल रहे हैं?

विजय: मैं तो दिल्ली में हूं, लेकिन रहने वाला जबलपुर का हूं।

राजेश: हूं हूं..पूरा मामला मैं बताता हूं। ये कट्टरवादी विचारधारा वाले युवाओं का संगठन है।हमको भारत को हिंदू राष्ट् बनाने की मांग का उद्देश्य लेकर चल रहे हैं। तीसरा की अन्य हिंदूवादी संगठन जो कि चक्का जाम कर दिया, तोड़-फोड़ कर दी, थाने घेर दी, ट्क रोक लिया। हम लोग ये काम नहीं करते हैं।


विजय: आपका क्या काम-काज है?

राजेश: हम लोग एक कट्टर वैचारिक संगठन तैयार कर रहे हैं दस हजार लोगों का और हम समय-समय पर अपने फरमान जारी करेंगे मुस्लिमों को... और उसका पालन कराना होगा दस हजार लोगों को। और कट्टर विचार ऐसे नार्मल विचारधारा वाले लोग नहीं होने चाहिए ज्यादा से ज्यादा लोग जुड़े नहीं

विजय: आम हिंदू नहीं जो हिन्दुत्व में विश्वास रखते हैं उन्हीं को...

राजेश: आम हिंदू नहीं, जो कट्टर हैं।

विजय: अच्छा कट्टर होने चाहिए...

राजेश: हां।

विजय: आप कह रहे हैं कि फरमान जारी करेंगे, उसकी पालना कैसे कराई जाएगी। क्या हम लोगों को उसकी पालना करानी होगी?

राजेश: कल हमारी बेवसाइट लांच हो रही है, समय-समय पर लोगों को क्या करना है तो वो तो आप तक जानकारी पहुंच जाएगी हाईटेक माध्यम से जानकारी होनी चाहिए। या फिर व्यक्तिगत तौर या फिर पत्र-वत्र... आप तक जानकारी पहुंच जाएगी की क्या करना है।

विजय: ये देश भर में और भी जगहों पर होगा या आप अभी सिर्फ मध्यप्रदेश को टारगेट किए हैं?

राजेश: अभी हमारा टारगेट केवल मध्य प्रदेश है, हमारा सीधा सा मानना है कट्टर हिंदूवादी हैं हम किसी का सर नहीं फुडवाना चाहते न शहर बंद कराना चाहते हैं।

विजय: वहीं मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि हमें करना क्या होगा?

राजेश: करना क्या है, हमारे लोग आप से मिल लेंगे...आप ने अपना नाम बताया, काम बताया हमें लगाता है तो हमारे लोग आप से मिलना चाहिए तो मिलेंगे और बातचीत करेंगे। आप हिंदुस्तान के बारे में क्या सोचते हैं हिंदू समाज के बारे में क्या सोचते हैं हमें लगता है तो हम आपको ले लेंगे। और ये न..ऐसे तो एक हजार हिंदू संगठन चल रहे हैं हिंदुस्तान में...

विजय: हां सही बात सब वोट बैंक की राजनीति करने लगते हैं।

राजेश: आप की आवाज सही नहीं आ रही है...

विजय: अभी ये जो फैसला आने वाला है, उसमें भी कुछ करना है क्या?

राजेश: नहीं ये तो हमारे राष्ट्रीय स्वाभिमान का प्रश्न है ही, पर मुझे जो लगता है कि आने वाले कई वर्षों तक हमें हिंदू समाज के बीच में काम करना है। ये सिर्फ अयोध्या का नहीं है....ये हिंदू समाज का विषय है और कहीं न कहीं हमें कट्टरवादी हिंदू की तैयारी करनी होगी। ऐसे कुछ होने वाला नहीं है।

विजय: इधर भी अपनी कुछ तैयारी है क्या इस फैसले को लेकर?

राजेश:यह जो फैसला आ रहा है इस पर हमारी भूमिका इस लिए नहीं है कुछ...आज दिल्ली में हमारी प्रेस कॉन्फ्रेंस है।

विजय: दिल्ली में कहां, आप बताते तो मैं चला जाता

राजेश: हां...हैलो.... (खरखराहट)

('नई पीढ़ी' ब्लॉग से साभार)




Sep 17, 2010

हिन्दू योद्धा भरती अभियान


जर्नलिस्ट यूनियन फॉर सिविल सोसाइटी (JUCS)की मध्य प्रदेश ईकाई ने जबलपुर रेलवे स्टेशन पर ‘भगवा ब्रिगेड का हिंदू योद्धा भर्ती अभियान’का पोस्टर पाया। यह पोस्टर पूरे मध्य प्रदेश में सार्वजनिक स्थानों पर लगा है। इस पोस्टर में हिन्दुत्वादियों द्वारा प्रस्तावित अयोध्या में राम मंदिर के ढांचे  का छाया चित्र लगा है। 

पोस्टर में स्पष्ट रुप से लिखा है ‘म0 प्र0 में 10000 हिंदू योद्धा की भर्ती अभियान की शुरुआत की है हम हिंदू युवाओं से इस मिशन से जुड़ने की अपील करते हैं’.भगत सिंह, शिवाजी, चंद्रशेखर आजाद, भीम राव अंबेडकर समेत महान और क्रांतिकारी व्यक्तित्वों के फोटो के साथ सावरकर जैसे व्यक्ति जिसने अग्रेंजों से माफी मांगी थी के फोटो का इस्तेमाल करके भगवा ब्रिगेड युवाओं को अपने सांप्रदायिक एजेंडे पर भड़काना चाहता है। हिंदू योद्धा की भर्ती अभियान की बात करने वाले भगवा ब्रिगेड ने इस तथ्य को प्रमाणित कर दिया है कि हिंदू युवाओं को भड़काकर ऐसे संगठन उनका सैन्यकरण कर सांप्रदायिक और आतंकवादी देशद्रोही गतिविधियों में लिप्त करते हैं।


