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भूटान के जनतांत्रिक नेता दोरजी और भारत

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मीडिया ने कभी यह बताने की जरूरत नहीं महसूस की कि ‘ग्रॉस नेशनल हैप्पीनेस’ (सकल राष्ट्रीय खुशहाली) के भूटान नरेश के नारे के पीछे डेढ़ लाख भूटानियों का दर्द छुपा है, जिन्हें 1990-91 में भूटान नरेश की निरंकुशता ने देश से बाहर खदेड़ दिया क्योंकि इन लोगों ने न्यूनतम  जनतंत्र की मांग की थी...

आनंद स्वरूप वर्मा

ड्रूक नेशनल कांग्रेस के अध्यक्ष और भूटानी शरणार्थियों के अत्यंत सम्मानित नेता रोंग थोंग कुन्ले दोरजी का 19-20 अक्टूबर की रात में भारत के पूर्वी राज्य सिक्कीम की राजधानी गंगटोक में निधन हो गया. वे 71 वर्ष के थे. दोरजी पिछले 11 वर्षों से निर्वासित जीवन बिता रहे थे. 1990 में दक्षिणी भूटान में मानव अधिकरो और न्यूनतम जनतंत्र की मांग को लेकर आंदोलन शुरू होने पर भूटान नरेश जिग्मे सिंघे वांगचुग ने भीषण दमन का सहारा लिया और लगभग डेढ़ लाख लोगों को देश से बाहर खदेड़ दिया गया.

इन लोगों की नागरिकता समाप्त कर दी गयी और इनकी जमीन और मकानों पर कब्जा कर लिया गया. चूंकि यह आंदोलन भूटान के दक्षिणी हिस्से में केन्द्रित था जहां नेपाली मूल के भूटानी नागरिकों की ही मुख्य रूप से आबादी थी इसलिए भूटान नरेश को यह प्रचारित करने में आसानी हुई कि यह आंदोलन एक जातीय आंदोलन था. इसके कुछ वर्षों बाद पूर्वी भूटान में आर.के.दोरजी के नेतृत्व में आंदोलन शुरू हुआ जहां प्रमुख रूप से सारचोप लोगों की आबादी थी.

राजा ने जो मिथक तैयार किया था वह इस आंदोलन से टूट गया और इसके नेता दोरजी राजा के प्रमुख शत्रु बन गए. मई 1991 में भूटान की शाही सरकार ने दोरजी को गिरफ्रतार कर लिया और डेढ़ महीने तक भीषण यातना देने के बाद जबरन एक मापफीनामें पर दस्तखत कराने के बाद रिहा कर दिया. दोरजी किसी तरह सरकार की निगाह से बच कर नेपाल आए और यहां उन्होंने 1994 में ड्रुक नेशनल कांग्रेस की स्थापना की.

दोरजी को 18 अप्रैल 1997 की शाम को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्रतार किया और डिफेंस कॉलोनी पुलिस स्टेशन में रख दिया. उस समय देश के प्रधनमंत्राी पद पर इंद्र कुमार गुजराल थे जिन्होंने अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्रा में मानव अध्किार संगठनों के साथ अपने संबंधें को विकसित कर कापफी वाहवाही लूटी है.

उनकी गिरफ्तारी पर पत्रकार राम बहादुर राय ने ‘जनसत्ता’ में लिखा कि ‘दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की राजधानी में पड़ोसी देश भूटान के लोकतांत्रिक आंदोलन के नेता को जबरन ‘सरकारी मेहमान’ बनाया गया है. ये सज्जन रोग थोंग कुनले दोरजी हैं. गुजराल सरकार की मेहरबानी से इन्हें नरेला के जिस भिक्षुगृह में रखा गया है वहां एक ही कमरे में अपराधी और राजनीतिक नेता दोनों के लिए स्थान है.’ राम बहादुर राय ने इसे अत्यंत शर्मनाक बताते हुए आगे कहा कि ‘यह कार्रवाई हमारे लोकतांत्रिक चादर पर काला धब्बा है’.

नरेला के भिक्षुगृह में कैद दोरजी ने पत्रकारों से कहा कि ‘मैं यहां सोच कर आया था कि भारत सरकार से अनुरोध करूंगा कि वह भूटान के लोकतांत्रिक आंदोलन को मदद करे लेकिन इसके बदले मुझे कैद मिली है.’ उसी सप्ताह राजेश जोशी ने भी पुलिस हिरासत में कैद दोरजी से भेंट की और आउटलुक में एक लंबी रिपोर्ट प्रकाशित की. हमारे देश की जनतांत्रिक सरकार की योजना थी कि दोरजी को चोरी छिपे भूटान रवाना कर दिया जाय और राजा को सौंप दिया जाय.

भारत सरकार की योजना के विफल होने का मुख्य कारण ‘भूटान सालिडारिटी’ के सदस्यों की सक्रियता थी जिन्होंने फौरन इस खबर को प्रसारित किया और मानव अधिकार संगठनों से जुड़े कुछ प्रमुख लोगों के हस्तक्षेप के बाद रात में तकरीबन 12 बजे डिफेन्स कालोनी थाने के एसएचओ ने स्वीकार किया कि दोरजी वहां कैद हैं. अगले दिन सुबह अखबारों में खबर आ गयी और भारत सरकार की सारी योजना ध्वस्त हो गयी.

