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आतंक का गढ़ बनते पाकिस्तानी मदरसे

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पाकिस्तान में मदरसे दिन-प्रतिदिन नफरत, आतंकवाद, विध्वंस तथा वैमनस्य को परवान चढ़ाने का केंद्र बनते जा रहे हैं तो  इसी विचारधारा में फलने-फूलने वाले असामाजिक व अराजक तत्व आधुनिक शिक्षा व शिक्षण संस्थाओं का पुरज़ोर विरोध कर रहे हैं... 

तनवीर जाफरी

फारसी भाषा में मदरसा शब्द का अर्थ होता है वह स्थान जहां 'दर्स' अर्थात् सबक पढ़ाया जाता हो। आमतौर पर मदरसों में इस्लाम संबंधित धार्मिक शिक्षा का ज्ञान दिया जाता रहा है।  धीरे-धीरे अब इन्हीं मदरसों में आधुनिक शिक्षा से जुड़े कई पाठ्यक्रमों को भी शामिल किए जाने लगा है, लेकिन इस्लाम धर्म के नाम पर  पाकिस्तान में मदरसों की हालत दिन-प्रतिदिन बद से बद्तर होती जा रही है।  

madrassa-studentदुनिया पाकिस्तान पर यह आरोप लगा रही है कि पाकिस्तान में स्थित तमाम मदरसे आतंकवादियों विशेषकर तालिबानी विचारधारा का शिक्षण व प्रशिक्षण केंद्र बन चुके हैं। ऐसा नहीं है कि पाकिस्तान पर इस प्रकार के आरोप भारत या किन्हीं पाक विरोधी शक्तियों द्वारा लगाए जाते हों। पाकिस्तान से आए दिन आने वाली खबरों से ही स्वयं इस बात का पता चलता है कि पाक में किस प्रकार नापाक होते ऐसे मदरसे फल फूल रहे हैं।  

पिछले दिनों पाकिस्तान के कराची  महानगर में  एक प्रमुख मदरसे से पाकिस्तानी सुरक्षाकर्मियों ने छापा मारकर 55 छात्रों को वहां से मुक्त कराया। मदरसे का प्रमुख मौलवी मौके से फरार हो गया। समझा जा रहा है कि 8 से 25 आयु वर्ग के इन गरीब छात्रों को मदरसा प्रबंधन की मिलीभगत से तालिबानी आतंकवादियों ने मदरसे के एक तहखाने में बंधक बनाकर रखा हुआ था। 

कई छात्रों के पैरों में बेडिय़ां पड़ी हुई थीं जबकि कई को लोहे की ज़ंजीरों से जकड़ा गया था। रिहा कराए गए छात्रों ने बाद में बताया कि उन्हें तालिबान लड़ाके व आत्मघाती हमलावर बनने के लिए प्रशिक्षण दिया जाता था। उनसे युद्ध के लिए तैयार रहने को कहा जाता था।

जो छात्र उनके द्वारा दी जाने वाली शिक्षा अथवा प्रशिक्षण का विरोध करता था उसे खाना नहीं दिया जाता था, उसकी बुरी तरह पिटाई की जाती थी तथा पैरों में रस्सियां बांधकर उल्टा लटका दिया जाता था। इनमें से अधिकांश छात्र खैबर पखतूनख्वाह प्रांत से संबद्ध थे। इस क्षेत्र के लोग इस तथाकथित मदरसे को 'जेल मदरसा' के नाम से जानते थे। 

पाकिस्तानी मदरसों में आतंकियों की पनाहगाह होने का सबसे बड़ा प्रमाण पूरी दुनिया ने उस समय देखा था जब 2007 में इस्लामाबाद में स्थित लाल मस्जिद नामक पाक के एक प्रमुख धार्मिक शिक्षण संस्थान में पाक सेना द्वारा तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल परवेज़ मुशर्रफ के आदेश पर एक बड़ा सैन्य ऑप्रेशन किया गया था।

लाल मस्जिद में हुई इस सैन्य कार्रवाई में भारी मात्रा में मस्जिद से हथियार व गोला बारूद बरामद हुए थे। मस्जिद के भीतर से सुरक्षाकर्मियों पर भीषण गोलाबारी की गई थी, जिसकी जवाबी कार्रवाई में लगभग 100 लोगों को  जान गंवानी पड़ी थी। मरने वालों में जहां लाल मस्जिद में पनाह लेने वाले तमाम आतंकी तथाकथित छात्र तथा कई बेगुनाह राहगीर शामिल थे, वहीं इस मुठभेड़ में 11 सुरक्षाकर्मी भी मारे गए थे। 


कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि एक ओर पाकिस्तान में मदरसे दिन-प्रतिदिन नफरत, आतंकवाद, विध्वंस तथा वैमनस्य को परवान चढ़ाने का केंद्र बनते जा रहे हैं तो दूसरी ओर इसी खतरनाक व मानवता विरोधी विचारधारा में फलने-फूलने वाले असामाजिक व अराजक तत्व आधुनिक शिक्षा व शिक्षण संस्थाओं का पुरज़ोर विरोध करते आ रहे हैं। इसी विचारधारा के लोगों द्वारा गत् पांच वर्षों में 500 से अधिक स्कूलों को ध्वस्त किए जाने के समाचार भी हैं। अभी पिछले ही दिनों इस्लामाबाद के समीप एक स्कूल को तालिबानी लड़ाकों ने विस्फोट कर उड़ा दिया था।

इसी वर्ष जून में मेरे पास इस्लामाबाद से यूथ ऑफ पाराचिनार की ओर से एक प्रेसनोट आया था जो अत्यंत हृदयविदारक था। हालांकि उस समय मैंने इस विज्ञप्ति पर कुछ नहीं लिखा परंतु आज इस आलेख में उसका उल्लेख करना प्रासंगिक समझ रहा हूं। इस्लामाबाद से लगभग 290 किलोमीटर पश्चिम में पाकिस्तान से काबुल जाने के मार्ग पर पाराचिनार नामक एक नगर है। पाराचिनार फाटा क्षेत्र में स्थित कुर्रम एजेंसी की राजधानी है तथा यह तोरा-बोरा रेंज का सीमांत क्षेत्र भी है।

इस क्षेत्र के तमाम बच्चे आधुनिक शिक्षा लेने के उद्देश्य से राजधानी इस्लामाबाद के विभिन्न स्कूलों में पढ़ते हैं तथा वहां छात्रावास में रहते हैं। इनमें कई बच्चे ऐसे हैं जिनके माता-पिता अथवा अभिभावकों को तालिबानों द्वारा अकारण शहीद कर दिया गया। इसके अतिरिक्त पाराचिनार क्षेत्र में चल रही पाक सेना व तालिबानों के मध्य युद्ध जैसी स्थिति के चलते पाराचिनार मार्ग को बंद कर दिया गया था। इस वजह से छुट्टियों में यह अपने घरों को भी वापिस नहीं जा पा रहे थे।

ऐसे दर्जनों छात्रों द्वारा नेशनल प्रेस क्लब इस्लामाबाद के कार्यालय के समक्ष प्रदर्शन किया गया था। तालिबानी ज़ुल्मोसितम के शिकार  मासूम बच्चे अपने हाथों में बैनर व तख्तियां  लेकर पूरी दुनिया को अपनी दर्दभरी दास्तान सुनाना चाह रहे थे। इनमें इरशाद अहमद नामक पांचवीं कक्षा के एक छात्र ने कहा कि मुझे नहीं पता कि आतंकियों ने मेरे अमनपसंद पिता को क्यों कत्ल कर दिया। अब तो मुझे स्कूल की फीस जमा करने में भी काफी संकट का सामना करना पड़ा है। इसी प्रकार सातवीं कक्षा में पढऩे वाले एक होनहार छात्र मुज़म्मिल हुसैन का कहना था- तालिबान बहुत गंदे हैं। वह तो बच्चों को भी मार डालते हैं। क्या इन आतंकियों के अपने बच्चे नहीं हैं? 

इन सभी बच्चों ने इस्लामाबाद प्रेस क्लब के समक्ष प्रदर्शन कर राष्ट्रपति आसिफ अली ज़रदारी, प्रधानमंत्री युसुफ रज़ा गिलानी, पाक सेना अध्यक्ष जनरल अशफाक परवेज़ कयानी तथा मुख्य न्यायाधीश जस्टिस इफ्तिखार चौधरी से अपील की कि कृप्या वे  उन सब बच्चों की सहायता करें।

पाक के यह हालात अपने आप में इस बात के पुख्ता सुबूत हैं कि वहां एक ओर तो मदरसे 'नापाक' होते जा रहे हैं, दूसरी ओर दुनिया की सबसे ज़रूरी व कीमती चीज़ यानी आधुनिक व सामयिक शिक्षा का गला घोंटने का भरपूर प्रयास किया जा रहा है। ऐसे में पाकिस्तान का भविष्य क्या होने वाला है, इसका अंदाज़ा आसानी से लगाया जा सकता है।

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