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जनता को बेवकूफ न समझो अरुंधती

तुमने आंदोलन को एक ‘तमाशा’ बताया है और जनता को ‘भीड़’. शायद तुम्हारी आंखें तमाशा देखने की आदी होंगी. तब तो तुम ये भी कह सकती हो कि प्रशांत भूषण इस तमाशे के सबसे बड़े रिंग मास्टर हैं. सातारा, झांसी, बगहा, मुजफ्फरपुर, जबलपुर जैसे छोटे कस्बे के लोग जिनकी सम्मिलित कमाई तुम्हारी रॉयल्टी से कम होगी- तमाशा करने निकले हैं...

विश्वदीपक  

करीब एक दशक पहले इलाहाबाद के आनंद भवन (जहां हिंदुस्तान के कार्पोरेट नीति के पैगंबर जवाहर लाल पैदा हुए थे जिसका एक छोर अन्ना तक जाता है और दूसरा तुम तक) के सामने फुटपाथ पर लगने वाली किताबों की दुकान पर तुम्हे देखा था----नीली बरसाती के ऊपर धूल से सनी हुई. मटमैली सी. अनेक मोटी पतली, नई ताजी, सड़ी-गली किताबों के बीच तुम्हारे चेहरे पर इलाहाबाद युनिवर्सिटी के ग्योथिक स्टाइल में बने बुर्ज की छाया पड़ रही थी. लापरवाही से (बाद में पता चला कि सावधानी पूर्वक) चेहरे की आखिरी सीमा को छूती तुम्हारी लटों में हमनें गुस्सा महसूस किया था.

लेकिन हमारा मन तुम्हारे दाएं नाक के समानांतर उभरे तिल और पार्ददर्शी आंखों पर अटक गया. तब हम तुम्हारा नाम भी नहीं जानते थे. फ्लैप पलटकर देखा तो पता चला कि तुम ‘गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स’ की लेखिका अरूंधति हो.
 
तब से लेकर आज तक किसी आयत की तरह तुम हमारी जिंदगी में घुली मिली हो. 
 
तुमने लिखा है कि ऐसा कोई दिन नहीं जब तुमने ‘नोम चोम्स्की जिंदाबाद’ (the loneliness of nom chomski) न बोला हो. और आज हम तुम्हे ये बता रहे हैं कि हमारी जिंदगी का शायद ही ऐसा कोई पल रहा होगा जब हमने ‘अरूंधति जिंदाबाद’ न गुनगुनाया होगा. बाद में जब हमने तुम्हे दिल्ली में ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ के दौरान देखा तो समझ आया कि ‘अंधेरे में’ जीने वाले हिंदी के कवि मुक्तिबोध ने ‘संवेदनात्क ज्ञान’ किसे कहा था. तुमने शायद मुक्तिबोध का नाम भी नहीं सुना होगा. लेकिन ये तय है कि ‘एक साहित्यिक की डायरी’ में उन्होने ये बातें तुम्हारे जैसी किसी अरूंधति को देखकर ही लिखा होगा!  
 
अरुंधति, तुम्हारे तर्क हमें सम्मोहन की हद तक ले जाते हैं. अकाट्य. पुख्ता. बेजोड़. दुनिया के अनजान रहस्यों से पर्दा उठाने वाली तुम्हारी नर्म कोमल आवाज, लापरवाह दिखने वाली मासूम मर्मभेदी आंखों की चमक ने हमें ‘सबसे बड़े लोकतंत्र’ (ऐसा अमेरिकी साम्राज्यवाद का मानना है) पर शक करना सिखा दिया, हमें सोचने के लिए मजबूर किया. कार्पोरेट लूट के प्रति आगाह किया.
 