फैसले से पहले की तैयारी: कैसे अमन कायम
भगवा ब्रिगेड के मार्ग दर्शक दामोदर सिंह यादव और संयोजक राजेश विड़कर के छाया चित्र लगे हैं और इनका पता 752 जनता क्वाटर्स,नंदानगर इंदौर और मोबाइल नंम्बर 8120002000, 9977900001 है। ऐसे में JUCS भगवा ब्रिगेड के दोनों नेताओं समेत इस संगठन के पदाधिकारियों और सदस्यों पर देश द्रोह के तहत कार्यवायी करने और दिये हुए पते के मकान को तत्तकाल सीज करने की मांग करता है। साथ ही हमतत्काल प्रभाव से भगवा ब्रिगेड पर प्रतिबंध लगाने की और उच्च स्तरीय जांच की मांग करते हैं . 

मध्य प्रदेश से लगातार हिन्दुत्ववादियों के आतंकवादी घटनाओं में लिप्त होने के मामले पिछले दिनों आए हैं। ऐसे दौर में जब अयोध्या मसले पर फैसला आने वाला है तब ऐसे पोस्टरों का मध्य प्रदेश में जारी होना भाजपा सरकार की मंशा को बताता है कि वो हर हाल में देश का अमन-चैन बिगाड़ने पर उतारु है।
ऐसे में सवाल उठता है कि  मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह जो संघ गिरोह के आतंक पर यूपी में आकर राजनीति करते हैं वो इस मसले पर क्यों चुप हैं। jucsका साफ मानना है कि  मध्य प्रदेश की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस कांग्रेस हिंदू वोट बैंक के खातिर इस गंभीर मसले पर चुप  है। जाहिरा तौर पर  सांप्रदयिक तनाव में वह अपना भविष्य खोज रही है।



Sep 16, 2010

कहां जायेंगे राष्ट्रमंडल के निर्माता

राष्ट्रमंडल खेल अथ भ्रष्टमंडल  कथा भाग- 1

 

राहुल लल्ला आये भी,बोले भी पर हम उनसे मिल न सके कि उनकी पार्टी के लोगों ने कहा था कपड़ा पहन कर आओ और हम गमछी में थे। सोचा था अपना दुख कहेंगे,गांव की भूख कहेंगे पर कमर में अटकी गमछी ने सब चौपट  कर दिया।

अजय प्रकाश

रामकुमार अहिरवार जब बांदा रेलवे स्टेशन पर छह महीने पहले उत्तर प्रदेश संपर्क क्रांति एक्सप्रेस में दिल्ली आने के लिए बैठे थे  तो राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारी के लिए हो रहे निर्माण में काम मिलना जिंदगी को साकार करने जैसा लगा था। दिल्ली में कई साल निर्माण मजदूर का काम कर गांव लौटे मजदूर ने काम की जिन बुरी स्थितियों का जिक्र किया,उसे रामकुमार ने मजाक में उड़ा दिया था। गांव के मजदूर ने यह भी बताया था कि कई मजदूरों की जवान बीबियां या बेटियां वहां से वापस नहीं लौट रहीं,तो रामकुमार ने मर्दानगी का वास्ता दे कसे बाजुओं की मछलियों को लहराया था कि ‘कौन बुरी निगाह मेरी बेटी-बीबी पर डाल सकता है।’


खेल ख़त्म होने के बाद कहाँ जायेंगे मजदूर                फोटो-आरबी यादव

दिल्ली के निजामुद्दिन रेलवे स्टेशन पर उतरने के बाद की कहानी अब रामकुमार की जुबानी सुनिये,-‘तीन बेटियां,एक बेटा,मैं और मेरी बीबी,बुंदेलखंड के उस गांव से चले थे जहां भूख से हुई मौतों के बाद कांग्रेस पार्टी के राहुल लल्ला एक बार गये थे। लल्ला आ रहे हैं,इसके लिए मैदान से घास छिली गयी, मिट्टी बराबर हुई और स्टेज सजा। लल्ला आये भी,बोले भी पर हम उनसे मिल न सके कि उनकी पार्टी के लोगों ने कहा था कपड़ा पहन कर आओ और हम गमछी में थे। सोचा था अपना दुख कहेंगे,गांव की भूख कहेंगे पर कमर में अटकी गमछी ने सब चैपट कर दिया। निराश हो हम फिर एक बार कुदाल लेकर उन सूखे खेतों में अनाज उगाने में लगे रहे, जहां इतना नहीं उपजा कि हम छोटे बेटे को बचा सकें और बाकी परिवार कुपोषित न हो।’

इतना बताने के साथ रामकुमार ने दिल्ली में काम की साइट और गांव का नाम न छापने का आग्रह किया। उनकी राय में गांव का नाम छपेगा तो बदनामी होगी और साइट का पता चलेगा तो रोटी जायेगी। अब रामकुमार गमछी में नहीं हैं। राष्ट्रमंडल खेलों ने उन्हें पैंट-बूशर्ट दे दी है और वे गमछी से पसीना पोंछते हैं,कभी जमीन पर बिछा रोटी रख खा लेते हैं।

रामकुमार गमछी से आंसू पोंछते हुए कहते हैं,‘गांव में हम एक भूखे परिवार थे और शहर में हम खाने पर काम करने वाले बंधुआ हो गये हैं। 12 घंटे काम के बदले मुझे 110, बीबी को 90 और दो बेटियों को अस्सी-अस्सी रूपये मिलते हैं जो कुल मिलाकर 360रूपये होते हैं। हालांकि ठेकेदार ने कहा था रोज आठ घंटे काम के बदले 600 दिलवायेगा, मजदूरी रोजाना शाम को मिलेगी और रहने के लिए आवास होगा।

