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साक्षात्कार

समाज को आईना दिखाएगी 'शूद्र’

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दलित चेतना वाली फिल्मों में दलित भूमिका बड़े अभिनेता निभाते रहे हैं. मैं अपनी कहानी में कोई समझौता नहीं करना चाहता था, इसलिये मैंने में नए कलाकारों को लिया है, अगर कोई बड़ा अभिनेता लेता तो फिल्म अपने मुद्दे से भटक जाती. नए कलाकारों से चरित्र और कहानी के साथ पूरा न्याय किया है...

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'जौन पानी मनही के काम न आ सके वो पानी नाही... मूत... मूत है... मूत... है,’ जैसे डायलाग और ‘हमें गर्व हैं हम शूद्र हैं’ जैसे उद्वेलित कर देने वाले गीत के साथ शीघ्र ही रिलीज होने वाली फिल्म का नाम है ‘शूद्र द राइजिंग’. फिल्म के निर्माता, निर्देशक और लेखक लखनऊ के युवा फिल्मकार संजीव जायसवाल हैं. पिछले दिनों गोवा में हुए अंर्तराष्ट्रीय फिल्म समारोह में ‘शूद्र’ को काफी सराहना मिली थी. सन 2005 में राजेश सिंह के साथ मिलकर ‘फरेब’ फिल्म बना चुके संजीव ने इस बार गंभीर विषय को बड़े पर्दे पर उतारने का प्रयास किया है. ‘शूद्र’ को सेंसर बोर्ड से अभी प्रमाणपत्र नहीं मिला है, लेकिन विषय की गंभीरता, संवेदनशीलता और तेवरों को देखते हुए लगता है कि रिलीज के साथ ही फिल्म विवादों में घिर सकती है.

फिल्म के निर्माता-निर्देशक संजीव जायसवाल से आशीष वशिष्ट की बातचीत

आपको ‘शूद्र द राइजिंग’ बनाने का विचार कैसे आया?
जब कुछ बुजुर्गों ने मुझे बताया कि शूद्रों के पैरो में घंटिया बांध दी जाती थी, कमर में झाडू लटकाया जाता था तो मैं उद्वेलित हो गया. मुझे लगा कि इस गंभीर विषय पर फिल्म बनानी चाहिए. फिर इस बारे में इंटरनेट पर खोजबीन की, किताबों के पन्ने पलटे और समस्या की गहराई जानने और असलियत समझने की कोशिश की और लगा कि वर्षों से फैली हिंसा की जड़ में जाति व्यवस्था ही है.

sanjeev-jaisavalइस विषय पर पहले भी कई फिल्में बन चुकी हैं, ‘शूद्र’ उनसे अलग कैसे है ?
ये सच है कि समाज की इस कड़वी और तल्ख हकीकत को पहले भी बड़े पर्दे पर फिल्माया जा चुका है, लेकिन मेरी फिल्म पूरी तरह से जातिप्रथा के खिलाफ है. मैंने इसकी तह में जाने की कोशिश की है. इसीलिए अतीत में जाकर इसकी वजह तलाशी है. कैसे हिंदुओं ने खुद को ब्राहम्ण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्णों में बांट रखा है. कैसे समाज में जहर फैला जिसकी वजह से सदियों तक दलितों को अछूत बनाए रखा. मैं एक क्रिएटिव आदमी हूं, इसलिए सिनेमा के माध्यम से खामोश क्रांति लाना चाहता हूं.

वर्तमान में परिस्थितियां काफी बदल चुकी हैं ?
अगर स्थितियां बदल गयी होतीं तो हरियाणा में दलित के हाथ नहीं काटे गये होते. उड़ीसा में अभी हाल में घरों को जलाने की घटना नहीं होती. देश में दलितों पर होने वाले अत्याचार, अपराध और प्रताड़ना की घटनाओं में उतरोत्तर वृद्धि हो रही है. अभी भी दलितों को धर्मस्थलों में आने से रोका जाता है. केवल कहने भर से कि हम सब एक हैं. कोई परिर्वतन नहीं आने वाला. अपनी जाति को श्रेष्ठ साबित करने के लिए हिंसा और आंतकवाद का सहारा लेकर दूसरी जाति को नीचा दिखाने का षडयंत्र मात्र है, यदि हम अब भी नहीं जागे तो न मानव बचेगा न धर्म. समानता की भावना ही शांति का मूल मंत्र है.

