Feb 28, 2011

वित्त मंत्री साहब वर्ल्ड बैंक इससे अधिक क्या चाहता था !



वित्त मंत्री को राजकोषीय घाटे की चिंता सबसे ज्यादा थी.निश्चय ही,इससे विश्व बैंक-मुद्रा कोष   और बड़ी देशी-विदेशी पूंजी को सबसे ज्यादा खुशी होगी...



आनंद प्रधान

मौका गंवाना कोई यू.पी.ए सरकार से सीखे.इस बार का सालाना बजट एक बेहतरीन मौका था जब मनमोहन सिंह सरकार अपनी प्राथमिकताओं के बारे में देश को साफ सन्देश दे सकती थी.यह मौका था जब वह आम आदमी के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का सबूत देते हुए अर्थव्यवस्था के हित में कुछ साहसिक फैसले कर सकती थी.

लेकिन इसके बजाय यह बजट पिछली बार की तरह ही वित्तीय कठमुल्लावाद से प्रेरित है.नतीजा यह कि वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने पिछले साल की तरह ही एक रूटीन बजट पेश किया है जिसमें दिखावे के लिए कृषि-किसान, सामाजिक क्षेत्र और आम आदमी की बात करते हुए भी सबसे अधिक जोर राजकोषीय घाटे को काबू में करने पर दिया गया है.

आश्चर्य नहीं कि अगले बजट में वित्त मंत्री ने राजकोषीय घाटे का अनुमान जी.डी.पी का 4.6 प्रतिशत रहने का अनुमान पेश किया है.इसके लिए उन्होंने सरकारी खर्चों में न सिर्फ मामूली बढोत्तरी की है बल्कि कुछ महत्वपूर्ण क्षेत्रों में बजट प्रावधानों में कटौती कर दी है.उदाहरण के लिए, ग्रामीण विकास पर केन्द्रीय योजना में चालू वित्तीय वर्ष की तुलना में अगले वित्तीय वर्ष में लगभग 150 करोड़ रूपये की कटौती करते हुए 55288 करोड़ रूपये खर्च करने का प्रावधान किया है.

इसी तरह, कृषि क्षेत्र की केन्द्रीय योजना में भी चालू वर्ष की तुलना में अगले वर्ष के बजट में बहुत मामूली लगभग 382 करोड़ रूपये की वृद्धि के साथ 14744 करोड़ रूपये का प्रावधान किया गया है. यह चालू वर्ष की तुलना में सिर्फ 2.6 प्रतिशत की वृद्धि है.अगर मुद्रास्फीति को ध्यान में रखें तो यह वृद्धि वास्तव में नकारात्मक है.

हैरानी की बात यह है कि यह उस सरकार का बजट है जो पिछले कई वर्षों कृषि क्षेत्र में दूसरी हरित क्रांति की बातें कर रही है. लेकिन अगर यह कृषि क्षेत्र को ‘नई डील’ है तो अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है कि इस डील से क्या निकलनेवाला है? इसी तरह, यू.पी.ए सरकार समावेशी विकास के बहुत दावे करती रहती है. लेकिन समावेशी विकास के लिए सामाजिक क्षेत्र पर खर्च करना बहुत जरूरी है.

इस बजट में भी वित्त मंत्री ने बहुत उत्साह के साथ बताया कि सामाजिक क्षेत्र पर 1,60.887 करोड़ रूपये का प्रावधान किया गया है. लेकिन सच यह है कि यह जी.डी.पी का सिर्फ 2.1 प्रतिशत है. कहने की जरूरत नहीं है कि सामाजिक क्षेत्र पर जी.डी.पी का सिर्फ 2फीसदी खर्च करके किस तरह का समावेशी विकास होगा.

साफ है कि वित्त मंत्री को राजकोषीय घाटे की चिंता सबसे ज्यादा थी.निश्चय ही,इससे विश्व बैंक-मुद्रा कोष और बड़ी देशी-विदेशी पूंजी को सबसे ज्यादा खुशी होगी.उनकी तरफ से यू.पी.ए सरकार पर सबसे अधिक दबाव भी यही था कि सरकार राजकोषीय घाटे को काबू में करने पर सबसे अधिक जोर दे.

यह एक तरह का वित्तीय कठमुल्लावाद है जो मानता है कि अर्थव्यवस्था में सरकार की भूमिका सीमित होनी चाहिए. इसके लिए वह सरकारी खर्चों में कटौती पर जोर देता है. उसका मानना है कि अगर सरकार का राजकोषीय घाटा अधिक होगा तो वह बाजार से कर्ज उगाहने उतारेगी और प्रतिस्पर्द्धा में निजी क्षेत्र को बाहर कर देगी. इससे ब्याज दरों पर भी दबाव बढ़ेगा.

लेकिन यह नव उदारवादी आर्थिक सैद्धांतिकी है जिसकी असलियत हालिया वैश्विक मंदी के दौरान खुलकर सामने आ चुकी है. इसके बावजूद भारत में अर्थव्यवस्था के मैनेजर अभी भी इस सैद्धांतिकी से चिपके हुए हैं. कहते हैं कि आदतें बहुत मुश्किल से छूटती हैं. नव उदारवादी आर्थिक सैद्धांतिकी के पैरोकारों पर भी यह बात लागू होती है.

दोहराने की जरूरत नहीं है कि राजकोषीय घाटे को काबू में करने के आब्शेसन के कारण वित्त मंत्री ने राजनीतिक और आर्थिक रूप से अर्थव्यवस्था को एक नई दिशा देने और प्राथमिकताओं में बदलाव का एक बड़ा मौका गंवा दिया है. अगर वह चाहते तो अर्थव्यवस्था की मौजूदा बेहतर स्थिति का लाभ उठाकर अधिक से अधिक संसाधन जुटाते और उसे कृषि और सामाजिक क्षेत्र पर खर्च करके एक नई शुरुआत कर सकते थे.

असल में,मुद्दा यह है कि अर्थव्यवस्था की तेज विकास दर का फायदा आम आदमी को नहीं मिल रहा है. तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था से रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और कृषि क्षेत्र में कोई बड़ा बदलाव नहीं आ रहा है.