राष्ट्रमंडल खेलों में काम करने वाले दूसरे मजदूरों के क्या हालात हैं के बारे में रामकुमार कहते हैं,‘कभी मिथुन चक्रवर्ती की फिल्म देखी है। जिस तरह उसकी फिल्मों में एक मजदूर का दर्द दिखाकर जिंदगी बयां होती है वैसे ही जिन बातों के बारे में मैंने बताया है, यहां सबकी वही गति है।’

खेल गांव से मात्र किलोमीटर की दूरी पर सराय काले खां सड़क के किनारे फुटपाथ पर टाइल्स चिपका रहे मजूदर से बात करने पर पता चलता है कि उसकी बीबी, किसी लड़के साथ चली गयी है। उसे जब यह आभास हो जाता है कि पूछने वाला पत्रकार है तो वह कह पड़ता है, -‘अब आप पूछेंगे कि काहे तो सुन लीजिए, - मेरी बीबी को यहां काम करना और सात फुट उंचे टीन में रहना,वह बिना पंखा के रास नहीं आ रहा था। वह मुझसे कई बार बोली की कमरा ले लो,तो हमने कह दिया था कि फिर बचत नहीं हो पायेगी। उसके बाद दो-तीन दिन रूठी रही और एक दिन आगरा पहुंच कर फोन करती है कि वह किसी मैकेनिक के साथ रह रही है। बस इतनी कहानी है, अब आपका काम हो गया, मुझे अपना काम करने दीजिए।’

यह कुछ नजीरें और चंद मामले उन लोगों के हैं जिनकी बदौलत 3अक्टूबर से होने जा रहे राष्ट्रमंडल खेल का बेहतर आयोजन दुनियाभर में देश की शान -ओ शौकत  में इजाफा करेगा। दिल्ली और केंद्र की कांग्रेस सरकार खेल के सफल आयोजन में इतने मतांध हो गये हैं कि लाखों की संख्या में काम पर लगे मजदूरों की न्यूनतम जरूरतों को पूरा करने के हर इकरारनामें पर सवाल पूछने से उन्हें देशद्रोह की बू आने लगती है।

पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल राइट्स नाम के मानवाधिकार संगठन ने हाल में जारी एक रिपार्ट में कहा है कि निर्माण स्थलों पर श्रम कानूनों के लगातार उल्लंघन हो रहे हैं लेकिन सरकारी एजेंसियां इन मामलों पर बिल्कुल भी गौर करना नहीं चाह रही हैं। तय न्यूनतम मजदूरी न देना, ओवरटाइम के बदले कोई अतिरिक्त भुगतान नहीं, कोई साप्ताहिक छुट्टी नहीं, मजदूरी अनियमित दिया जाना, प्रमाण के तौर पर मजदूरी की रसीद या प्रमाण पत्र तक न देना, कानून के अंतर्गत अनिवार्य माने जाने वाले ‘मस्टर रोल’ या दूसरे रिकॉर्ड न रखना,सुरक्षा के सामान मुफ्त में न देना,प्रवासी मजदूरों को यात्रा भत्ता न देना, महिला मजदूरों का कम वेतन और आवासिय सुविधाओं का अभाव जैसे मामले साबित करने के लिए काफी हैं कि बेगारी कराकर राष्ट्रमंडल खेलों के नींव में कितना खून-पसीना राष्ट्रमंडल खेलों में मजदूरों का जज्ब हुआ है। पीयूडीआर के सचिव और पत्रकार आशीष गुप्ता ने कहा कि सिर्फ सरकार ने जिन 40 हजार मजदूरों के राष्ट्रमंडल खेलों में काम करने की बात स्वीकारी है,अगर उसी में हो रही लूट को जोड लिया जाये तो ठेकेदार हर महीने मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी और ओवरटाइम न देकर 30 करोड़ और सलाना 360 करोड़ रूपये हड़प रहे हैं।’

कुछ स्वंय सेवी संगठनों का दावा है कि दिल्ली में खेलों के हो रहे काम में करीब चार लाख मजदूर लगे हैं। मजदूर चूंकि परिवार समेत रह रहे हैं इसलिए उनके बच्चों की संख्या भी अस्सी हजार के करीब है। जब जबकि राष्ट्रमंडल खेलों में पखवाड़े भर का समय बचा हुआ है वैसे में यह सवाल सबसे प्रमुखता से उभर कर आ रहा है कि लाखों की संख्या में काम पर लगे मजदूर और उनके परिवार निर्माण काम खत्म होने के बाद कहां जायेंगे। जेपी गु्रप के कंस्ट्रक्शन साइट पर काम करने वाले कारीगर दीनानाथ गौड़ कहते हैं कि, ‘मैं वहां पिछले छह वर्षों से काम कर रहा हूं लेकिन यहां ज्यादा पैसा मिलने की वजह से चला आया हूं, अब कहां काम मिलेगा।’

दीनानाथ तो फिर भी कुशल मजदूर हैं लेकिन सवाल है कि जो अकुशल मजदूर फैक्ट्रियों और दूसरी जगहों से काम छोड़ लौटे हैं आखिर उनकी भरपायी कहां होगी। ऐसे में प्रश्न यह राष्ट्रमंडल निर्माण काम पूरा होने के बाद एकाएक इतनी बड़ी संख्या में जो मजदूर और उनके परिवार बेरोजगगार होंगे उनको काम कहां मिलेगा और काम से बड़ी समस्या क्या आवास की उभरकर सामने नहीं आयेगी। पीयूडीआर की शशि  सक्सेना कहती हैं कि ,‘इस मामले में सरकार की कोई योजना नहीं है। सरकार को कामगारों की बेकारी पर कोई ठोस योजना बनानी चाहिए जिससे वह दूसरे काम की जगहों पर शिफ्ट किये जा सकें।’



Sep 14, 2010

बिहार में मुस्लिम मुख्यमंत्री क्यों नहीं?