क्या आपको नहीं लगता कि इसे लेकर विवाद उठ सकते हैं?
हां, हो सकता है. लेकिन हमने जो दिखाया है वो तथ्यों पर आधारित है. असल समस्या सिस्टम की है, अपने फायदे के लिए चंद लोग पूरे समाज को भरमाने और भटकाने का काम करते हैं. ऐसे में गंभीर प्रयास भी विवादों का शिकार हो जाते हैं. हमने समाज की बात की है, ये कोई काल्पनिक कथा नहीं है. जो हुआ है उसे पर्दे पर पूरी ईमानदारी से उतारने का प्रयास किया है. कुछ लोगों को इससे तकलीफ हो सकती है, लेकिन समाज को आईना दिखाएगी 'शूद्र’. गोवा में हुए अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में गोविंद निहलानी, शेखर कपूर और विशाल भारद्वाज जैसे फिल्मकारों ने मेरे प्रयास को सराहा है. इस फिल्म के माध्यम से हम सन्देश देना चाहते हैं कि वे पुरानी रूढ़ीवादी मान्यताओं को त्याग कर आज के बदलते दौर के साथ कदम से कदम मिलाकर चलें.

आप लखनऊ से हैं और प्रदेश की मुख्यमंत्री एक दलित महिला हैं. कहीं आपने ‘शूद्र’ किसी राजनीतिक फायदे के लिए तो नहीं बनायी है?
अगर ऐसा होता तो हम इसे चुनाव से पहले रिलीज करने की कोशिश करते. 'शूद्र' का सब्जेक्ट बहुत बड़ा है. किसी छोटे लाभ या सस्ती लोकप्रियता के लिए इसे बर्बाद नहीं किया जा सकता. यह एक बड़ा और गंभीर मुद्दा है. हम इसे किसी दल या प्रदेश तक बाँधने की बजाय विश्व स्तर पर ले जाना चाहते हैं इसलिए फिल्म में शिवाजी, डॉ. अम्बेडकर के साथ ही नेल्सन मंडेला, मार्टिन लूथर किंग जैसे नेताओं की चर्चा की है. यह फिल्म बाबा साहेब डा. अंबेडकर को समर्पित है. फिल्म पर किसी दल को लाभ पहुंचाने से न जोड़ दिया जाए, इसलिए यूपी में विधानसभा चुनावों के बाद ही इसे प्रदर्शित करने की तैयारी है. वहीं अभी फिल्म को सेंसर बोर्ड से प्रमाण पत्र भी नहीं मिला है. सबकुछ ठीक रहा तो बाबा साहब के जन्मदिन से एक दिन पूर्व 13 अप्रैल को फिल्म रिलीज करने की योजना है.

फिल्म के बारे में कुछ बताएं?
'शूद्र' 25 करोड़ लोगों की कहानी है जो सदियों से शोषण और दमन का शिकार हो रहे हैं.  फिल्म मनु स्मृति से शुरू होकर आज के समय तक आती है और दलितों को उनके मूलभूत अधिकारों से वंचित किये जाने की समस्या को उठाती है. इसकी कहानी बाला, माधव और भेरु की है, जिन्होंने अमानवीय परिस्थितियों के खिलाफ मोर्चा खोला. यह कहानी उस संघर्ष की भी है जिस कारण शूद्र कहलाने वाले पिछले तबके के लोग भोजन, पानी, दवाई, आत्म-सम्मान और आजादी के लिए मर रहे हैं. किसी शूद्र को सिर्फ इसलिए मर दिया जाता है कि उसने किसी खास कुएं से एक बूंद पानी पी लिया. घाव से पीडित आदमी दवा का मोहताज होकर मरता है, तो वहीं किसी बच्चे को सिर्फ इसलिए प्रताड़ना झेलनी पड़ती है कि उसके कानों में कुछ वेद-मंत्र चले गए हैं. इन सबकी वजह सिर्फ इनका शूद्र या अस्पृश्य जाति में जन्म लेना है. दलित चेतना वाली फिल्मों में दलित भूमिका बड़े अभिनेता निभाते रहे हैं. मैं अपनी कहानी में कोई समझौता नहीं करना चाहता था, इसलिये मैंने में नए कलाकारों को लिया है, अगर कोई बड़ा अभिनेता लेता तो फिल्म अपने मुद्दे से भटक जाती. नए कलाकारों से चरित्र और कहानी के साथ पूरा न्याय किया है. जो मैसेज मैं फिल्म के जरिये देना चाहता था लगता है, उसमें सफल रहा हूं.

