भारत की प्रतिबंधित कम्युनिस्ट पार्टी सीपीआइ (माओवादी) के सदस्य और तीन राज्यों में उसका इंचार्ज होने के आरोप में गिरफ्तार किये गए प्रशांत राही उत्तराखंड की विभिन्न जेलों में 3 साल 8 महीने की कैद के बाद जमानत पर रिहा हो गए हैं. रिहाई के बाद उन्होंने फिर एक बार जनता से वायदा किया है कि वह विभिन्न तरीकों से शोषित-उत्पीडित जनता के संघर्षों में लगातार शामिल रहेंगे. हालाँकि उन्होंने देश की जनता के मुक्तिसंग्राम में माओवादी नेतृत्व को अभी भविष्य का सवाल बताया है. जेल से छूटने के बाद प्रशांत राही का पहला विशेष साक्षात्कार सिर्फ जनज्वार पर प्रकाशित हो रहा है...
पहला विशेष साक्षात्कार सिर्फ जनज्वार पर
प्रशांत राही से सुधीर कुमार की बातचीत
अपनी रिहाई के लिए आप किन संस्थाओं और व्यक्तियों के शुक्रगुजार हैं?जेल जीवन के दौरान मैंने महसूस किया कि मुझे ढेर सारे मित्रों, शुभचिंतकों का समर्थन हासिल है। मैं इसी समर्थन से कृतज्ञ महसूस करता था। रिहाई के बाद मुझे अहसास हुआ कि समर्थन उससे काफी ज्यादा है, जो मैं बंदी जीवन के दौरान सोचा करता था। औपचारिक तौर पर मैं किसी व्यक्ति या संस्था विशेष का आभार व्यक्त करना आवश्यक नहीं समझता। मैं अपनी रिहाई के लिए प्रयासरत सभी लोगों का शुक्रगुजार हूं। यहां मैं यह जरूर कहना चाहूंगा कि उत्तराखण्ड के जनसंघर्षों के नेतृत्वकारी व्यक्तियों ने मेरे आत्मबल को बेहद मजबूती दी।
खासतौर पर कमला पंत, निर्मला बिष्ट, पदमा गुप्ता से जेल में हुयी मुलाकात ने मुझे एक राजनीतिक बंदी होने का गरिमामयी अहसास करवाया। इससे पहले जेल के भीतर मुझे हर पल मेरे एक खतरनाक देशद्रोही अपराधी होने का अहसास करवाया जाता था। इस दृष्टि की निरंतरता ने मुझे बेहद व्यथित कर दिया था। इस मुलाकात ने मुझे उत्साहित किया और बाहर की दुनिया के साथ भी मेरा एक उम्दा अहसास देने वाला रिश्ता कायम किया।
जेल में ही राजीव लोचन शाह, शमशेर सिंह बिष्ट और पीसी तिवारी से भी मुलाकात हुयी, इनका लेखन भी पढ़ा। इससे मेरे भीतर खुद के लिए गौरव की भावना पुनर्जागृत हुयी जो गिरफ्तारी के बाद हुए अमानवीय व्यवहार से क्षीण हो गयी थी। मैं इन सभी साथियों को ‘लाल सलाम‘ पेश करता हूं। क्रांतिकारी ताकतों द्वारा राजनीतिक बंदी रिहाई कमेटी के गठन ने भी उम्मीद और आशा का संचार किया, बाद में इसने मेरी रिहाई में अहम् भूमिका अदा की। मेरी दिली इच्छा है कि उत्तराखण्ड के जनसंघर्षों की ये ताकतें एकजुट होकर एक मंच पर आएं। मैं खुद भी इस एकता के लिए हरसंभव कोशिश करुंगा। मैं न्यायपालिका के उन व्यक्तियों का भी शुक्रगुजार हूं, जिन्होंने मेरी रिहाई को सुगम बनाया।
आपको पुलिस द्वारा क्यों और कैसे गिरफ्तार किया गया?
