प्रसिद्ध संगीतकार खैय्याम के जन्मदिन 18 फरवरी पर विशेष
पद्मभूषण, संगीत नाटक अकादमी समेत दर्जनों पुरस्कारों से नवाजे जा चुके भारत के सर्वश्रेष्ठ संगीतकारों में शामिल खैय्याम मौजूदा समय के सबसे वरिष्ठ संगीतकार हैं। 18 फरवरी 1927 में पंजाब के नवाशहर में जन्में खैय्याम ने संगीत के सफर की शुरूआत 1943 में की थी। करियर के शुरूआती करीब 20 वर्षों तक वे ‘शर्मा’ के नाम से काम करते रहे। उमराव जान, आहिस्ता-आहिस्ता, कभी-कभी, त्रिशूल, शोला और शबनम, रजिया सुल्तान जैसी कई दर्जन यादगार फिल्मों को संगीत देने वाले खैय्याम आज 18 फरवरी को उम्र के 86वें बसंत में प्रवेश कर रहे हैं और मूक फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ से शुरू होने वाला भारतीय सिनेमा 100वें साल में दाखिल हो चुका है। खैय्याम ने सिनेमा के मूक दौर से लेकर आधुनिक सिनेमा के उतार-चढ़ावों को बड़े नजदीक से देखा है। सिनेमा की सौ साल पर संगीतकार खैय्याम से बातचीत के प्रमुख अंशः
वरिष्ठ संगीतकार खैय्याम से अजय प्रकाश की बातचीत
भारतीय सिनेमा सौंवे साल में प्रवेश कर चुका है। सिनेमा के इस लंबे सफर पर बतौर संगीतकार आपकी प्रतिक्रिया?
दादा साहब फाल्के ने भारत की पहली फिल्म 1913 में ‘राजा हरिश्चंद्र’ बनायी थी, जो मूक थी। उसके बाद 1931 में अल्देसिर इरानी के निर्देशन में ‘आलम आरा’ बोलती फिल्म आई। आलम आरा से बैकग्राउंड संगीत का प्रवेश हुआ और बोलती फिल्मों (टॉकी) का चलन शुरू हुआ, लेकिन सिनेमा में संगीत को महत्वपूर्ण स्थान देने का श्रेय दादा साहब फाल्के को जाता है। दिल से कहूं तो सिनेमा में हम संगीतकारों की रोजी-रोटी की व्यवस्था दादा साहब ने ही की।

आलम आरा के बाद से फिल्मों की संगीत यात्रा कैसी रही?
फिल्मों में संगीत के स्थान की बात करें तो कहा जा सकता है कि बगैर संगीत के हमारे देश में फिल्मों की कल्पना नहीं की जा सकती। दादा साहब ने हमारे देश में संगीत की ताकत को बड़ा कायदे से पकड़ा। संगीत हम भारतीयों की पूजा है, इबादत है और इससे भी बढ़कर हमारी जिंदगी है। जन्म से लेकर मृत्यु तक के सफर में हम बिना संगीत के कहीं नहीं होते। बच्चे की पैदाइश के वक्त गाये जाने वाला सोहर हो या मरने के वक्त के शोकगीत। यही वजह है कि आजादी के आंदोलन में हमारे गीतों ने बड़ी भूमिका अदा की और कवि प्रदीप के गीत ‘दूर हटो ऐ दुनिया वालों हिंदुस्तां हमारा है’, ने आजादी की लहर को तेज कर दिया था। संगीत के मामले में हम दुनिया के सिरमौर हैं, जिसका हम सबको फक्र है।
आखिर भारतीय फिल्मों में ऐसी क्या वजहें थीं, जिनके कारण संगीत की महत्ता बनी रही?
बोलती फिल्मों के आने के बाद से फिल्मों की कहानियां आमतौर पर ऐतिहासिक, धार्मिक और सामाजिक होती थी। समाज में चूंकि संगीत का गहरा प्रभाव था इसलिए जो बात घंटे दो घंटे की फिल्म नहीं कर पाती थी, वह काम चंद मिनट के गाने कर देते थे। इसलिए पहले की फिल्मों में गानों की संख्या ज्यादा देखेंगे। इसके बाद स्टंट और अलीफ लैला जैसी फिल्मों का दौर आया जो आज की भोंडी फिल्मों के मुकाबले साफ-सुथरीं थीं और उनमें अच्छे गाने होते थे। अब तो संगीत के नाम पर जो किया जाता है, उसे मुझे बड़ी शर्मिंदगी महसूस होती है।
मौजूदा दौर का आधुनिक संगीत आपके दौर से बिल्कुल अलग है, इस बदलाव में आप क्या संभावनाएं देखते हैं?
मेरी राय में संगीत के नाम पर जो आज बाजार को ध्यान में रखकर किया जाता है उसे मैं संगीत नहीं मानता बल्कि ताल, औजार और शोर की यह जुगलबंदी है, जिसे कोई भी संगीत की समझ रखने वाला आदमी संगीत नहीं कह सकता। हमारी पीढ़ी के लोग या हमारे पहले वाले भी जब संगीत तैयार या कंपोज करते थे तो एक मंजर होता था, जो आज संगीतकारों में बहुत कम दिखता है। गीतों में गालियों की भरमार और नाच में नंगेपन ने संगीत को सिर के बल खड़ा कर दिया है। बेशक कुछ नये संगीतकारों में सुफी रूझान देखने को मिल रहा है और उनकी क्षमताओं को देख उम्मीद बंधती है।
संगीत में गिरावट क्यों आयी?
जाहिर तौर पर मुनाफे का दबाव बढ़ता गया। ज्यादा से ज्यादा फायदे के लिए मनगढ़ंत कहानियां अच्छी तकनीकी के जरिये लोगों को परोसी जाने लगीं। फिल्म को लेकर मुल्य की सोच खत्म हुई और फिल्म के तैयारी पक्ष की जगह बाजार पक्ष हावी होता चला गया। मुझे याद है कि मैंने ‘त्रिशुल’ फिल्म में ‘गाउजी-गम-गम’ गाने में संगीत दिया था। बाद में दिल्ली के प्रेस क्लब में एक पत्रकार ने मुझसे जब पूछा कि आप जैसा संगीतकार ऐसे गीत के लिए संगीत कैसे दे सकता है तो मैं बहुत शर्मिंदा हुआ था और गलती कबूल की थी। मगर मुझे फक्र है कि मैंने इसके अलावा एक भी निरर्थक गाने को न तो कंपोज किया और न ही संगीत दिया। लेकिन क्या आज के संगीतकारों में समाज के प्रति यह लिहाज है।
दुनिया के स्तर पर हमारा मौजूदा फिल्मी संगीत कहां ठहरता है?
हमारे मुल्क के संगीत का इतिहास बेहद गौरवपूर्ण है। दूसरा कि संगीत को लेकर एकदम से पोछा भी नहीं लगाया जा सकता है कि हमारे सिनेमा में संगीत ही नहीं है। साथ ही संगीत की तकनीकी में हम दुनिया में सर्वश्रेष्ठ हैं।