'संगीतकारों की रोजी-रोटी की व्यवस्था दादा साहब ने की'

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प्रसिद्ध संगीतकार खैय्याम के जन्मदिन 18 फरवरी पर विशेष

पद्मभूषण, संगीत नाटक अकादमी समेत दर्जनों पुरस्कारों से नवाजे जा चुके भारत के सर्वश्रेष्ठ संगीतकारों में शामिल खैय्याम मौजूदा समय के सबसे वरिष्ठ संगीतकार हैं। 18 फरवरी 1927 में पंजाब के नवाशहर में जन्में खैय्याम ने संगीत के सफर की शुरूआत 1943 में की थी। करियर के शुरूआती करीब 20 वर्षों तक वे ‘शर्मा’ के नाम से काम करते रहे। उमराव जान, आहिस्ता-आहिस्ता, कभी-कभी, त्रिशूल, शोला और शबनम, रजिया सुल्तान जैसी कई दर्जन यादगार फिल्मों को संगीत देने वाले खैय्याम आज 18 फरवरी को उम्र के 86वें बसंत में प्रवेश कर रहे हैं और मूक फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ से शुरू होने वाला भारतीय सिनेमा 100वें साल में दाखिल हो चुका है। खैय्याम ने सिनेमा के मूक दौर से लेकर आधुनिक सिनेमा के उतार-चढ़ावों को बड़े नजदीक से देखा है। सिनेमा की सौ साल पर संगीतकार खैय्याम से बातचीत के प्रमुख अंशः

वरिष्ठ संगीतकार खैय्याम से अजय प्रकाश की बातचीत

भारतीय सिनेमा सौंवे साल में प्रवेश कर चुका है। सिनेमा के इस लंबे सफर पर बतौर संगीतकार आपकी प्रतिक्रिया?

दादा साहब फाल्के ने भारत की पहली फिल्म 1913 में ‘राजा हरिश्चंद्र’ बनायी थी, जो मूक थी। उसके बाद 1931 में अल्देसिर इरानी के निर्देशन में ‘आलम आरा’ बोलती फिल्म आई। आलम आरा से बैकग्राउंड संगीत का प्रवेश हुआ और बोलती फिल्मों (टॉकी) का चलन शुरू हुआ, लेकिन सिनेमा में संगीत को महत्वपूर्ण स्थान देने का श्रेय दादा साहब फाल्के को जाता है। दिल से कहूं तो सिनेमा में हम संगीतकारों की रोजी-रोटी की व्यवस्था दादा साहब ने ही की।

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आलम आरा के बाद से फिल्मों की संगीत यात्रा कैसी रही?

फिल्मों में संगीत के स्थान की बात करें तो कहा जा सकता है कि बगैर संगीत के हमारे देश में फिल्मों की कल्पना नहीं की जा सकती। दादा साहब ने हमारे देश में संगीत की ताकत को बड़ा कायदे से पकड़ा। संगीत हम भारतीयों की पूजा है, इबादत है और इससे भी बढ़कर हमारी जिंदगी है। जन्म से लेकर मृत्यु तक के सफर में हम बिना संगीत के कहीं नहीं होते। बच्चे की पैदाइश के वक्त गाये जाने वाला सोहर हो या मरने के वक्त के शोकगीत। यही वजह है कि आजादी के आंदोलन में हमारे गीतों ने बड़ी भूमिका अदा की और कवि प्रदीप के गीत ‘दूर हटो ऐ दुनिया वालों हिंदुस्तां हमारा है’, ने आजादी की लहर को तेज कर दिया था। संगीत के मामले में हम दुनिया के सिरमौर हैं, जिसका हम सबको फक्र है।

आखिर भारतीय फिल्मों में ऐसी क्या वजहें थीं, जिनके कारण संगीत की महत्ता बनी रही?

बोलती फिल्मों के आने के बाद से फिल्मों की कहानियां आमतौर पर ऐतिहासिक, धार्मिक और सामाजिक होती थी। समाज में चूंकि संगीत का गहरा प्रभाव था इसलिए जो बात घंटे दो घंटे की फिल्म नहीं कर पाती थी, वह काम चंद मिनट के गाने कर देते थे। इसलिए पहले की फिल्मों में गानों की संख्या ज्यादा देखेंगे। इसके बाद स्टंट और अलीफ लैला जैसी फिल्मों का दौर आया जो आज की भोंडी फिल्मों के मुकाबले साफ-सुथरीं थीं और उनमें अच्छे गाने होते थे। अब तो संगीत के नाम पर जो किया जाता है, उसे मुझे बड़ी शर्मिंदगी महसूस होती है।

मौजूदा दौर का आधुनिक संगीत आपके दौर से बिल्कुल अलग है, इस बदलाव में आप क्या संभावनाएं देखते हैं?