सत्रह दिसम्बर 2007 से पहले ही मेरी गिरफ्तारी का एजेण्डा पुलिस के पास था। मैं उत्तराखण्ड में चल रहे जनसंघर्षों का सचेत और विचारवान प्रतिनिधि हूं। सामंतवाद, पूंजीवाद और साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलनों के लिए मेरी संकल्पबद्धता है। इन्हीं कारणों से मैं राज्य और सत्ताधारी लुटेरों के लिए बड़ा खतरा बन गया था। जिस दौर में मैं गिरफ्तार हुआ वह राज्य में जनांदोलनों के अवसान का दौर था। ऐसे में मेरे पास जनता का सुरक्षा दुर्ग भी नहीं था। इसने मेरी गिरफ्तारी को सुगम बनाया। जब तक मैं जनांदोलनों में सक्रिय था, तब तक राज्य चाहकर भी मुझे गिरफ्तार नहीं कर सकता था।
सत्रह दिसम्बर 2007 से पहले ही मेरी गिरफ्तारी का एजेण्डा पुलिस के पास था। मैं उत्तराखण्ड में चल रहे जनसंघर्षों का सचेत और विचारवान प्रतिनिधि हूं। सामंतवाद, पूंजीवाद और साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलनों के लिए मेरी संकल्पबद्धता है। इन्हीं कारणों से मैं राज्य और सत्ताधारी लुटेरों के लिए बड़ा खतरा बन गया था। जिस दौर में मैं गिरफ्तार हुआ वह राज्य में जनांदोलनों के अवसान का दौर था। ऐसे में मेरे पास जनता का सुरक्षा दुर्ग भी नहीं था। इसने मेरी गिरफ्तारी को सुगम बनाया। जब तक मैं जनांदोलनों में सक्रिय था, तब तक राज्य चाहकर भी मुझे गिरफ्तार नहीं कर सकता था।
अपनी गिरफ्तारी की प्रक्रिया के बारे में बतायें?
सत्रह दिसम्बर 2007 को देहरादून - ऋषिकेश मार्ग पर दोपहर 1 बजे बिना वर्दी के पुलिस वालों द्वारा मुझे अपहृत कर लिया गया। अपहरण करने से पहले सात-आठ लोगों ने मुझ पर पीछे से हमला बोला और जबरन एक वैन में डाल दिया गया। देहरादून पुलिस कंट्रोल रूम के पिछले दरवाजे से मुझे भीतर ले जाकर दूसरी गाड़ी में डाल दिया गया और हरिद्वार रास्ते में डोईवाला से पहले ही मेरी आंखों में पट्टी बांध दी गयी।
सत्रह दिसम्बर 2007 को देहरादून - ऋषिकेश मार्ग पर दोपहर 1 बजे बिना वर्दी के पुलिस वालों द्वारा मुझे अपहृत कर लिया गया। अपहरण करने से पहले सात-आठ लोगों ने मुझ पर पीछे से हमला बोला और जबरन एक वैन में डाल दिया गया। देहरादून पुलिस कंट्रोल रूम के पिछले दरवाजे से मुझे भीतर ले जाकर दूसरी गाड़ी में डाल दिया गया और हरिद्वार रास्ते में डोईवाला से पहले ही मेरी आंखों में पट्टी बांध दी गयी।
