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Back साक्षात्कार मुक्ति के संघर्षों के प्रति मेरी आस्था पहले जैसे ही हैं

मुक्ति के संघर्षों के प्रति मेरी आस्था पहले जैसे ही हैं

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हल्दूचैड़, दुम्का बंगर, लालकुंआ, नैनीताल के सामाजिक कार्यकर्ता और आंदोलनकारी गोपाल भट्ट को पुलिस ने देशद्रोह के आरोप में जेल में बंद कर दिया था. साढ़े तीन साल बाद वे जमानत पर रिहा हुए. प्रस्तुत है संजय रावत और सुधीर कुमार से बातचीत...

आपकी गिरफ्तारी की वजह क्या रही?

किशोरावस्था में भगत सिंह के व्यक्तित्व और विचारों से प्रभावित हुआ. बारहवीं कक्षा में मैं भगत सिंह के विचारों से अभिप्रेरित प्रगतिशील छात्रा संगठन के सम्पर्क में आया. छात्र जीवन से ही मैं राजनीतिक रूप से सक्रिय और जनपक्षधर संघर्षों में भागीदार रहा. 1994 में अल्मोड़ा कैम्पस में अध्ययन के दौरान मैं राजनीतिक रूप से पूर्णतः सक्रिय हुआ. कालेज में हम छात्रों से जुड़े छोटे-बड़े सभी मुद्दों पर सक्रिय रहे और गैरबराबरी वाली शिक्षा व्यवस्था को बदलने के लिए प्रयास करते रहे. इसी दौरान भगत सिंह के विचारों से मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन और माओ के विचारों को जानने समझने का सफर भी शुरू हुआ.

gb32000 तक के अपने छात्र जीवन में मेरी राजनीतिक गतिशीलता इन्हीं विचारों के आलोक में गतिमान रही. इसी दौरान अपनी सक्रियता के कारण मैं कालेज से निलम्बित भी किया गया. छात्र जीवन के बाद भी मेरी राजनीतिक सक्रियता बनी रही. अब मैं, जल, जंगल, जमीन पर जनता के अधिकारों को लेकर पूरी तरह संघर्ष में उतर गया. हमने बिंदुखत्ता क्षेत्र में किसानों के भूअधिकारों के लिए संघर्ष किया और सफलता भी पायी. इस आंदोलन के दौरान, जो कि भूमिहीन श्रमिक किसान संघर्ष समिति के बैनर तले लड़ा गया, मैं 50 साथियों के साथ गिरफ्तारी के बाद 15 दिन जेल में बंद रहा.

इसी समय हम समूचे उत्तराखण्ड की मेहनतकश जतना को संगठित करने की दिशा में आगे बढ़े और जनांदोलनों को विकसित करने का प्रयास करने लगे. हमने देश के क्रांतिकारी आंदोलन के सच्चे प्रतिनिधियों के पक्ष में लामबंदी करने की कोशिशें शुरू कर दीं. इसी दौरान माओ विचारधरा और माओवाद के फर्क को भी आत्मसात किया.

जन संघर्षों से प्राप्त नवगठित राज्य को आप किस रूप में देखते हैं?

नए राज्य की व्यवस्था क्या हो, यह सवाल राज्य निर्माण के आंदोलन के दौरान और बाद मैं भी महत्वपूर्ण है. इसी दृष्टि से नए राज्य को देखें तो इसमें भी आम जनता बदहाली, गरीबी में जी रही है. भूमाफियाओं, भ्रष्टाचारियों की पकड़ राज्य में ज्यादा मजबूत हुयी है. जनता की लूट-खसोट बढ़ी है. नए राज्य में अपराधों का ग्राफ तेजी से बढ़ा है. सुदूर पर्वतीय क्षेत्र भी अपराध की जद में आ गए हैं. हां! नेताओं, अफसरों, भूमाफियाओं, पूंजीपतियों और धन्नासेठों को राज्य बनने से जरूर फायदा हुआ है.

आपकी गिरफ्तारी की वजह क्या रही?