मेरी राय में संगीत के नाम पर जो आज बाजार को ध्यान में रखकर किया जाता है उसे मैं संगीत नहीं मानता बल्कि ताल, औजार और शोर की यह जुगलबंदी है, जिसे कोई भी संगीत की समझ रखने वाला आदमी संगीत नहीं कह सकता। हमारी पीढ़ी के लोग या हमारे पहले वाले भी जब संगीत तैयार या कंपोज करते थे तो एक मंजर होता था, जो आज संगीतकारों में बहुत कम दिखता है। गीतों में गालियों की भरमार और नाच में नंगेपन ने संगीत को सिर के बल खड़ा कर दिया है। बेशक कुछ नये संगीतकारों में सुफी रूझान देखने को मिल रहा है और उनकी क्षमताओं को देख उम्मीद बंधती है।

संगीत में गिरावट क्यों आयी?

जाहिर तौर पर मुनाफे का दबाव बढ़ता गया। ज्यादा से ज्यादा फायदे के लिए मनगढ़ंत कहानियां अच्छी तकनीकी के जरिये लोगों को परोसी जाने लगीं। फिल्म को लेकर मुल्य की सोच खत्म हुई और फिल्म के तैयारी पक्ष की जगह बाजार पक्ष हावी होता चला गया। मुझे याद है कि मैंने ‘त्रिशुल’ फिल्म में ‘गाउजी-गम-गम’ गाने में संगीत दिया था। बाद में दिल्ली के प्रेस क्लब में एक पत्रकार ने मुझसे जब पूछा कि आप जैसा संगीतकार ऐसे गीत के लिए संगीत कैसे दे सकता है तो मैं बहुत शर्मिंदा हुआ था और गलती कबूल की थी। मगर मुझे फक्र है कि मैंने इसके अलावा एक भी निरर्थक गाने को न तो कंपोज किया और न ही संगीत दिया। लेकिन क्या आज के संगीतकारों में समाज के प्रति यह लिहाज है।

दुनिया के स्तर पर हमारा मौजूदा फिल्मी संगीत कहां ठहरता है?

हमारे मुल्क के संगीत का इतिहास बेहद गौरवपूर्ण है। दूसरा कि संगीत को लेकर एकदम से पोछा भी नहीं लगाया जा सकता है कि हमारे  सिनेमा में संगीत ही नहीं है। साथ ही संगीत की तकनीकी में हम दुनिया में सर्वश्रेष्ठ हैं। 

डॉ अयूब ने कहा 'पैसे के बदले इज्ज़त तो दे सकती हो'

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उत्तर प्रदेश में उभर रही पीस पार्टी ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. अय्यूब अंसारी पर टिकट के बदले  इज्जत लूटने का  आरोप लगा है. संयोग से यह आरोप किसी और ने नहीं बल्कि उन्ही की पार्टी की एक महिला नेता और जिला पंचायत  सदस्य ने लगाया है...

पीस पार्टी की महिला नेता सुनीता मित्रा से आशीष वशिष्ठ की बातचीत

sunita-mitraआपने पीस पार्टी के अध्यक्ष डॉ. अय्यूब पर टिकट के बदले इज्जत मांगने के आरोप लगाए हैं, आखिर पूरा मामला क्या है?
मैं पिछले कई सालों से राजनीति में हूं। मैंने बसपा के बैनर तले राजनीति की शुरुआत की थी, लखीमपुर से जिला पंचायत सदस्य हूं। बसपा में बढ़ते भ्रष्टाचार को देखते हुए  डॉ. अय्यूब के कहने पर पीस पार्टी से जुड़ी। पिछले साल ही डॉ. अय्यूब ने शाहजहांपुर में हरदोई की गोपामउ सीट से मुझे पीस पार्टी का प्रत्याशी  घोषित कर दिया था, लेकिन टिकट की घोषणा इसी महीने की थी। बीते 13 जनवरी को मुझे लखनऊ की मेट्रो सिटी स्थित डॉ. अयूब अंसारी के मकान में ‘जरूरी काम है’ कहकर बुलाया गया था।

लखीमपुर से लखनऊ आप किसके साथ आयी थी?
पीस पार्टी  के नेता इनामुल, एमजे खान,डॉ. अवनीश और उस्मान मुझे इनोवा गाड़ी में लखीमपुर से लखनऊ डॉ. अय्यूब के मैट्रो सिटी स्थित मकान में लाये थे। ये चारों डॉ. अय्यूब के करीबी हैं।

लखनऊ पहुंचने के बाद क्या हुआ?
लखनऊ में डॉ. अयूब के मकान पर देर रात तक पार्टी की बैठक चली। इसके बाद रात के करीब दो बजे मुझे डॉ. अयूब के कमरे में भेज दिया गया। वहां डॉ. अय्यूब टिकट के बदले में अपना इनाम मांगने लगे। उन्होंने मुझसे कहा कि 'सुनीता जी आप टिकट के बदले पैसा नहीं दे सकती हैं तो इज्जत तो दे सकती हैं।' इसके बाद हमारे बीच हाथापाई हुई। चूँकि वह पिछले दिनों एक दुर्घटना के बाद से घायल  हैं और शरीर को बहुत सक्रिय नहीं कर सकते, इसलिए मैं उनसे बाजु छुड़ाकर भागने में कामयाब हुई.   

