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बलात्कार के खिलाफ संघर्ष के 10 वर्ष

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सेना द्वारा हिरासत में यातनाएं देकर, बलात्कार, और हत्या के 10 वर्ष के बाद भी न्याय के लिए इंतज़ार जारी !

आज भी वो दिन हम भुला नहीं सकते जब कुछ महिलाओं ने इम्फाल, मणीपुर में स्थित असम राइफल्स के मुख्यालय के सामने नग्न अवस्था में विरोध प्रदर्शन किया था. उन्होंने हाथों में एक बड़ा पोस्टर पकड़ा था जिस पर लिखा था - 'भारतीय सेना हमारा बलात्कार करो!'

इस प्रदर्शन से कुछ घंटे पहले 10-11 जुलाई 2004 की रात कुमारी थांगजम चानु मनोरमा देवी को असम राइफल्स के सैनिकों द्वारा पूछताछ के लिए हिरासत में लिया गया. अगली सुबह मनोरमा देवी का शव संदेहास्पद और विकृत अवस्था में पाया गया. rape-manipur-indian-army

मनोरमा के साथ हिरासत में बलात्कार किया गया था, यातनाएं दी गईं थीं, और अंततः उन्हें गोली मार दी गई थी जिससे उनकी मृत्यु हुई. इस जघन्य कृत्य के दस वर्ष बीत जाने के बाद भी अभी तक दोषी अधिकारियों और सैनिकों पर अभियोग शुरू नहीं किया गया है. राज्य सरकार द्वारा बिठाए गए एकमात्र जांच-कमीशन की रिपोर्ट के बारे में किसी को कोई खबर नहीं है क्योंकि सेना ने मणीपुर सरकार के खिलाफ याचिका दायर की है कि राज्य सरकार को सैन्य मामलों में जांच करने का अधिकार नहीं है.

मनोरमा देवी जैसे मामलों से यह बात उजागर होती है की देश के सैन्य बलों को सशस्त्र संघर्ष क्षेत्रों में (जम्मू और कश्मीर, उत्तर-पूर्वी राज्य और मध्य भारत के कुछ हिस्से) दण्डमुक्ति प्रदान की गई है. सैन्य बलों को एक ऐसा रक्षा कवच प्राप्त है जिसके चलते वे किसी प्रकार की कार्यवाही या सज़ा से बच जाते हैं. फलस्वरूप इन क्षेत्रों में लगातार लोकतांत्रिक अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है.

अब तक आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर्स ऐक्ट (आफ्सपा) को दण्डमुक्ति का मुख्य स्त्रोत माना जाता रहा है. लेकिन गौर करने पर पता चलता है की दण्डमुक्ति का यह कवच विभिन्न कानूनों में, कार्यपालिका की कार्यवाहियों और न्यायपालिका के फैसलों के रूप में भी देखने को मिलता है जैसा की यहाँ समझाया गया है -

1. कानूनों द्वारा - आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर्स ऐक्ट (आफ्सपा), आर्मी ऐक्ट, और अन्य समान कानूनों के अनुसार सेना के जवानों पर आम न्यायालयों में अभियोग चलाने से पहले केन्द्रीय सरकार या सेना के सम्बंधित अफसर से अनुमति लेना अनिवार्य है.

2. कार्यपालिका की कार्यवाहियों द्वारा - ऐसा बहुत ही कम होता है कि केन्द्रीय सरकार सैन्य बलों के खिलाफ आम अदालतों में अभियोजन चलाए जाने की इजाज़त दे. उदाहरण के लिए, 1989 से 2011 के बीच जम्मू और कश्मीर में तैनात भारतीय सेना के अधिकारियों और सैनिकों के खिलाफ कार्यवाही के लिए 44 आवेदन रक्षा मंत्रालय को दिए गए. रक्षा मंत्रालय द्वारा इनमें से 33 मामलों को खारिज कर दिया गया तथा 11 मामले अभी भी लंबित हैं.

3. न्यायपालिका के फैसलों द्वारा - हाल ही में पाथरीबल मामले में सी.बी.आई. ने सेना के जवानों को अनंतनाग में 5 लोगों के एक फर्ज़ी मुठभेड़ में दोषी पाया. पर सर्वोच्च न्यायालय ने दुर्भाग्यपूर्ण ढंग से सेना की अपील स्वीकारते हुए सैन्य अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही करने की सेना की स्वायत्ता का अनुमोदन किया. यह नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों का खुला उल्लंघन है, जिसके अनुसार कोई भी अपने ही मामले में खुद निर्णय नहीं ले सकता.

सशस्त्र सैन्य बलों द्वारा की गई हिंसा को 'राष्ट्रीय हितों', 'एकता', और 'संप्रभुता' के नाम पर सही ठहराया जाता है. पर असल में हिसा के ज़रिए, प्रभावशाली वर्ग जन-संसाधनों पर एकाधिकार जमाना चाह रहा है और लोगों के लोकतांत्रिक और मूलभूत अधिकारों का हनन कर रहा है.

स्पष्ट है की देश में दो तरह के क़ानून लागू हैं. जहां एक ओर महिला आन्दोलन ने महिलाओं पर हो रही हिंसा के खिलाफ सज़ा सुनिश्चित करवा कर कुछ जीत हासिल की है, वहीँ दूसरी ओर संघर्ष क्षेत्रों में वे अभी भी बलात्कार, अपहरणों, और हिरासत में हत्या के मामलों में पीड़ितों को न्याय दिलाने में असमर्थ रहे हैं. आम कोर्ट में मुलज़िम सैनिकों पर कार्यवाही चलाना भी असंभव है. क्यों एक ही तरह के अपराधों के लिए देश में अलग तरह से कार्यवाही की जा रही है ? क्यों सशस्त्र बलों को उन कृत्यों के लिए दण्डमुक्ति मिल जाती है जो गैर संघर्ष क्षेत्रों में दण्डनीय हैं? क्या बलात्कार और दमन सरकारी ड्यूटी का हिस्सा है?

पीयूडीआर

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