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चम्बल का चैम्पियन रेस हार गया

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फिल्म देखने के बाद कुछ लोग अपने गाँव, कस्बे के आस-पड़ोस में विराजमान किसी पप्पू या कल्लू की चाय की दुकान पर अगले कुछ हफ्तों तक उस पात्र के बारे में जरूर बात करेंगे जिसने सामाजिक समस्याओं से जूझते उस समाज के लिए कई मजेदार टिप्पणियाँ कीं...

संजीव ठाकुर

‘पान सिंह तोमर’ फिल्म के माध्यम से निर्देशक तिग्मांशु की यह एक ऐसी खोज है, जिसका दायरा अब तक बीहड़ों तक सीमित था जो अब असीमित हो गया है। तिग्मांशु की बीहड़ों मे बागियों की तलाश अभी तक जारी है । वे लगभग पिछले दो दशकों से वहाँ की सामाजिक राजनीतिक और सांस्कृतिक प्रभाव से मुक्त नहीं  हो पाये हैं। 

उनका सिने सफरनामा ‘द बैंडिट क्वीन’ में कास्टिंग डायरेक्टर की भूमिका से पहली निर्देशित फिल्म हासिल (2003) से अब तक की पिछली फिल्म 'साहेब बीवी और गैंगस्टर' (2011) तक जारी है।  वे हमेशा से ही कस्बाई संस्कृति से प्रभावित रहे हैं। यह फिल्म उसी संस्कृति से प्रभावित हमें गवारू और  बीहड़ों की संस्कृति से परिचय कराती है। 

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तिग्मांशु केवल फिल्म नहीं बनाते, बल्कि किसी घटना का वास्तविक मूल्यांकन सामाजिक- सांस्कृतिक बिंम्बों और  प्रतीकों का नायाब चित्रण करते हैं। उनके समकालीन मिलन लूथरिया की सुपरहिट फिल्म ‘द डर्टी पिक्चर’ भी उसी पैटर्न पर अपने समय के सिनेमाई संस्कृति का दर्शन कराती है।

इस फिल्म के पहले सीन में ठेलानुमा रिक्शा सड़क पर धीमी रफ्तार से दौड़ रहा है। उस पर सवार एक इंसान हाथ में भोंपू लिए शायद एक फिल्म के रिलीज होने के बारे में गला फाड़े जा रहा है। वैसे वह बीच में सदाबहार फिल्मी गाने भी चला सकता है। उसी भागते हुए रिक्शे पर एक पोस्टर भी है जो कहीं भी किसी भी उदासीनता और बदहाली झेल रहे सिंगल स्क्रीन सिनेमाहाल पर लगे पोस्टर जैसा हो सकता है । 

जो आपको कभी भी तंगनुमा गलियों और कस्बाईनुमा शहरों के एकमात्र सार्वजनिक शौचालय या कूड़ाघरों के आसपास लगे मिल सकते हैं। वह शायद उस समय यही बताना चाहता हो उनका असली हीरो वही है, जो घोड़े पर सवार, कारतूस से भरी कमरबंद और माथे पर काले या लाल रंग का चटखारा तिलक लगाये हुए है और जिसके कंधे पर दो नाली बंदूक है।   

शायद उस समय पत्रकारों पर काम का बोझ ज्यादा होता होगा, रिपोर्टिंग करने से लेकर सुबह-सुबह अखबार बांटने तक का नेक काम खुद ही करना पड़ता है। फिर भी उस फट्टू पत्रकार के पास चर्बी ज्यादा रहती है, देखने से ऐसा लगता है वह कभी भी सुबह चार किलोमीटर नहीं दौड़ सकता, क्योंकि उसे रेस हारने का डर नहीं है। 

यकीनन उस पत्रकार को शहर की आइसक्रीम खाने का अच्छा अनुभव है। अच्छी आइसक्रीम खाने का लाइसेन्स अब सिर्फ दो लोगों के पास है -जो इस देश में अंग्रेजों का कानून अब तक चला रहें और जो लोग उस कानून से चल रहे हैं ।अगर तीसरा कोई आइसक्रीम खाने की कोशिश करता है तो वह बागी हो जाता है।

‘बीहड़ में बागी होते हैं, डकैत मिलते हैं पार्लियामेंट में’  डायलाग कुछ ज्यादा सोच-समझकर नहीं लिखा गया होगा। हाँ, अगर बीहड़ क्वीन फूलन देवी अब तक पार्लियामेंट में होती, तो उनका बयान इस मसले पर जरूर आता।

इरफान खान हर बार की तरह अपने निभाए गए पिछ्ले किरदार को क्यों ज्यादा चुनौती देते हैं? उनसे यह यक्ष प्रश्न अगर किसी टीवी के इंटरव्यू में पूछा गया होगा तो उसका जवाब उन्होंने जरूर दिया होगा। यह फिल्म देखने मात्र से या भले ही कुछ समय के लिये, लेकिन आम दर्शक अपना रियल हीरो जरूर खोज लेता होगा। फिल्म को देखते वक्त कहीं-कहीं या कभी-कभी गाने के बोल सुनाई पडते हैं, जिनको ज्यादा महत्व देने की जरूरत नही है, क्योंकि इस पिक्चर के हीरो को गाना पसंद नहीं है।

वैसे फिल्म देखने के बाद, कुछ लोग अपने गाँव, कस्बे के आस-पड़ोस में विराजमान किसी पप्पू या कल्लू की चाय की दुकान पर अगले कुछ हफ्तों तक उस पात्र के बारे में जरूर बात करेंगे जिसने सामाजिक समस्याओं से जूझते उस समाज के लिए कई मजेदार टिप्पणियाँ की.

