दलित चेतना वाली फिल्मों में दलित भूमिका बड़े अभिनेता निभाते रहे हैं. मैं अपनी कहानी में कोई समझौता नहीं करना चाहता था, इसलिये मैंने में नए कलाकारों को लिया है, अगर कोई बड़ा अभिनेता लेता तो फिल्म अपने मुद्दे से भटक जाती. नए कलाकारों से चरित्र और कहानी के साथ पूरा न्याय किया है...

'जौन पानी मनही के काम न आ सके वो पानी नाही... मूत... मूत है... मूत... है,’ जैसे डायलाग और ‘हमें गर्व हैं हम शूद्र हैं’ जैसे उद्वेलित कर देने वाले गीत के साथ शीघ्र ही रिलीज होने वाली फिल्म का नाम है ‘शूद्र द राइजिंग’. फिल्म के निर्माता, निर्देशक और लेखक लखनऊ के युवा फिल्मकार संजीव जायसवाल हैं. पिछले दिनों गोवा में हुए अंर्तराष्ट्रीय फिल्म समारोह में ‘शूद्र’ को काफी सराहना मिली थी. सन 2005 में राजेश सिंह के साथ मिलकर ‘फरेब’ फिल्म बना चुके संजीव ने इस बार गंभीर विषय को बड़े पर्दे पर उतारने का प्रयास किया है. ‘शूद्र’ को सेंसर बोर्ड से अभी प्रमाणपत्र नहीं मिला है, लेकिन विषय की गंभीरता, संवेदनशीलता और तेवरों को देखते हुए लगता है कि रिलीज के साथ ही फिल्म विवादों में घिर सकती है.
फिल्म के निर्माता-निर्देशक संजीव जायसवाल से आशीष वशिष्ट की बातचीत
आपको ‘शूद्र द राइजिंग’ बनाने का विचार कैसे आया?
जब कुछ बुजुर्गों ने मुझे बताया कि शूद्रों के पैरो में घंटिया बांध दी जाती थी, कमर में झाडू लटकाया जाता था तो मैं उद्वेलित हो गया. मुझे लगा कि इस गंभीर विषय पर फिल्म बनानी चाहिए. फिर इस बारे में इंटरनेट पर खोजबीन की, किताबों के पन्ने पलटे और समस्या की गहराई जानने और असलियत समझने की कोशिश की और लगा कि वर्षों से फैली हिंसा की जड़ में जाति व्यवस्था ही है.
इस विषय पर पहले भी कई फिल्में बन चुकी हैं, ‘शूद्र’ उनसे अलग कैसे है ?
ये सच है कि समाज की इस कड़वी और तल्ख हकीकत को पहले भी बड़े पर्दे पर फिल्माया जा चुका है, लेकिन मेरी फिल्म पूरी तरह से जातिप्रथा के खिलाफ है. मैंने इसकी तह में जाने की कोशिश की है. इसीलिए अतीत में जाकर इसकी वजह तलाशी है. कैसे हिंदुओं ने खुद को ब्राहम्ण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्णों में बांट रखा है. कैसे समाज में जहर फैला जिसकी वजह से सदियों तक दलितों को अछूत बनाए रखा. मैं एक क्रिएटिव आदमी हूं, इसलिए सिनेमा के माध्यम से खामोश क्रांति लाना चाहता हूं.
वर्तमान में परिस्थितियां काफी बदल चुकी हैं ?
अगर स्थितियां बदल गयी होतीं तो हरियाणा में दलित के हाथ नहीं काटे गये होते. उड़ीसा में अभी हाल में घरों को जलाने की घटना नहीं होती. देश में दलितों पर होने वाले अत्याचार, अपराध और प्रताड़ना की घटनाओं में उतरोत्तर वृद्धि हो रही है. अभी भी दलितों को धर्मस्थलों में आने से रोका जाता है. केवल कहने भर से कि हम सब एक हैं. कोई परिर्वतन नहीं आने वाला. अपनी जाति को श्रेष्ठ साबित करने के लिए हिंसा और आंतकवाद का सहारा लेकर दूसरी जाति को नीचा दिखाने का षडयंत्र मात्र है, यदि हम अब भी नहीं जागे तो न मानव बचेगा न धर्म. समानता की भावना ही शांति का मूल मंत्र है.
क्या आपको नहीं लगता कि इसे लेकर विवाद उठ सकते हैं?