जिस समय यह घटना घटी उस समय वहां आप दोनों के अलावा कोई और भी मौजूद था?
जी हाँ, उस समय डॉ. अय्यूब और मेरे अलावा पीस पार्टी के नेता इनामुल, एमजे खान, डॉ. अवनीश और उस्मान भी आवास में मौजूद थे। मेरे विरोध करने पर इन चारों ने मुझे दूसरे कमरे में बंद कर दिया और मेरा मोबाइल भी मुझसे छीन लिया। रात तीन बजे मुझे कमरे में बंद करने के बाद इन लोगों ने सुबह नौ बजे दरवाजा खोला। सुबह मैंने घटना की जानकारी अपने पति आनंद मित्रा को दी। उन्होंने पार्टी के कार्यकर्ताओं के साथ आकर मुझे वहां से निकाला।

क्या आपके साथ कभी पहले भी ऐसा कुछ हुआ था?
नहीं, पहले ऐसा कुछ नहीं हुआ। हाँ, डॉ. अय्यूब फोन पर अश्लील बातें करने की कोशिश जरूर करते थे, जिसे में हंसी-मजाक समझकर टाल जाती थी। लेकिन वो इस हद तक गिर जाएंगे, मुझे इसकी उम्मीद नहीं थी। इनका नाम डॉ.  अय्यूब नहीं शैताने अय्यूब होना चाहिए। जांच एजेंसियों को इनकी जांच करनी चाहिए कि आखिर इनके पास इतना पैसा कहां से आया है। मुझे शक है लोगों की किडनी बेच-बेचकर इसने करोड़ों रुपये जमा किये हैं, इसकी जांच होनी चाहिए।

पीस पार्टी में ऐसा पहले भी होता रहा है?
देखिए पीस पार्टी में कई महिला नेता डॉ. अय्यूब से पीडि़त हैं, लेकिन लोकलाज के चलते वो सामने आने का साहस नहीं जुटा पा रही हैं। पीपीआई में पुरुष प्रत्याशियों से टिकट देने के एवज में 2-2 करोड़ रुपए मांगे जा रहे हैं। लखीमपुर के नामे महाराज ने टिकट के बदले दो करोड़ रुपये दिये थे, बाद में उनका टिकट भी काट दिया गया। जो महिला प्रत्याशी पैसा देने की हैसियत में नहीं है, उनसे इज्जत का सौदा करने के लिए कहा जा रहा है।

क्या आपने इस मामले की शिकायत किसी थाने में दर्ज करवाई है?
लखनऊ जनपद के महानगर थाने में मैंने शिकायत दर्ज करवाने की कोशिश की थी, लेकिन पुलिस ने दबाव में आकर मामला दर्ज नहीं किया। इसके बाद मैंने लखीमपुर पहुंचकर जिला अदालत में मामला दर्ज करवाया है। डॉ. अय्यूब के गुर्गे और पीस पार्टी के नेता फोन पर लगातार मुझ पर रिपोर्ट वापिस लेने का दबाव बना रहे हैं और धमकियां दे रहे हैं। लेकिन मेरे पति, स्थानीय लोग और लखीमपुर खीरी के जिला अध्यक्ष से मुझे पूरा सहयोग मिल रहा है। मैं पीछे हटने और डरने वाली नहीं हूं।

सुनीता जी, जब डॉ, अय्यूब आपको अश्लील फोन करते थे तो आपने पहले ही इसका विरोध क्यों नहीं किया। चुनाव के समय कहीं ये आपका पब्लिसिटी स्टंट तो नहीं?
नही, ये कोई चुनावी स्टंट नहीं है। कोई भी औरत अपनी इज्जत दांव पर लगाकर ऐसे आरोप किसी पर नहीं लगाएगी। लोकलाज के कारण ऐसी घटनाएं हाईलाइट नहीं हो पाती हैं। देखिए डॉ. अय्यूब के फोन को मैं हंसी-मजाक ही समझती थी। मैंने बोलने की हिम्मत की है और अब मैं डॉ. अय्यूब की हकीकत सामने लाकर रहूंगी।

