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कद्दू कटेगा तो सब में बँटेगा

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सिडकुल की बँटाई

दिल्ली में लालाओं की नौकरी करने वाले समझदार टाईप स्थानीय ग्याडू तो फेसबुक पर अपनी भड़ास निकाल ले ही रहे हैं और जो बचे खुचे हैं, उनमें से किसी ने महाराज की मूँछ पकड़ ली है, तो किसी ने हरीया दीदा का आम पच्का रखा है. कुछ बचे हुए लाटे कोश्यारी चचा की धोती संभाल रहे हैं, तो कुछ ग्याडू मुछ्याल बोड़ा की ईमानदार घुंघरालू मूंछों में उलझ गये और कुछ ने उक्रांद को कब्र से उठाने का जिम्मा ले रखा है...

चंद्रशेखर करगेती

लो रे ग्याडूओ! कुछ अपने राज्य उत्तराखंड के सिडकुल के बारे में भी जानो. उत्तराखण्ड राज्य में अपने बुबू (दादाजी) तिवारी ने 6 सिडकुल बनाये और ढोल-नगाड़े के साथ विकास पुरुष का खिताब ले उड़े. सिडकुल अवस्थापना के नाम पर ग्याडूओं, नेताओं और अधिकारियों ने खूब माल उड़ाया, लेकिन साथ ही इस राज्य के युवाओं के मन में एक आस जगाई कि उसे अब रोजगार के लिये दिल्ली-मुम्बई के लालाओं के दरवाजे नहीं खटखटाने पड़ेंगे. अब तो अपने राज्य में ही एक कोठरी 2-3 लोगों के साथ रह गुजर-बसर कर कुछ धेले की कमाई-धमाई कर ही लेगा, सो महाराज हम भी झाड़ में दुबके रहे! पर महाराज क्या करें जब हमने पेड़ ही बबूल का बोया था, तो आम कहाँ से उगते?

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अपने अवतारी विकास पुरुष के बाद आये मुछ्याल बोड़ा और उनके सहोदर निखट्टू भैजी ने तो राम नाम के भजन ही करने थे. सो राज्य के ग्याडूओं की चिन्ता क्यों करते? 70% स्थानीय ग्याडूओं को स्थायी रोजगार के जीओ (सरकारी फरमान) पर ध्यान क्यों देते? इस राज्य में संविदा श्रम को अधिनियम-1970 की धारा 10 के तहत निषिद्ध किया हुआ है, लेकिन भई अपने राम नाम जपने वाले सरकार के कप्तान साहब उस पर ध्यान देते, तो पार्टी के लेबर ठेकेदारी का व्यवसाय करने वाले नेताजी की पेट पर लात नहीं पड़ जाती!

सो सरकारी फरमान अपने औद्योगिक विकास विभाग के प्रमुख सचिव साहब शर्मा जी की फाईलों में धूल फाँकता रहा और वे उसकी धौंस दिखाकर अपना राज-काज देहरादून में ठाट से अब तक चला ही रहे हैं. किसे चिन्ता है स्थानीय ग्याडूओं की, कि उन्हें रोजगार मिले या न मिले, वोट तो नेताओं को पिछले बारह सालों से मिल ही रहे हैं.

अब दिल्ली में लालाओं की नौकरी करने वाले समझदार टाईप के स्थानीय ग्याडू तो फेसबुक पर अपनी भड़ास निकाल ले ही रहे हैं और जो बचे खुचे हैं, उनमें से किसी ने महाराज की मूँछ पकड़ ली है, तो किसी ने हरीया दीदा का आम पच्का रखा है, कुछ बचे हुए लाटे कोश्यारी चचा की धोती संभाल रहे हैं, तो कुछ ग्याडू मुछ्याल बोड़ा की ईमानदार घुंघरालू मूंछों में उलझ गये, तो कुछ ने उक्रांद को कब्र से उठाने का जिम्मा ले रखा है. बर्तन माँजने वाला भन्मजुवा ग्याडू तो बेचारा अभी भी बर्तन ही माँज रहा है.

चलो छोड़ो! मुद्दे की बात करते हैं अपने राज्य में 6 सिडकुल बनाये गये. मैंने भी सोचा चलो पूछ तो लूँ कि राकेश शर्मा के विभाग से कि लल्ला कितने ठो प्लाट काटे हो सिडकुल में! तो साहब के लोकसूचना अधिकारी ने जवाब दिया है, रे ग्याडू गिन ले, पूरे राज्य की जमीन में सिडकुल के नाम पर पन्तनगर में 511, हरिद्वार में 686 , सितारगंज में 320, आईटी पार्क देहरादून में 31, सेलाकुई देहरादून में 35 तथा कोटद्वार में 100 कारखाने लगाने को फीता लगा दिया है.

