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पाकिस्तान में उम्मीदों का तीसरा विकल्प

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दशकों से चली आ रही पाकिस्तान की भ्रष्ट राजनीतिक व्यवस्था ने आर्थिक तौर पर मुल्क को इतना खोखला कर दिया है कि पिछले दिनों पाकिस्तान में आर्थिक संकट के चलते 106 प्रमुख रेलगाडिय़ों के परिचालन को बंद करना पड़ा तो वहीं धन की कमी के कारन कई बिजलीघरों के बंद होने के भी समाचार हैं...

तनवीर जाफरी

कट्टरपंथ, भ्रष्टाचार, स्वार्थपूर्ण राजनीति, अराजकता तथा सांप्रदायिकता ने पाकिस्तान को दिवालिएपन की कगार पर पहुंचा दिया है। पाकिस्तान की सत्ता में रहने वाली वहां की दो पारंपरिक राजनीतिक पार्टियों पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) तथा पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज़) पर से आम लोगों का विश्वास उठने लगा है और अवाम अब तीसरे राजनीतिक विकल्प की और बड़ी उम्मीद से देख रही है.

पाकिस्तान को क्रिकेट विश्वकप में 1990 में पहली बार विजय दिलाने वाले इमरान खान उसी समय से पाकिस्तानी जनता के लिए एक आदर्श हीरो के रूप में स्थापित हो चुके हैं। उन्होंने क्रिकेट जीवन से सन्यास लेने के बाद से ही सामाजिक गतिविधियों में भाग लेना शुरु कर दिया था। लगभग एक दशक पूर्व इमरान ने तहरीक-ए-इंसाफ नामक एक राजनैतिक दल का गठन भी इसी उम्मीद से किया था कि शायद क्रिकेट के नाते स्थापित हुई उनकी लोकप्रियता उनके राजनैतिक संगठन को भी फायदा पहुंचा सकेगी, परंतु ऐसा नहीं हो सका और शुरुआती दौर में उनकी तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी जहां भी चुनाव लड़ी उसे अधिकांश स्थानों पर हार का मुंह देखना पड़ा।

पिछले चुनावों में भी तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी की बुरी तरह पराजय हुई, परंतु अब हालात शायद कुछ बदलते हुए दिखाई दे रहे हैं। पाकिस्तान में अचानक आम लोगों का रुझान इमरान खान व उनकी पार्टी की ओर बढऩे लगा है। तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी की ताज़ातरीन बढ़ती लोकप्रियता के कई कारण हैं। एक तो यह कि गत् 6 दशकों से चली आ रही पाकिस्तान की भ्रष्ट राजनीतिक व्यवस्था ने आर्थिक तौर पर पाकिस्तान को इतना खोखला कर दिया है कि पिछले दिनों पाकिस्तान में आर्थिक संकट के चलते 106 प्रमुख रेलगाडिय़ों के परिचालन को बंद करना पड़ा। कारण यह बताया गया कि इन रेलगाडिय़ों को चलाने के लिए सरकार के पास पैसे नहीं थे।

इसके अतिरिक्त पाकिस्तान में धन की कमी के चलते कई बिजलीघरों के बंद होने के भी समाचार हैं। आर्थिक संकट से जूझ रहे पाकिस्तान पर एक मुसीबत यह भी आ पड़ी है कि आप्रेशन एबटाबाद में अमेरिकी सेना द्वारा ओसामा बिन लाडेन के मारे जाने के बाद पाकिस्तान व अमेरिका के बीच संबंधों को लेकर आई दरार के परिणामस्वरूप तथा पाक-अफगान सीमा पर अमेरिका द्वारा कथित रूप से अपेक्षित कार्रवाई न किए जाने के कारण अमेरिका ने पाकिस्तान को दी जाने वाली आर्थिक सहायता से भी अपने हाथ खींच लिए हैं और इन्हीं हालात के बीच पिछले दिनों प्रकृति ने पाकिस्तान को बाढ़ रूपी प्रलय से भी दो-चार कर दिया। नतीजतन जहां लाखों लोग बेघर हो गए वहीं अरबों रुपये की संपत्ति का भी नुकसान हुआ। पहले से ही घोर आर्थिक संकट से जूझ रहा पाकिस्तान इस प्राकृतिक विपदा से निपटने में पूरी तरह असमर्थ व असहाय देखा गया।

उधर पाकिस्तानी राजनीति में सैन्य हस्तक्षेप को लेकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान की बन चुकी गैर भरोसेमंद छवि को लेकर भी पाक अवाम काफी दु:खी है। समय-समय पर पाकिस्तान में होने वाले सैन्य तख्तापलट ने वहां की परंपरागत राजनीतिक पार्टियों की विश्वसनीयता तथा उनकी योग्यता पर भी प्रश्रचिन्ह लगा दिया है। ऐसे में पाक अवाम का तीसरे राजनीतिक विकल्प की तलाश करना स्वाभाविक माना जा सकता है। उधर पाक अवाम की तीसरे विकल्प की तलाश की इच्छापूर्ति करने की दिशा में इमरान खाऩ द्वारा भी जनता के बीच कुछ ऐसे शगूफे छोड़े जा रहे हैं जिनपर इमरान खान अथवा उनकी पार्टी द्वारा अमल कर पाना संभव हो या न हो परंतु अवाम को पहली नज़र में यह मुद्दे आकर्षित ज़रूर कर रहे हैं।