आरोप लग रहा है कि आप दूसरे राजनीतिक दलों के साथ मिलकर पीस पार्टी को बदनाम कर रही हैं?
पीस पार्टी के नेता ये दुष्प्रचार कर रहे हैं कि समाजवादी पार्टी के नेताओं से मेरी मिलीभगत है, लेकिन ये सच्चाई नहीं है। समाजवादी पार्टी के किसी भी नेता ने मुझे ऐसा करने के लिये नहीं कहा है। जो मेरे साथ हुआ था, मैं वही कह रही हूं इसके अलावा सब बकवास है।

तो क्या अब भी आप चुनाव लड़ेंगी?
मैं चुनाव लडूंगी या नहीं यह अलग बात है, लेकिन एक बात साफ है कि मैं पीस पार्टी ऑफ इण्डिया के खिलाफ चुनाव प्रचार जरूर करूंगी और जनता को पीस पार्टी का असली चेहरा और हकीकत बताऊंगी। डॉ. अय्यूब जैसे लोग अगर ताकत पा जाएंगे तो सूबे में औरतों का जीना हराम हो जाएगा। 

किसान समस्याओं का हल है कम उत्पादन - भाकियू

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किसानों को प्रोडक्शन कम कर देना चाहिए। कम उत्पादन ही किसानों की समस्याओं को खत्म करने का कारगर उपाय है। किसान ज्यादा फसल के लालच में यूरिया, कीटनाशकों और तमाम दूसरे साधनों पर अंधाधुंध पैसा खर्च करता है, लेकिन बाद में उसे लाभकारी रेट नहीं मिलता है---

भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय अध्यक्ष राकेश टिकैत से आशीष वशिष्ट की बातचीत

खेती-किसानी से जुड़े मसले चुनावी मुद्दा क्यों नहीं बन पाते हैं?
देखिए, तमाम राजनीतिक दल और नेता जात-पात की राजनीति में मशगूल हैं। ऐसे में उन्हें किसानों की याद नहीं आती है। सच्चाई यह है कि आज नेताओं को चुनाव जीतने के लिए किसानों की कोई जरूरत ही नहीं है। अब जीत के लिए जाति का फैक्टर ज्यादा हावी रहता है, इसलिए न तो कोई किसानों की बात करता है, न ही परवाह।

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भाजपा और समाजवादी पार्टी ने अपने चुनाव घोषणा पत्र में किसानों के लिए कई घोषणाएं की हैं, बाकी दल भी किसानों के मुद्दों को अपने घोषणा पत्र में शामिल करेंगे। इससे क्या किसानों का भला होगा?
घोषणा पत्र तो हर चुनाव में जारी होता है, लेकिन इससे किसान का कोई भला नहीं होता। मुख्य बात तो नीतियों और योजनाओं को जमीन पर लागू करने की होती है। इसके लिए कोई भी दल गंभीर नहीं है। नेता जीतने के लिए हर हथकंडा अपनाते हैं, खेती-किसानी पर जाति भारी पड़ गयी है। आज हर नेता जात की पालिटिक्स कर रहा है, ऐसे में किसानों के मुद्दे और प्राब्लम कोई उठाना ही नहीं चाहता। मेरी समझ में नहीं आता कि जब राजनीतिक दलों ने किसानों की भलाई के लिए कुछ करना ही नहीं होता तो पता नहीं वो चुनाव घोषणा पत्र में किसानों के मुद्दे शामिल ही क्यों करते हैं।

किसानों की शिकायत है कि सूबे के सरकार ने पिछले पौने पांच साल में खेती-किसानी लिए कुछ खास नहीं किया है?
हां, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि किसान परेशान हैं। हालाँकि सरकार ने पिछले दो सालों में कुछ अच्छे काम भी किये हैं, मसलन जमीन अधिग्रहण कानून और गन्ना किसानों को फसल का उचित रेट दिया है। देखिए कोई भी राजनीतिक दल किसानों की समस्याएं हल करना ही नहीं चाहता है, नेता सोचते हैं जब तक समस्याएं हैं तभी तक उनकी ड्योढ़ी पर भीड़ जुटेगी। कोई भी पार्टी किसानों का भला नहीं चाहती है। चुनाव के वक्त जात-पात हावी हो जाती है, इसलिए किसानों को खुद ही अपनी समस्याओं का हल निकालना होगा।