अब इतनी जगह फीता लगा तो मुझ ग्याडू के पेट में दर्द होना लाजिमी था. भई घोषित दलाल जो ठहरे हम तो. सो बेचारे स्थानीय ग्याडू जो रोज दिल्ली-मुम्बई को भाग रहे हैं, रुकते क्यों नहीं हैं देवभूमि में. उनके नाम पर दलाली खाने का मन कर गया रे, वैसे ये मुझे भी आज ही पता लगा कि मैं तो इस बात की दलाली खा रहा हूँ, जब अपने दिल्ली निवासी आंदोलनकारी जनता संघर्ष मोर्चे वाले भाई विनोद नेगी जी ने बताया.

सो लगे हाथ यह भी पूछ लिया कि पिछले सालों में कितनी लोग अपनी पंचवर्षीय योजना पूरी नहीं कर पाए. यानी कि कितनी औद्योगिक इकाईयों में निर्माण कार्य नहीं हुआ, तो लल्ला राकेश साहब के लोकसूचना अधिकारी ने बड़ी बेशर्मी से जवाब दे ही दिया कि वर्तमान में पन्तनगर में 14, हरिद्वार में 44, सितारगंज में 198, आईटी पार्क देहरादून में 17, सेलाकुई देहरादून में 01तथा कोटद्वार में 06 में आवंटित प्लॉट में कोई निर्माण नहीं किया .

अब तो कुछ और जानने की खदबदाहट हुई रे, तो सिडकुल वाले साहब से पूछ ही लिया कि साहब उन औद्योगिक इकाईयों की संख्या और नाम भी बता दो जिन्होंने अभी जमीन पर फीता लगवाकर कब्जा तो ले लिया और पर उत्पादन जैसा कुछ किया-धिया नहीं. यानि अभी तक उत्पादन शुरू ही नहीं किया.

ग्याडूओ रे! तब से अपनी खोपड़ी पकड़े हुए हूँ, देखो तो निर्लज्जों ने कैसा जवाब दिया. बताते हैं कि पन्तनगर में 38, हरिद्वार में 106, सितारगंज में 212, आईटी पार्क देहरादून में 17, सेलाकुई देहरादून में 04, तथा कोटद्वार में 16 इकाईयों में उत्पादन की गड़गड़ाहट सुनाई ही नहीं दी. अब साहब ये ऐरे-गैरे नत्थू खेरे फिर भी प्लॉट पर कब्जा जमाये हुए हैं, जैसे खाला दहेज में लेकर आई हो इन प्लॉटों को.

साहब ने संख्या तो बता दी, पर अपने प्रिय मामुओं के नाम बताने में शरमा गये, जो अजगर के मानिंद इन प्लॉटों कब्जा जमाये बैठे हुए है.खैर, मैं भी बड़ा जिद्दी हूँ कच्छे का हाल तो जानकर ही रहूंगा, सो देवाधिदेव सूचना आयुक्त के यहाँ शिकायत करे डाली है, कि साहब देखो तो! एक तो हमारी ही जमीन पर फीता लगाते हैं, चलो फीता लगा भी दिया कोई बात नहीं, जमीन उठाकर तो नहीं ले गये पर नाम तो बता दो कि फीता किसके हक में लगा?

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रे पढ़े लिखे ग्याडूओ! हिसाब लगाओ तो यह सब जानकारी देने में साहब को इतनी मेहनत करनी पड़ी कि वे सही से जोड़ लगाना ही भूल गये और अब ज़रा तुम जोड़ लगाओ तो कि इन्हीं की दी गयी सूचना कैसी है. सिडकुल सितारगंज में कुल औद्योगिक प्लाट की संख्या 320 है, जिनमें निर्माण कार्य नहीं हुआ है, उन इकाईयों की संख्या 198 है. जिनमें उत्पादन कार्य नहीं हो रहा है उन इकाईयों की संख्या 212 है, तथा जिन इकाईयों में उत्पादन हो रहा है उन इकाईयों की संख्या 103 बतायी गयी है.

उत्पादन शुरू न करने वाली इकाईयां 212 हैं तथा उत्पादन करने वाली इकाईयों की संख्या 103 है, इस प्रकार कुल योग 315 (212+103) इकाइयां होता है, जबकि कुल औद्योगिक प्लॉट की संख्या 320 बतायी गयी है. शेष 5 इकाईयों का किसी भी श्रेणी में न होना अपने आप में सूचना का गलत होना दर्शाता है .

भैजी रे! अपने कोटद्वार सिडकुल का हाल तो और भी बुरा है. साहब बहादुर ने यहाँ भी सिडकुल के लिये 100 एकड़ में 100 औद्योगिक प्लॉट कटवाये थे. यानि एक एकड़ का एक प्लॉट. सरकार बहादुर बताते हैं कि 07-अगस्त-2012 की तिथि तक 6 औद्योगिक प्लॉट में कोई निर्माण कार्य नहीं हुआ. 16 प्लॉट में उत्पादन होने जैसा कोई काम नहीं हो रहा और 15 प्लॉट में उत्पादन जैसा कुछ हो रहा है.