उदाहरण के तौर पर तालिबान से लड़ रही नाटो सेनाओं में लगभग 1,03700 अमेरिकी सैनिक तैनात हैं। पाकिस्तान के अफगानिस्तान सीमांत क्षेत्र में अमेरिकी सेना द्वारा किए जाने वाले ड्रोन हमलों का पाक अवाम पुरज़ोर विरोध कर रही है। इस मुद्दे पर अपने लाख विरोध जताने के बावजूद पाक सरकार अथवा पाक सेना इस अमेरिकी कार्रवाई को रोक नहीं पा रही है। ड्रोन हमलों से प्रभावित क्षेत्र के लोगों का कहना है कि इन हमलों में बेगुनाह आम नागरिक मारे जा रहे हैं। इस क्षेत्र के लोग अब इस ड्रोन कार्रवाई के विरुद्ध अंतर्राष्ट्रीय अदालत में भी जाने को तैयार हैं। इस प्रकरण में सत्ता में होने के नाते ज़ाहिर है पाक सरकार व पाक सेना अपनी सीमाओं के भीतर ही रहकर अपना सीमित विरोध दर्ज कराती है जबकि इमरान खान इस विषय पर मुखरित होकर जनता की आवाज़ बनने की कोशिश कर रहे हैं।

इमरान की पाकिस्तान में बढ़ती लोकप्रियता का दूसरा कारण भारत-पाक के बीच पारंपरिक विवादित मुद्दा यानी मसल-ए-कश्मीर भी है। गत् 30 अक्तूबर को पाकिस्तान के लाहौर शहर के मध्य स्थित मीनार-ए- पाकिस्तान नामक ऐतिहासिक मैदान में इमरान खान ने एक ऐसी विशाल रैली को संबोधित किया जो तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी द्वारा आयोजित की गई अब तक की सबसे विशाल रैली मानी जा रही है। खबरों के अनुसार इस रैली में एक लाख से अधिक लोगों की भीड़ इमरान खान को सुनने के लिए इकट्ठी हुई। इसी विशाल जनसभा में इमरान ने जहां अमेरिकी ड्रोन कार्रवाई के प्रति अपना खुला विरोध दर्ज कर जनता के दिलों को जीतने की कोशिश की वहीं भारतीय कश्मीर में मौजूद भारतीय सेना की मौजूदगी को भी उन्होंने गलत ठहराया।

पाक अवाम का दिल जीतने के लिए इमरान खान इस जनसभा में जमात-उद-दावा के प्रमुख तथा भारत के 26/11 के मुंबई हमलों के मोस्ट वांटेड अपराधियों में सर्वप्रमुख हाफिज़ मोहम्मद सईद की पाक अवाम को वरगलाने वाली भाषा बोलने से भी नहीं चूके। इमरान ने अपने उत्तेजनात्मक भाषण में कहा कि 'मैं भारत को यह बता देना चाहता हूं कि कश्मीर घाटी के लोगों के बीच 7 लाख फ़ौजी तैनात कर हिंदुस्तान को कुछ हासिल नहीं होगा। उन्होंने कहा कि इतिहास गवाह है कि कोई भी सेना किसी भी देश की समस्या का समाधान नहीं कर सकती। उन्होंने यह प्रश्र किया कि क्या अमेरिका अफगानिस्तान में कामयाब हो गया? क्या भारतीय सेना अमेरिकी सेना से भी ताकतवर है? और जब अमेरिकी सेना अफगानिस्तान में कामयाब नहीं हो सकती तो फिर भारत की सेना घाटी में कैसे कामयाब हो सकती है?

पाकिस्तान में आम चुनाव 2013 में होने की संभावना है। परंतु इन दो वर्षों के बीच इमरान तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी को देश के एक मुख्य विकल्प के रूप में स्थापित करने की पूरी कोशिश करेंगे। लाहौर के जिस मीनार-ए-पाकिस्तान नामक मैदान में पहली बार इमरान खान को इतना बड़ा जनसमर्थन मिलता दिखाई दिया उस मैदान का भी अपना एक असाधारण ऐतिहासिक महत्व है। यह वही मैदान है जहां 1940 में मुस्लिम लीग की एक ऐसी ही विशाल जनसभा में अलग पाकिस्तान देश के निर्माण का प्रस्ताव पारित हुआ था। बताया जा रहा है कि इस मैदान में उसके बाद अब दूसरी बार इमरान खान की इस रैली में इतनी बड़ी संख्या में मध्यम उच्च व उच्च वर्ग भी शामिल हुआ जो आमतौर पर राजनैतिक कार्यक्रमों तथा भीड़भाड़ वाले कार्यक्रमों में शिरकत नहीं करता, न ही मतदान के लिए जाने की ज़रूरत महसूस करता है।

निश्चित रूप से लाहौर में आयोजित तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी की इस सफलतम रैली का आयोजन जहां इमरान खान के हौसलों को ओर बुलंद करेगा वहीं पाकिस्तान मीडिया द्वारा विशेषकर पाकिस्तानी अखबारों द्वारा इस रैली की सफलता के तमाम पहलुओं को उजागर करना भी तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी के लिए काफी फायदेमंद साबित हो सकता है। अब इस बात की पूरी संभावना है कि इमरान खान शायद अब पीछे मुडक़र देखने के बजाए अपने दल को और अधिक मज़बूत करने तथा इसका जनाधार और व्यापक करने में अपना पूरा समय लगाएं। इन सभी सकारात्मक बातों के साथ-साथ इमरान खान की पार्टी को इस बात की कमी भी महसूस हो रही है कि तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी में इमरान खान के अतिरिक्त कोई दूसरा कद्दावर राजनैतिक चेहरा नज़र नहीं आ रहा है।

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