किसी भी विकासशील अर्थव्यवस्था में राजकोषीय घाटा आम बात है. राजकोषीय घाटा अपने आप में कोई बुराई नहीं है.अगर सरकार संसाधनों को सही जगह पर और सही तरीके से खर्च करे तो राजकोषीय घाटा अर्थव्यवस्था को ज्यादा गति देता है और लोगों को उसका लाभ भी पहुंचा पाता है. ऐसा नहीं है कि वित्त मंत्री यह नहीं जानते हैं. उन्हें राजकोषीय घाटे के लाभों का पता है.

लेकिन उनकी मुश्किल यह है कि उन्हें बड़ी देशी-विदेशी पूंजी को खुश करना है क्योंकि अर्थव्यवस्था की ड्राइविंग सीट उनके हाथों में चली गई है.पिछले दो दशकों में हर वित्त मंत्री की यह एक आर्थिक मजबूरी बन गई है. जाहिर है कि प्रणब मुखर्जी भी इसके अपवाद नहीं हैं.


'राष्ट्रीय सहारा'  से  साभार  

धमाकों की नए सिरे से जांच हो



संजरपुर/ आज़मगढ़. आज़मगढ़ के निर्दोष मुस्लिम नौजवान ही नहीं सरकारी मशीनरी  के निशाने पर छत्तीसगढ़ के ग़रीब आदिवासी भी हैं। वहां पर 650गांवों जलाकर आदिवासियों को बेघर कर दिया गया। सैकड़ों की संख्या में लोग लापता हैं। मानवाधिकार आयोग जैसी संस्थाएं कहां हैं?नए हिन्दुस्तान की लड़ाई छत्तीसगढ़ के आदिवासियों और संजरपूर के निर्दोष नौजवानों को मिलकर लड़नी है।”ये बातें वरिष्ठ मानवाधिकार नेता हिमांशु कुमार ने संजरपूर में आयोजित विशाल राष्ट्रीय मानवाधिकार जनसम्मेलन में कही।

दिल्ली से आई मानवाधिकार नेता शबनम हाशमी ने जांच एजेंसियों की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि मालेगांव, समझौता एक्सप्रेस, मक्का मस्जिद में विस्फोट करने वाले असीमानंद और सुनील जोशी का योगी आदित्यनाथ के साथ गहरा संबंध उजागर हुआ है,बावजूद इसके आजतक योगी को गिरफ्तार करना तो दूर पूछताछ तक भी नहीं की गई।


संजरपुर में मानवाधिकार : संबोधित करती शबनम हाशमी
पीयूसीएल के राष्ट्रीय सचिव चितरंजन सिंह ने कहा कि देश में हुए तमाम धमाकों की नए सिरे से जांच की जाए। उन्होंने संघ परिवार और उसकी फासिस्ट विचारधारा की न्यायपालिका तक में घुसपैठ पर चिंता जताते हुए न्यायपालिका में धर्मनिरपेक्ष मुल्यों की पुनर्बहाली की मांग की। लखनउ के वरिष्ठ वकील मो.शोएब ने भाजपा के बजाए कांग्रेस, सपा और बसपा को ज़्यादा खतरनाक बताते हुए कहा कि ये पार्टियां भाजपा की दूसरे नंबर की टीम हैं,जो सेकुलर चेहरे के साथ संघ परिवार के एजेन्डे को बढ़ा रही हैं।

मुंबई से आए मानवाधिकार नेता फिरोज़ मिठीबोलवाला ने भारत सरकार के अमेरिका और इजराईल के साथ बढ़ते नापाक रिश्ते को भारत में बढ़ती आतंकी घटनाओं और निर्दोष मुस्लिम नौजवानों की गिरफ्तारी की वजह बताया। वहीं अयोध्या से आए महंत युगल किशोर शरण शास्त्री ने कचहरियों पर हुए कथित हमलों पर सवाल उठाते हुए कहा कि फैजाबाद कचहरी में हुआ विस्फोट भाजपा नेता विश्वनाथ सिंह और महेश पाण्डे की चौकियों पर हुए थे और वो दोनों हादसे के वक़्त गायब थे। उन्होंने कचहरी विस्फोटों में सुनवाही कर रहे न्यायाधिशों के साम्प्रदायिक रवैये का भी ज़िक्र किया।

आर.टी.आई.कार्यकर्ता अफ़रोज़ आलम साहिल जिन्होंने बाटला हाउस फर्जी मुठभेड़ में मारे गए युवकों के पोस्टमार्टम रिपोर्ट को निकलवाया था,ने सूचना के अधिकार कानून पर सवाल उठाते हुए कहा कि इसमें भी साम्प्रदायिक कारणों से रिपोर्टों को लटकाया जाता है। कार्यक्रम की अध्यक्षता हरमन्दिर पाण्डे ने किया। संचालन पीयूसीएल प्रदेश उपमंत्री मसीहुद्दीन संजरी ने किया।

कार्यक्रम में 12सूत्रीय प्रस्ताव भी पारित किया गया। कार्यक्रम में तारिक़ शफ़िक़,महासागर गौतम,बलवंत यादव, अब्दुल्लाह, आफताब अहमद, सालीम दाउदी, जितेन्द्र हरि पाण्डेय, सुनील, गुलाम अम्बिया, फहीम अहमद प्रधान, वसीउद्दीन, रवि शेखर, विजय प्रताप, शाहनवाज आलम, राजीव यादव, गुंजन, बबली, अंशुमाला आदि मौजूद रहे। इस सम्मेलन में शमीम अख्तर संजरी की पुस्तक ‘लहू-लहू’ और तीन पुस्तकों सहित डॉक्यूमेंट्री फिल्म भगवा युद्ध का विमोचन किया गया।








काली कमाई के सरगनाओं में अहमद पटेल और देशमुख भी



विदेशों में काला धन जमा करने वालों में बड़े उद्योगपति ही नहीं,कई शीर्ष नेता भी हैं। केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री विलासराव देशमुख और वरिष्ठ कांग्रेसी नेता अहमद पटेल उन नेताओं में शामिल हैं...



