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Back साक्षात्कार माँ के प्यार की कोई शर्त नहीं - प्रसून जोशी

माँ के प्यार की कोई शर्त नहीं - प्रसून जोशी

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प्रसून जोशी नई पीढ़ी के गीतकारों की उस पांत का हिस्सा हैं, जिन्होंने हिंदी फिल्मों के गीतों में शब्द की सत्ता को प्रतिष्ठित करने का काम किया है। उनकी 'रंग दे बसंती' हो या 'तारे जमीं पर' या अभी हालिया रिलीज 'आरक्षण' सबमें शब्दों का सौंदर्य बोलता है और कविता नजर आती है...
 
प्रसून जोशी से वरिष्ठ पत्रकार दीप भट्ट की बातचीत 
 
पुरानी फिल्मी गीतों में शब्द की सत्ता बरकरार नजर आती है। यही वजह है कि पुराने गीतों के मुखड़े याद में रह जाते हैं। शायद ही कोई ऐसा गीत हो जिसमें संगीत शब्द पर हावी न नजर आता हो। ऐसा क्यों?
देखिए, जो गीत है वो अपने आप में क्या है। गीत ·विता और संगीत का संगम है। हर गीत कुछ कहने की कोशिश करता है। उसमें काव्य होता है। वह अपने आप में कम्प्लीट है। संगीत का वो सिर्फ  प्रयोग करता है। मैं कई बार संगीतकारों को बोलता हूं कि भई अगर आप प्याले बनाते हैं तो उसमें शराब भरने का काम हम ही करते हैं। यानी उसमें कंटेंट हमारा है। उसके अंदर तत्व हमारा है। तो ये पहले अच्छी तरह से समझा जाता था। मैं सिर्फ  यह कहना चाहता हूं कि हर दौर में बदलाव आते हैं।

तो इसका मतलब यह लगाएं कि पुराने दौर के फिल्मी गीतों का स्तर मौजूदा दौर से कमतर था?
नहीं मेरे कहने का कतई यह मतलब नहीं है। मैं आपकी बात को इस ढंग से समझता हूं कि कुछ खराबी जरूर आ गई है। इसमें कुछ हद तक सच्चाई भी है। कुछ खत्म हो गया है। क्योंकि हम इस बारे में कांशस नहीं होते हैं कि कैसे जो नई चीजें आ रही हैं उसमें हम कहीं अपना कुछ पुराना खोते तो नहीं जा रहे हैं।

एक फिल्मी गीत में आप शब्द की अहमियत को किस रूप में देखते हैं?
देखिए शब्द संस्कृति का कैप्सूल है। शब्द जब बनता है तो उससे जुड़ी संस्कृति भी बनती है। एक शब्द से जुड़े हुए कई मनोभाव बनते हैं। शब्द से जुड़े हुए रंग बनते हैं। शब्द से जुड़ी हुई ऋतुएं बनती हैं। तो शब्द की सिर्फ हत्या नहीं होती। शब्द जब लुप्तप्राय होता है तो उसके साथ बहुत सारी चीजें खत्म हो जाती हैं। शब्द को बचाना और जो हमारे एक्सप्रेशंस हैं उन्हें बचाना बहुत जरूरी है। उदाहरण के तौर पर कुमाउनी में गंध पर इतने शब्द हैं कि आप सोच नहीं सकते कि किसी खास गंध के लिए किस शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। जैसे कुमाउनी में गंध शब्द के लिए 'चुरैन' शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। 'चुरैन' शब्द अपने आप में अदभुत शब्द है। यह शब्द कोई एक-दो दिन में नहीं, बल्कि बड़े एक्सपीरिएंस के बाद वजूद में आया होगा। ऐसे एक दो नहीं हजारों-लाखों शब्द हैं जो हमारे सामूहिक अवचेतन के माध्यम से इसे संप्रेषित करते हैं।