पर आज...इस देश को वास्तविक गृहयुद्ध में झोंकने वाला (जबकि तुमने आंदोलन पर गृहयुद्ध का आरोप लगाया है) गृहमंत्री जश्न मना रहा होगा. जिसके माथे पर माओवादी प्रवक्ता, आजाद की हत्या का दाग है. और जिसने पूरे मध्यभारत को नरसंहार की जमीन बना दिया है. और जो पिछले काफी समय से आंतरिक दबाब में घुट रहा था तुमने उसके लिए ऑक्सीजन सिलिंडर की व्यवस्था कर दी है.  
यह इतिहास का सबसे विचित्र किंतु दुखदायी तालमेल है. एक असंगत त्रासदी.  
क्या तुम बता सकती हो कि तुमने अपने लेख में इंकलाब जिंदाबाद का जिक्र क्यों नहीं किया? जबकि ये नारा भी लोगों ने प्रमुखता से लगाया है. ये तुम्हारी लापरवाही है या जानबूझकर तुमने इसे ड्रॉप किया है?  क्या तुमने भी वामपंथी-प्रगतिशील-क्लब की सदस्यता ले ली है? 
 
जिस भारतीय राज्य को तुम ‘बनाना रिपब्लिक’ कहती हो उसके लिए इस नए नवेले मोह का कारण क्या है?  (अरूणा रॉय का हश्र हमे मालूम है) किस आधार पर तुमने ये निष्कर्ष निकाल लिया कि अन्ना के आंदोलन में शामिल लोग भारतीय राज्य को उखाड़ फेंकना चाहते हैं.

क्या तुम्हे माओवादियों और अन्ना के आंदोलन के लक्ष्य का फर्क समझाने की जरूरत है?तुम न सिर्फ माओवादी आंदोलन को रिड्यूस कर रही हो बल्कि उसी सरकारी तर्क को हवा दे रही गो जिसके मुताबिक हर विरोध करने वाले को माओवादी करार दिया जाता है. ताकि उसकी हत्या करने में आसानी हो. गनीमत है कि इस आंदोलन में अब तक कोई हिंसा नहीं हुई है. 
  
तुमने इस आंदोलन की नीयत पर ‘कार्पोरेट भ्रष्टाचार’ को लेकर सवाल उठाया है. क्या तुमसे ये कहने की जरूरत है कि भारतीय राजनीति में संभवत सबसे विनम्र, ईमानदार, प्रधानमंत्री, जो पहले वित्तमंत्री की देखरेख में कार्पोरेट्स लीडरान को बकायदा लोकतांत्रिक पद्धति से चुनकर संसदीय नेता बनाया गया. चिदंबरम क्या हैं—कार्पोरेट या नेता? विजय माल्या, नवीन जिंदल? इन्हे किस जातिवाचक संज्ञा के दायरे में रखा जा सकता है? राजनीतिक भ्रष्टाचार और कार्पोरेट भ्रष्टाचार पानी और शक्कर की तरह आपस में घुल चुके हैं. इन्हे तुम कैसे अलग अलग इकाई के रूप में देख रही हो समझ नहीं आता.  

हर देश, समाज और यहां तक कि व्यक्ति अपने अपने तरीके से खुद को अभिव्यक्त करता है. (चीन, रूस, ईरान, दक्षिणी अमेरिकी आंदोलन इसके गवाह हैं. सबके कुछ न कुछ राष्ट्रीय प्रतीक हैं) क्या हिंदुस्तान का झंडा हमेशा ही सांप्रदायिक राष्ट्रवाद का ही प्रतीक है? पिछले कई दशकों में तुम या तुम्हारे जैसे लोग जनता को दूसरा झंडा क्यों नहीं थमा सके? जब मिस्र में ‘मुस्लिम ब्रदर हुड’ लोकतांत्रिक तानाशाह, होस्नी मुबारक के खिलाफ आंदोलन का नेतृत्व करता है तो तुम जैसों को प्रगतिशीलता नजर आती है. गोएल गोनिम, सबसे बडे बहुराष्ट्रीय निगम, गूगल का कर्मचारी उस आंदोलन का नेतृत्व करता है तब तुम जैसे इंटरनेशनल-हिंदुस्तानी एलीट को दिक्कत नहीं होती. उस वक्त तुम लोगों के दिमाग में कार्पोरेट नैतिकता का सवाल पैदा नहीं होता. 