विदेशों में जमा काले धन को स्वदेश वापस लाने और भ्रष्टाचार के खिलाफ रामलीला मैदान में आयोजित रैली में पूर्व आयकर आयुक्त विश्वबंधु गुप्ता ने कहा कि   ‘गृह मंत्री पी.चिदंबरम विदेशी बैंक में ‘दाऊद’ कंपनी के करीबी हसन अली द्वारा एक लाख करोड़ रुपए जमा कराने के मुद्दे पर कार्रवाई करने वाले थे। लेकिन वे इसलिए चुप हो गए क्योंकि उनकी पार्टी के दो लोगों के नाम काला धन जमा करने वालों की सूची में उजागर हो गए।’


भ्रष्टाचार और कालेधन के खिलाफ राष्ट्रव्यापी अभियान के मुखिया बाबा रामदेव ने भ्रष्टाचार की  पांच वजहें बतायीं.  पहला  90फीसदी बड़े नोट छापे जा रहे हैं, दूसरा  एक लाख से ज्यादा लोग अवैध खनन कर रहे हैं, तीसरा  विकास योजनाओं के धन में बड़े पैमाने पर हो रही है चोरी, चौथा  संवैधानिक पदों पर बैठे लोग रिश्वतखोरी को बढ़ावा दे रहे हैं और टैक्स की चोरी के लिए लोग विदेशों में धन जमा कर रहे हैं।

स्वामी दयानंद सरस्वती के जन्मदिवस और शहीद चंद्रशेखर आजाद के बलिदान दिवस के अवसर पर योग गुरू स्वामी रामदेव के भारत स्वाभिमान ट्रस्ट द्वारा यह रैली आयोजित की गई थी। भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान चलाएंगे रामदेव रैली में बाबा रामदेव ने घोषणा की कि वह लोगों को योग सिखाने के अलावा देश से भ्रष्टाचार को खत्म करने का भी अभियान चलाएंगे। उन्होंने कहा कि नेताओं को भ्रष्टाचार से मुक्त करने के लिए अनुलोम-विलोम जैसे योग सिखाना
होगा।


भ्रष्टाचार रोकने के पांच उपाय


कठोर कानून बनाया जाए व बड़े नोटों को वापस लिया जाए।
यूनाइटेड नेशंस कन्वेंशन अगेंस्ट करप्शन संधि (2006 से लंबित) का अनुमोदन हो।मॉरिशस रूट को बंद किया जाए।
काला धन जमा करने वाले विदेशी बैंकों पर प्रतिबंध लगे।
फॉरेन एकाउंट पॉलिसी की तुरंत घोषणा की जाए।


रैली में समाज सुधारक अन्ना हजारे, वरिष्ठ वकील राम जेठमलानी, राजनेतासुब्रमण्यम स्वामी, चिंतक गोविंदाचार्य, पूर्व आईपीएस किरन बेदी, आरटीआई कार्यकर्ता अरविंद केजरीवाल, ऑल इंडिया उलेमा काउंसिल के अध्यक्ष मौलाना मकसूद हसन कासमी,स्वामी अग्निवेश जैसी हस्तियां उपस्थित थीं। वक्ताओं ने भ्रष्टाचार और कालेधन की समस्या के पांच कारण और इन्हें दूर करने के पांच सुझाव भी बताए।

रैली के बाद एक ज्ञापन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील को सौंपा गया। इसमें भ्रष्टाचार से मुकाबले के लिए कठोर कानून बनाने की मांग की गई। ट्रस्ट के एक सदस्य के मुताबिक ज्ञापन में 30 लाख लोगों ने हस्ताक्षर किए हैं।




मध्य-पूर्व एशियाई देशों में मचा कोहराम तथा भारत



लीबिया के गृहमंत्री ने गद्दाफी का साथ छोड़ दिया है। सेना का एक बड़ा भाग गद्दाफी के विरुद्ध हो चुका है। शासकीय असहयोग,व्यापक जनविद्रोह तथा सत्ता से चिपके रहने की गद्दाफी की जि़द ने लीबिया में गृहयुद्ध छिडऩे जैसे हालात पैदा कर दिए हैं...


तनवीर जाफरी

मध्य-पूर्व एशिया के कई प्रमुख देश इस समय शासन व्यवस्था के परिर्वतन के लिए चल रहे जनआंदोलन के दौर से गुज़र रहे हैं। जागरूक हो चुकी आम जनता तानाशाहों, बादशाहों तथा सत्ता पर जबरन क़ाबिज़ हुक्मरानों को अब सिंहासन खाली करने की सलाह दे रही है। मिस्र और टयूनिशिया के हुक्मरानों ने जान बचाने की कीमत पर आखिरकार गद्दी छोड़ ही दी। दूसरी तरफ  लीबिया के विचित्र प्रवृति के तानाशाह कर्नल मोअ मार गद्दाफी ने अपनी अंतिम सांस तक सत्ता से चिपके रहने का संकल्प लिया है।

इस जनविरोधी आकांक्षा को अमल में लाने के लिए यदि लीबिया को बरबादी के मुहाने तक भी ले जाना पड़ा तो शायद उन्हें कोई आपत्ति नहीं होगी। यही वजह है कि हुक्मरानी के आखिरी क्षण गिन रहे गद्दाफी ने अपने समर्थकों से यह अपील की है कि वे ''विद्रोहियों को कुचल डालें,काकरोच की तरह उन्हें मसल डालें,उनपर हमले किए जाएं तथा उनकी पहचान कर उन्हें घरों से बाहर निकाल उनका दमन किया जाए।''

 कल्पना कीजिए कि जिस तानाशाह के सिंहासन के नीचे की ज़मीन खिसक रही हो और ऐसे संकटकालीन समय में वह इस प्रकार के आक्रामक तेवर दिखा सकता है तो समझा जा सकता है कि सत्ता पर अपनी मज़बूत पकड़ रखते हुए गद्दाफी जैसा शासक अपने विरोधियों तथा आलोचकों का क्या हश्र करता रहा होगा। बड़े आश्चर्य की बात है कि ऐसे तानाशाह शासक चंद दिनों पहले हुआ इराकी तानाशाह सद्दाम हुसैन का हश्र इतनी जल्दी भूल जाते हैं।