वो कैसे?
असल समस्या यह है कि किसान को उसकी फसल का लाभकारी मूल्य नहीं मिलता। बिचौलिए किसान का हिस्सा खा जाते हैं। बिजली, पानी, खाद और बीज की समस्याएं तो हैं ही, लेकिन अगर किसान को लागत के हिसाब से अपनी फसल का रेट मिलने लगे तो कोई परेशानी ही नहीं रहेगी। आज किसान का खर्चा ज्यादा हो रहा है और आमदनी कम। पिछले चार दशकों में गेंहू के रेट में दो-तीन सौ फीसदी की बढ़ोतरी हुई है, जबकि सोने के रेट दो-तीन हजार फीसदी बढ़े हैं। आज तीन क्विटंल गेंहू बेचकर एक तोला सोना नहीं खरीदा जा सकता है। सरकार फसल का उचित दाम नहीं देती है और न ही पूरी फसल खरीदती है। आढ़ती और बिचौलिए सारा मुनाफा चट कर जाते हैं। अगर फसल अच्छी और ज्यादा हो गयी तो सड़क किनारे सड़ती है। हालात चाहे जैसे भी हों, लेकिन किसी भी सूरत में किसान को उसकी फसल का सही रेट मिलने वाला नहीं है, इसलिए समस्याएं कम होने का नाम नहीं ले रही हैं।

तो किसानों को क्या करना चाहिए?
किसानों को प्रोडक्शन कम कर देना चाहिए। कम उत्पादन ही किसानों की समस्याओं को खत्म करने का कारगार उपाय है। किसान ज्यादा फसल के लालच में यूरिया, कीटनाशकों और तमाम दूसरे साधनों पर अंधाधुंध पैसा खर्च करता है, लेकिन बाद में उसे लाभकारी रेट नहीं मिलता है।

अगर प्रोडक्शन कम होगा तो देश में अनाज का संकट पैदा नहीं हो जाएगा?
नहीं, ऐसा नहीं होगा। अगर आंकड़ों पर नजर दौड़ाएं तो सरकारी गोदामों में लाखों-करोड़ टन अनाज सड़ रहा है। उन्नत तकनीक और साधनों से उत्पादन रिकार्ड स्तर को छू रहा है, लेकिन प्राडक्शन ज्यादा होने से किसानों के हाथ आखिर लगा ही क्या है। वे आत्महत्याएं करने को मजबूर हैं। किसान की भलाई इसी में है कि वो प्राडक्शन कम कर दे। खाद, बिजली, पानी और बीज की प्राब्लम और हाई रेट उनकी समस्याएं बढ़ा रहे हैं। किसान देसी तकनीक अपनाएं तो कई समस्याएं हल हो सकती हैं, क्योंकि समस्याएं बहुत हैं जिनको ठीक करने में वक्त लगेगा।

आजादी मिले 64 साल हो गये हैं और कितना समय चाहिए?
देखिए, सरकार की नीतियां ही ऐसी हैं कि इससे किसी का भला होने वाला नहीं है। सरकार सीधे किसानों से सम्पर्क करने की बजाय किसी एजेंसी या संस्था के माध्यम से योजनाओं को लागू करवाना चाहती है। जबकि किसान से अधिक प्रयोग कोई दूसरा नहीं कर सकता। संस्था के लोग आकर किसानों को खाद बनाने की ट्रेनिंग दे रहे हैं। जिनका जन्म ही खेत-खलिहान में हुआ हो उन्हें भला संस्था वाले कैसे और क्या सिखाएंगे। संस्थाएं सरकारी एजेंट और दलाल बनकर किसान के हक का पैसा खाने के अलावा दूसरा काम नहीं करती। सरकार को सीधे किसानों से सम्पर्क करना चाहिए, किसी बिचौलिए या तीसरे की कोई जरूरत नहीं है।

किसान को मजदूर बनाने का उपक्रम है एफडीआइ’

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विदेशी कंपनियां छोटे-मझोले किसानों को अपने ही खेतों का मजदूर बना देंगी। बगैर एफडीआइ हुए ही खुदरा बाजार में पैठ चुकी रिलायंस जैसी कंपनियां जब किसानों के खेतों को 40 वर्षों के लिए लीज पर लेने लगी हैं तो वह किसान मजदूर होकर ही तो लौटेगा...

किसान जागृति मंच के अध्यक्ष सुधीर पंवार से अजय प्रकाश की बातचीत


भारत के खुदरा बाजार में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआइ) का राजनीतिक पार्टियां विरोध कर रही हैं, जबकि सरकार का कहना है कि इससे बाजार की बेहतरी होगी, आपकी राय?sudhir-panwar-1

एफडीआइ से सीधे प्रभावित होने वाले कुल तीन तबके हैं- किसान, व्यापारी और उपभोक्ता। एफडीआइ क्या है, इस बारे में किसानों को कोई जानकारी नहीं है, उपभोक्ता हमारे देश में कभी कोई संगठित ताकत बन नहीं सका जिसके विरोध या समर्थन का कोई मतलब हो। बचे व्यापारी तो जाहिर तौर पर उनका राजनीतिक पार्टियों और सत्ता में सीधा दखल भी है और वह लाभ-हानि के सभी पक्षों से वाकिफ भी हैं। व्यापारियों के रा”ट्रीय स्तर पर हुए सशक्त  विरोध की वजह से सरकार को एफडीआइ से कदम पीछे खींचना पड़ा है, लेकिन किसान अभी भी अंधेरे में हैं।