पुलिस की अफरा-तफरी में एक घंटे बाद ही यह वाहन बुरी तरह दुर्घटनाग्रस्त हो गया। इसके बाद मुझे ले जा रहे व्यक्तियों ने कई सरकारी संस्थाओं से सम्पर्क साधा, अंततः एक घंटे के बाद एक दूसरा वाहन मंगवाकर मुझे नजीबाबाद से पहले जंगल में मौजूद किसी कोठी में ले जाया गया। अपहरण के चार घंटे के बाद एक अंग्रेजीदां व्यक्ति ने पहली दफा इसी कोठी में मुझे मेरे नाम से सम्बोधित किया। उसकी बातों से समझ में आया कि मुझे फर्जी मुठभेड़ में मार गिराया जाने वाला है। यहां पर इसी रात मुझे बुरी तरह पीटा गया। अठारह दिसम्बर की सुबह मुझसे विभिन्न किस्म से सुराग लेने की कोशिश की गयी। दिनभर की मैराथन पूछताछ के बाद 18 दिसम्बर की शाम पुनः 1 घंटे की यात्रा कर मुझे स्थानांतरित किया गया। यहां पर मेरी आंखों की पट्टी उतार दी गयी। अब शायद केंद्र सरकार की खुफिया संस्थाओं के लोग मेरे सामने थे। यह एक बंगलेनुमा जगह थी, जहां पर भीतर पीएसी सम्मेलन कक्ष हरिद्वार के उद्घाटन का शिलापट लगा हुआ था। इसी जगह पर मुझे सभी हदों को पार कर अमानवीय यातनाएं दी गयीं। यहीं पर भारतीय पुलिस की बीमार और विकृत मानसिकता से मेरा सामना हुआ।
इसी बंगले में मेरे सामने ही मेरे खिलाफ तमाम सुबूत गढ़े गए। यहां मौजूद कई पुलिसकर्मियों और खुफिया अधिकारियों को मैं जानता हूं जिनके नाम में किसी स्वतंत्र या सरकारी जांच कमेटी के समक्ष ही रखूंगा। हां, यहां बता दूं कि बंगले में मौजूद एक पुलिस अधिकारी बाद में रणवीर फर्जी मुठभेड़ के अभियुक्त के रूप में मुझे जेल में मिला। इस अधिकारी ने जेल में मुझे फख्र के साथ बताया कि पुलिस विभाग में तरक्की के लिए दांव-पेंच, झूठ और साक्ष्य गढ़ने में महारत जरूरी है। बीस दिसम्बर को सुबह 10 बजे केन्द्रीय एजेंसी के अधिकारी द्वारा बधाई दी गयी कि उन्होंने मुझे मुठभेड़ में मार गिराने का विचार त्याग दिया है और अब मुझे गिरफ्तार भर किया जाएगा। 20 दिसम्बर को मुझे नानकमत्ता कोतवाल के सरकारी निवास पर ले जाया गया। 22 दिसम्बर को मैं इस जगह को पहचान पाया। पुलिस द्वारा 22 दिसम्बर को ही मेरी गिरफ्तारी हसपुर खत्ता के जंगलों से हुयी दिखायी गयी।
मुझ पर आरोप लगाया गया कि मैं हसपुर खत्ता के जंगलांे में बीसेक साथियों के साथ स्थानीय ग्रामीणों को सैन्य प्रशिक्षण दे रहा था कि यह प्रशिक्षण राष्ट्र के खिलाफ साजिश रचने के लिए दिया जा रहा था। 22 दिसम्बर को ही पहली बार मैंने दो वर्दीधारी पुलिसवालों को अपने सामने पाया। इनमें एक आईजी उत्तराखण्ड थे और दूसरे ऊधमसिंहनगर के पुलिस प्रमुख थे। इन्होंने मेरी तत्काल रिहाई और मेरे खिलाफ लिख लिए गए मुकदमों को रद्दी की टोकरी में डाल देने के एवज में दो शर्तें रखीं, जिन्हें मैंने नामंजूर कर दिया।
क्या आप खुद को माओवादी नेता कहलाना पसंद करेंगे?