दोरजी की रिहाई की मांग को लेकर दिल्ली सहित देश के कई शहरों में धरना प्रदर्शन हुए. सबसे ऐतिहासिक धरना 15 अगस्त 1997 की रात में तिहाड़ जेल के बाहर हुआ. उस रात आजादी की 50वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में संसद का विशेष अधिवेशन बुलाया गया था और ठीक रात में 12 बजे जश्न मनाया जा रहा था. उसी समय जार्ज पफर्नांडीज के नेतृत्व में तकरीबन 40 सांसद भूटान साॅलिडाॅरिटी के आह्वान पर रातभर तिहाड़ जेल के बाहर भूटानी जनता के संघर्ष के समर्थन में और दोरजी की गिरफ्तारी के विरोध में नारे लगाते रहे. 12 जून 1998 को उन्हें जमानत पर रिहा किया गया.

इसी महीने भूटान के नये नरेश जिग्मे खेसर वांग्चुक अपनी शादी के बाद दिल्ली की यात्रा पर आये थे और शादी से लेकर उनकी सपत्नीक भारत यात्रा तक की विरुदावली गाने में भारतीय मीडिया ने कोई कसर नहीं छोड़ी- ठीक वैसे ही जैसे यहां का मीडिया नये नरेश खेसर के पिता जिग्मे सिंगे वांग्चुक के पर्यावरण प्रेम और जनतांत्रिक मिजाज का गुणगान करता रहा है.

इस मीडिया ने कभी अपने पाठकों या श्रोताओं को यह बताने की जरूरत नहीं महसूस की कि ‘ग्रॉस नेशनल हैप्पीनेस’ (सकल राष्ट्रीय खुशहाली) के भूटान नरेश के नारे के पीछे डेढ़ लाख भूटानियों का दर्द छुपा है, जिन्हें 1990-91 में भूटान नरेश की निरंकुशता ने देश से बाहर खदेड़ दिया क्योंकि इन लोगों ने न्यूनतम मानव अधिकार और औपचारिक जनतंत्र की मांग की थी. इस मांग के जवाब में टेकनाथ रिजाल सहित सैकड़ों लोगों को जेलों में डाल दिया गया, भीषण यातनाएं दी गयीं, उनके मकान ध्वस्त कर दिये गये, खेतों पर कब्जा कर लिया गया और यह प्रचारित किया गया कि वे राष्ट्र विरोध्ी गतिविध्यिों में लगे थे.

आंदोलन चूंकि मुख्यतः दक्षिणी भूटान में केंद्रित था, जहां देश की कुल आबादी का 50 प्रतिशत हिस्सा रहता है और जहां ल्होत्सोम्पा ;नेपाली मूल के भूटानी नागरिकद्ध लोगों का बहुमत है, राजा ने विश्व जनमत को यह कहकर गुमराह करने की कोशिश की कि यह नेपाल से प्रेरित मुट्ठीभर लोगों का आंदोलन है. राजा के इस दुष्प्रचार को दोरजी के आंदोलन से जबर्दस्त झटका लगा. इसकी सीधी वजह यह थी कि दोरजी जिस आंदोलनकारी तबके का नेतृत्व कर रहे थे वे पूर्वी भूटान के सारपोच समुदाय के लोग थे.

दोरजी की सक्रियता ने इस मिथ को तोड़ दिया कि यह आंदोलन किसी खास जातीय समूह का है. दक्षिणी भूटान और पूर्वी भूटान के लोगों के आंदोलन का यह असर था कि मौजूदा नरेश खेसर के पिता जिग्मे सिंगे वांग्चुक को अपने देश में जनतंत्रा लाने का ढोंग करना पड़ा जिसे भारत सरकार की भरपूर मदद मिली और जिसे भारतीय मीडिया ने जमकर प्रचारित किया.

मीडिया ने कभी यह बताने की जहमत नहीं उठायी कि 1990-91 और उसके बाद से प्रतिबंध्ति राजनीतिक दल ;भूटान पीपुल्स पार्टी, भूटान नेशनल डेमोक्रेटिक कांग्रेस और ड्रुक नेशनल कांग्रेसद्ध पर से प्रतिबंध् नहीं हटाया गया और उन्हें इस पफर्जी चुनाव में भाग लेने की अनुमति नहीं मिली. मीडिया ने कभी यह नहीं बताया कि राजा ने अपने दो निकट संबंध्यिों से दो नयी पार्टियां बनवा लीं और उन्हीं के बीच चुनाव कराकर जनतंत्रा का तमाशा कर दिया जिसका स्वागत करने मनमोहन सिंह से लेकर प्रणव मुखर्जी तक सभी बारी बारी पहुंच गये.

मीडिया ने कभी यह जानकारी नहीं दी कि भूटान से बाहर नेपाल में बने सात शरणार्थी शिविरों में बदहाली की जिंदगी काट रहे शरणार्थियों की वापसी के सवाल पर भारत सरकार एक आपराध्कि चुप्पी साध्े रही और पश्चिमी देशों के उस प्रस्ताव का स्वागत किया जिसके तहत सस्ते मजदूर के रूप में काम करने के मकसद से इन देशों ने ‘मानवीय आधर पर’ शरणार्थियों को अपने यहां बसाने की जिम्मेदारी ली.

रोंगथोंग कुनले दोरजी एक अन्य भूटानी नेता टेक नाथ रिजाल के साथ मिलकर शरणार्थियों की सम्मानपूर्वक स्वदेश वापसी के लिए अंत तक अथक प्रयास करते रहे. दुनिया के सबसे बड़े जनतंत्रा के हुक्मरानों और यहां के मीडिया दिग्गजों के लिए यह शर्म की बात है कि उसने दोरजी और उनके साथियों के संघर्ष को कभी मान्यता नहीं दी.

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