यानि आज के दिन में सिडकुल कोटद्वार में 16 प्लॉट में उत्पादन नहीं हो रहा है और 15 प्लॉट में उत्पादन हो रहा, जो कि कुल योग 31 प्लॉट, और कुल प्लॉट थे 100, 100-31= 69. बब्बा रे! 69 एकड़ जमीन कहाँ गयी बल? उस पर क्या हो रहा है? न हमें मालूम है और न सरकार बहादुर को. ढूंढो तो ग्याडूओ! टिहरी के विस्थापित एक एक इंच जमीन को तरस रहे हैं और अपने पुनर्वास मंत्री साहब उनके पुनर्वास के लिये जमीन नहीं तलाश पा रहे और सरकार बहादुर हैं कि 69 एकड़ जमीन ही खो दिये हैं.

अब अपने माई लॉर्ड बिज्जी भैजी को सितारगंज का सच कौन बतायेगा कि लाट सैप नयी दुकान खोलने से पहले पुराना हिसाब तो देख लो, क्या गुल खिलाए हैं अपने पुराने भाईयों ने? पर क्या करें दीदा! अपने जज साहब की अभी हाईकोर्ट वाली आदत गयी नहीं है कि जब तक वकील साहब कहेंगे नहीं तो जज साहब न्याय करेंगे कैसे? या फिर अपने राकेश लल्ला ने जज साहब की पहले से ही इतनी बड़ी सेटिंग करा दी है, कि साहब हिसाब के चक्कर में न पड़ो बस सेंटीमीटर गिनो, जितना लंबा फीता उतने ही ज्यादा जीरो. ग्याडूओ रे! कुछ बात भेजे में आई या नहीं. मतलब साफ़ है कद्दू कटेगा तो सब में बँटेगा. स्थानीय ग्याडूओ के हाथ लगेगा फिर वही कद्दू का डंठल.

स्थानीय ग्याडू तो पहले भी लाला की नौकरी कर रहा था अब भी करेगा. सरकारी जमीन उनके बबा का माल थोड़े ही है? इस पर तो अपने मंत्रियों और सचिवों का पट्टा है, जिसे चाहे पट्टे पर दें. हमें क्या...

chandrashekhar-karketiचन्द्रशेखर करगेती पेशे से अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता व आरटीआई कार्यकर्ता भी हैं.

Last Updated on Saturday, 08 December 2012 16:11

Comments  

 
0 #8 vinod paneru 2013-12-04 08:25
are bhai sahab apne to bahut hi sahi likha ha.aur yahi sach v h,thanks..
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0 #7 Kamalesh S Mahar 2013-02-10 18:34
Kargeti ji jankari dene ke liye dhanyabad, SIDKUL ke bare mai jyada jankari dene ka kast karen
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0 #6 चंद्रशेखर करगेती 2012-12-11 18:59
धन्यवाद त्रेपन भेजी, आप बड़े भाईयों का आशीर्वाद हो जो इतना लिख पाया....प्रतिक्रिया हेतु हार्दिक आभार.
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+1 #5 Trepan singh chauhan 2012-12-09 22:16
shandaar jankaari dene ke liye chandrshekhar ji ko badhaai
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0 #4 चंद्रशेखर करगेती 2012-12-08 21:50
निखिल भाई बस यूँ ही लिख डाला कोइ पूर्व तैयारी नहीं थी......बस एक आरटीआई से मिली अधूरी जानकारी पर ही लिखा है, जब पूरी जानकारी आ जायेगी तो शायद आलेख एक अलग रूप में लिखूंगा.....उसमें कानूनी पहलु का समावेश भी होगा......
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0 #3 चंद्रशेखर करगेती 2012-12-08 21:45
रावत जी, खोजी पत्रकार को स्टिंग में मंत्री जी के बेडरूम के तस्वीर उतारने होते है , सो इस काम के लिए मंत्री जी के साथ चिपके रहना होता है तो वो उनके खिलाफ नहीं लिख सकता यह अलग बात है कि उसका स्टिंग भी कभी सामने नहीं आता वह संपादक या मालिक की तिजोरी भरता है, बड़े सम्पादक और वरिष्ठ पत्रकारों को अपनी फोज पालनी होती सो इनसे बैर नहीं......हम तो ग्याडू ठहरे जो लिखा है उसका तो अर्थ भी नहीं जानते कि क्या लिख बैठे है...बस जब मित्र उसे कहीं स्थान देते है तो भेजे में आता है कि चक्कलस में कुछ काम की चीज लिख दी होगी....वैसे मेरी **** गाय पर लेख लिखने की भी नहीं है, आपको मेरी चकल्लस पसंद आयी...और किसी के नाम पर गाली देने का मन हुआ, मैं इतने में ही अपने को कृतार्थ समझता हूँ......
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+1 #2 SANJAY RAWAT 2012-12-08 21:30
वाह मित्र , ये हिमाकत तो वरिष्ठ पत्रकार तो क्या जनपक्षी संपादक और खोजी पत्रकार भी नहीं कर पाए ,
राकेश शर्मा की माँ की ..........................
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+2 #1 निखिल उपाध्याय् 2012-12-08 16:33
kargeti ji uttarakhand sidkul ke baare men vakai aapki tippni kabilegaur hai.. sadhuwad.
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