गीतकार की हैसियत को किस तरह आंकते हैं?
मैं बहुत गर्व के साथ संगीतकारों को बताता हूं कि हम जो शब्द लिखने वाले लोग हैं, उनकी कोई कम महत्ता नहीं है। लिखना अपने आप में बहुत कमिटल आर्ट है। ये कला आपको कमिटमेंट से जोड़ती है। ये अपनी बात को सामने रख देती है। एक लेखक जब लिखता है तो वह साफ-साफ  कहता है कि मेरे लिखने का यह मतलब है। जब गालिब यह कहते हैं कि 'दिल ही तो है न संगो खीश्त दर्द से भर न आये क्यों...'  तो वह कहना चाहते हैं कि जनाब ये दिल है कोई ईंट-पत्थर नहीं है। मैं दिल को ईंट पत्थर नहीं मानता ये बात वह कहते हैं, लेकिन संगीत में पैटन्र्स होते हैं। वहां पर आप कुछ कह नहीं रहे हैं। वहां पर आप भाव पैदा कर रहे हैं। तो उसमें ऐसा कुछ कमिटमेंट नहीं है। तो संगीत में किसी के लिए यह कहना कि अच्छा है या बुरा थोड़ा मुश्किल है। आप इसे यूं समझ सकते हैं कि संगीतकार भाव सृष्टि कर रहा है। डॉयलॉग से भी फर्क है गीत का। जो डॉयलॉग में नहीं कहा जा सकता उसे भावों में कहा जा सकता है। लेकिन संगीत में भी फर्क है। संगीत को कमिटमेंट मिलता है गीत के शब्द से।

आपने जिन फिल्मों के गीत लिखे हैं उन्हें रचने से पहले क्या आपकी निर्देशकों के साथ कोई सिटिंग हुई?
मैं तो सिटिंग के बगैर काम ही नहीं कर सकता। अभी हाल में रिलीज 'आरक्षण' के गीतों को लिखने से पहले मेरी फिल्म के निर्देकक प्रकाश झा के साथ जमकर सिटिंग्स हुयीं। मैंने प्रकाश झा से कहा मैं गीत लिखने से पहले आपके साथ बैठूंगा, ताकि फिल्म के लिए जो गीत लिख रहा हूं उनका फिल्म के साथ एक गहरा तारतम्य बने। आप आरक्षण देखेंगे तो आपको यह बात समझ में आएगी। हम मेकर के साथ बैठते हैं तो कहानी को पकड़ते हैं। जिस सिचुएशन पर गीत आ रहा है उसे गहराई से समझते हैं। तब एक तारतम्य बनता है। एक ताना-बाना बनता है और फिर कोई गीत बनता है। गीत सेंत-मेंत में नहीं बन जाते उनके लिए आपको तकलीफ  उठानी पड़ती है। मैं कोशिश करता हूं संगीत निर्देशक के साथ बैठने की। उन्हें समझने की। आरक्षण में शंकर एहसान लॉय ने म्यूजिक दिया तो मैं उनके साथ हर गीत की संगीत रचना में बैठा। मेरी क्रिएटिविटी खिल उठी और मैंने इस फिल्म के एक गीत की कंपोजीशन खुद की।

गाने के विजुअलाइजेशन को आप कितना महत्व देते हैं... अगर गीत सुंदर बना हो और उसका विजुअलाइजेशन घटिया हो, तो गीतकार को कैसा महसूस होता है?
मेरे लिए जैसे किसी गीत की रचना करना किसी चैलेंज से कम नहीं है। वैसे ही गीत के विजुअलाइजेशन को भी मैं एक बड़ा चैलेंज मानता हूं। कई बार विजुअलाइजेशन भी आपके गाने की ऐसी-तैसी कर देता है। आपने लिखा कुछ और होता है और फिल्म निर्देशक पर्दे पर उसका ट्रीटमेंट कुछ और कर देता है। तो ऐसे में आपको लगता है कि यार मैंने तो ऐसा नहीं कहा था। ये क्या कर दिया फिल्मकार ने। इसीलिए मैं कह रहा हूं कि आप जब साथ मिलकर काम नहीं करेंगे तो ऐसा ही होगा। दूसरी बात यह है कि भाषा के संस्कार कम होते जा रहे हैं। नॉलेज कम होती जा रही है। वो जो आप कह रहे हैं उसे समझ ही नहीं पा रहे हैं आपके डॉयरेक्टर।