बिहार विधानसभा 2005 चुनाव के बाद 'मुख्यमंत्री मुस्लिम हो' को लेकर कई दिनों तक सियासी ड्रामा चलता रहा, जिसके पीछे लालू-पासवान की वोट बैंक की सियासत ही थी। रामविलास पासवान मुस्लिम मुख्यमंत्री का पाशा फेंककर लालू प्रसाद के मुस्लिम वोट पर काबिज होना चाहते थे।

पंकज कुमार

बिहार में चुनावी बिगुल बज चुका है लेकिन उससे पहले पाटलिपुत्र के युद्ध में हर दल या मोर्चा-दूसरे मोर्चे की राजनीतिक जमीन अपने पक्ष में करने की कोशिश में जुटा है। राजनीति के इस खेल में कौन किस पर भारी पड़ेगा, इसकी कुंजी तो जनता जनार्दन के पास है। लेकिन उससे पहले नेता वोट की राजनीति को जात-पात,सामाजिक ध्रुवीकरण के इर्द-गिर्द केंद्रित करने की कोशिश में जुटे हैं।

पिछले बिहार विधानसभा चुनाव में मात खाए लालू यादव और रामविलास पासवान ने राजनीतिक इच्छा व्यक्त की कि राज्य में एक मुस्लिम उपमुख्यमंत्री हो। इसका सीधा मतलब हुआ कि अगर विधानसभा चुनाव के बाद लालू-पासवान के गठजोड़ वाली सरकार बनी तो राज्य में मुख्यमंत्री के साथ दो उपमुख्यमंत्री भी होंगे। लेकिन लालू-पासवान की इस मंशा पर शक और सवाल उठना लाजिमी है।

सबसे अहम सवाल कि सत्ता में आने पर मुस्लिम उपमुख्यमंत्री ही क्यों, मुख्यमंत्री क्यों नहीं? दूसरा सवाल क्या यह मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति नहीं है? तीसरा सवाल क्या यह जनभावना है? चौथा सवाल जब संयुक्त तौर पर सीट और कुर्सी का बंटवारा हुआ उस वक्त यह घोषणा क्यों नहीं की गई? पांचवा सवाल सामाजिक ध्रुवीकरण के बदले विकास के मुद्दे चुनावी एजेंडा क्यों नहीं?


लालू-पासवान: चुनाव की यारी
ऐसे कई सवाल हैं जो लालू-पासवान की टीम द्वारा मुस्लिम को उपमुख्यमंत्री बनाए जाने की वकालत को कटघरे में खड़ा करते हैं। सवाल यह भी है कि किसी मुस्लिम को मुख्यमंत्री पद पर आसीन करने के मुद्दे पर फरवरी 2005 के विधानसभा चुनाव के बाद लालू प्रसाद और रामविलास पासवान आपस में भिड़ गए। इस प्रकरण के बाद पासवान ने समर्थन देने से मना कर दिया। आखिर 2010 विधानसभा चुनाव आते-आते पासवान का मुस्लिम प्रेम पीछे क्यों छूट गया? यह लालू-पासवान की राजनीतिक अवसरवादिता नहीं तो और क्या है? फरवरी 2005 में लालू यादव अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे,जबकि रामविलास पासवान किसी मुस्लिम को मुख्यमंत्री बनाने पर अड़े थे।

नाक की इस लड़ाई की वजह से बिहार को राष्ट्रपति शासन और साल के भीतर दूसरी बार चुनाव का सामना करना पड़ा। गौरतलब है कि पांच साल पहले पासवान ने ही मुस्लिम मुख्यमंत्री का नारा दिया, लेकिन इस बार जब भावी मुख्यमंत्री की उम्मीदवारी का मौका आया तो लालू के नाम पर सहमति दे दी। इतना ही नहीं उपमुख्यमंत्री पद पर अपने छोटे भाई पशुपति पारस की दावेदारी करने में जरा भी देरी नहीं की। इस ऐलान पर जब खलबली मची तब जाकर पासवान ने गठबंधन सरकार बनने पर मुस्लिम को उपमुख्यमंत्री बनाने का आश्वासन दिया।

बिहार विधानसभा 2005 चुनाव के बाद मुख्यमंत्री किसी मुस्लिम को बनाने को लेकर कई दिनों तक सियासी ड्रामा चलता रहा,उसके पीछे भी लालू-पासवान की वोट बैंक की सियासत ही थी। रामविलास पासवान मुस्लिम मुख्यमंत्री का पाशा फेंककर लालू प्रसाद यादव के मुस्लिम वोट पर काबिज होना चाहते थे। उनकी मंशा बिहार में लालू प्रसाद यादव से बड़े जनाधार वाला नेता के तौर पर उभरने की थी। इतना ही नहीं वह अपनी छवि दलित नेता तक ही सीमित नहीं रखना चाहते थे। 2005 में  लोजपा प्रमुख का गुप्त एजेंडा यह था कि मुस्लिम-दलित समीकरण के जरिए राज्य के करीब 32फीसदी वोट पर सेंध लगा सके। लेकिन लालू यादव ने रामविलास पासवान के इस राजनीतिक दांव को कामयाब नहीं होने दिया। उन्होंने एमवाई (मुस्लिम-यादव) समीकरण को बनाए रखने के लिए सरकार नहीं बनाना ही बेहतर समझा और राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ा।