हां, हो सकता है. लेकिन हमने जो दिखाया है वो तथ्यों पर आधारित है. असल समस्या सिस्टम की है, अपने फायदे के लिए चंद लोग पूरे समाज को भरमाने और भटकाने का काम करते हैं. ऐसे में गंभीर प्रयास भी विवादों का शिकार हो जाते हैं. हमने समाज की बात की है, ये कोई काल्पनिक कथा नहीं है. जो हुआ है उसे पर्दे पर पूरी ईमानदारी से उतारने का प्रयास किया है. कुछ लोगों को इससे तकलीफ हो सकती है, लेकिन समाज को आईना दिखाएगी 'शूद्र’. गोवा में हुए अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में गोविंद निहलानी, शेखर कपूर और विशाल भारद्वाज जैसे फिल्मकारों ने मेरे प्रयास को सराहा है. इस फिल्म के माध्यम से हम सन्देश देना चाहते हैं कि वे पुरानी रूढ़ीवादी मान्यताओं को त्याग कर आज के बदलते दौर के साथ कदम से कदम मिलाकर चलें.
आप लखनऊ से हैं और प्रदेश की मुख्यमंत्री एक दलित महिला हैं. कहीं आपने ‘शूद्र’ किसी राजनीतिक फायदे के लिए तो नहीं बनायी है?
अगर ऐसा होता तो हम इसे चुनाव से पहले रिलीज करने की कोशिश करते. 'शूद्र' का सब्जेक्ट बहुत बड़ा है. किसी छोटे लाभ या सस्ती लोकप्रियता के लिए इसे बर्बाद नहीं किया जा सकता. यह एक बड़ा और गंभीर मुद्दा है. हम इसे किसी दल या प्रदेश तक बाँधने की बजाय विश्व स्तर पर ले जाना चाहते हैं इसलिए फिल्म में शिवाजी, डॉ. अम्बेडकर के साथ ही नेल्सन मंडेला, मार्टिन लूथर किंग जैसे नेताओं की चर्चा की है. यह फिल्म बाबा साहेब डा. अंबेडकर को समर्पित है. फिल्म पर किसी दल को लाभ पहुंचाने से न जोड़ दिया जाए, इसलिए यूपी में विधानसभा चुनावों के बाद ही इसे प्रदर्शित करने की तैयारी है. वहीं अभी फिल्म को सेंसर बोर्ड से प्रमाण पत्र भी नहीं मिला है. सबकुछ ठीक रहा तो बाबा साहब के जन्मदिन से एक दिन पूर्व 13 अप्रैल को फिल्म रिलीज करने की योजना है.
फिल्म के बारे में कुछ बताएं?
'शूद्र' 25 करोड़ लोगों की कहानी है जो सदियों से शोषण और दमन का शिकार हो रहे हैं. फिल्म मनु स्मृति से शुरू होकर आज के समय तक आती है और दलितों को उनके मूलभूत अधिकारों से वंचित किये जाने की समस्या को उठाती है. इसकी कहानी बाला, माधव और भेरु की है, जिन्होंने अमानवीय परिस्थितियों के खिलाफ मोर्चा खोला. यह कहानी उस संघर्ष की भी है जिस कारण शूद्र कहलाने वाले पिछले तबके के लोग भोजन, पानी, दवाई, आत्म-सम्मान और आजादी के लिए मर रहे हैं. किसी शूद्र को सिर्फ इसलिए मर दिया जाता है कि उसने किसी खास कुएं से एक बूंद पानी पी लिया. घाव से पीडित आदमी दवा का मोहताज होकर मरता है, तो वहीं किसी बच्चे को सिर्फ इसलिए प्रताड़ना झेलनी पड़ती है कि उसके कानों में कुछ वेद-मंत्र चले गए हैं. इन सबकी वजह सिर्फ इनका शूद्र या अस्पृश्य जाति में जन्म लेना है. दलित चेतना वाली फिल्मों में दलित भूमिका बड़े अभिनेता निभाते रहे हैं. मैं अपनी कहानी में कोई समझौता नहीं करना चाहता था, इसलिये मैंने में नए कलाकारों को लिया है, अगर कोई बड़ा अभिनेता लेता तो फिल्म अपने मुद्दे से भटक जाती. नए कलाकारों से चरित्र और कहानी के साथ पूरा न्याय किया है. जो मैसेज मैं फिल्म के जरिये देना चाहता था लगता है, उसमें सफल रहा हूं.




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