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ईमानदारी का ईनाम मौत!

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बलूनी को बार-बार दिल्ली बुलाकर उनका उत्पीड़न किया जा रहा था. झूठे आरोपों और विजिलेंस के उत्पीड़न से परेशान होकर वह आत्महत्या के लिए मजबूर हुए. अपने सुसाइड नोट में बलूनी ने साफ लिखा है कि उनकी दराज से बरामद नोटों के फिंगर प्रिंट उनके नहीं हैं. उन्हें जानबूझकर फंसाया गया है...

मनोज बडोनी

भ्रष्टाचार और दलाली इस देश और समाज को किस कदर दीमक की तरह कुरेद रही है, यह रेलवे की नौकरी करने वाले सुनील बलूनी की रेलवे ट्रैक पर की गई खुदकुशी से साफ हो जाता है. रेलवे विजिलेंस और दलालों के नेटवर्क ने जिस तरह बलूनी को भ्रष्ट साबित करने की कोशिश की, वह बताता है कि ईमानदारी आज के दौर में बेईमानी से ज्यादा घातक साबित हो रही है.

sunil baloni railway officer family mamber crying after his sucideये भ्रष्टाचारियों व दलालों के बढ़े हुए हौसले ही हैं कि वे एक ईमानदार अफसर को इस हालात में पहुंचा देते हैं कि उसे उन्हीं रेलवे की पटरी पर मौत को गले लगाने के लिए मजबूर होना पड़ता है, जिस पर जमी भ्रष्ट दलाली की गंदगी को हटाने के लिए वह बेईमानों के खिलाफ ताउम्र मोर्चा खोले रखते हैं. इससे भी ज्यादा हैरान करने वाला रवैया देहरादून पुलिस का रहा, जिसने सीबीआई द्वारा जांच शुरू करने से पहले ही अपनी फाइल बंद कर दी. हालांकि किरकिरी होते देख पुलिस ने अपनी जांच बंद न करने का दावा किया है, लेकिन ऐसी जांचों का हश्र किसी से छिपा नहीं है.

सरकारी विभागों में रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार और बेईमानी इस कदर हावी हो चुकी है कि ईमानदारी से काम करने वाले अधिकारियों को भ्रष्ट किस्म के अधिकारी और दलाल पचा नहीं पा रहे हैं. विभागों में ईमानदारी से काम करने वाले लोगों का इस कदर उत्पीड़न और शोषण हो रहा है कि वे आत्महत्या जैसे कदम उठाने को मजबूर हैं. कारण यह है कि इनकी सच्चाई की आवाज बेईमानों के नक्कारखाने में दबकर रह जाती है और बेईमानी अट्टाहासी हंसी हंसती रहती है.

देश के भ्रष्टतम विभागों में शुमार रेलवे विभाग में भ्रष्टाचार कोई नई बात नहीं है. रेलवे टिकट का आरक्षण हो या सीट दिलाने के नाम पर पैसों का लेन-देन, सामान में टैक्स चोरी का मामला हो या प्लेटफार्म पर मिलने वाले उत्पादों में मिलावटखोरी की शिकायतें, हर जगह दलाल रेलवे पुलिस की नाक के नीचे भ्रष्टाचार को अंजाम देने में बेखौफ लगे हैं.

रेलवे विभाग को दीमक की तरह चाट रहे इन दलालों के चलते ही आज रेलवे की माली हालत इस कदर कंगाल हो चुकी है कि विभाग की औकात कर्मचारियों को वेतन देने तक की ही रह गई है. यही कारण है कि रेलवे की सूरत बदलने की सरकार की तमाम कोशिशें इसी भ्रष्टतंत्र की वजह से फ्लॉप साबित होती रही हैं. रेलवे में एफडीआई लाने के बाद भी यह बदरंग तस्वीर बदलेगी, ऐसी उम्मीद लगाना बेमानी ही होगा, क्योंकि दलाली की दीमक को साफ कर पाना असंभव ही प्रतीत होता है.