बहरहाल,गद्दाफी के इस आक्रामक आह्वान का लीबिया की जनता पर थोड़ा बहुत असर तो ज़रूर पड़ रहा है। वह गद्दाफी समर्थक सेना और पुलिस द्वारा बरती जा रही हिंसा का शिकार भी हो रही है। चूंकि अब गद्दाफी के ज़ुल्मो-सितम ने अपनी सभी हदें पार कर दी हैं लिहाज़ा धीरे-धीरे वह सभी लोग उसका साथ छोड़कर विद्रोहियों के पक्ष में खड़े हो रहे हैं जिनके समक्ष गद्दाफी बेनकाब हो चुके हैं।

लीबिया के गृहमंत्री ने गद्दाफी का साथ छोड़ दिया है। कई मंत्री साथ छोडऩे वाले हैं। सेना का एक बड़ा भाग गद्दाफी के विरुद्ध हो चुका है। आधा दर्जन से अधिक लीबियाई राजदूतों व तमाम राजनयिकों ने भी उसका साथ छोड़ दिया है। शासकीय असहयोग,व्यापक जनविद्रोह तथा सत्ता से चिपके रहने की गद्दाफी की जि़द ने लीबिया में गृहयुद्ध छिडऩे जैसे हालात पैदा कर दिए हैं।

इसमें कोई दो राय नहीं कि यदि गद्दाफी आसानी से गद्दी नहीं छोड़ते तथा गद्दी से चिपके रहने की अपनी जि़द पर अड़े रहते हैं तो देश में भारी नरसंहार भी हो सकता है। अमेरिका सहित कई पश्चिमी देशों की नज़रें लीबिया में हो रही उथल-पुथल पर लगी हुई हैं। मध्य-पूर्व एशियाई देशों में चल रही व्यवस्था परिवर्तन की इस बयार के चलते कच्चे तेल की कीमतों में भी भारी इज़ाफा होने की संभावना है।

व्यवस्था परिवर्तन किए जाने के पक्ष में फैला यह जनाक्रोश मुस्लिम बाहुल्य देशों तक ही सीमित है। विद्रोह की इस लहर को अलग-अलग नज़रिए से देखा जा रहा है। कहीं अल्पसंख्यक सुन्नी समुदाय के तानाशाह के विरुद्ध बहुसंख्यक शिया समुदाय विद्रोह पर आमादा हो गया है तो कहीं अमेरिकी पिट्ठू शासक के विरुद्ध जनता का गुस्सा फूट पड़ा है। कई देशों के लोग अपने निरंकुश, निष्क्रिय,भ्रष्ट तथा विकास की अनदेखी करने वाले तानाशाह से रुष्ट हैं तो कहीं राजशाही को ठेंगा दिखाकर जनता-जनार्दन प्रजातंत्र लागू करना चाह रही है।

 मध्य-पूर्व एशियाई देशों के जनता की अलग-अलग प्रकार की समस्याएं हैं। कई सदियों से यह धारणा बनी हुई थी या इस्लाम विरोधी ताकतों ने इस बात को आम धारणा का रूप दे डाला था कि इस्लाम धर्म के मानने वाले बादशाहत या तानाशाही को ही पसंद करते हैं। इस प्रकार का दुष्प्रचार करने वालों को भी मध्य-पूर्व एशियाई देशों में फैली इस ताज़ातरीन जनक्रांति की लहर ने माकूल जवाब दे दिया है। इस क्रांति ने साबित कर दिया है कि मुस्लिम समाज का मिज़ाज न केवल लोकतांत्रिक है, बल्कि अहिंसक भी है।

 इस भारी जनाक्रोश के बीच भारत जैसे विशाल देश के तमाम राजनीतिक विश्लेषक इस विषय पर चिंतन-मंथन करने लगे हैं कि क्या यहाँ भी उसी प्रकार के हालात पैदा हो सकते हैं? ये कयास लगाए जाने का कारण केवल यही है कि देश के आमजन आज़ादी के 64 वर्षों बाद भी भयंकर गरीबी, बेरोज़गारी, अशिक्षा, भ्रष्टाचार, घपलों व घोटालों के शिकार हैं।

माओवाद तथा नक्सलवाद जैसी समस्या बहुत तेज़ी से भारत में अपनी जड़ें गहरी करती जा रही है। इसका कारण भी बढ़ती गरीबी, भूख, बेरोज़गारी तथा शासन व्यवस्था का इन ज़मीनी हकीकतों की तरफ से मुंह मोड़े रखना है। देश की आम जनता भारतीय शासन व्यवस्था की उदासीनता तथा निष्क्रियता के चलते त्राहि-त्राहि कर रही है।

देश के कई हिस्सों में कर्जदार किसानों द्वारा आत्महत्या किए जाने के समाचार प्राप्त हो रहे हैं। गरीब आज भी भूख के चलते दम तोड़ देता है। देश में सर्वोच्च समझी जाने वाली भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी  की कहीं भ्रष्टाचारियों द्वारा गोली मारकर तो कहीं जिन्दा   जलाकर हत्या की जा रही है तो कहीं माओवादियों द्वारा उनका अपहरण किए जाने के समाचार प्राप्त हो रहे हैं। भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर विपक्षी दल संसद की कार्रवाई को बाधित करते हैं। मंहगाई इस समय अपने चरम पर है। राजनेता जनता के मध्य अपनी विश्वसनीयता खोते जा रहे हैं।

भारत में चारों ओर ऐसा वातावरण बनता जा रहा है कि आम लोगों का वर्तमान राजनैतिक दलों, राजनेताओं तथा  राजनीतिक व्यवस्था से विश्वास ही उठ रहा  है। आम आदमी को यह कहते सुना जा सकता है कि इस देश में कानून और न्याय का डंडा केवल गरीबों पर ही चलता है,जबकि संपन्न लोग इन सबसे ऊपर या इनसे निपटने में सक्षम नज़र आते हैं।  प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह स्वयं इस आशय की स्वीकारोक्ति कर भी चुके हैं।

पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम भी यह महसूस कर चुके हैं कि भारतीय जनमानस के चेहरों पर मुस्कुराहट नहीं, बल्कि मायूसी के भाव नज़र आते हैं। ऐसे में यदि कुछ विश्लेषक इस बात की चिंता ज़ाहिर करें कि कहीं मध्य-पूर्व एशियाई देशों अर्थात् मिस्र, टयूनिशिया, लीबिया, यमन जैसे हालात कहीं यहाँ भी पैदा न हो जाएँ तो इसमें बिलकुल भी आश्चर्य नहीं होना चाहिए। नि:संदेह यहाँ की जनता के भीतर भी व्यवस्था को लेकर तथा अपने और अपने परिवार के भविष्य को लेकर उतना ही गुस्सा व चिंता व्याप्त है जितनी कि कई मध्य-पूर्व एशियाई देशों में देखी जा रही है। बावजूद इसके कि हमारा देश विश्व का सबसे बड़ा एवं सफल लोकतांत्रिक देश माना जाता है।

भला हो हमारे संविधान निर्माताओं का जिन्होंने देश की राजनैतिक प्रणाली तथा भारतीय संविधान के साथ राजनैतिक व्यवस्था के समन्वय का ऐसा ताना-बाना रचा है जिसके परिणामस्वरूप राजनैतिक तौर पर पूरे देश की जनता एक-दो नहीं बल्कि सैकड़ों राजनैतिक दलों,विचारधाराओं, वर्गों, क्षेत्रों आदि में विभाजित हो गई है। भारतीय सेना के गठन का ढांचा भी कुछ ऐसा ही पेंचीदा  है कि हमारे शासक सेना के अनुशासन और इसके वर्गीकरण का पूरा लाभ उठाते हुए सेना की ओर से पूरी तरह बेफ़िक्र रहकर अपना राजपाट चला सकते हैं।

दूसरी तरफ लोकतंत्र की ज़मीनी हकीकतों पर पर्दा डालते हुए हमारे शासक दुनिया को बार-बार यह बता कर अपनी पीठ स्वयं भी थपथपाते रहते हैं कि हमारा देश दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे आदर्श लोकतंत्र है। इन शासकों तथा वर्तमान शासन व्यवस्था के जिम्मेदार लोगों को इस वास्तविकता की अनदेखी हरगिज़ नहीं करनी चाहिए कि मनुष्य सबकुछ एक सीमा तक सहन कर सकता है। भय, भूख, गरीबी तथा अपने बच्चों के भविष्य के प्रति अनिश्चितता का वातावरण जागरुक समाज अधिक दिनों तक सहन नहीं कर सकता।

यदि भारत के विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र होने का भ्रम दुनिया में बनाए रखना है तो आम लोगों की आम ज़रूरतों तथा उनकी आम परेशानियों से यथाशीघ्र रूबरू होना तथा उनका समाधान करना ही होगा। अन्यथा परिवर्तन की यह बयार कब किस देश की व्यवस्था की चूलें हिला बैठे,कुछ नहीं कहा जा सकता।




लेखक हरियाणा साहित्य अकादमी के भूतपूर्व सदस्य और राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मसलों के प्रखर टिप्पणीकार हैं.उनसे tanveerjafri1@gmail.comपर संपर्क किया जा सकता है.



 
 
 
 

Feb 27, 2011

दर्द की सांद्रता गाढ़ी है



 अंजनी कुमार

कहते हैं समय की मार बड़ी होती है
इस समय तो सरकार की मार बड़ी भारी है
दोनों के मिलने से दर्द की सांद्रता गाढ़ी है
अपना होना ही अब भारी है।।

लोग जानते हैं सरकार को खूब
मार करती सरकार को इंकार बर्दास्त  नहीं है
वह रोज ही भेज रहा हैं निर्णय
रोज ही पहुंचा देता है डाकिया
हमारे हिस्से का परवाना
और हिदायतें
और उस घूरती आंख का खतरनाक इशारा
और, और भी बहुत कुछ
समय धरता रहता है गिरेबान जब तब
कई कई रात नींद आंख में उतरती नहीं है।।

यह अपने समय की सरकार है
और यह सरकार का समय है
इतिहास की सूरत में यह एक दौर है
जहां हां पर चमकता हुआ सिर है
और ना पर उधड़ी हुई लावारिस लाश  है
जहां रोजमर्रा जिंदगी
बूट की नोक पर उछलते हुए चल रही है
जम्हूरियत जन की पीठ पर लदी हुई है
और राज चंद लोगों की जगीर है
इस निश्कर्श पर जन की हामी है
जनतंत्र कभी हंसी है, कभी गाली है।।

सच है कि सच की चमक से चिलकती है आंख
सवाल की नोक से उमड़ता है दर्द का लावा
जैसे अड़ियल दरख्त के खोखड़ में सुलग रहा हो आग
ऐसे ही सुलग रही है जमाने की छाती
सच है कि यह गुलामी का दौर नहीं है
जमाना बदला है बहुत कुछ
उसकी सलवटें अभी बाकी हैं
जम्हूरियत शब्द अभी बाकी है
पाठ कुपाठ, अर्थ अनर्थ जारी है
कुछ कहते हैं कि अब बंदूक की बारी है।।




राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार .फिलहाल मजदूर आन्दोलन पर कुछ जरुरी लेखन में व्यस्त.उनसे abc.anjani@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.