माओवादी आंदोलन आज देश के भीतर एक बड़ी ताकत बन चुका है। अभी यह देश की मेहनतकश जनता को समग्र तौर पर अपने भीतर नहीं समेट सका है। देश की जनता के समग्र मुक्तिसंग्राम में माओवादी नेतृत्व अभी भविष्य का सवाल है। इन हालातों में माओवादी नेता होने-न होने का सवाल अप्रासंगिक है।
माओवादी आंदोलन आज देश के भीतर एक बड़ी ताकत बन चुका है। अभी यह देश की मेहनतकश जनता को समग्र तौर पर अपने भीतर नहीं समेट सका है। देश की जनता के समग्र मुक्तिसंग्राम में माओवादी नेतृत्व अभी भविष्य का सवाल है। इन हालातों में माओवादी नेता होने-न होने का सवाल अप्रासंगिक है।
आपकी जमानत का आधार क्या है?
आखिर न्याय व्यवस्था पर मुझे जेल के भीतर बंद रखने का निराधार राजकीय दबाव कब तक काम कर सकता था। आखिरकार मुझे जमानत देना ही इनकी नियति थी।
आखिर न्याय व्यवस्था पर मुझे जेल के भीतर बंद रखने का निराधार राजकीय दबाव कब तक काम कर सकता था। आखिरकार मुझे जमानत देना ही इनकी नियति थी।
जमानत के करीब एक माह बाद आप जेल से बाहर आ पाए, इस संदर्भ में भारतीय न्याय व्यवस्था के बारे में क्या कहना चाहेंगे?
उत्तराखण्ड में मेरी तरह के अन्य राजनीतिक बंदियों के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो मेरी रिहाई अन्य की तुलना में जल्दी हुयी है। राज्य के पिछले दो तीन सालों में यह अप्रत्याशित और आश्चर्यजनक ही है। उत्तराखण्ड में जमानतियों की तस्दीक की जो प्रक्रिया शुरू की गयी है, वह सभी राज्यों में नहीं है। राज्य में न्याय-प्रणाली राज्य गठन के बाद से कठोर और जटिल होती जा रही है। राज्य के भू-पारिस्थितिकी, भू-राजनीतिक स्थिति, नवगठित राज्य में नीति निर्माताओं में परिपक्वता-अपरिपक्वता और नौकरशाही, अधिकारी वर्ग में ताकत के दुरुपयोग की प्रवृत्ति वगैरह इसके मूल में हो सकते हैं। उत्तराखण्ड राज्य उत्तर प्रदेश से अलग होकर बना है। उत्तर प्रदेश से तुलना करें तो राज्य की न्यायपालिका में भ्रष्टाचार तुलनात्मक रूप से कम है। जिस भ्रष्टाचार पर उच्च न्यायालय जस्टिस सुधा मिश्रा और मार्कण्डेय काट्जू की बैंच न तल्ख टिप्पणी भी की थी। अभियुक्तों के प्रति अनावश्यक कठोरता और पुलिस के प्रति अतिशय नरमी उत्तराखण्ड की न्याय प्रणाली के बेहद नकारात्मक पहलू हैं।
उत्तराखण्ड में मेरी तरह के अन्य राजनीतिक बंदियों के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो मेरी रिहाई अन्य की तुलना में जल्दी हुयी है। राज्य के पिछले दो तीन सालों में यह अप्रत्याशित और आश्चर्यजनक ही है। उत्तराखण्ड में जमानतियों की तस्दीक की जो प्रक्रिया शुरू की गयी है, वह सभी राज्यों में नहीं है। राज्य में न्याय-प्रणाली राज्य गठन के बाद से कठोर और जटिल होती जा रही है। राज्य के भू-पारिस्थितिकी, भू-राजनीतिक स्थिति, नवगठित राज्य में नीति निर्माताओं में परिपक्वता-अपरिपक्वता और नौकरशाही, अधिकारी वर्ग में ताकत के दुरुपयोग की प्रवृत्ति वगैरह इसके मूल में हो सकते हैं। उत्तराखण्ड राज्य उत्तर प्रदेश से अलग होकर बना है। उत्तर प्रदेश से तुलना करें तो राज्य की न्यायपालिका में भ्रष्टाचार तुलनात्मक रूप से कम है। जिस भ्रष्टाचार पर उच्च न्यायालय जस्टिस सुधा मिश्रा और मार्कण्डेय काट्जू की बैंच न तल्ख टिप्पणी भी की थी। अभियुक्तों के प्रति अनावश्यक कठोरता और पुलिस के प्रति अतिशय नरमी उत्तराखण्ड की न्याय प्रणाली के बेहद नकारात्मक पहलू हैं।
जेल-जीवन का अनुभव कैसा रहा, वहां की दिनचर्या के बारे में बताएं?