दोनों दलों के प्रमुखों का यह ऐलान उनके आत्मविश्वास में कमी, कमजोर पड़ती सियासत और चुनाव पूर्व हार के डर को भी दिखाता है। वर्ष 1990 में लालू यादव ने जब बिहार की सत्ता संभाली तो उस वक्त मुस्लिमों ने भागलपुर दंगों की वजह से कांग्रेस से दूरी बनाई और जनता दल को वोट दिया। वर्ष 1997में लालू यादव ने जनता दल से अलग होकर राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) का गठन किया और अल्पसंख्यकों को बीजेपी के साम्प्रदायिक चेहरे का डर दिखाकर वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करते रहे। लेकिन 2005 विधानसभा चुनाव में एनडीए ने जेडीयू नेता नीतीश कुमार का सेक्युलर चेहरा पेश किया,तो आरजेडी का एमवाई (मुस्लिम-यादव) तिलिस्म टूट गया।

लालू से मोहभंग हो चुके अल्पसंख्यकों ने न सिर्फ आरजेडी से बल्कि एलजेपी से भी किनारा कर लिया। पिछले पांच साल में नीतीश सरकार की कार्यशैली से अल्पसंख्यक समाज में रोजगारोन्मुख,भयमुक्त और गैर संप्रदायवाद का संदेश गया है। मुस्लिम वोटरों के इस रुख से लालू-पासवान की परेशानी बढ़ना लाजिमी है। यही वजह है कि दोनों नेता एमवाईडी (मुस्लिम-यादव-दलित)समीकरण का हथकंडा अपना रहे हैं।


किसकी लाज बचाएं मुसलमान : किसके साथ जाएँ मुसलमान
 राजनीति के माहिर दोनों नेता जातीय समीकरण की बदौलत करीब 11फीसदी यादव, 16 फीसदी दलित और राज्य की आबादी के करीब 16फीसदी मुस्लिम वोटरों को गोलबंद कर सत्ता का सुख भोगना चाहते हैं। इस पूरी आबादी को जोड़ा जाए तो यह कुल आबादी का 43फीसदी है। मुस्लिम उपमुख्यमंत्री का शिगूफा इसी कड़ी का एक हिस्सा भर है। आरजेडी-एलजेपी का कहना है कि राज्य में दो-दो उपमुख्यमंत्रियों  का होना कोई नई बात नहीं है। अगर दोनों नेताओं को लगता है कि इस समीकरण से मुस्लिम-यादव-दलित मतदाता एक हो जाएंगे और उनका गठबंधन जीत जाएगा, तो वह इस तरह के दर्जनों उपमुख्यमंत्रियों की घोषणा कर सकते हैं।

आरजेडी प्रमुख लालू यादव की पार्टी ने बिहार में लगातार 15 साल तक एमवाई यानी मुस्लिम-यादव समीकरण के भरोसे शासन किया, पिछड़े समुदाय के साथ-साथ अल्पसंख्यक समुदाय ने भी लालू यादव का पूरा साथ दिया। जातीय-धार्मिक भावना उभारकर आरजेडी लगातार तीन बार सत्ता में बनी रही और इस बार भी रोजी-रोटी, सामाजिक बराबरी के बदले जज्बाती सवालों पर गोलबंदी की जा रही है। अच्छा तो यह होता कि लालू-पासवान जनभावनाओं को ख्याल में रख कर रोजी-रोटी, गरीबी, बिजली, सड़क, पानी, भ्रष्टाचार, सूखा, लालफीताशाही को मुद्दा बनाते और बिहार की जनता के सामने बेहतर विकल्प पेश करते। इसमें कोई शक नहीं कि विधानसभा चुनाव में जाति का प्रभाव रहेगा ही।

दोनों नेता भले ही अक्टूबर 2005विधानसभा चुनाव की हार को आरजेडी-एलजेपी गठबंधन का टूटना और लोगों में भ्रम की स्थिति को कारण बता रहे हों, लेकिन सच यह है कि बिहार की जनता तुच्छ राजनीति से तंग आ चुकी थी  और उन्हें जनता से जुड़े सरोकार वाली सरकार चाहिए थी। यही वजह है कि अक्टूबर में विधानसभा चुनाव के बाद हुए लोकसभा चुनाव में आरजेडी चार सीटों पर सिमट गई,जबकि रामविलास पासवान की पार्टी लोजपा का सूपड़ा साफ हो गया। राज्य में इसके बाद हुए उपचुनाव में भी एनडीए गठबंधन को बड़ी जीत मिली। इस बीच यह जरूर हुआ कि सितंबर 2009 में बिहार विधानसभा के 18 क्षेत्रों में हुए उपचुनाव में एनडीए गठबंधन 13 सीटों पर हार गया। बटाईदारी विवाद से उत्पन्न विशेष उन्मादपूर्ण परिस्थिति में वे उपचुनाव हुए थे। तब से अब तक राज्य की राजनीतिक परिस्थिति व मनःस्थिति बदल गई लगती है।

लालू प्रसाद और रामविलास पासवान ने राजनीति के गुर समाजवादी जननेता जयप्रकाश नारायण और लोहिया जी से भले ही सीखे हों, लेकिन सत्तासुख के लालच ने दोनों नेताओं को अपने सिद्धांतों से भटका दिया है। मौजूदा राजनीति को देखकर लगता है कि आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद और लोजपा प्रमुख रामविलास पासवान सामाजिक सरोकारों के मुद्दों से दूर होते जा रहे है। लालू-पासवान की जोड़ी जब से राज्य और केंद्र की सत्ता से दूर हुई है तब से दोनों कदमताल मिलाते चल रहे है। उन्हें पता है कि जब तक उनके पास संख्या बल नहीं होगा, तब तक दिल्ली और पटना में उन्हें पूछनेवाला कोई नहीं।


लेखक दूरदर्शन में 'जागो ग्राहक जागो' कार्यक्रम में बतौर सहायक प्रोडूसर 
काम कर चुके हैं, फिलहाल एक पाक्षिक अख़बार में सहायक संपादक हैं इनसे  kumar2pankaj@gmail.com पर  संपर्क किया जा सकता है.