आपने संगीतकार एआर रहमान के साथ 'रंग दे बसंती' फिल्म में काम किया। कैसा रहा उनके साथ काम का अनुभव?
एआर रहमान के साथ काम करने का एक अलग अनुभव रहा, क्योंकि मैंने ऐसे म्यूजिक डायरेक्टर्स के साथ काम किया है जिनको कविता की बिल्कुल समझ नहीं थी, लेकिन भाषा की समझ थी। लेकिन एआर रहमान ऐसे संगीतकार हैं जिन्हें कविता की समझ तो है पर भाषा की समझ बिल्कुल नहीं है। लेकिन फिर भी वह हिंदी शब्दों का प्रयोग गीतों में करते हैं और बड़ी खूबसूरती के साथ। अब मैंने हिंदी में जो लिखा है वो उनकी समझ से बाहर है। तो मैंने उन्हें ट्रांसलेट करके समझा दिया। क्योंकि उसके बाद भी एक-दूसरे को समझना बहुत जरूरी होता है। कुछ देर बाद जो आपकी बॉडी लैंग्वेज होती है, जो आपके हाव-भाव होते हैं वो समझ में आते हैं। जिस तरह से आप बैठे होते हैं। जो आपकी आंखों में हो रहा होता है वो सब एक-दूसरे को देखकर आदमी पढऩे लगता है। कई बार न जानते हुए भी बहुत शानदार कंपोजीशन बनती है। रु-ब-रू गाने को लीजिए या 'रंग दे बसंती' के लुकाछिपी को लीजिए।

आपने 'रंग दे बसंती' हो या 'तारे जमीं पर' सब में मां पर गीत लिखे हैं। क्या ये सिर्फ सिचुएशन की डिमांड पर लिखे गए गीत हैं या आपका मां से गहरा लगाव है?
मेरा मां से बहुत गहरा लगाव है। जब मैंने 'तारे जमीं पर' के लिए मां से जुड़ा गीत 'पर अंधेरे से डरता हूं मैं मेरी मां' लिखा तो उसमें मां से दूर हॉस्टल में रहने वाले बच्चे के भय और मां से उसके भावनात्मक लगाव को प्रदर्शित किया। तो इस पूरे गीत में मेरे भीतर का बच्चा भी मौजूद है। आप यह जानकर हैरान होंगे कि एक दिन जब मैं मुंबई में ताज होटल से बाहर निकल रहा था तो एक अस्सी साल का बूढ़ा मुझ से लिपटकर फूट-फूटकर रोने लगा। उसने कहा कि प्रसून मैं अस्सी साल का हूं और मेरी मां को गुजरे हुए एक अरसा हो गया, लेकिन तुम्हारे इस गीत में इतनी ताकत है कि इसे सुनकर मुझे यूं लगा कि मैं एक बच्चे में तब्दील हो गया हूं और खटिया के नीचे दुबका बैठा हूं। मां मुझे खोज रही है। सोचिये, मेरे लिए इससे बड़ी और क्या बात हो सकती है। दरअसल मां का प्यार अनकंडीशनल होता है। मां के प्यार में कोई शर्त नहीं होती है। पिता हमेशा डिमांडिंग होते हैं। 'एक फूल दो माली' के मन्ना डे के गाए इस गीत 'तुझे सूरज ·हूं या चंदा, तुझे दीप कहूं या तारा, मेरा नाम करेगा रोशन, जग में मेरा राज दुलारा...' को सुनिए तो ये पिता का एटीट्यूड है। गीत पिता के एटीट्यूड को व्यक्त कर रहा है। कहने का मतलब अगर बेटा नाम रोशन नहीं करेगा तो पिता नाराज हो जाएंगे। इसलिए मां से पिता की तुलना का सवाल ही पैदा नहीं होता। मां शब्द की और उसके भाव की पिता से दूर-दूर तक तुलना नहीं की जा सकती।

Comments  

 
-1 #4 p yadav 2011-12-05 14:21
"saas gari debe ,sasur gari debe 'chhattisgarh ka 40 saal purana lokgeet hai ,isake original geetkar (female) partition ke baad pakistan chali gayee.
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0 #3 ravishankar ravi 2011-12-01 10:14
behar pyari batcheet, bikul kavita ki tarah, puri imandari se. salam
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+1 #2 SANJAY RAWAT 2011-11-18 21:33
AAKHIRI SAWAL KE JAWAB HAJAM NAHIN HO PA YA PRASOON BHAI MAA - PITA KE BEECH TULNA THEEK NAHIN HAIN .AGAR GANON SE CODITION TEY HOTI HAI TO FILM "ZAKHAM" KA GEET BHI SUNA HOGA -"PEDH LIKH KE BADA HOKE, TU IK KITAB LIKHNA, AAPNE SAWALON KA TU KHUD HI JAWAB LIKHNA................
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0 #1 राघवेन्द्र सिंह 2011-11-13 17:41
बहुत अच्छा साक्षात्कार. पढ़कर मन में अच्छा लगा कि हमारे गीतकार समाज के बारे में भी सोचते हैं.
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