तुमने आंदोलन को एक ‘तमाशा’ बताया है और जनता को ‘भीड़’. शायद तुम्हारी आंखें तमाशा देखने की आदी होंगी. तब तो तुम ये भी कह सकती हो कि प्रशांत भूषण इस तमाशे के सबसे बड़े रिंग मास्टर हैं. सातारा, झांसी, बगहा, मुजफ्फरपुर, जबलपुर जैसे छोटे कस्बे के लोग जिनकी सम्मिलित कमाई तुम्हारी रॉयल्टी से कम होगी- तमाशा करने निकले हैं? बेशक तुम आंदोलन के इस रूप से असहमत हो सकती हो लेकिन क्या तुमने इस भीड़ के बीच उतरकर इसकी नाड़ी नापने की कोशिश की है? ये उबाल पहले,  लोकतंत्राकि फासीवादी व्यव्स्था और उसी कार्पोरेट लूट के खिलाफ है जिसकी तुम बात करती हो. दूसरे नंबर पर ये जनलोकपाल के साथ है. अगर कोई स्टेथेस्कोप हो तुम नाप सकती हो.  
  
तुमने अरविंद केजरीवाल को फोर्ड फाउंडेशन से मिलने वाले 4 लाख डॉलर अनुदान की बात की है.  हम इसकी आलोचना करते हैं. तुम पर संदेह करें हमारा दिल गवाही नहीं देता. हम फिर अरविंद की आलोचना करते हैं. और उनसे इस बारे में जवाब भी मांगेगे. लेकिन -
 
क्या तुम बता सकती हो कि दुनिया जिस बुकर पुरस्कार की वजह से तुम्हे जानती है उसको स्पांसर करने वाले ‘द मैन ग्रुप’  की पुरस्कार राशि तुमने इसलिए स्वीकार की क्योंकि ये निगम जनवादी है?  सिडनी शांति पुरस्कार के पीछे कौन सा पवित्र कार्पोरेट हाउस है? तुम्हारी किताबें हार्पर कॉलिन्स और पेंगुइन (दोनों मीडिया मुगल उर्फ मर्डौक की कंपनियां हैं जिनके खिलाफ अपराध और फर्जीवाडे के जाने कितने आरोप हैं) से छपती हैं तो क्या हम तुम्हे मोहब्बत करना बंद कर दें. तुम्हारे साथ खड़े होना बंद कर दें?  
 
हम एजाज अहमद के उस तर्क को क्यों न स्वीकार कर लें जिसमें उन्होने कहा था कि तुम्हे बुकर इसलिए दिया गया ताकि हिंदुस्तान के वामपंथी आंदोलन को कमजोर किया जा सके. ( ‘The God of Small Things is too much anxiously written, and therefore overwritten…the book panders to the prevailing anti-Communist sentiment which damages it both ideologically and formally…she has neither a feel for Communist politics nor a rudimentary knowledge of it’--- Aijaz Ahmed, ‘Reading Arundhati Roy Politically. ) 

तुमने भारतीय राज्य की दमनकारी ‘नीतियों का विरोध करने और अपनी असहमतियों को पुन: दृढ़ता से कहने के लिए’ (tehelka, jan 2006) में साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटा दिया. लेकिन जब तुम्हे ‘अहिंसा की वकालत’ के लिए मई 2004 में ‘सिडनी शांति पुरस्कार’ दिया गया तब तुम चुप बैठ गई. पूरे ईराक को क्रबगाह बना देने वाले और हमेशा हमेशा के लिए ईराक को बंजर-नपुंसक बना देने वाले अमेरिका के छोटे प्यादे, ऑस्ट्रेलिया की नीतियों से तुम्हे दिक्कत नहीं हुई?
 
और आखिर में. तुम जिस जनता को ‘वेबकूफ’ समझती हो. वो दरअसल है नहीं. वो झंडे लहराने से अगर प्रभावित होती तो हिंदुस्तान में कब की वामपंथी क्रांति हो चुकी होती. कब का इंडिया शाइन हो चुका होता. इसी जनता ने इंदिरा से लेकर अटल जैसे नेताओं को खारिज कर दिया है. अगर अरविंद और अन्ना इसके साथ धोखा करेंगे तो ये उन्हे भी खारिज कर देगी. और शायद तुम्हे भी.