Sep 12, 2010

क्यों न हो उच्च नैतिकता की मांग !


महिलाओं का यौन शोषण करनेवाले मार्क्सवादी इन शिविरों के बाहर भी हैं। अफसोस की बात है कि यह शर्मनाक स्थिति दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रतिष्ठित मार्क्सवादी शिक्षकों तक पसरी हुई है। इन ‘विभूतियों’ के खिलाफ वे आखिर चुप क्यों हैं, जिनको आती है भाषा?


राजू रंजन प्रसाद

मृणाल वल्लरी का लेख मैंने दो बार पढ़ा। पहले आपके ब्लॉग  पर और पुनः इसे जनसत्ता में। कहना होगा कि इस लेख में मुझे ऐसा कुछ लगा जिससे कह सकता हूं कि दो बार पढ़ने में लगा मेरा श्रम बेकार नहीं गया। किन्हीं को अगर ‘नवोदित’ पत्रकार की ‘बाल-सुलभ’ टिप्पणी लगी हो, तो मात्र इस कारण से मैं इस लेख को ‘खारिज’ नहीं कर सकता।

इस लेख में मुझे लगा कि पत्रकार (संयोग कहिए कि वह महिला पत्रकार हैं,यद्यपि  मैं इस तरह के विभाजन में दिलचस्पी नहीं रखता।) की एक पीढ़ी तैयार हो रही है जो किसी भी मुद्दे को एक ‘संवेदनात्मक जुड़ाव’ के साथ, जिसे आप प्रतिबद्धता कह ले सकते हैं, उठाने के खतरे झेलने को तैयार है।

कुछ लोग इसे ‘नाम कमाने की भूख’और ‘नारीवादी उच्छ्वास’ से भी जोड़कर देख सकते हैं। जिनके अंदर प्रतिबद्धता और ईमानदारी की आग नहीं होती, वे ऐसी बातें बड़ी ही सहजता से कह सकते हैं। बगैर किसी दुविधा और अपराध-बोध के। यहां तो लोग महात्मा गांधी तक की ईमानदारी और वचनबद्धता को ‘मजबूरी का नाम गांधी’साबित कर डालते हैं। मृणाल तो फिर भी ‘नवोदित’ हैं।

इस लेख से अगर माओवाद विरोधी अथवा कुछ अवांछित कहे जा सकनेवाले संदेश गये हैं तो इसके कुछ कारण भी हैं। कुछ कारणों को लेख में अंतर्निहित माना जा सकता है तो कुछ को मोहल्ला लाइव के मॉडरेटर महोदय द्वारा सृजित साजिश के रूप में। साजिश  का यह खेल खेला गया लेख की प्रस्तुति के स्तर पर। याद करें कि अखबार में इस लेख का शीर्षक ‘लाल क्रांति के सपने की कालिमा’था। मॉडरेटर महोदय ने इसका शीर्षक लगाया ‘क्या माओवादी दरअसल बलात्कारी होते हैं?’

एक नक्सल मिजाज का आदमी ऐसे शीर्षक से भरसक बचेगा। यह लेखिका का पहले से दिया हुआ शीर्षक नहीं था, बल्कि मॉडरेटर द्वारा सनसनी फैलाने के लिए गढ़ा गया। तिसपर मॉडरेटर की माओवाद की पक्षधरता! मुझे यह आसानी से हजम होनवाली बात नहीं लगती। अफसोस की बात तो यह है कि कुछ क्रांतिवीर ऐसी गलतियों की तरफ ध्यान न दिलाकर, उल्टे लोगों को अविनाश  जी का ‘पॉलिटिकल स्टैण्ड’ बताने लगते हैं।

स्त्री-अस्मिता’ की लड़ाई लड़नेवाले अरविन्द शेष  को बताना चाहिए था कि खुद मॉडरेटर महोदय स्त्रियों के यौन-शोषण के आरोपी रहे हैं। ईमानदार पाठकों-पत्रकारों से हमारी अपेक्षा है कि ऐसे दोहरे चरित्रवाले टिप्पणीकारों की हरकत पर वे नजर रखेंगे।

मृणाल की इस बात से कि माओवादी शिविरों  में महिलाओं का यौन शोषण होता है,मुझे इनकार नहीं है। शायद किसी को न होगा। अलबत्ता इसे ‘आम बात’ कहने पर असहमति बनती है। लेखिका को यह ‘आम बात’ बाहर की दुनिया में नजर आनी चाहिए थी। कहना चाहिए था कि हमारे समाज में महिलाओं का यौन शोषण ‘आम बात’ है, ऐसी कुछ घटनाएं माओवादी शिविरों तक में देखी जा सकती हैं।

वल्लरी का मानना सही है कि माओवादी शिविरों में भर्ती किये जानेवाले कामरेडों को मार्क्सवाद  की कड़ी शिक्षा  से गुजरना पड़ा होगा। यह भी कि उनके पास एक आदर्श  समाज स्थापित करने का सपना है। और सारा त्याग,सारी कुर्बानी भी उसी के लिए है। तो कम-से-कम वहां तो एक उच्च नैतिकता का मॉडल प्रस्तुत किया जाना चाहिए था। बेशक  ऐसी मांग की जानी चाहिए।

