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‘जनमुद्दों को छोड़ा तो नेता बन सका’

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जो जनमुद्दे आपको एक बड़ा नेता नहीं बना सकते, वह देश की तकदीर क्या बदलेंगे। और आज नेता जी को देखिये, मैडम के शूरमाओं में शुमार हैं। आप अच्छा मानें या बुरा, लेकिन सच यही है कि देश में सर्वाधिक मुद्दे उठाने वाले लोग सबसे कम वोट पाते हैं...

अजय प्रकाश

उत्तर प्रदेश के बुदेलखंड क्षेत्र की एक विधानसभा से बसपा टिकट पर चुनाव लड़ रहे एक प्रत्याशी से जब जनमुद्दों पर जवाब देते नहीं बना तो वह एकाएक उबल पड़े। वर्षों  से राजनीति करने का वास्ता देते हुए कहने लगे, ‘भाई साहब मैं आज का नेता नहीं हूं। जनता के मुद्दे बहुत उठाये और इंतजार किया कि उस बार नहीं तो इस बार हमें जनता चुन ही लेगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ और मेरी हालत ये हो गयी कि कोई बड़ी पार्टी टिकट देने तक को तैयार नहीं थी।’

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नेता जी आगे बोले, ‘मगर जबसे बाहुबल और धनबल की राजनीति में लगा हूं, तबसे मैं हारूं या जीतूं कम से कम नेता तो हूं। आजकल के राजनीतिक फैशन में तो जनमुद्दे उठाने वालों का कद सामाजिक कार्यकर्ता से ऊपर जा ही नहीं पाता। इतना तो आप भी मानते होंगे कि सामाजिक कार्यकर्ता देश की दशा पर जितनी बात कर ले, उस पर असर नेता ही डालता है।’ 

देश के सर्वाधिक पैसे वाले मुख्यमंत्रियों में शामिल हो चुकीं मायावती की पार्टी के नेता जी यह संक्षिप्त संदेश अपने विश्वस्त लोगों के बीच हमें सुनाते हैं। एक बड़े से दालाननुमा जगह पर नेता जी को घेरकर सभी जातियों और वर्गों के लोग बैठे हैं।

अमीर-गरीब, दलित-ब्राह्मण, यादव-अल्पसंख्यक और जाट-जाटव सब हैं। कुछ महिलाएं भी हैं। बारी-बारी से सभी लोग अपने ज्ञान और क्षमता के हिसाब से यह बताने की कोशिश करते हैं कि नेता जी ने जनता के मुद्दों में समाये रहने की फितरत को छोड़कर कितना जरूरी काम किया है। इन सभी समर्थकों के मुताबिक अब नेता जी ज्यादा काम के हो गये हैं।

एक सज्जन करीब-करीब अंग्रेजी में बोलते हुए हमें बताते हैं कि नेता जी की जनता के मुद्दों से बनती दूरी के कितने रामबाण फायदे हैं। बात की पुष्टि में वह एक उदाहरण सुनाते हैं। अंग्रेजीदां सज्जन कहते हैं ‘कुछ साल पहले की बात है। यही नेता जी थे और यही स्थान था। मेरे बेटे को कुछ लोगों ने उठा लिया था और बदले में लाखों रुपये मांग रहे थे। मैं दौड़ते-दौड़ते नेता जी के पास आया। मेरा बेटा छूट तो गया, लेकिन आठ दिन बाद। मगर आज नेता जी की हनक यह है कि आज मेरा एक ट्रक सुबह सात बजे पकड़ा गया और साढ़े सात बजे छूट गया। ये लीजिये इस खुशी की मिठाई आप भी खाइये।’ उदाहरण देने वाले सज्जन के मुताबिक आज सुबह वह नेताजी के पास मिठाई ही लेकर आये थे।

सज्जन मेरी ओर मिठाई बढ़ाने लगे तो नेता जी लीजिये-लीजिये कहते हुए अपने पीए की जेब से लाल कलम निकाले और कुछ आवेदननुमा कागजों पर धकाधक दस्तखत करने में जुट गये। सफारी सूट पहना एक आदमी जिसे नेताजी का पीए बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है, वह एक-एक करके दस्तखत हुए कागजों को नेता जी के तरफदारों की ओर बढ़ाता गया। दस्तखत किया हुआ कागज पाकर अपने को धन्य महसूस करते लोग नेता जी के पांव छू-छू कर निकलते गये।

दस्तखत का काम खत्म होने पर पीए ने नेता जी की ओर नीली कलम और चेकबुक बढ़ा दिया। अबकी नेता जी देख-देखकर दस्तखत किये और कौन चेक किस मद में जा रहा है, समझते गये। करीब दर्जन भर चेकों पर नेता जी के दस्तखत लेने के बाद पीए मुझे छोड़ने आया और बताने लगा कि वह भी मेरी तरह ही कभी तीसमारखां हुआ करता था, पर धीरे-धीरे उसे समझ में आया कि पत्रकारिता में कुछ है नहीं। बकौल पीए, ‘पत्रकारिता को जब राजनीतिज्ञों की ही चरणवंदना करनी है तो फिर नाक घुमाकर क्यों पकड़ी जाये। सीधे क्यों नहीं?’

पीए बन चुका पत्रकार बातचीत में बताया कि पत्रकारिता का आदर्श दिखाने के दांत होते हैं और खाने के दांत वही होते हैं, जिनके दम पर आदर्शवादी पत्रकारिता अपना परचम अखबारों के किसी हिस्से में चिपकाती रहती है। पीए अपनी बात तथ्यजनक साबित करने के लिए पत्रकारिता की दलाली में सने कुछ नामचीन लोगों के नाम बताता है कि कैसे दलाली के इस खेल के अप्रत्यक्ष खिलाड़ी ही असल खिलाड़ी हैं।

अंत में विदा करते-करते पीए कहता है, ‘मैंने ही नेता जी को समझाया कि कहां जनमुद्दों के चक्कर में पड़े हैं। जो जनमुद्दे आपको एक बड़ा नेता नहीं बना सकते, वह देश की तकदीर क्या बदलेंगे। और आज नेता जी को देखिये, मैडम के शूरमाओं में शुमार हैं। आप अच्छा मानें या बुरा, लेकिन सच यही है कि देश में सर्वाधिक मुद्दे उठाने वाले लोग सबसे कम वोट पाते हैं। उदाहरण चाहे जहां से ले लें।'

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