Feb 25, 2011

लेखक व पत्रकार अनिल सिन्हा नहीं रहे



जाने माने लेखक व पत्रकार अनिल सिन्हा नहीं रहे। 25 फरवरी को दिन के 12 बजे पटना के मगध अस्पताल में उनका निधन हुआ। 22 फरवरी को जब वे दिल्ली से पटना आ रहे थे, ट्रेन में ही उन्हें ब्रेन स्ट्रोक हुआ। उन्हें पटना के मगध अस्पताल में अचेतावस्था में भर्ती कराया गया। तीन दिनों तक जीवन और मौत से जूझते हुए अखिरकार आज उन्होंने अन्तिम सांस ली। उनका अन्तिम संस्कार पटना में ही होगा।


 उनके निधन की खबर से पटना, लखनऊ, दिल्ली, इलाहाबाद आदि सहित जमाम जगहों में लेखको, संस्कृतिकर्मियों के बीच दुख की लहर फैल गई। जन संस्कृति मंच ने उनके निधन पर गहरा दुख प्रकट किया है। उनके निधन को जन सांस्कृतिक आंदोलन के लिए एक बड़ी क्षति बताया है।

ज्ञात हो कि अनिल सिन्हा एक जुझारू व प्रतिबद्ध लेखक व पत्रकार रहे हैं। उनका जन्म 11 जनवरी 1942 को जहानाबाद, गया, बिहार में हुआ। उन्होंने पटना विश्वविद्दालय से 1962 में एम. ए. हिन्दी में उतीर्ण किया। विश्वविद्दालय की राजनीति और चाटुकारिता के विरोध में उन्होंने अपना पी एच डी बीच में ही छोड़ दिया। उन्होंने कई तरह के काम किये।

 प्रूफ रीडिंग, प्राध्यापिकी, विभिन्न सामाजिक विशयों पर शोध जैसे कार्य किये। 70 के दशक में उन्होंने पटना से ‘विनिमय’साहित्यिक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया जो उस दौर की अत्यन्त चर्चित पत्रिका थी। आर्यवर्त,आज,ज्योत्स्ना, जन,दिनमान से वे जुड़े रहे। 1980में जब लखनऊ से अमृत प्रभात निकलना शुरू हुआ उन्होंने इस अखबार में काम किया। अमृत प्रभात लखनऊ में बन्द होने के बाद में वे नवभारत टाइम्स में आ गये। दैनिक जागरण,रीवाँ के भी वे स्थानीय संपादक रहे। लेकिन वैचारिक मतभेद की वजह से उन्होंने वह अखबार छोड़ दिया।

अनिल सिन्हा बेहतर,मानवोचित दुनिया की उम्मीद के लिए निरन्तर संघर्ष  में अटूट विश्वास रखने वाले रचनाकार रहे हैं। वे मानते रहे हैं कि एक रचनाकार का काम हमेषा एक बेहतर समाज का निर्माण करना है,उसके लिए संघर्श करना है। उनका लेखन इस ध्येय को समर्पित है।

 वे जन संस्कृति मंच के संस्थापकों में थे। वे उसकी राष्ट्रीय परिषद के सदस्य थे। वे जन संस्कृति मंच उत्तर  प्रदेश के पहले सचिव थे। वे क्रान्तिकारी वामपंथ की धारा तथा भाकपा माले  से भी जुड़े थे। इंडियन पीपुल्स फ्रंट जैसे क्रान्तिकारी संगठन के गठन में भी उनकी भूमिका थी। इस राजनीति जुड़ाव ने उनकी वैचारिकी का निर्माण किया था।
कहानी, समीक्षा, अलोचना, कला समीक्षा, भेंट वार्ता, संस्मरण आदि कई क्षेत्रों में उन्होंने काम किया। ‘मठ’ नम से उनका कहानी संग्रह पिछले दिनों 2005 में भावना प्रकाषन से आया। पत्रकारिता पर उनकी महत्वपूर्ण पुस्तक ‘हिन्दी पत्रकारिता इतिहास,स्वरूप एवं संभावनाएँ’ प्रकाशित  हुई। पिछले दिनों उनके द्वारा अनुदित पुस्तक ‘सामा्राज्यवाद का विरोध और जतियों का उन्मुलन’छपकर आया थ। उनकी सैकड़ों रचनाएँ पत्र पत्रिकाओं में छपती रही है।


उनका रचना संसार बहुत बड़ा है,उससे भी बड़ी है उनको चाहने वालों की दुनिया। मृत्यु के अन्तिम दिनों तक वे अत्यन्त सक्रिय थे तथा 27फरवरी को लखनऊ में आयोजित,नागार्जुन व केदार जन्तषती आयोजन के वे मुख्य कर्मा.णर्ता थे।

उनके निधन पर शोक  प्रकट करने वालों में मैनेजर पाण्डेय, मंगलेश डबराल, वीरेन डंगवाल, आलोक धन्वा, प्रणय कृष्ण, रामजी राय, अशोक भैमिक, अजय सिंह, सुभाष चन्द्र कुशवाहा, राजेन्द्र कुमार, भगवान स्वरूप कटियार, राजेश कुमार, कौशल किशोर, गिरीश चन्द्र श्रीवास्तव, चन्द्रेश्वर, वीरेन्द्र यादव, दयाशंकर राय, वंदना मिश्र, राणा प्रताप, समकालीन लोकयुद्ध के संपादक बृजबिहारी पाण्डेय आदि रचनाकार प्रमुख हैं।

अपनी संवेदना प्रकट करते हुए जारी वक्तव्य में रचनाकारों ने कहा कि अनिल सिन्हा आत्मप्रचार से दूर ऐसे रचनाकार रहे हैं जो संघर्ष में यकीन करते थे। इनकी आलोचना में सृर्जनात्मकता और शालीनता दिखती है। ऐसे रचनाकार आज विरले मिलेंगे जिनमे इतनी वैचारिक प्रतिबद्धता और सृर्जनात्मकता हो। इनके निधन से लेखन और विचार की दुनिया ने एक अपना सच्चा व ईमानदार साथी खो दिया है।


Feb 24, 2011

विदेशों में जमा काला धन बनाम राजनीतिक हथकंडे


विदेशों में जमा काले धन के मुद्दे को लेकर भारत में मची हाय-तौबा की आड़ में तमाम नेता,राजनीतिक दल तथा राजनीति में पदार्पण करने की इच्छा पालने वाले कई नए चेहरे इस विषय पर कुछ ज्यादा ही दलीलें पेश कर रहे हैं...