पंजाब यूनिवर्सिटी से अपनी पढ़ाई करने वाली अभिनेत्री माही गिल को भी नहीं पता होगा कि इतनी जल्दी उनके बारे में कोई सार्थक चर्चा करेगा, जिसके लिए सिने जगत की मशहूर अभिनेत्री मल्लिका शेरावत जैसी कई अभिनेत्रियाँ वर्षों से तरस रही हैं।

बीहड़ में बसे सुदूर गाँवों की महिलाएं अगर इस फिल्म को देखेंगी तो शायद ही उनके पास कोई स्पेस हो जो किसी भी महिला पात्र को कापी कर सके। हाँ बीहड़ में अब भँवर सिंह जैसे लोग शायद ही बचे हों, जो किसी निर्दोष बूढ़ी महिला को सिर्फ बदले की भावना से मार देते हों और लल्ला जैसे जवान लड़के को पीटने की अधिकतम सीमा के बाद तरस खाकर  छोड़ देते होंगे।

वैसे भी इस फिल्म को देखने में भाषायी समस्या हो सकती है, मगर जिसने विशाल भारद्वाज की धम-धम धड़म धड़ाइया यानि ‘ओमकारा’ और अनुराग कश्यप निर्देशित ‘गुलाल’ मन लगाकर देखी होगी, वो ज्यादा शिकायत नहीं करेंगे।

यह फिल्म सामंतवादी व्यवस्था में वर्चस्ववादी संस्कृति को लेकर उपजी एक रार है, जिसके मुख्य पात्र अपने ही लोगों द्वारा सताए जाने की घटना से गंभीर रूप से पीड़ित हैं। फिल्म के मुख्य पात्र  ने उस दौर मे आर्मी ज्वाइन की थी जब देश आजाद हो रहा था और ज़्यादातर लोग चौथी पास नहीं कर पाते थे। फिल्म का मुख्य पात्र ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ और अपने उसूलों से गैर समझौतापरस्त देश की राष्ट्रीय धरोहर था। उसका मन बहुत करता है कि अपनी माँ की रक्षा के लिए कुर्बानी दे, लेकिन उस राष्ट्रीय धरोहर की कीमत उसके मेडल और सर्टिफिकेट चुकाते हैं जो एक पुलिस थाने में बेरहमी से मेज से जमीन पर फेंक दिये जाते हैं।

दरअसल इस देश मे क्रिकेट को छोडकर एकाध ही ऐसे खेल हैं, जिसके खिलाड़ियों और उनके जीते हुए राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मेडलों की इज्जत की जाती है या उनको कोई बड़ा नाम-इनाम मिलता है। हाँ, उसकी तवज्जो तब जरूर बढ़ जाती है जब तीन राज्यों की पुलिस कोई बड़ा गुप्त इनाम, मेडल या सीधे कहें तो प्रमोशन पाने के चक्कर मे बीहड़ों में खाक छानती है। वैसे बीहड़ों में सबसे बड़ी सजा गद्दारी की होती है, जिसमें सामूहिक हत्या होना आम बात है और उसकी कीमत गाँव के सरपंच और उसके लोग भी चुकाते हैं।

खैर, पान सिंह की बदले की भावना उसे बागी तो बना देती है और वह अपने परिवार के प्रति हुए अमानवीय कृत्यों का बदला भी लेता है। चचेरे भाइयों द्वारा हड़पी हुई जमीन भी वापस पा लेता है, लेकिन उस पात्र को चाहने वाले दर्शकों के मन वो सवाल अब तक गूंज रहा होगा और शायद जवाब भी मांग रहा होगा कि जो उसका चचा मरते वक्त नहीं दे पाया था, लेकिन हो सकता है ऊपर जाकर उसे जरूर कुछ बताए। वैसे अब फिल्मों मे हीरो कम पात्र ज्यादा मिलते हैं, यह अब आपके ऊपर निर्भर करता है कि आपका हीरो कौन है।

मुख्य पात्र आखिरी दम तक उस नहर तक पहुँचने की कोशिश करता है, क्योंकि वह सरेंडर का मतलब अच्छी तरह जानता है। आखिरकार चंबल का चैम्पियन अपनी ज़िंदगी की आखिरी रेस दौड़ता है, लेकिन उस स्टीपेलचीज़ चैम्पियन को पता नहीं होता कि वह इस बार रेस हार जाएगा। 

sandeep-thakur 

भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय लखनऊ में पत्रकारिता से परास्नातक .'एहसास मंच' सांस्कृतिक समूह का संचालन. 

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