मैं वादा नहीं करता, पर कोशिश करुंगा इन अनुभवों को लिख पाऊं। जेल जीवन के अनुभव साझा करने न करने को लेकर फिलहाल मैं ऊहापोह की स्थिति में हूं। जहां तक दिनचर्या का सवाल है, जेल में सुबह दो बजे जगने या जगा दिए जाने के बाद दिनचर्या शुरू होती है। जेल में हम नामों से नम्बर में बदल दिए जाते हैं। कायदन हर दो घंटे में हम नम्बरों को गिना जाता है। एक घटिया चाय से शुरुआत करने के बाद ज्यादातर वक्त मैंने व्यायाम, खेल, अध्ययन-लेखन में बिताया। इन तीन साल आठ महीनों में मैं सिर्फ 10 माह आम बैरक में रहा।
मैं वादा नहीं करता, पर कोशिश करुंगा इन अनुभवों को लिख पाऊं। जेल जीवन के अनुभव साझा करने न करने को लेकर फिलहाल मैं ऊहापोह की स्थिति में हूं। जहां तक दिनचर्या का सवाल है, जेल में सुबह दो बजे जगने या जगा दिए जाने के बाद दिनचर्या शुरू होती है। जेल में हम नामों से नम्बर में बदल दिए जाते हैं। कायदन हर दो घंटे में हम नम्बरों को गिना जाता है। एक घटिया चाय से शुरुआत करने के बाद ज्यादातर वक्त मैंने व्यायाम, खेल, अध्ययन-लेखन में बिताया। इन तीन साल आठ महीनों में मैं सिर्फ 10 माह आम बैरक में रहा।
मेरा ज्यादातर वक्त तन्हाई में ही बीता। आम बैरक में सभी बंदियों की शाम टेलीविजन की गिरफ्त में आ जाता है। मैं भी इससे बच नहीं पाता था। कम रोशनी की वजह से पढ़ाई-लिखाई नहीं हो पाती थी। तन्हाई में मैंने ज्यादातर शामें अध्ययन-लेखन में बिताया। मेरे मुलाकातियों ने हमेशा मुझे बेहतर अध्ययन सामग्री मुहैया करायी थी। हालांकि जेलजीवन की सामाजिकता में भी मेरा वक्त बीतता था, पर मैंने अध्ययन-लेखन को ज्यादा वक्त दिया। जेल में चुनाव के मौके पर विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के काम आने वाले शातिर अपराधियों से लेकर सलाखों के पीछे आ चुके पुलिस अधिकारियों के साथ भी रहने का मौका मिला। जेल में उच्चकोटि के साहित्य के शौकिन बंदियों का भी सानिध्य मिला। इनमें से किसी एक से मुझे चे ग्वेरा की जीवनी भी पढ़ने को मिली। बंदियों के माध्यम से मैंने जीवन के कुछ अनजाने पहलुओं से भी परिचित हुआ।
अंडरवर्ल्ड एवं सरकारी खुफिया तंत्र का गठजोड़, भारत-पाकिस्तान युद्ध से खुफिया तंत्र का सम्बन्ध, अंधराष्ट्रवाद का अंडरवर्ल्ड और गैंगवार से सम्बन्ध इत्यादि के बारे में मुझे नयी जानकारियां हासिल हुयीं। जेल में रहकर यह अहसास बढ़ा कि पुलिस अपराधियों के सुधार में सबसे बड़ी बाधा है। यहीं पर पुलिस की धड़ेबंदियों का अंडरवर्ल्ड की धड़ेबंदियों से अंतर्सम्बंध के बारे में समझ गहराई। यहां ऐसे बंदियों से भी मुलाकात हुयी, जिनके भीतर रचनात्मक कार्य करने की प्रतिभा और इच्छाशक्ति है। यह इच्छाशक्ति न्याय-प्रणाली से मात खा रही है। समाजवाद में इसी रचनात्मकता को बाहर लाकर व्यक्तित्वांतरण की प्रक्रिया की शुरुआत की जा सकती है।
