कई छोटे दलों के प्रत्याशी होते हैं, जिनकी सम्पत्ति के बारे में विवरण जारी नहीं होता न यह अखबारों में छपता है। क्या हमें यह बताने की जरूरत नहीं है कि चुनाव लड़ रहे कुछ करोडपति या लखपति हैं तो बहुतेरे ऐसे लोग भी हैं जिनके पास सम्पत्ति के नाम पर कुछ नगद रूपए ही हैं...
मनोज सिंह
गोरखपुर जिले में सबसे पुराना औद्योगिक क्षेत्र बरगदवा है। यह गोरखपर शहर से करीब सात-आठ किलोमीटर उत्तर पूर्व में नेपाल जाने वाले मुख्य सड़क पर स्थित है। थोडी दूर आगे गोरखपुर का फर्टिलाइजर है जो दो दशक से बंद पड़ा है। इस क्षेत्र में एक दर्जन से अधिक सरिया, धागा बनाने वाली और कपड़ा रंगाई की औद्योगिक इकाइयां हैं। यह सभी औद्योगिक इकाइयां शहर के नामी सेठों की हैं। इन सेठों का इतिहास क्या है और ये कैसे मामूली कारोबारी से दो दशक में उद्योगपति हो गए, इसकी कहानी फिर कभी।
इन कारखानों में पिछले तीन वर्ष से मजदूरों के अधिकारों के घोर अवहेलना को लेकर आंदोलन चल रहा है। आंदोलन की शुरुआत पहले सीपीआई-एमएल ने की, फिर दिशा छात्र समुदाय से जुड़े छात्र नेताओं ने बड़ी मेहनत से उनके बीच संगठन बनाया और संगठित आंदोलन शुरू किया। काम के घंटे तय करने, वाजिब मजदूरी और कारखाने में मिलने वाली दूसरी सुविधाओं को प्राप्त करने के लिए आंदोलन छिड़े तो कई बार हड़ताल हुई।

काम के घंटे, वाजिब मजदूरी, मजदूरों की हड़ताल इन सेठों के लिए एकदम असहनीय थे, क्योंकि इस तरह के शब्द भी उन्होंने गोरखपुर की फिजां में सुने नहीं थे। इस समय वे अपने ही कारखानों में ऐसा होते देख रहे थे। फिर वे एकजुट हुए। वे एकजुट हुए तो उनका हितपोषण करने वाले राजनेता, प्रशासनिक अधिकारियों और मीडिया की एकजुटता हुई। आंदोलन को माओवाद प्रेरित घोषित किया गया।
अखबारों में इस सम्बन्ध में खबरें ही नहीं, विज्ञापन भी छपे। प्रशासन ने एक-एक कर मजदूर नेताओं पर कई मुकदमे दर्ज कर दिए। मजदूरों पर फायरिंग करने और कराने वाले आज भी ससम्मानित घूम रहे हैं, लेकिन तीन मजदूर नेताओं को विधानसभा चुनाव शरू होने के पहले जिलाबदर कर दिया गया।
यदि इन मजदूर नेताओं में से कोई चुनाव लड़ता (यहां उल्लेखनीय है कि ये मजदूर नेता जिस संगठन से ताल्लुकात रखते हैं उन्हें चुनावी राजनीति में कोई विश्वास नहीं है) तो इनको अपने हलफनामे में जिक्र करना पड़ता कि उन पर पांच मुकदमे दर्ज हैं, जिनमें जिला बदर की भी कार्यवाही शामिल है। फिर इन हलफनामों के आधार पर इलेक्शन वाच आपराधिक मुकदमों वाले प्रत्याशियों की सूची जारी करता और अखबार उस पर रंग-बिरंगी हेडलाइनों के साथ खबर छापते कि इतने दागी चुनाव मैदान में हैं। इस सूची में असल दागियों के साथ इन ‘दागियों’ का भी नाम होता।
इस अफसाने का जिक्र करने के पीछे जेहन में उठ रहे कुछ सवाल हैं, जिन्हें आप लोगों से भी शेयर करना चाहता हूं। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफोर्म्स एक गैरसरकारी संगठन है जिसे आईआईएम के दो प्रोफेसरों ने बनाया है। यह संगठन पिछले कुछ वर्षों से चर्चा में है। यह इलेक्शन वाच नाम से विधानसभा और लोकसभा चुनावों में उम्मीदवारों की सम्पत्ति, आपराधिक मामलों के विवरण, शैक्षिक योग्यता आदि के आंकड़े जारी करता है। यह आंकड़े उम्मीदवारों द्वारा नामांकन के समय दाखिल किए जाने वाले हलफनामे के आधार पर तैयार किए जाते हैं।