 तनवीर जाफरी

भारतीय अर्थव्यवस्था,यहां व्याप्त गरीबी एवं  बेरोज़गारी,कायदे-कानून तथा अपनी ज़रूरत के लिए विदेशी बैंकों से समय-समय पर कर्ज लेते रहने जैसे हालात नि:संदेह किसी भी भारतीय को इस बात की इजाज़त नहीं देते कि वह अपने धन को देश के बजाए विदेशी बैंकों में जाकर जमा करे। वह भी केवल इसलिए कि उसने नाजायज़ और गलत तरीके से धन इकट्ठा  किया है। ऐसे लोग उस धन को दुनिया की नज़रों से सिर्फ इसलिए छुपाकर रखना चाहते हैं कि एक तो उनका धन सुरक्षित रह सके दूसरा,वह भारतीय वित्तीय कानूनों से बचे रह सकें और तीसरा,वह स्वयं को बदनामी से बचा सके।

पश्चिमी देशों के काला धन जमा करने वाले इन बैंकों में गोपनीयता बरकरार रखने के इतने ऊंचे पैमाने निर्धारित किए गए हैं कि अभी तक स्पष्ट रूप से किसी भी खातेदार का नाम और उसकी कुल जमाराशि का खुलासा नहीं हो पाया है। कल को विकीलीक्स जैसी वेबसाईट  या  खोजी पत्रकारिता के चलते कुछ नाम उजागर हो जाए तो यह अलग बात है। ऐसे बैंक 'काला धन'शब्द को भी अपने तरीके से परिभाषित करते हैं। भारत में पिछले कुछ महीनों से विदेशी बैंकों में जमा काले धन का मुद्दा बहुत गरमाया हुआ है। इससे ऐसा लगता है गोया इस विषय पर शोरगुल और हंगामा बरपाने  वालों को इस बात का पता चल चुका हो कि किस व्यक्ति का कितना धन किस देश के किस बैंक में जमा है।


इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत के आर्थिक हालात ऐसे नहीं हैं कि इस प्रकार के नकारात्मक आर्थिक वातावरण का सामना किया जा सके। इस विषय पर पूरी गंभीरता से काम किया जाना चाहिए तथा विदेशों में जमा काला धन यथाशीघ्र देश में वापस लाने के प्रयास करने चाहिए। इतना ही नहीं, ऐसे गैरकानूनी कामों में लिप्त लोगों को चाहे वह कितनी ही ऊंची हैसियत रखने वाले क्यों न हों उन्हें कानून के अनुसार सख्त सज़ा भी दी जानी चाहिए।

इनके नाम यथाशीघ्र उजागर किए जाने चाहिए, ताकि आम जनता यह समझ सके कि नेता, अभिनेता, अधिकारी, समाजसेवी या धर्मगुरु अथवा व्यापारी का लबादा ओढ़े हुए ये लोग वास्तव में वैसे नहीं है जैसे दिखाई देते हैं। साधु के भेष में छपे ये शैतान देश के  सबसे बड़े दुश्मन हैं। अवैध धन की जमाखोरी करने वाले यही वे लोग हैं जिनके कारण भारत को गरीब देश कहा जाने लगा है।

विदेशों में जमा काले धन के मुद्दे को लेकर भारत में मची हाय-तौबा की आड़ में तमाम नेता, राजनीतिक दल तथा राजनीति में पदार्पण करने की इच्छा पालने वाले कई नए चेहरे इस विषय पर कुछ ज्यादा ही दलीलें पेश कर रहे हैं। एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने की कोशिशें हो रही हैं। इससे विदेशों से  काला धन वापस लाने जैसा गंभीर मुद्दा मुख्य विषय से भटकता हुआ दिखाई देने लगा है। साफ ज़ाहिर होने लगा है कि इस मुद्दे को लेकर किए जाने वाले शोर-शराबे का मकसद विदेशों से काले धन की वापसी कम,राजनीतिक रूप से व्यक्ति विशेष या दल विशेष को बदनाम करना अधिक है।

अफवाह फ़ैलाने वाले लोग भलीभांति जानते हैं कि साधारण जनता अफवाहों पर जल्दी विश्वास कर लेती है। वर्ष 1986-1987 के मध्य का वह दौर राजनीतिज्ञों के लिए एक उदाहरण बन चुका है, जब स्वीडन की बोफोर्स तोप सौदे में कथित रूप से ली गई दलाली के मुद्दे पर केंद्र की तत्कालीन राजीव गांधी सरकार की चूलें हिल गई थीं। आरोप जडऩे तथा दूसरों को बदनाम करने में महारत रखने वाले तत्कालीन महारथियों ने राजीव गांधी, अमिताभ बच्चन, अजिताभ बच्चन सहित कई लोगों को अपने अनर्गल आरोपों के घेरे में ले लिया था। परिणामस्वरूप कांग्रेस को सत्ता से हाथ धोना पड़ा था। भारत में गठबंधन सरकार का दौर उसी दुर्भाग्यशाली समय से ही शुरू हुआ।

लग रहा है कि आगामी संसदीय चुनावों से पूर्व एक बार फिर परोपेगंडा महारथियों द्वारा देश में वैसे ही हालात पैदा करने की कोशिश की जा रही है। मुख्य विपक्षी भारतीय जनता पार्टी बार-बार न केवल केंद्र पर यह आरोप लगा रही है कि वह काला धन मुद्दे पर कोई कार्रवाई नहीं करना चाह रही है, बल्कि इस विषय में छानबीन के लिए उसने एक टॉस्क फोर्स का गठन भी किया है।


भाजपा की इस टॉस्क फोर्स ने दावा किया था कि पूर्व प्रधानमंत्री स्व.राजीव गांधी तथा कांग्रेस अध्यक्ष तथा यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गाँधी स्वयं विदेशों में काला धन जमा करने जैसे गंभीर और गैरकानूनी मामलों में लिप्त हैं। उनके कई विदेशी बैंकों में खाते हैं। यह टॉस्क फोर्स इस बात का पता करने का काम कर रही है कि किन-किन लोगों का किन-किन देशों के किन-किन बैंकों में कितना-कितना धन जमा है।