अपनी राजनीतिक यात्रा और भविष्य की योजनाओं के बारे में बताइये?वर्ष 1978 में मैं बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में आईआईटी का छात्र था। यहां पर सत्यनाथ सारंगी के नेतृत्व में ‘सोसायटी आफ सोशल वर्कर’ नामक एक ग्रुप सक्रिय था। सुभाष गाताडे, नीरज जैन वगैरह इस संगठन के अन्य नेताओं में थे। मैं इस ग्रुप का शुभेच्छु बन गया और 1981 में इसका सक्रिय सदस्य हो गया। मुझे सक्रिय कार्यकर्त्ता के रूप में प्रेरित करने का काम दक्षिण भारतीय एस रमेश ने किया। वही मेरे प्रेरणास्रोत और अंतरंग मित्र रहे। मैं उनकी सहृदयता, संवेदनशीलता और सामाजिक सरोकारों के प्रति समर्पण से बेहद प्रभावित रहा। हम लोग शंकर गुहा नियोगी के आंदोलन से अभिप्रेरित रहे। हम किसी भी पार्टी या संगठन से नहीं जुड़ना चाहते थे।
इसी दौरान विभिन्न गैर सरकारी संगठनों ने हमें अपने भीतर समेटने का प्रयास किया। इसी दौरान बाढ़ राहत का कार्य करते हुए एक एमडी डॉक्टर से संपर्क का मौका मिला जो कि नक्सलबाड़ी आंदोलन के भी हिस्सेदार रहे थे। इन्होंने मुझे चीनी समाज में वर्गों का विश्लेषण और एक अन्य मार्क्सवादी रचनाएं पढ़ाई। इस अंतर्मुखी डॉक्टर के रूप में मेरा एक सच्चे कम्युनिस्ट से परिचय हुआ। इन्हीं से मेरी गैर सरकारी संगठन के बारे में भी सार्थक बातचीत हुयी। अपने व्यवहार से कम्युनिज्म का पाठ पढ़ाने वाले इसी डॉक्टर की वजह से मैं गैर-सरकारी संगठनों के बारे में एक निर्णायक अवस्थिति तक पहुंचा और हम सभी के बीच गैर सरकारी संगठनों के पक्ष या विपक्ष में एक ध्रुवीकरण बना। इसी सवाल पर हम सत्यनाथ सारंगी से अलग हो गए। इसी दौरान एस रमेश, नियोगी के आंदोलन में शामिल हो गए।
हम लोग विभिन्न कम्युनिस्ट संगठनों के कार्यक्रमों में और मजदूरों के बीच जाने लगे। बिना दिशा निर्देशन के बिखराव और हताशा होने लगी। वर्ष 1982 के आसपास हम में से के कई लोग भारत में पूंजीवादी विकास को स्वीकार कर छात्र आंदोलन में जुट गए। मैं छात्र आंदोलन में देर से जुटने वालों था। 1984-85 में मैंने नौकरी छोड़ दी और बीएचयू में छात्रों को संघर्ष के लिए संगठित करना शुरू किया। बाद में मैं पूर्वी उत्तर-प्रदेश में इस नए ग्रुप के साथ मेहनतकश वर्गों, तबकों के संगठन में लगा रहा। इस ग्रुप की अंदरूनी बहसों, टूट-बिखराव तथा व्यक्तिगत जीवन की समस्याओं के चलते मैं उत्तराखण्ड आ गया और देहरादून में पत्रकारिता के काम में लग गया। यह 1991 की बात है।