रेलवे में सीनियर ट्रैफिक इंस्पेक्टर (एकाउंट) के पद पर कार्यरत 38 वर्षीय सुनील कुमार बलूनी रेलवे के इसी भ्रष्ट तंत्र से लड़ते रहे, लेकिन आखिरकार हार गए और रिश्वतखोर दलालों के सामने न झुकने की कीमत उन्हें अपनी जान देकर चुकानी पड़ी. भ्रष्ट अधिकारियों के उत्पीड़न से परेशान होकर बलूनी ने रेल की पटरी के आगे छलांग लगाकर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली. सुसाइड नोट से साफ हो जाता है कि बलूनी को झूठे आरोप में फंसाया गया, जिससे वे मानसिक तनाव झेल रहे थे.

गौरतलब है कि रेलवे में सीनियर ट्रैफिक इंस्पेक्टर (एकाउंट) सुनील कुमार बलूनी को बीते 20 नवंबर को दिल्ली से आई रेलवे की विजिलेंस टीम ने रिश्वत के आरोप में पकड़ा था, जिसके बाद से सुनील बलूनी काफी परेशान रहने लगे. बताया जा रहा है कि बलूनी 2 दिसम्बर की सुबह नई दिल्ली से देहरादून आए थे. उसी दिन दोपहर करीब डेढ़ बजे हरिद्वार बाईपास फाटक के पास दून से इलाहाबाद जा रही लिंक एक्सप्रेस के नीचे आकर उन्होंने अपनी जान दे दी.

सुनील बलूनी रेलवे विभाग में एक ईमानदार अधिकारी के रूप में पहचान रखते थे. रेलगाड़ियों के जरिये बाहर से आने वाले सामान में टैक्स चोरी के रूप में लाखों के वारे-न्यारे होते हैं. बलूनी इस गोरखधंधे को जड़ से खत्म करने को प्रयासरत थे और यही बात इस गोरखधंधे से जुड़े लोगों को रास नहीं आई. जब विभाग के कुछ रिश्वतखोर और बेईमान अधिकारियों को बलूनी की ईमानदारी अपने दलाली के धंधे में बाधक लगने लगी, तो उन्हें फंसाने के लिए जाल बिछाया गया और उन्हें रिश्वत के झूठे आरोप में फंसाया दिया गया.

रेलवे का पार्सल विभाग भ्रष्ट कॉकस का ऐसा मकड़जाल बन गया है, जिससे बाहर निकल पाना असंभव है. देहरादून की ही बात करें तो हर रोज यहां लाखों का खेल होता है. एक दलाल ही यहां प्रतिदिन 50 से 60 हजार तक आसानी से अंदर कर लेता है. कहने को तो टैक्स चोरी रोकने के लिए पार्सल आफिस के बाहर बनी राजस्व चौकी बनी है, लेकिन यह चौकी भी टैक्स चोरी रोकने में पूरी तरह फ्लॉप साबित हो रही है.

प्रदेश सरकार के अधीन यह चौकी भी तय महीना पहुंच जाने पर इस गोरखधंधे पर चुप्पी साध लेती है, जिससे सरकार को प्रतिदिन लाखों की चपत लग रही है. पार्सल कार्यालय के अधिकारी, कर्मचारी कमाई के इस मोटे खेल में बराबर के भागीदार हों तो टैक्स चोरी पकड़ने की जहमत कौन उठाए?

देश के विभिन्न स्थानों से आए माल की ढुलाई में ठेकेदार मोटा पैसा टैक्स चोरी के रूप में बचा लेते हैं. ढुलाई के लिए भी इन ठेकेदारों ने अपने आदमी रखे हुए हैं, जो सरेआम प्लेटफार्म से ही माल बाहर ले जाते हैं. ये आदमी न तो रेलवे विभाग के हैं और न ही इनके कोई पहचान पत्र आदि ही हैं. ये केवल ठेकेदारों का माल बाहर ले जाने का काम करते हैं.

दरअसल ट्रेनों के माध्यम से लीज कोचों में देश के कई जगहों पर माल भेजा जाता है, जिस पर 15 प्रतिशत टैक्स का भुगतान अनिवार्य है. इसके लिए बकायदा मुहर लगाई जाती है, लेकिन ठेकेदार और लीज होल्डर बिना टैक्स चुकाए माल बाहर ले जाते हैं. बचाए गए टैक्स की रकम में से कुछ हिस्सा विभाग को चढ़ावे के तौर पर प्राप्त होता है. देशभर के सभी स्टेशनों पर यह धंधा निर्बाध रूप से चल रहा है.