खुदरा बाजार में विदेशी कंपनियों के उतरने की स्थिति में सरकार ने किसानों के लिए क्या व्यवस्था दी है?
किसानों के सवालों से जुड़े होने के कारण हमारे लिए भी अभी यह जानना बाकी है कि इस तबके के लिए सरकार ने एफडीआइ में क्या प्रावधान किये हैं। सरकार ने पूरी तरह से इसे गुप्त रखा है। मीडिया में आ रही खबरों और चर्चाओं में भी विदेशी निवेश के सवाल पर व्यापारियों का पक्ष ही उभर रहा है। हमें जो जानकारी मिली है उस मुताबिक विदेशी कंपनियां भारतीय किसानों के 60 प्रतिशत माल/फसलों का इस्तेमाल बाजार में करेंगी।

दुनिया के देशों में एफडीआइ के अनुभव कैसे रहे हैं?
विदेशी कारपोरेट समूहों की ये कंपनियां सबसे पहली चोट स्वाभाविक तौर पर खुदरा बाजार पर करती हैं और पहला नुकसान स्थानीय व्यापारियों को ही होता दिखता है। दूसरी तरफ व्यापक विरोध से निपटने के लिए शुरूआती वर्षों में ये किसानों को भी लाभ देती हुई दिखती हैं। जो भाव स्थानीय व्यापारी किसानों की फसलों का देते पहले से देते रहते हैं, उनके मुकाबले ये कंपनियां किसानों को बढ़े दर पर भुगतान करती हैं। साफ है कि एफडीआइ के इस खेल में कुछ वर्ष के भीतर जब स्थानीय खुदरा बाजार खत्म होने लगता है तो फिर कंपनियां बाजार पर आधिपत्य कर लेती है।

भारतीय बाजारों में बड़ी कंपनियों का आधिपत्य तो पहले से ही है, अब क्या इस प्रक्रिया के बाद कॉरपोरेट खेती का चलन बढ़ेगा।
बेशक, यह इसीलिए किया जा रहा है। भारतीय खुदरा बाजार में आने को बेताब वालमार्ट हो या कैरीफोर कोई जनहित के लिए तो आ नहीं रही हैं। इनके आने के साथ देश में कारपोरेट खेती का असर बढ़ेगा, ठेके पर खेती होगी और छोटे-मझोले किसान एक प्रक्रिया में मजदूरों की श्रेणी में तेजी से पहुंचेंगे। बड़े किसानों का तो लाभ बढ़ेगा, लेकिन कंपनियां छोटे-मझोले किसानों को अपने ही खेतों का मजदूर बना देंगी। बगैर एफडीआइ हुए ही खुदरा बाजार में पैठ चुकी रिलायंस जैसी कंपनियां जब किसानों के खेतों को 40 वर्षों के लिए लीज पर लेने लगी हैं तो वह किसान मजदूर होकर ही लौटेगा।

लेकिन बिचैलियों की वजह से किसानों को जो भारी नुकसान होता है उससे तो राहत मिलेगी?
जहां ये कंपनियां किसानों की जमीन खरीद लेंगी या लीज पर ले लेंगी वहां तो यह संभव है, बाकी जगहों पर तो इन्हें भी बिचैलियों की जरूरत पड़ेगी। बिचैलियों को ये एग्रीगेटर कह रहे हैं, जो बुनियादी तौर पर बिचैलिया ही होगा। इसपर रोक लगाना तभी संभव है जब सरकार गांवों और ब्लाक स्तर पर किसान कोआपरेटिव बनाये और उसमें किसानों को फैसले और भागीदारी का अधिकार दे। फिर कम्पनियाँ उन्हीं कोआपरेटिव से खरीदारी करें। हमारी यह भी मांग है कि बाजार से होने वाली कमाई का एक हिस्सा किसानों को भी दिया जाये और उन समूहों को स्वंय दाम तय करने का अधिकार हो। मगर इन बातों का तभी महत्व है जब सरकार एफडीआइ में खरीददारी और बिक्री के प्रावधानों को सार्वजनिक करे। इस कानून को चोर दरवाजे से लाने की कोशिश की गयी तो किसान कत्तई स्वीकार नहीं करेंगे।
(द पब्लिक एजेंडा से साभार)