इलेक्शन वाच द्वारा जारी आंकड़ों को सामान्यतया सभी प्रमुख अखबार प्रमुखता से छापते हैं और न्यूज चैनल इन्हें दिखाते हैं। एडीआर और इलेक्शन वाच से जुड़े लोगों की इमानदारी, निष्ठा असंदिग्ध है। उनका इस काम के पीछे मकसद यह है कि चुनाव में धनबल और बाहुबल का प्रभाव खत्म हो और मतदाता अपने प्रत्याशियों के बारे में पूरी जानकारी रखे, ताकि योग्य उम्मीदवार का चुनाव कर सकें। उनके इस नेक मकसद पर कोई संदेह न करते हुए इलेक्शन वाच द्वारा प्रथम और द्वितीय चरण में होने वाले मतदान के विधानसभा सीटों के उम्मीदवारों के सम्बन्ध में जारी विवरण और उन विवरणों के आधार पर अखबारों द्वारा छापी गई खबरों का उदाहरण देना चाहूंगा।
इलेक्शन वाच अपने विवरण प्रत्येक विधानसभा सीट के चार या पांच प्रमुख दलों के प्रत्याशियों पर केन्द्रित करता है और अधिकतर मामलों में सिटिंग विधायकों पर। यह उसकी मजबूरी हो सकती है, क्योंकि बड़ी संख्या में चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों के हलफनामे और उन पर दर्ज विवरण को देखना-पढ़ना और उसका विश्लेषण करना संभव नहीं है। इससे दो खतरे खड़े होते हैं-पहला यह कि एक विधानसभा क्षेत्र से 10 से लेकर 30 से अधिक उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे होते हैं, लेकिन हमारा विश्लेषण चार या पांच प्रमुख दलों के उम्मीदवारों पर ही केन्द्रित रहता है।
इसमें हम यह तो पता चलता है कि कितने करोड़पति या लखपति हैं, लेकिन अन्य उम्मीदवारों में जिनमें कई छोटे दलों के प्रत्याशी होते हैं, की सम्पत्ति के बारे में विवरण जारी नहीं होता न यह अखबारों में छपता है। क्या हमें यह बताने की जरूरत नहीं है कि चुनाव लड़ रहे कुछ करोडपति या लखपति हैं तो बहुतेरे ऐसे लोग भी हैं जिनके पास सम्पत्ति के नाम पर कुछ नगद रूपए ही हैं। ऐसा करने से जनता के सामने तो साफ होगा कि कौन अमीर है व कौन गरीब और यदि उसे वोट देने का यही पैमाना चुनना होगा तो वह अमीर और गरीब में से चुनाव कर लेगा।
इलेक्शन वाच यह जारी करता है कि हमारे विधायकों की सम्पत्ति पिछले पांच वर्ष में कितनी बढ़ी। पिछले चुनाव के हलफनामे और इस चुनाव के हलफनामे के विश्लेषण के जरिए यह आंकड़ा तैयार होता है। इसमें यह भी बताया जाता है कि कितने प्रतिशत और कितनी रकम का इजाफा हुआ है, लेकिन इस आंकड़े से कई बार ऐसे नतीजे निकाले जाते हैं जिसका एकदम उल्टा अर्थ होता है। इससे यह प्रतीत होता है कि सभी ने अपने विधायक काल में भ्रष्टाचार कर सम्पत्ति बढा ली है, जबकि इसमें कई ऐसे होते हैं जिनके बारे में ऐसा कहा नहीं जा सकता। इस बार बहुत से प्रत्याशियों की कुल सम्पत्ति में वृद्धि का कारण जमीन की बढ़ी कीमतें हैं।
उम्मीदवारों के आपराधिक मुकदमों का विवरण जारी करते समय सबके लिए एक ही पैमाना होता है, वह है पुलिस द्वारा दर्ज मुकदमे। अब हमारे यूपी की पुलिस किस तरह स्वतंत्र, निष्पक्ष और दबाव मुक्त होकर काम करती है, यह सभी जानते हैं। जनांदोलन से जुड़े सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं के खिलाफ पुलिस गुंडों की तरह ही पेश आती है। ऊपर की कहानी एक बानगी है।