Comments  

 
0 #7 Surya Prakash 2011-09-20 10:32
Vishwadeepak ji, kya koyi aandolan jo corporate sector se anudan leta ho,jisko corporate media 24 ghante lagatar 12 dino tak coverage kiya tha. Jis aandolan me lagi police ke paas dande tak nahi the, jo apni mangon me teek curreption ki root ko hi nahi choote, jo jis bill ki baat karta jisme fasist soutra chepe hoon aur jiske neta beech sarak par fansi dene ki rai dete ho ya corporate ke tukro par pal rahe ho uss aandolan se aap koun si asha rakhte hain. Bakai janta bebkoof nahi hain beh janti hai ki uski lakhon ki relly ka media ka coverage aur iss aandolan ka media ka coverage alag kyon hai,beh janegi ki Irom ka anshan Anna ke anshan se alag kyon samja jata hai. Aur saath me yeh bhi janegi ki koun koun aur kyon Anna aandolan ke aalochako se bhinn rai rakte hain.
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0 #6 Neeraj Tiwari 2011-08-29 21:44
Well written Vishwadeepak ji...
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-1 #5 Biplav 2011-08-27 02:04
प्रिय साथी,

दुःख की बात यह है कि वे भी अन्ना समर्थक मूढ़मतियों की ही तरह उन दलित, अल्पसंख्यक और वामपंथी बुद्धिजीविओं पर लांछन लगा रहे है जो या तो या तो इस आन्दोलन से सहमत नहीं है या इसके प्रति आलोचनात्मक रुख रखते है। सबसे दुखद है उस महिला पर तोहमत लगाना जिसने अपने दम पर देश के वास्तविक जनान्दोलनों और व्यवस्था द्वारा उनके दमन के सवाल पर देश-विदेश नें सबसे अधिक प्रचार किया और धयान खींचा है। हिंदी लेखकों को यह तो पता होना ही कि द्वितीय पुरुष-एक वचन के लिए हिंदी में सिर्फ एक शब्द नहीं है।
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-1 #4 Pavan Patel, JNU 2011-08-24 15:01
A de-generated article with on current impasse contexttualizin g Roy's article by a right wingers apologist. What a shame for Janjwar and Mohalla for Publishing this.
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+1 #3 Anand Pawar 2011-08-24 11:49
"और आखिर में. तुम जिस जनता को ‘वेबकूफ’ समझती हो. वो दरअसल है नहीं. वो झंडे लहराने से अगर प्रभावित होती तो हिंदुस्तान में कब की वामपंथी क्रांति हो चुकी होती. कब का इंडिया शाइन हो चुका होता. इसी जनता ने इंदिरा से लेकर अटल जैसे नेताओं को खारिज कर दिया है. अगर अरविंद और अन्ना इसके साथ धोखा करेंगे तो ये उन्हे भी खारिज कर देगी. और शायद तुम्हे भी."

Liked the very straight approach !! Aapaki Hindi bhi prabhavshali hein!! Thanks for this narration.
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-3 #2 Pratibhas singh, BHU 2011-08-23 23:42
bhiay ashok isamen baat kee batangad kya hai. jo baten vishvdeepak ne bade sahi tarike se uthayi hain usamen aapko dard kahan uthane lagta hai. arundhati koi devta hain jo kah den aur ham man len. arundhati men aapko pholon kee mahak aati hai to aaye, hame to bhaiye kaai baar vah badabu bhi karti hain aur khoosabu bhi. aaj badabu uthi to deepak bhaiya ne rakh di.
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+2 #1 ashok 2011-08-23 22:07
aap itne bade bekoof hai ki baat ka batangad bana sakate hai. arundhati ko tahe dil se gali dijiye. lekin har roj anna aandolan ke kendra me kya hai ise jaroor yaad kijiye. baki jo bach raha hai usame inqilab bhi hai aur rss ka fasiwaadi agenda bhi. is batwre ke gart me ghusiye.....rasta kidhar ko jata hai jaroor dikhega.
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