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Back साक्षात्कार किसान को मजदूर बनाने का उपक्रम है एफडीआइ’

किसान को मजदूर बनाने का उपक्रम है एफडीआइ’

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विदेशी कंपनियां छोटे-मझोले किसानों को अपने ही खेतों का मजदूर बना देंगी। बगैर एफडीआइ हुए ही खुदरा बाजार में पैठ चुकी रिलायंस जैसी कंपनियां जब किसानों के खेतों को 40 वर्षों के लिए लीज पर लेने लगी हैं तो वह किसान मजदूर होकर ही तो लौटेगा...

किसान जागृति मंच के अध्यक्ष सुधीर पंवार से अजय प्रकाश की बातचीत


भारत के खुदरा बाजार में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआइ) का राजनीतिक पार्टियां विरोध कर रही हैं, जबकि सरकार का कहना है कि इससे बाजार की बेहतरी होगी, आपकी राय?sudhir-panwar-1

एफडीआइ से सीधे प्रभावित होने वाले कुल तीन तबके हैं- किसान, व्यापारी और उपभोक्ता। एफडीआइ क्या है, इस बारे में किसानों को कोई जानकारी नहीं है, उपभोक्ता हमारे देश में कभी कोई संगठित ताकत बन नहीं सका जिसके विरोध या समर्थन का कोई मतलब हो। बचे व्यापारी तो जाहिर तौर पर उनका राजनीतिक पार्टियों और सत्ता में सीधा दखल भी है और वह लाभ-हानि के सभी पक्षों से वाकिफ भी हैं। व्यापारियों के रा”ट्रीय स्तर पर हुए सशक्त  विरोध की वजह से सरकार को एफडीआइ से कदम पीछे खींचना पड़ा है, लेकिन किसान अभी भी अंधेरे में हैं।

खुदरा बाजार में विदेशी कंपनियों के उतरने की स्थिति में सरकार ने किसानों के लिए क्या व्यवस्था दी है?
किसानों के सवालों से जुड़े होने के कारण हमारे लिए भी अभी यह जानना बाकी है कि इस तबके के लिए सरकार ने एफडीआइ में क्या प्रावधान किये हैं। सरकार ने पूरी तरह से इसे गुप्त रखा है। मीडिया में आ रही खबरों और चर्चाओं में भी विदेशी निवेश के सवाल पर व्यापारियों का पक्ष ही उभर रहा है। हमें जो जानकारी मिली है उस मुताबिक विदेशी कंपनियां भारतीय किसानों के 60 प्रतिशत माल/फसलों का इस्तेमाल बाजार में करेंगी।

दुनिया के देशों में एफडीआइ के अनुभव कैसे रहे हैं?
विदेशी कारपोरेट समूहों की ये कंपनियां सबसे पहली चोट स्वाभाविक तौर पर खुदरा बाजार पर करती हैं और पहला नुकसान स्थानीय व्यापारियों को ही होता दिखता है। दूसरी तरफ व्यापक विरोध से निपटने के लिए शुरूआती वर्षों में ये किसानों को भी लाभ देती हुई दिखती हैं। जो भाव स्थानीय व्यापारी किसानों की फसलों का देते पहले से देते रहते हैं, उनके मुकाबले ये कंपनियां किसानों को बढ़े दर पर भुगतान करती हैं। साफ है कि एफडीआइ के इस खेल में कुछ वर्ष के भीतर जब स्थानीय खुदरा बाजार खत्म होने लगता है तो फिर कंपनियां बाजार पर आधिपत्य कर लेती है।

भारतीय बाजारों में बड़ी कंपनियों का आधिपत्य तो पहले से ही है, अब क्या इस प्रक्रिया के बाद कॉरपोरेट खेती का चलन बढ़ेगा।
बेशक, यह इसीलिए किया जा रहा है। भारतीय खुदरा बाजार में आने को बेताब वालमार्ट हो या कैरीफोर कोई जनहित के लिए तो आ नहीं रही हैं। इनके आने के साथ देश में कारपोरेट खेती का असर बढ़ेगा, ठेके पर खेती होगी और छोटे-मझोले किसान एक प्रक्रिया में मजदूरों की श्रेणी में तेजी से पहुंचेंगे। बड़े किसानों का तो लाभ बढ़ेगा, लेकिन कंपनियां छोटे-मझोले किसानों को अपने ही खेतों का मजदूर बना देंगी। बगैर एफडीआइ हुए ही खुदरा बाजार में पैठ चुकी रिलायंस जैसी कंपनियां जब किसानों के खेतों को 40 वर्षों के लिए लीज पर लेने लगी हैं तो वह किसान मजदूर होकर ही लौटेगा।

लेकिन बिचैलियों की वजह से किसानों को जो भारी नुकसान होता है उससे तो राहत मिलेगी?
जहां ये कंपनियां किसानों की जमीन खरीद लेंगी या लीज पर ले लेंगी वहां तो यह संभव है, बाकी जगहों पर तो इन्हें भी बिचैलियों की जरूरत पड़ेगी। बिचैलियों को ये एग्रीगेटर कह रहे हैं, जो बुनियादी तौर पर बिचैलिया ही होगा। इसपर रोक लगाना तभी संभव है जब सरकार गांवों और ब्लाक स्तर पर किसान कोआपरेटिव बनाये और उसमें किसानों को फैसले और भागीदारी का अधिकार दे। फिर कम्पनियाँ उन्हीं कोआपरेटिव से खरीदारी करें। हमारी यह भी मांग है कि बाजार से होने वाली कमाई का एक हिस्सा किसानों को भी दिया जाये और उन समूहों को स्वंय दाम तय करने का अधिकार हो। मगर इन बातों का तभी महत्व है जब सरकार एफडीआइ में खरीददारी और बिक्री के प्रावधानों को सार्वजनिक करे। इस कानून को चोर दरवाजे से लाने की कोशिश की गयी तो किसान कत्तई स्वीकार नहीं करेंगे।
(द पब्लिक एजेंडा से साभार)

Comments  

 
+1 #1 Samar Rana 2011-12-16 18:31
Thanks Ajay Prakah,I think this is the only interview which is focus on farmers' concerns otherwise whole media is flooded either with the so called economists,trad ers and lobbyist in the name of farmers.I perceived a well thought out strategy on the Government part- first through policies make the farmer helpless and suddenly advertise that now foreign companies are here for your well being,hand overloss making land to them in lieu of assured pittance (income) sudhir panwar is right at least farmers should know what are the conditionalitie s of the entry of these companies.
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