Sat19052012

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अब राहुल की डोर 2014 पर टंगी

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मुस्लिम वोटरों को अपने से दूर छिटकते देख राहुल ने बसपा को छोड़कर सपा पर हमले करने शुरू किये। लखनऊ की सभा में सपा का घोषणा पत्र फाड़ने का ड्रामा कर समाजवादी पार्टी से अपनी नाराजगी और दूरी साबित करने की नाकाम कोशिश की...

आशीष वशिष्ट

उत्तर प्रदेश को साधने और सूबे में अपनी खोई जमीन वापिस पाने की खातिर कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी दिन-रात एक किये हुए हैं। राहुल और उनकी टीम मिशन 2012 और अपनी सफलता की चाहे जितने दावें करें लेकिन असलियत से राहुल बखूबी वाकिफ हैं कि उनके मि’ान की हवा लगभग निकल चुकी है। मिशन 2012 में अपेक्षित सफलता मिलते न देख राहुल अब 2014 के आम चुनावों तक मैदान में डटे रहने का मन बना चुके हैं। वाराणसी में प्रेस कांफ्रेस में मीडिया के समक्ष राहुल ने जो कुछ भी उवाच किया, वो उनकी फ्यूचर प्लानिंग का ही हिस्सा था।

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राहुल ने मिशन 2012 की कामयाबी के लिए हर पापड़ बेला और नुस्खा अपनाया। वो दलितों के घरों में गये, उनके साथ खाना खाया, उनके घरों में सोये, मीलों पैदल चले। मुस्लिम वोटरों को अपने पाले में लाने के लिए उन्होंने और उनके सिपासिलारों ने मौलानाओं, मौलवियों और मुस्लिम धर्म गुरूओं के दरवाजे नाक रगड़ने से लेकर दर चूमने तक हर काम किया। राहुल ने किसान, महिलाओं, छात्रों के मुद्दों को जोर-शोर से उठाया और बसपा सरकार पर हमला करने में भी कोर कसर नहीं छोड़ी। राहुल के प्रयासों से ही 2009 के आम चुनावों में पार्टी को उम्मीद से अधिक सफलता हासिल हुई।

राहुल ने यूपी को साधने के लिए आधा दर्जन सांसदों को मंत्री बनाया और महत्वपूर्ण पदों की जिम्मेदारी भी सौंपी। यूपी कोटे के अधिकतर मंत्रियों ने पिछले तीन सालों में अपना अधिकतर समय यूपी में ही गुजारा। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर बसपा सरकार को घेरने का भी कोई मौका राहुल ने नहीं छोड़ा। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन में व्याप्त भ्रष्टाचार और धांधली को उजागर करने में राहुल ने अहम भूमिका निभाई। भूमि अधिग्रहण के मसले पर किसानों का हमदर्द बनकर उभरे राहुल की खूब वाह-वाही हुई थी।

लेकिन चुनाव से पहले जन लोकपाल बिल और भ्रष्टाचार पर अन्ना के आंदोलन और काले धन पर रामदेव की मुहिम ने आम आमदी की नजर में कांग्रेस को गुनाहगार बनाकर रख दिया। अन्ना और रामदेव के साथ यूपीए सरकार के रूखे व्यवहार और अडि़यल रवैये ने राहुल के मिशन 2012 की राह में कांटें बिखेर दिए। वहीं राहुल की मिशन 2012 की टीम ने भी राहुल के गेम प्लान को बिगाड़ने का ही काम किया। विवादित बयान देकर सुर्खियों में बने रहे दिग्विजय सिंह का मुस्लिम वोटरों को रिझाने की खातिर दिया बयान राहुल के गले की फांस बन गया। दिग्विजय के बाद सलमान खुर्शिद और बेनी की विवादित बयानबाजी, और पार्टी के सीनियर नेताओं बेनी प्रसाद और पीएल पुनिया की आपसी लड़ाई ने पार्टी की फजीहत करवाई और मुसीबतें बढ़ाई।

वहीं विरोधियों को घेरने की राहुल की रणनीति भी कारगार साबित नहीं हो पायी। राहुल ने सपा को मैदान और लड़ाई से बाहर दिखाने की रणनीति के तहत बसपा पर सीधे हमले किए, लेकिन राहुल की इस कवायद का उलटा असर हुआ और जनता में यह मैसेज गया कि कांग्रेस और सपा में मिलीभगत है। मुस्लिम वोटरों को अपने से दूर छिटकते देख राहुल ने बसपा को छोड़कर सपा पर हमले करने शुरू किये। लखनऊ की सभा में सपा का घोषणा पत्र फाड़ने का ड्रामा कर समाजवादी पार्टी से अपनी नाराजगी और दूरी साबित करने की नाकाम कोशिश की।

असल में उत्तर प्रदेश में खोई जमीन वापिस पाना इतना आसान नहीं है, जितना राहुल ने सोचा था। सूबे में पार्टी को सत्ता से बेदखल हुए दो दशकों से अधिक समय बीत चुका है। ऐसे में चार सालों की दौड़-धूप से काया पलट की उम्मीद करना बेमानी ही होगा। जानकारों की माने तो राहुल की दौड़-धूप से कांग्रेस की विधायकों की संख्या 22 से बढ़कर 40-50 तक पहुंच सकती है। राहुल ने अपनी ओर से मिशन 2012 को सफल बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। राहुल, सोनिया और प्रियंका के अलावा प्रियंका के पति राबर्ट वाड्रा और दोनों बच्चे भी चुनाव प्रचार में कूद गए।

पूरे गांधी परिवार का चुनाव प्रचार में हिस्सा लेना और प्रियंका का इज्जत की दुहाई देकर एक-एक की वोट मांगना साबित करता है कि राहुल मिशन 2012 को लेकर किस हद तक गंभीर हैं। लेकिन पिछले दो दशकों से पार्टी संगठन और कैडर दोनों कमजोर हुए, पार्टी नेताओं की सिर-फुटौव्वल, उठा पटक और आंतरिक राजनीति ने पार्टी का कबाड़ा कर दिया था।

उत्तर प्रदेश की टेढी राजनीति और जमीनी हकीकत से वाकिफ राहुल ने यह समझ लिया है कि क्षेत्रीय दलों से हाथ मिलाकर नुकसान के अलावा कुछ हासिल होने वाला नहीं है। कांग्रेस को गंठबंधन सरकारों के खट्टे अनुभव ज्यादा हैं। वहीं अगले आम चुनावों में दो साल का वक्त बचा है, ऐसे में विधान सभा चुनाव के नतीजे आने के बाद किसी दल से हाथ मिलाने का खामियाजा कांग्रेस को उठाना पड़ सकता है। वाराणीस की प्रेस कांफ्रेस में जो कुछ भी राहुल ने कहा उसमें एक साथ कई संदेश छिपे हुए थे, उसमें एक यह भी था कि चाहे मिशन 2012 है, लेकिन उनकी व कांग्रेस की नजर 2014 के आम चुनाव ही है।

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