इसी दौरान नई आर्थिक नीति आयी। नई आर्थिक नीतिओं को लेकर अंग्रेजी पत्रिका आस्पेक्टस ऑफ़ इंडियाज इकोनोमी के विश्लेषणों और पूर्वानुमानों को व्यवहारतः सही पाकर मैं उसके अनुवाद तथा प्रचार-प्रसार में लग गया। इस बीच मैं अपने पूर्व राजनितिक ग्रुप के साथ ही मिलकर गतिविधियां करने लगा। वर्ष 1994 में उत्तराखण्ड आंदोलन की चिंगारी फूटी और मैं एक पत्रकार और आंदोलनकारी की दोहरी भूमिका में इसमें शामिल हो गया। मैं ग्रुप के साथ भी बना रहा और एक हद तक स्वतंत्र भी रहा। राज्य आंदोलनकारी के रूप में मेरा वजूद देहरादून में कायम हुआ। इस आंदोलन ने मेरे भीतर जनता को संगठित करने का आत्मविश्वास पैदा किया। वर्ष 1996 से क्षेत्रीय आंदोलनों को व्यापक परिप्रेक्ष्य में समझना शुरू कर दिया। 1998-99 आते-आते मेरी भारतीय समाज के विश्लेषण की समझ बनी कि यह एक अर्द्धसामंती और अर्द्धऔपनिवेशिक समाज है।
इस दौरान उत्तराखण्ड किसान संगठन को मॉडल मानते हुए हम कुछ कार्यकर्ता जल, जंगल, जमीन के सवाल पर गांवों में बुनियादी वर्गों को संगठित करने के काम में लग गए। हमने क्रांतिकारी आंदोलन के संगठन की शुरुआती कोशिशें शुरू कर दीं। उत्तराखण्ड संघर्ष वाहिनी के प्रयासों से गठित हुयी समन्वय समिति का भी मैं हिस्सा बना। समन्वय समिति की भीतर बहसों का हिस्सा रहा। वर्ष 1996 में परेड ग्राउंड देहरादून और गाँधी पार्क में पत्रकारों पर हुए लाठीचार्ज और उसके बाद चुनाव बहिष्कार तक के लिए हुयी पत्रकारों और प्रगतिशील ताकतों की गोलबंदी में भी मैं शामिल रहा, बल्कि आंदोलन की अगुवाई में था।बाद के दिनों में भी मैं विभिन्न जनसंघर्षों में शामिल रहा और जल, जंगल, जमीन के सवाल पर मेहनतकश अवाम को एकजुट करता रहा। राज्य गठन के बाद सरकारों ने जनआंदोलनों का घोर दमन शुरू किया। दमन के इसी दौर में मेरी गिरफ्तारी हो गयी।
मेरी आगे की योजना यह है कि मैं आगे भी अपने सामाजिक दायित्वों का निर्वाह करता रहूंगा. जेलबंदियों, जिसमें राजनीतिक बंदी भी शामिल हैं, की बेहतरी के लिए काम करुंगा। मैंने पिछले चार सालों में राज्य की अपराध सम्बन्धी न्याय प्रणाली को बेहद करीब से देखा है। राज्य में 3000 बंदी, जिनमें 90 फीसदी अपराधी नहीं है, इस प्रणाली से त्रस्त हैं। इसमें बदलाव के लिए संघर्ष ही फौरी योजना में शामिल है।
अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के सवाल पर आपका रुख?
