पार्टी के अध्यक्ष पुष्पकमाल दहल ‘प्रचण्ड’ ने गरीब और भूमिहीन किसानों को धोखा दिया है. कब्ज़ा की गई जमीन लौटने का फैसला पार्टी के महाअधिवेशन में लिए गए निर्णय के विपरीत है. यदि सरकार इस समझौते को लागू करने का प्रयास करेगी तो नेपाल की जनता इसका प्रतिकार करेगी...
काठमांडू, (नेपाल) 18 नवंबर (जनज्वार). नेपाल में 1 नवंबर को हुए सात सूत्रीय समझौते का विरोध तेज होता जा रहा है. कल इस समझौते के खिलाफ भूमिहीन किसानों (जिन पर इसका सबसे अधिक प्रभाव पड़ना लाजमी है) ने काठमांडू में हजारों की संख्या में प्रदर्शन कर समझौते का विरोध किया. कल ही के दिन धनगड़ी स्थित ‘लिसने गाम स्मृति ब्रिगेड’ के सभी माओवादी लड़ाकों ने ‘रोल कोल’ का बहिष्कार कर अपना विरोध जताया. इस केन्टोनमेंट में तकरीबन 500 माओवादी लड़ाके 2006 में हुए शांति समझौते के बाद से रह रहे है.
कल काठमांडू में हुई भूमिहीन किसानों के विरोध प्रदर्शन में भाग ले रहे लोगों का कहना था कि जब तक उनकी जीविका का उचित प्रबंध नहीं कर दिया जाता तब तक जनयुद्ध में कब्ज़ा की गई जमीन को उनसे छीनना अन्यायपूर्ण है और वे हर हाल में इसका विरोध करेंगे. सभा को संबोधित करते हुए अखिल नेपाल किसान संघ (क्रांतिकारी) के महासचिव नन्द बहादुर बुडा मगर ने कहा, पार्टी के अध्यक्ष पुष्पकमाल दहल ‘प्रचण्ड’ ने गरीब और भूमिहीन किसानों को धोखा दिया है. उन्होंने कहा कि कब्ज़ा की गई जमीन लौटने का फैसला पार्टी के महाअधिवेशन में लिए गए निर्णय के विपरीत है. यदि सरकार इस समझौते को लागू करने का प्रयास करेगी तो नेपाल की जनता इसका प्रतिकार करेगी.
बुडा मगर ने पार्टी के प्रचण्ड-बाबुराम समूह पर आरोप लगाया कि वे गरीब किसानों की जमीन के बदले प्रधान मंत्री पद हासिल करना चाहते है. इस अवसर पर संघ के केन्द्रीय सदस्य कर्ण बहादुर के सी ने कहा कि पार्टी के अद्धयक्ष प्रचण्ड पार्टी को धोखा दे रहे है और सात सूत्रीय समझौता धोखेबाजी का उत्कर्ष है. उन्होंने कहा कि अब प्रचण्ड गरीब जनता के नेता नहीं है बल्कि साम्राज्यवाद और विस्तारवाद के दलाल बन गए है.
इसके आलावा सैकडो अन्य असंतुष्ठ लड़ाकों ने चेतावनी दी है कि यदि उनका सम्मानजनक समायोजन नहीं होता (2006 के वृहद शांति समझौते के अनुसार का) तो वे नेतृत्व के खिलाफ विद्रोह करेंगे. 1 नवंबर के समझौते के तीसरे दिन सुर्खेत स्थित केन्टोनमेंट के उप कमांडर दुर्गा प्रसाद चौधरी ने एक प्रेस वार्ता आयोजित कर समझौते का बहिष्कार किया था और और चेतावनी दी थी कि वे और उनके केन्टोनमेंट के सभी माओवादी लड़ाके इस समझौते को शर्मनाक मानते है.
गौरतलब है कि समझौते को नेपाल की संसदीय पार्टियों (जिसमे माओवादी पार्टी का प्रचण्ड-बाबुराम गुट भी शामिल है) ने ऐतिहासिक करार दिया था और बहुत से नेपाल मामलों के जानकारों ने इस की तुलना 2006 में हुए शांति समझौते से की थी.


