बर्धन ने भाकपा में अपना राज बनाए रखने के लिए हर मोर्चे पर निक्कमे और बेईमान चेलों को फिट करने का रिवाज शुरू किया. इन चेलों ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया और पार्टी को तबाह और बर्बाद किया.वामपंथ के इस पुरातन पुरुष के भाव देखिये तो लगता है कि उन्हें मुस्कराए सदी गुजर चुकी हो...
शरद गौतम
वामपंथी आन्दोलन के संकट कुछ हद तक दुनिया के पैमाने पर एक जैसे हैं जो जनवादी संस्कारों से दूर और आज़ादी से अनजाने जान पड़ते है .लोकतंत्र से उनकी इस दूरी के कारण वामपंथी नेतृत्व में अक्सर एक 'भगवान' होने की ऐसी प्रवृत्ति घर कर जाती है जो वस्तुगत परिस्थितियों से बदलने वाले आदमी की बजाय अपने को दुनिया बदलने वाला समझने लगता है.

भगवान होने की उनकी यह बीमारी उन्हें डट कर झूट बोलने वाले शेखबाज इंसान में बदल देती है जो उनकी गप्प सरीखी बातों से लेकर उनकी शारीरिक भाषा तक से छलक - छलक कर टपकती है .हिन्दुस्तानी लाल झंडे वाले नेताओं की वर्तमान पौध इसका सबसे बढ़िया नमूना है .इनके चेहरों पर बुद्धिजीवी लगते रहने का एक स्थायी तनाव का भाव हमेशा बना रहता है.
माले के दीपांकर भट्टाचार्य को ही लीजिये. लगता है सारी दुनिया का ज्ञान और दर्द लेकर पैदा हुए हैं .चहरे पर गंभीरता इतनी ओढ़ ली है कि समय से पहले ही बुढा गए लगते हैं .प्रकाश करात जैसा विरोधाभाषी व्यक्तित्व आपको दूसरा कोई जल्दी नहीं मिलेगा. खुद चमकदार और आधुनिक बने रहते हैं, मगर विचारधारा के मामले में 1964 पर ही अटक जाते हैं. यही हाल उनकी बीवी वृंदा करात का भी है.
माकपा के दुसरे बड़े समझे जाने वाले नेता सीताराम येचुरी की दशा माकपा के इतिहास में जरा हटके है. वह माकपा के दुसरे सबसे बड़े नेता समझे जाते हैं, मगर वह खुद जानते हैं कि वह सबसे ऊँचे मुकाम पर कभी नहीं पंहुच सकते है, वह हमेशा करात विरोधी गुट के चेहरा बनकर रहेंगे और सत्ता की बारी आने पर में पिल्लई साहेब मौका मार जायेंगे .इस दुःख में वह अपने करीबी पत्रकारों को पार्टी की भीतरी कहनियां भी मुहैया कराते है .वैसे भी कामरेड येचुरी पहले से ही मीडिया से नजदीकी के लिए कुख्यात है .
अब बारी देश की सबसे पुरानी कम्युनिस्ट पार्टी भाकपा की .इस पार्टी का एक ही संकट हैं ए बी बर्धन.आप कभी भाकपा के इस पूर्व महासचिव और हाल ही में बने नए महासचिव को गौर से चलते हुए देखें तो आपको लगेगा जैसे कॉलेज का कोई दबंग लौंडा अपने चार छः चेलों के साथ चल रहा है .बाजु फैलाए सीना चौड़ा किये पूरी अकड़ के साथ.
बर्धन की यही दबंगई है जिसने भाकपा में अपना राज बनाए रखने के लिए हर मोर्चे पर निक्कमे और बेईमान चेलों को फिट करने का रिवाज शुरू किया. आगे चलकर इन चेलों ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया और पार्टी को तबाह और बर्बाद किया . वामपंथ के इस पुरातन पुरुष बर्धन के भाव देखिये तो लगता है कि उन्हें मुस्कराए हुए एक सदी गुजर चुकी हो.
अपने चेलों को फिट कराने की कोशिश का ताज़ातरीन उदाहरण बर्धन ने केरल में पेश किया. यहां दिवाकरण के समर्थन सिर्फ एक आदमी होने के बावजूद बर्धन ने दिवाकरण को सचिव बनाने के लिए एड़ी -चोटी का जोर लगा दिया.
यही कसरत अब वो राजस्थान में और उसके बाद बिहार में आजमाने वाले हैं. बिहार में बर्धन भाकपा अध्यक्ष राम नरेश पाण्डेय को बनवाने की कोशिश करेंगे. दिल्ली में बर्धन की नाक के नीचे ही इनकी खास अमरजीत कौर एक 65 साल के लाचार थके आदमी को सचिव बनवा रही थी और बर्धन ख़ामोशी से अपनी ख़ास प्यादे की करतूत देख रहे थे .
सबसे मजेदार तो आजकल बर्धन का भाषण होता है. वो सार्वजनिक तौर जवानो को आगे लाने की हिमायत करते हैं, जबकि उनकी उम्र 87 साल होने को है .जो कुर्सी छोड़ कर भी तिकड़म से भाकपा की सत्ता में मरते दम तक बने रहना कहते हैं. भाकपा के दुसरे बड़े नेता गुरुदास दास गुप्ता गज़ब के आदमी है, शायद ही कभी किसी ने उन्हें हँसते मुस्कराते देखा हो. वैसे इनके आने से भाकपा की ट्रेड यूनियन मजबूत हुई है!
भाकपा की एक महिला नेत्री तो मौकापरस्ती का सबसे बड़ा उदहारण हैं. किसी जमाने में भाकपा में बर्धन के मुखर विरोधी रहे प्रेम सागर गुप्ता के कंधे पर सवार होकर अपना राजनितिक कैरियर शुरू करने वाली यह महिला अपने राजनीतिक आका का राजनितिक कैरियर ख़त्म कर देने वाले आदमी बर्धन की ख़ास बनी हुई हैं .हालांकि उक्त महिला भाकपा में ग्रहण हैं. उन्हें जिस भी संगठन या राज्य की जिम्मेदारी दी जाती यह उसे ही चौपट कर देती हैं, मगर बर्धन की कृपा से हर तबाही के बाद मोहतरमा की तरक्की पक्की रहती है .
वामपंथी दलों के नेतृत्व की यह हालत दरअसल संघर्षो से दूर भागने और सुविधापरस्त होने के कारण हुई है और मेरी चिंता इस मौकापरस्ती को लेकर ही है .मै जानता हूँ कि एक ईमानदार वामपंथ ही देश की राजनीति को सही दिशा दे सकता है, इसीलिए वामपंथी राजनीति से जुड़े हुए और उसके सभी हमदर्दों से आशा रखता हूँ कि वो भी मेरी भावना को समझते हुए वामपंथी राजनीति की तमाम बुराइयों को उजागार करके उसे अधिक जनवादी, ईमानदार और एक सशक्त विकल्प बनने की राह पर जाने को प्रेरित करेंगे.
(लेख शरद गौतम के ब्लॉग 'वाचमैन' से पुनर्प्रकाशित. )