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Back साक्षात्कार किसान समस्याओं का हल है कम उत्पादन - भाकियू

किसान समस्याओं का हल है कम उत्पादन - भाकियू

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किसानों को प्रोडक्शन कम कर देना चाहिए। कम उत्पादन ही किसानों की समस्याओं को खत्म करने का कारगर उपाय है। किसान ज्यादा फसल के लालच में यूरिया, कीटनाशकों और तमाम दूसरे साधनों पर अंधाधुंध पैसा खर्च करता है, लेकिन बाद में उसे लाभकारी रेट नहीं मिलता है---

भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय अध्यक्ष राकेश टिकैत से आशीष वशिष्ट की बातचीत

खेती-किसानी से जुड़े मसले चुनावी मुद्दा क्यों नहीं बन पाते हैं?
देखिए, तमाम राजनीतिक दल और नेता जात-पात की राजनीति में मशगूल हैं। ऐसे में उन्हें किसानों की याद नहीं आती है। सच्चाई यह है कि आज नेताओं को चुनाव जीतने के लिए किसानों की कोई जरूरत ही नहीं है। अब जीत के लिए जाति का फैक्टर ज्यादा हावी रहता है, इसलिए न तो कोई किसानों की बात करता है, न ही परवाह।

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भाजपा और समाजवादी पार्टी ने अपने चुनाव घोषणा पत्र में किसानों के लिए कई घोषणाएं की हैं, बाकी दल भी किसानों के मुद्दों को अपने घोषणा पत्र में शामिल करेंगे। इससे क्या किसानों का भला होगा?
घोषणा पत्र तो हर चुनाव में जारी होता है, लेकिन इससे किसान का कोई भला नहीं होता। मुख्य बात तो नीतियों और योजनाओं को जमीन पर लागू करने की होती है। इसके लिए कोई भी दल गंभीर नहीं है। नेता जीतने के लिए हर हथकंडा अपनाते हैं, खेती-किसानी पर जाति भारी पड़ गयी है। आज हर नेता जात की पालिटिक्स कर रहा है, ऐसे में किसानों के मुद्दे और प्राब्लम कोई उठाना ही नहीं चाहता। मेरी समझ में नहीं आता कि जब राजनीतिक दलों ने किसानों की भलाई के लिए कुछ करना ही नहीं होता तो पता नहीं वो चुनाव घोषणा पत्र में किसानों के मुद्दे शामिल ही क्यों करते हैं।

किसानों की शिकायत है कि सूबे के सरकार ने पिछले पौने पांच साल में खेती-किसानी लिए कुछ खास नहीं किया है?
हां, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि किसान परेशान हैं। हालाँकि सरकार ने पिछले दो सालों में कुछ अच्छे काम भी किये हैं, मसलन जमीन अधिग्रहण कानून और गन्ना किसानों को फसल का उचित रेट दिया है। देखिए कोई भी राजनीतिक दल किसानों की समस्याएं हल करना ही नहीं चाहता है, नेता सोचते हैं जब तक समस्याएं हैं तभी तक उनकी ड्योढ़ी पर भीड़ जुटेगी। कोई भी पार्टी किसानों का भला नहीं चाहती है। चुनाव के वक्त जात-पात हावी हो जाती है, इसलिए किसानों को खुद ही अपनी समस्याओं का हल निकालना होगा।

वो कैसे?
असल समस्या यह है कि किसान को उसकी फसल का लाभकारी मूल्य नहीं मिलता। बिचौलिए किसान का हिस्सा खा जाते हैं। बिजली, पानी, खाद और बीज की समस्याएं तो हैं ही, लेकिन अगर किसान को लागत के हिसाब से अपनी फसल का रेट मिलने लगे तो कोई परेशानी ही नहीं रहेगी। आज किसान का खर्चा ज्यादा हो रहा है और आमदनी कम। पिछले चार दशकों में गेंहू के रेट में दो-तीन सौ फीसदी की बढ़ोतरी हुई है, जबकि सोने के रेट दो-तीन हजार फीसदी बढ़े हैं। आज तीन क्विटंल गेंहू बेचकर एक तोला सोना नहीं खरीदा जा सकता है। सरकार फसल का उचित दाम नहीं देती है और न ही पूरी फसल खरीदती है। आढ़ती और बिचौलिए सारा मुनाफा चट कर जाते हैं। अगर फसल अच्छी और ज्यादा हो गयी तो सड़क किनारे सड़ती है। हालात चाहे जैसे भी हों, लेकिन किसी भी सूरत में किसान को उसकी फसल का सही रेट मिलने वाला नहीं है, इसलिए समस्याएं कम होने का नाम नहीं ले रही हैं।

तो किसानों को क्या करना चाहिए?
किसानों को प्रोडक्शन कम कर देना चाहिए। कम उत्पादन ही किसानों की समस्याओं को खत्म करने का कारगार उपाय है। किसान ज्यादा फसल के लालच में यूरिया, कीटनाशकों और तमाम दूसरे साधनों पर अंधाधुंध पैसा खर्च करता है, लेकिन बाद में उसे लाभकारी रेट नहीं मिलता है।

अगर प्रोडक्शन कम होगा तो देश में अनाज का संकट पैदा नहीं हो जाएगा?
नहीं, ऐसा नहीं होगा। अगर आंकड़ों पर नजर दौड़ाएं तो सरकारी गोदामों में लाखों-करोड़ टन अनाज सड़ रहा है। उन्नत तकनीक और साधनों से उत्पादन रिकार्ड स्तर को छू रहा है, लेकिन प्राडक्शन ज्यादा होने से किसानों के हाथ आखिर लगा ही क्या है। वे आत्महत्याएं करने को मजबूर हैं। किसान की भलाई इसी में है कि वो प्राडक्शन कम कर दे। खाद, बिजली, पानी और बीज की प्राब्लम और हाई रेट उनकी समस्याएं बढ़ा रहे हैं। किसान देसी तकनीक अपनाएं तो कई समस्याएं हल हो सकती हैं, क्योंकि समस्याएं बहुत हैं जिनको ठीक करने में वक्त लगेगा।

आजादी मिले 64 साल हो गये हैं और कितना समय चाहिए?
देखिए, सरकार की नीतियां ही ऐसी हैं कि इससे किसी का भला होने वाला नहीं है। सरकार सीधे किसानों से सम्पर्क करने की बजाय किसी एजेंसी या संस्था के माध्यम से योजनाओं को लागू करवाना चाहती है। जबकि किसान से अधिक प्रयोग कोई दूसरा नहीं कर सकता। संस्था के लोग आकर किसानों को खाद बनाने की ट्रेनिंग दे रहे हैं। जिनका जन्म ही खेत-खलिहान में हुआ हो उन्हें भला संस्था वाले कैसे और क्या सिखाएंगे। संस्थाएं सरकारी एजेंट और दलाल बनकर किसान के हक का पैसा खाने के अलावा दूसरा काम नहीं करती। सरकार को सीधे किसानों से सम्पर्क करना चाहिए, किसी बिचौलिए या तीसरे की कोई जरूरत नहीं है।

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