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आदिवासी इलाकों के शहरी

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शहरी व्यक्ति के पास कोई आर्थिक संसाधन नहीं हैं. उसे तो आदिवासियों के संसाधनों से जो उद्योग चलेगा या जो व्यापार होगा, उससे ही आमदनी होगी. इसलिए शहरी व्यक्ति आदिवासियों के संसाधनों की लूट को समर्थन देता है...

हिमांशु कुमार

कुछ दिन पहले दिल्ली में कुछ अफगानी विद्यार्थियों के एक दल से मुलाक़ात हुई. खूबसूरत मुस्कान वाले चौदह से अठारह साल के गोरे और लाल गालों वाले सुन्दर बच्चे. अमन और मुहब्बत की बातें कर रहे थे. मैंने कुछ सवाल किये तो उन्होंने कहा कि अमेरिका जो उनके देश में कर रहा है उसे वहाँ के कबायली अर्थात आदिवासी नापसंद करते हैं, लेकिन शहरी मिडिल क्लास के लोग अमेरिका के हमले को पसंद करते हैं.

मैं उनकी इस बात की समानता दंतेवाडा से करने लगा. दंतेवाडा में जो हथियारबंद फौज़ें वहाँ के खनिजों को लूटने के लिए भेजी गयी हैं, उन्हें भी वहाँ के आदिवासी नापसंद करते हैं, लेकिन शहरों में रहने वाले लोग इस सैन्यीकरण का समर्थन करते हैं, ऐसा क्यों होता है और क्या सब जगह ऐसा ही होता है ?

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मैंने देश के जितने भी आदिवासी इलाके देखे हैं उनमें आदिवासियों पर होने वाले दमन के विरुद्ध कभी भी कोई स्थानीय शहरी आवाज़ नहीं उठाता. बल्कि आदिवासियों के लिए आवाज़ उठाने वाले को वहाँ के शहरी पत्रकार, नेता, व्यापारी, सरकारी कर्मचारी देशद्रोही खलनायक के रूप में चित्रित करते हैं. इसलिए आपको बिनायक या दायमनी के लिए देश में या सारे संसार में समर्थक मिल जायेंगे, लेकिन उनके अपने शहर रायपुर या रांची में नहीं.

इसका पहला कारण तो आर्थिक है. आदिवासियों के पास जंगल में जीवन के अपने संसाधन हैं, इसलिए उन्हें अपने संसाधनों को बचाने के लिए संघर्ष करना ही पड़ता है. इसीलिये वो संसाधन लूटने वाली फौजों और उन फौजों को भेजने वाली सरकार के खिलाफ लड़ता है, लेकिन शहरी व्यक्ति के पास कोई आर्थिक संसाधन नहीं हैं. उसे तो आदिवासियों के संसाधनों से जो उद्योग चलेगा या जो व्यापार होगा, उससे ही आमदनी होगी. इसलिए शहरी व्यक्ति आदिवासियों के संसाधनों की लूट को समर्थन देता है, लुटेरी फौजों को समर्थन देता है, संसाधन लूटने वाली राजनीति का समर्थन करता है.

ऐसे में स्थानीय पत्रकार लुटेरी व्यवस्था के प्रवक्ता बन जाते हैं और फिर इनका सामना होता है किसी ऐसे व्यक्ति से, जो होता तो इनके बीच में है लेकिन इस लूट के खिलाफ आवाज़ बुलंद करता है, वो पूरी लूट की राजनीति को नंगा कर देता है. पूरे शहरी षड्यंत्र का पर्दाफाश करता है. एक अकेला मानवाधिकार कार्यकर्त्ता पूरे सत्ता के किले की नीव को हिलाकर रख देता है.

ऐसे में ये उम्मीद बेमानी होगी कि ये लुटेरी ताकतें उनका पर्दाफाश करने वाले मानवाधिकार कार्यकर्त्ता को बख्श देंगी. वो ऐसा कर ही नहीं सकतीं, क्योंकि मानवाधिकार कार्यकर्ता लूट होने नहीं देगा और लूट बंद हुई तो शहरी खायेंगे क्या? उनके पास अपना तो कोई उत्पादन है नहीं. सबकुछ तो लूटकर ही लाया गया है, लूट पर तो शहर जिंदा हैं, इसलिए बिनायक को उम्रकैद की सजा देनी जरूरी है, कोपा को जेल में डालना ज़रूरी है. दायमनी बरला को डराना ज़रूरी है.

ग्रामीण आदिवासियों के संसाधनों की इस लूट के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले हज़ारों कार्यकर्ता आज जेलों में बंद हैं. इस लूट के खिलाफ लड़ने वाली ताकतें देश की प्रधानमंत्री द्वारा सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बताई जा रही है. देश की ज़्यादातर फौजों को सीमा से हटाकर इन आदिवासी लूट क्षेत्रों में भेजा जा रहा है.

हम सबको जानना चाहिए कि जैसे ही कोई कम्पनी और सरकार खनिजों से भरी ज़मीन का एमओयू पर हस्ताक्षर करते हैं, वैसे ही वह कम्पनी अंतर्राष्ट्रीय शेयर बाज़ार में अपने शेयर बेच देती है. सवाल उठता है कि जिस आदिवासी ज़मीन के लिए दुनिया के ताकतवर लोगों ने अरबों रुपये दाँव पर लगाये हैं वो क्या अपने रुपये डूबने देंगे? ये पैसा लगाने वाले ताकतवर लोग दुनिया के बैंकों के मालिक हैं, ये वालस्ट्रीट के मालिक हैं, अमेरिकी सरकार से लेकर दुनिया की छोटे से छोटे देशों की सरकार को चलाते हैं, देश की हर राजनीतिक पार्टी इनके पैसे से चुनाव लड़ती है, यही आर्थिक दैत्य दुनिया के हर युद्ध की जगह और समय तय करते हैं, हर युद्ध इनके फायदे के लिए लड़ा जाता है और हर देश का बजट इनके कहने से बनाया जाता है.

यही ताकतें टीवी और अखबार की मालिक हैं, आप वही जानते और मानते हैं, जो ये ताकतें चाहती हैं. आपके धर्मगुरु भी इन्हीं आर्थिक आकाओं के गुलाम हैं. जनता इन धनिकों के खिलाफ न हों जाए, इसलिए धर्मगुरु आमजन को आसपास की वास्तविकता से काटकर स्वर्ग-नर्क की कल्पनाओं में उलझा कर रखते हैं. यही आर्थिक ताकतें आपके बच्चों के शिक्षण संस्थान चलाते हैं, इसलिए आपका बच्चा वही पढता है जो इन आर्थिक ताकतों का व्यापार चलाने के लिए आवश्यक है.

ध्यान से देखने पर पता चलता है कि आज ग्रामीण आदिवासी की लूट को समर्थन देने वाली ताकतें धार्मिक हैं, राष्ट्रवादी हैं, सेना और पुलिसभक्त हैं, सरकार को ही लोकतंत्र और राष्ट्र मानने वाली हैं और शहरी हैं. ये लड़ाई अभी और क्रूर और व्यापक होगी और इन शक्तियों का प्रतिरोध भी उतना ही व्यापक और तीव्र होगा.

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