आंदोलन का नेतृत्व पूरी तरह कारपोरेट घरानों के हाथ में है। सामंतवाद, पूंजीवाद, साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन की संभावनाशीलता के दौर में पश्चिम एशिया और अफ्रीकी देशों आंदोलन के व्यवस्था विरोधी होने का भ्रम पैदा होता है। अन्ना का आंदोलन इसी का एक रूप है। इन आंदोलनों के माध्यम से व्यवस्था में सुधार की संभावना को जागृत किया जा रहा है। इस तरह के आंदोलन शासक वर्गों के लिए सेफ्टी वॉल्ब का काम भी कर रहे हैं। रालेगण सिद्धी में लागू वर्ग-वर्ण व्यवस्था माडल को लागू करना अन्ना का साध्य है।
आंदोलन का नेतृत्व पूरी तरह कारपोरेट घरानों के हाथ में है। सामंतवाद, पूंजीवाद, साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन की संभावनाशीलता के दौर में पश्चिम एशिया और अफ्रीकी देशों आंदोलन के व्यवस्था विरोधी होने का भ्रम पैदा होता है। अन्ना का आंदोलन इसी का एक रूप है। इन आंदोलनों के माध्यम से व्यवस्था में सुधार की संभावना को जागृत किया जा रहा है। इस तरह के आंदोलन शासक वर्गों के लिए सेफ्टी वॉल्ब का काम भी कर रहे हैं। रालेगण सिद्धी में लागू वर्ग-वर्ण व्यवस्था माडल को लागू करना अन्ना का साध्य है।



Comments
I am hereby requesting the Editor of Jan Jwaar to make available the full text of my reply to Mr Sudhir's question about the so-called Anna Hazare movement against corruption in view of the immediate significance.
At the time of the interview, I was certainly not in favour of condemning or merely criticizing the ongoing movement. Just out of jail, I was in the process of understanding the movement. I was feeling that the question of the character of the leadership is only one aspect of this question. My reported reply does not represent my overall view. Neither at the time of the interview, nor now. I am in favour of participating/supporting with the aim of providing an alternative, a progressive democratic or revolutionary pole within the people's upsurge.
About the rest of the interview, since I had given Mr Sudhir the right to make a precis (brief presentation) of my replies I have no complaints about the shortcomings.
अन्ना हजारे के आन्दोलन के प्रति प्रशांत जी ने जो राय रखी है उसे पढकर किंचित निराशा हुई.
अस्मितावादी आंदोलनों के उरूज के दौर में यह एक मात्र ऐसा आन्दोलन रहा जो अपने मूल चरित्र में सर्व-समावेशी है.
जनज्वार के संचालक को प्रशांत जी के कमेन्ट का संज्ञान लेते हुए इस साक्षात्कार में अपेक्षित सुधर कर लेना चाहिए था. पत्रिका का नाम टी सुधर लिया गया है लेकिन अभी भी उसके साथ यह जुदा हुआ है कि प्रशांत जी उसके प्रचार-प्रसार में जुट गए. जबकि प्रशांत जी ने अपने कमेन्ट में इसका स्पष्ट खंडन किया है.
प्रशांत जी को शुभकामनायें. जनज्वार को साधुवाद कि हमें ये साक्षात्कार पढ़वाया.
I urgently wish to correct the most serious error in the interview prepared here by Mr Sudhir.
The most serious error is that the name of the journal whose analyses and projections I tended to consider as correct 1991 was NOT E.P.W. It was ASPECTS OF INDIA's ECONOMY, which I was reading regularly since its inception around 1988-89. This was being published from Mumbai.
It is wrong to say that I propagated any such journal then. It took about 8 years since 1991 for me to understand the full force and depth of the argument that India's development was never independent of imperialism in the neolcolonial phase of the world system.
I'm very surprised and taken aback that Mr Sudhir made such a Gross Mistake. So please read the above stated portion of this hurriedly reported interview with this correction.
Prashant Rahi
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