2000 के बाद क्रांतिकारी ताकतों के एकीकरण की प्रक्रिया बढ़ी. प्रगतिशील और संशोधनवादी ताकतों के बीच भी ध्रुवीकरण हुआ और लोग यहां से टूट कर क्रांतिकारी पातों में शामिल हुए. क्रांतिकारी ताकतों के एकीकरण से घबराकर मनमोहन सिंह ने देश की आंतरिक सुरक्षा नीति में महत्वपूर्ण परिवर्तन करते हुए नक्सलवादी आंदोलन को देश की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा घोषित कर दिया.

इसी पृष्ठभूमि में मुझ पर भी फर्जी मुकदमे लगा कर जेल में डाल दिया गया. क्योंकि में माओवाद को एक विचारधारा के तौर पर स्वीकार करता हूं. और राज्य के खिलापफ जुझारू, सशस्त्र संघर्षों का भी समर्थक हूं. यह दीगर सवाल है कि मैं इन संघर्षों का सीधा हिस्सेदार नहीं रहा.

गिरफ्तारी की प्रक्रिया के बारे में बतायें?

दिसम्बर 2007 में मेरी गिरफ्तारी हुयी. शांतिपुरी और शक्तिफार्म के बीच गांव में मेरे भाई ने खेती के लिए जमीन ली हुयी थी. मैं बड़े भाई के साथ यहीं गया. मैं इस बात से अनभिज्ञ था कि मेरे पीछे पुलिस पड़ी हुयी है. मुखबिरों ने इसकी सूचना पुलिस को दी. यहीं से पुलिस ने मुझे गिरफ्तार किया और दो दिनों तक लालकुंआ थाने में अवैध हिरासत में रखा. फतेहपुर में भी मुझे खास पूछताछ के लिए लाया गया. मुझे मानसिक रूप से प्रताडित किया गया और टार्चर भी किया गया. कोई भी सुराग न मिलने पर मुझे छोड़ दिया गया. जन दबाव भी इसकी वजह बना.

दो माह 23 फरवरी को सुबह 2-3 बजे मुझे और मेरी पत्नी को पूछताछ के नाम पर पुनः पुलिस  ले गयी. मेरी पत्नी को छोड़ दिया गया और अगली शाम मुझे माओवादी होने के आरोप में गिरफ्तार दिखाया गया.

शासक वर्ग और व्यवस्था का मौजूदा संकट तथा क्रांतिकारी आंदोलन की बढ़ती ताकत से पैदा बौखलाहट ही मेरी भी गिरफ्तारी का कारण है. इन प्रयासों से सामजवाद के शाश्वत आगमनgb1 को नहीं रोका जा सकता.

हिरासत के दौरान आप किन जेलों में रहे?

लगभग साढ़े तीन साल की गिरफ्रतारी के दौरान मेरा ज्यादातर वक्त हल्द्वानी जेल में ही बीता. बाद में मेरी जमानत की आशंका से राज्य सरकार ने मुझे पर बिहार सरकार की मिली भगत से फर्जी मुकदमे लगाकर भोतिहारी जेल भेज दिया, यहां में लगभग चार महीने रहा. पुलिस आज भी अपने षडयंत्रों से बाज नहीं आ रही है. मेरी रिहाई के बाद उत्तराखण्ड की मित्र पुलिस मेरी पत्नी के कार्यस्थल (हस्पताल) में गयी. इसका मकसद उनकी आजीविका के साधन को खत्म करने के अलावा और कुछ नहीं है. मुझे उम्मीद ही नहीं पूरा विश्वास है कि पुलिसिया उत्पीड़न का यह सफर जारी रहेगां

आपकी भविष्य की योजनाएं क्या है?

मेरी गिरफ्तारी ने जनमुक्ति के सपनों को खत्म नहीं कर दिया है. मेरा मनोबल आज भी पूरी तरह दृढ़ है. मैं सामाजिक सरोकारों के लिए अपने संघर्ष को निरंतर जारी रखूंगा. विचारधारा और मानव मुक्ति के संघर्षों के प्रति मेरी आस्था और समपर्ण आज भी पहले जैसे ही हैं.

Comments  

 
0 #1 LUNA 2011-11-10 23:36
one question (aap ki giraftari ki wajah kya rahi) repeated twice
,both questions have different answers
Quote
 

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