चौकी-चौके में अंतर नहीं                    फोटो: अजय प्रकाश
लेकिन हमें मानना पड़ेगा कि इसमें सिर्फ माओवादी ही विफल नहीं रहे हैं। भारत की अन्य जो दूसरी मार्क्सवादी  पार्टियां हैं उनकी पोलित ब्यूरो में भी क्या कम्युनिस्ट समाज की नैतिकता वाला मानदंड स्थापित हो सका है?शायद नहीं। आज भी इन मार्क्सवादी  पार्टी कार्यालयों में चाय बनाने और झाड़ू लगानेवाले क्या उससे ऊपर उठ सके हैं? जाहिर है, उत्तर नकारात्मक होगा। हम-आप सब जानते हैं कि इन वामपंथी पार्टियों में भी खून देनेवालों की अलग श्रेणी है तो फोटो खिंचानेवालों की अलग ही प्रजाति है।

हम यह भी जानते हैं कि महिलाओं का यौन शोषण करनेवाले मार्क्सवादी इन शिविरों के बाहर भी हैं। अफसोस की बात है कि यह शर्मनाक स्थिति दिल्ली विश्वविद्यालय  के प्रतिष्ठित  मार्क्सवादी शिक्षकों तक पसरी हुई है। इन ‘विभूतियों’ के खिलाफ वे आखिर चुप क्यों हैं, जिनको आती है भाषा ?

वल्लरी पूछती हैं कि ‘क्या मुकम्मल राजनीतिक शिक्षण  के बिना पार्टी में कॉमरेडों की भर्ती हो जाती है?’ जिसके अंदर मार्क्सवाद के लिए थोड़ी भी सदास्था बची है,ऐसे सवाल उठेंगे। कुछ दिनों पहले केरल के पूर्व सीपीएम सांसद कुरिसिंकल एस मनोज को व्यक्तिगत जीवन में धार्मिक आस्था प्रकट और अभिव्यक्त करने के लिए पार्टी की सदस्यता से जब हाथ धोना पड़ा था, तो मैंने भी अपने लेख में यही सवाल उठाया था कि ऐसे लोगों को जिनकी दृष्टि प्रगतिविरोधी एवं अवैज्ञानिक समझ पर आधारित हो,क्या कम्युनिस्ट पार्टी का सदस्य बनाया जाना चाहिए ?

क्या कारण है कि लगभग पचास वर्षों तक सीपीएम (बिहार) के नेता रह चुके चुनाव की घोषणा होने से ठीक पहले जदयू का दामन थाम लेते हैं। हमें इन तमाम सवालों को (यौन शोषण  समेत) सिर्फ माओवाद के संदर्भ में ही नहीं, बल्कि एक व्यापक संदर्भ में उठाना चाहिए।

Sep 11, 2010

दुष्प्रचार और भीतरघात साथ-साथ


सभी उपनिवेशवादी,ख़्वाह वे पुराने हों या नये,अपने मनसूबों को पूरा करने के लिए स्थानीय पिट्ठुओं पर ही निर्भर करते हैं.और अगर ये पिट्ठू अपने वर्गीय और सामाजिक रुझान से उनके साथ हों तो सोने में सुहागा हो जाता है.


नीलाभ



मेरे खयाल में अंजनी ने मृणाल वल्लरी के दुष्प्रचार का बहुत सही जवाब दिया है, हालांकि जनसत्ता, उसके गुर्गे, आम मीडिया, और कुछ स्वघोषित ब्लौगिये समाज सेवी और "सच्चाई के ठेकेदार" अपना शोर जारी रखे हुए हैं. यहां कुछ बातों को समझ लेना बहुत ज़रूरी है.

पहली बात तो यह है कि हमारी जनता जिन मुद्दों पर अपनी लड़ाई लड़ रही है,वे पहले की तरह सिर्फ़ ज़मीन या श्रम पर अधिकार की लड़ाई नहीं रह गयी है,न यह किसी एक फ़िरन्गी ताक़त और उसके पिट्ठुओं के ख़िलाफ़ किया जा रहा संघर्ष है.यह लड़ाई विश्व पूंजी और उनके दलालों के ख़िलाफ़ है जो एक नये उपनिवेशवादी ढांचे को लागू करके हमारे देश पर क़ब्ज़ा करना चाहते हैं.वेदान्त हो या पॉस्को  या एनरौना  या टाटा या जिन्दल -- इनका सूत्र संचालन अब amrika  , जापान, विश्व बैंक, अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोश और आवारा पूंजी के हाथ में है.

दूसरी बात यह है कि सभी उपनिवेशवादी,ख़्वाह वे पुराने हों या नये,अपने मनसूबों को पूरा करने के लिए स्थानीय पिट्ठुओं पर ही निर्भर करते हैं.और अगर ये पिट्ठू अपने वर्गीय और सामाजिक रुझान से उनके साथ हों तो सोने में सुहागा हो जाता है. इसलिए नरसिंह राव हों या मनमोहन सिंह, पी. चिदम्बरम हों या मोनटेक सिंह आहलूवालिया -- ये सब उनके प्राक्रितिक सहयोगी हैं.