प्रमुख स्टेशन होने के कारण देहरादून में भी यह गोरखधंधा वर्षों से बदस्तूर चल रहा है. यही नहीं, अधिक मुनाफा कमाने के फेर में ट्रेनों में ओवरलोडिंग भी की जाती है. ट्रेन के कोच की क्षमता से दुगना माल ढोकर लाया जाता है, जिससे दलाल तो मोटा माल कमाते हैं, लेकिन ओवरलोडिंग के कारण यात्रियों की जान पर खतरा मंडराता रहता है. सुनील बलूनी बीते कुछ समय से इन दलालों पर सख्ती दिखा रहे थे, जिसे दलालों को काफी नुकसान उठाना पड़ रहा था.

रिश्वत के झूठे आरोप में फंसाए जाने से आहत होकर ही सुनील बलूनी ने ट्रेन के आगे अपनी जान दी. सुनील के आत्महत्या के बाद वहां पर मिले सुसाइड नोट में लिखा था कि मैं घूसखोर नहीं. सुनील बलूनी पर घूस लेकर बिना टैक्स चुकाए माल निकलवाने के नाम पर 6500 रुपये की रिश्वत लेने का आरोप था. इस अधिकारी ने सुसाइड नोट में विजिलेंस इंस्पेक्टर, ठेकेदार और एक दलाल पर उन्हें फंसाने का आरोप लगाया था. उनकी मौत के बाद परिजनों ने रेलवे स्टेशन पर प्रदर्शन किया.

बाईपास पुलिस के मुताबिक सुसाइड नोट में दलाल सहगल, लीज होल्डर सतेंद्र कुमार और विजिलेंस इंस्पेक्टर हेमंत वासुदेव को आरोपित किया गया है. नार्दन रेलवे मैन्स यूनियन ने मामले की सीबीआई जांच की मांग की. कर्मचारियों के अनुसार बलूनी ने निर्धारित क्षमता से अधिक माल लाने वाले ठेकेदार पर जुर्माना लगाने की बात कही थी. इसी रंजिश के तहत उन्हें फंसाया गया.

कर्मचारियों का यह भी आरोप है कि सुनील बलूनी को बार-बार दिल्ली बुलाकर उनका उत्पीड़न किया जा रहा था. झूठे आरोपों और विजिलेंस के उत्पीड़न से परेशान होकर वह आत्महत्या के लिए मजबूर हुए. सुनील बलूनी ने भ्रष्ट ओर बेईमान लोगों का साथ न देकर आत्महत्या कर ली.

नियमतः विजिलेंस टीम किसी भी रेड के दौरान विभाग के अधिकारियों को साथ रखती है. इस प्रकरण में भी विजिलेंस टीम की मानें तो उन्होंने स्टेशन अधीक्षक को मामले के बारे में बताकर उन्हें अपने साथ शामिल किया था. उधर स्टेशन अधीक्षक एसएस डोभाल का कहना है कि उन्हें विजिलेंस टीम की कार्रवाई की कोई जानकारी नहीं थी और न ही विजिलेंस टीम ने उन्हें इस मामले में साथ लिया.

अपने सुसाइड नोट में बलूनी ने साफ लिखा है कि उनकी दराज से बरामद नोटों के फिंगर प्रिंट उनके नहीं हैं. उन्हें जानबूझकर फंसाया गया है. इस तरह विरोधाभासी बयानों से साफ है कि घूसखोरी के आरोपों में भी कहीं न कहीं झोल है. बहरहाल प्रदेश के मुख्यमंत्री हरीश रावत ने इस प्रकरण की सीबीआई जांच करने की संस्तुति दे दी है, लेकिन जब तक रेलवे विभाग में व्याप्त भ्रष्ट तंत्र का पूरा चेहरा बेनकाब न हो जाए, तब तक बलूनी को असली इंसाफ नहीं मिल पाएगा.

Last Updated on Thursday, 18 December 2014 20:06

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