कुशीनगर जिले के एक छात्र नेता अजय कुमार लल्लू ने जब विधानसभा क्षेत्र की राजनीति शुरू की तो उन पर एक-एक कर 12 मुकदमे दर्ज हो गए। पिछले बार जब वह चुनाव लड़े तो दागी उम्मीदवारों की सूची में उनका नाम भी प्रमुखता से शुमार था। वह इस बार कांग्रेस से चुनाव लड़ रहे हैं। इस बार भी उनका नाम इन दागियों की सूची में हैं।
आप हैरान रह जाएंगे कि पूर्वांचल के बाहुबली नेताओं में शुमार हरिशंकर तिवारी और उनके बेटे का नाम इस सूची में नहीं है, क्योंकि उनके खिलाफ मुकदमे दर्ज नहीं हैं। हरिशंकर तिवारी को पिछले चुनाव में हराने वाले पत्रकार राजेश त्रिपाठी पर जरूर तीन मुकदमे हैं और उनका नाम सूची में है। इसी तरह उनके बेटे विनय शंकर तिवारी पर कोई केस नहीं है लेकिन उनके प्रतिद्वंद्वी विधायक लालजी यादव पर दो केस हैं और उनका नाम सूची में है। लालजी यादव क्या हैं और किस तरह के व्यक्ति हैं, उनके क्षेत्र की जनता तो बखूबी जानती है लेकिन इन आंकड़ों के आधार पर दूसरे जगहों के लोग तो वही नजरिया बनाएंगे जो इससे परिलक्षित होता है।
इलेक्शन वाच द्वारा प्रथम और द्वितीय चरण के 41 रेड अलर्ट वाले सीटों यानी जहां पर आपराधिक पृष्ठभूमि ( इस शब्द के इस्तेमाल पर भी सवाल है कि क्या यह उपयुक्त शब्द है ), वाले उम्मीदवार तीन से ज्यादा हैं, उन सीटों पर उम्मीदवारों के नाम पढें और उन पर दर्ज मुकदमों की संख्या नहीं विवरण पढें तो लगेगा कि यह कुछ ज्यादा अतिरंजना है। अब इस सूची में चिल्लूपार का नाम नहीं है जहां हरिशंकर तिवारी लड़ रहे हैं, जहां उनके बेटे लड़ रहे हैं या जेल में बंद अमरमणि त्रिपाठी के बेटे लड़ रहे हैं। हां, इसमें कई रिजर्व सीटों के नाम इसलिए शामिल हैं जहां से लड़ रहे उम्मीदवारों पर सामन्य छिटपुट मुकदमे हैं।
इस तरह के और भी उदाहरण हैं। इस सूची के आधार पर जब मीडिया राजनीति में दागियों के भरमार की बात करता है, तो दरअसल यह एक सांख्यिकी भ्रम होता है, जमीनी सच्चाई नहीं।
प्रत्याशियों का शैक्षिक विवरण जारी करने के पीछे आखिर मंशा क्या है? कक्षा पांच या इससे कम पढ़ाई करने वाले उम्मीदवारों की सूची और उसके बरक्स पीएचडी धारकों की सूची क्या दर्शाती है? यही न कि हमें उच्च शिक्षित प्रत्याशियों को चुन लेना चाहिए ?
दरअसल, एक गैरबराबरी वाले समाज में जहां अमीरी-गरीबी, शिक्षित- अशिक्षित, दंबग-कमजोर के बीच गहरी विभाजन रेखा है और सत्ता और राजनीति कुछ लोगों व परिवारों-घरानों के नियंत्रण में है, ईमानदार नीयत से किया जाने वाला इस तरह विमर्श-विश्लेषण भी ताकतवार लोगों के पक्ष में ही हो जाता है। गनीमत है कि देश की बहुसंख्यक जनता इन विश्लेषणों के आधार पर नहीं, ठोस जमीनी सचाई पर अपनी राय बनाती है।
पूर्वी उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार मनोज सिंह देश के उन पत्रकारों में हैं जिन्होंने जनता का पक्ष चुना.



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