तीसरी बात,नव उपनिवेश्वादियों और उनके स्वाभाविक सहयोगियों के मनसूबे तब तक सफल नहीं हो सकते जब तक "बांटो और लूटो"की पुरानी आज़मूदा नीति पर अमल न किया जाये,चुनांचे देशवासियों के एक अच्छे-ख़ासे तबक़े को इस लूट का चूरा देना अनिवार्य होता है.परम्परागत रूप से मध्यवर्ग का एक बड़ा हिस्सा इसका लाभार्थी बनता है.यही वजह है कि पत्रकारिता और शिक्षक दिवसों पर पराड़कर और गणेश शंकर विद्यार्थी और ईश्वरचन्द्र विद्यासागर के गुण गानेवाले और त्याग और बलिदान और संयम का राग अलापने वाले आज अश्लील तनख़्वाहों का मज़ा लेते हुए सच्चाई के अलमबरदार बने हुए हैं.दिलचस्प बात यह है कि परम्परागत रूप से यही तबका परिवर्तन का विरोधी भी होता है और परिवर्तन का पक्षधर भी इसलिए सत्ताधारी और उसके गुर्गे इसके परिवर्तन विरोधी हिस्से को अपने आक्रमण के हाथ और हथियार बनाते हैं.

पढाई करतीं महिला गुरिल्ला                  फोटो: अजय प्रकाश
स्वामी अग्निवेश और मृणाल वल्लरी इसी परिवर्तन विरोधी,सत्ता समर्थक तबक़े के सबल प्रतिनिधि हैं और इन्हें पूंजीवादियों के पिट्ठुओं के रूप में ही देखा जाना चाहिए.एक अगर बाहर से दुष्प्रचार करते हुए जनद्रोह कर रहा है तो दूसरा भीतरघात करके.

खैर,ये बातें बहुत प्राथमिक स्तर की बातें हैं और आप सब इन्हें जानते ही हैं.इस पृष्ठभूमि को पेश करने के पीछे मेरा आशय दोहरा है.

पहले तो यह कि अगर हम स्वामी अग्निवेश के वर्गीय चरित्र और भीतर्घत के उनके इतिहास से परिचित थे तो हमने उन्हें छत्तीसगढ़,झारखण्ड और अन्य इलाक़ों में आदिवासियों से कन्धा मिला कर लड़ रहे साथियों और हमारी दमनकारी,जनविरोधी सरकार के बीच इतने संवेदनशील मामले पर स्वयंभू मध्यस्थ बनने का अवसर ही क्यों प्रदान किया ?आज़ाद और उनके साथियों ने भी उन्हें अपनी ओर से मध्यस्थता करने की ज़िम्मेदारी क्यों सौंपी ?शान्ति-वार्ता को विफल करने का इरादा गृहमन्त्री पी.चिदम्बरम का ही नहीं था,कहीं-न-कहीं इस में स्वामी अग्निवेश का भी बहुत योगदान है.और जिस तरह से आज़ाद और हेम चन्द्र पाण्डेय की निर्मम हत्या की गयी और फिर उसके बाद गिरफ़्तारियों और सनसनीखेज़ और सरासर झूठे रहस्योद~घाटनों का सिलसिला शुरू हो गया है,उससे यह साफ़ है कि स्वामी अग्निवेश और मृणाल वल्लरी एक ही विराट थैली के चट्टे-बट्टे हैं.झूठी ख़बरों और दुष्प्रचार का जो तूमार मृणाल वल्लरी ने बांधा है वह गृहमन्त्री और सरकार की धोखेधड़ी का ही एक शाख़साना है.

ऐसे में इस भूल-ग़लती के लिए कौन ज़िम्मेदार है जो कवि मुक्तिबोध के शब्दों में "आज बैठी है जिरह-बख़्तर पहन कर तख़्त पर दिल के" ? कितनी prophetic, भविष्यसूचक हैं आगे की पंक्तियां --

छाये जा रहे हैं सल्तनत पर घने साये स्याह,
सुल्तानी जिरह-बख़्तर बना है सिर्फ़ मिट्टी का,
वो -- रेत का-सा ढेर -- शाहंशाह,
शाही धाक का अब सिर्फ़ सन्नाटा !!
( लेकिन, ना ज़माना सांप का काटा )
भूल ( आलमगीर )
मेरी आपकी कमज़ोरियों के स्याह
लोहे का जिरह-बख़्तर पहन, ख़ूंख़ार
हां ख़ूंख़ार आलीजाह;

वो आंखें सचाई की निकाले डालता,
करता, हमें वह घेर ,
बेबुनियाद, बेसिर-पैर...

हम सब क़ैद हैं उसके चमकते ताम-झाम में,
शाही मुक़ाम में ! !

लिहाज़ा, अगर हमें आगे स्वामी अग्निवेशों के भीतरघात से बचना है तो हमें और भी सावधान रहना होगा और यहां "हम"से मेरा आशय उन सभी से है जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इस संघर्ष में जुटे हुए हैं. रही बात मृणाल वल्लरी जैसी पत्रकारों की, तो वे दुष्प्रचार के बल पर ही पनपते हैं. बैक्टीरिया की तरह. उनके पास कुछ पिटे-पिटाये वाक्य होते हैं, कुछ परम्परागत गालियां, बिना पढ़े कुछ भी उध्रृत करने की ग़ैर-ईमानदारी --चाहे वह मार्क्स का कोई वाक्य हो या एंगेल्स का या मौक़ा-मुहाल पडने पर वेदों का.

जनसत्ता के  सम्पादक को अपनी बिक्री से ग़रज़ है सच-झूठ से नहीं.कवि शमशेर के हवाले से कहूं तो "जो नहीं है जैसे कि ईमानदारी उसका ग़म क्य,वो नहीं है."और इसलिए क्या अब समय नहीं आ गया कि एक वैकल्पिक मीडिया,एक सबल सांस्कृतिक आन्दोलन खड़ा किया जाये और छिट्पुट ढंग से काम करने की बजाय एकाग्र ढंग से लोगों को गोलबन्द किया जाये.