इस सिलसिले में अपना तथा स्व. राजीव गांधी का नाम लिए जाने पर सोनिया गाँधी ने भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी को पत्र लिखा तथा अपने और अपने परिवार के ऊपर भाजपाईयों द्वारा लगाए जाने वाले इन आरोपों पर कड़ी आपत्ति जताई। सोनिया ने आडवाणी को लिखे पत्र में स्पष्ट रूप से लिखा कि किसी भी विदेशी बैंक में उनका कोई खाता नहीं है। सोनिया के पत्र के जवाब में आडवाणी ने भी शिष्टाचार का परिचय देते हुए उन्हें जवाबी पत्र लिखकर इस बात के लिए खेद जताया कि ''इस मामले में आपके परिवार का जि़क्र किया गया, इसके लिए मुझे खेद है। गांधी परिवार की ओर से इस तरह की सफाई पहले दी गई होती तो अच्छा रहता।''

आडवाणी का सोनिया गांधी से माफी मांगना या भाजपा द्वारा उनके  विरुद्ध किए गए दुष्प्रचार के लिए खेद जताना तो निश्चित रूप से एक शिष्ट राजनीति का एक हिस्सा माना जा सकता है। शीर्ष नेताओं के बीच इस प्रकार की वार्ताओं, पत्रों और टेलीफोन पर होने वाली वार्ताओं की बातें कभी-कभी प्रकाश में आती रहती हैं। मगर बिना किसी ठोस प्रमाण, आधार या सूचना के इस प्रकार सोनिया गांधी, स्व. राजीव गांधी या किसी भी अन्य व्यक्ति को दुष्प्रचारित करना कहां की नैतिकता है। इसे किस प्रकार की राजनीति कहा जाना चहिए?



लेखक हरियाणा साहित्य अकादमी के भूतपूर्व सदस्य और राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मसलों के प्रखर टिप्पणीकार हैं.उनसे tanveerjafri1@gmail.comपर संपर्क किया जा सकता है.




Feb 23, 2011

डीएम के आदेश पर दीवार रंगती पुलिस



करोड़ों  रूपये खर्च कर सरकार  देश के नागरिकों को जागरूक करती है, लेकिन  उसी जागरूकता की जिम्मेदारी मुफ्त में निभाने की कोशिश की तो एक युवा  मुजरिम बन गया...


एक हैं राम प्रकाश। उन्हें गांव वाले सामाजिक रूप से एक जागरूक युवा मानते हैं। ऐसा इसलिए है कि राम प्रकाश अपने गांव और समाज की जरूरतों की फिक्र करते हैं। उसी फिक्र में राम प्रकाश ने अपने साथियों संग मिलकर गांव की समस्याओं को दीवारों पर लिख डाला जिससे कभी अधिकारी -मंत्री आयें तो उनकी सामने गांव की तस्वीर साफ रहे।

लेकिन जागरूकता की जिम्मेदारी निभाना उत्तर प्रदेश सरकार हरदोई जिले के जिलाधिकारी एके सिंह की निगाह में जुर्म है । जिलाधिकारी महोदय के इशारे पर जिले के पुलिस वाले रामप्रकाश की गिरफ्तारी और कुटाई के लिए लगातार संभावित जगहों पर दबीश दे रहे हैं।

राम प्रकाश के नेतृत्व में हुआ दीवार लेखन उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले के जिलाधिकारी एके सिंह के लिए निगाह में जुर्म इसलिए दिखा क्योंकि इसके रहते जिलाधिकारी जनता के अपराधी माने जाते।

दरअसल जिस गांव में जनससमयाओं को लेकर दीवार लेखन किया गया था उस गांव में अगले कुछ दिनों में प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती दौरे पर आनेवाली थीं। उससे पहले इलाके में जिलाधिकारी एके सिंह के मनमाफिक सब हो रहा है या नहीं उसे 22 फरवरी को देखने क्षेत्र में दौरे पर आये। उसमें एक गांव लाला मऊ मवई भी था। वहां पहुंच कर डीएम साहब  की निगाहें उन नारों पर पड़ी जो गांव में जारी अव्यवस्था और मांगों पर सुनवाई न होने को लेकर थीं।


इसमें मुख्य मांग प्राथमिक विद्यालय की अपूर्ण दीवार को पूरा करने की थी। इसके अलावा एक स्वास्थ्य उप-केन्द्र के स्वीकृत की भी चर्चा थी जिसे ईंट भट्ठा मालिक अमित सिंह गांव जखसरा में बनवाना चाहते हैं जबकि गांव वाले लाला मऊ बनवाना चाहते हैं। तीसरी मांग के तौर पर पास में बहने वाली नहर के पानी को गांव में लाने के लिए नहर पर एक झाल बनवाने की बात दीवारों पर लिखी गयी थी।

इन मांगों को लिखा देख जिलाधिकारी काफी नाराज हुए। अपनी नाराजगी की अभिव्यक्ति उन्होंने पुलिस को राम प्रकाश को गिरफ्तार करने के आदेश के रूप में की। अब पुलिस राम प्रकाष को खोज रही है और राम प्रकाष भागे-भागे फिर रहें हैं। 23 फरवरी की शाम तक पुलिस राम प्रकाश  के घर पर थी और दीवारों  को लिखी मांगों को मिटा रही थी।

समाज के अंतिम आदमी की मजबूती की बात करने वाली मायावती सरकार में ऐसा गैरलोकतांत्रिक व्यवहार ना जाहिर करता है कि प्रषासन लोगों मांगों को ताकत के बल पर दबाना चाहता है। हालत यह है कि जिलाधिकारी महोदय को बचाने के लिए पुलिस गांव वालों को आतंकित कर रही है।

जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय से जुड़े और मैग्ससे पुरस्कार विजेता संदीप पाण्डेय कहते हैं कि    यदि जिला प्रशासन   ने लोगों की मांगों पर पहले ध्यान दिया होता तथा उनको सुलझाने की कोशिश की होती तो आज यह नौबत न आती कि लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों का दमन करने के लिए पुलिस का सहारा लेना पड़ता।




Feb 22, 2011

एक बदचलन की मौत !

एक आटो आकर रुका। उसमें से दो औरतें उतरीं। आगे वाली औरत उतरते ही छाती पीटते हुए गला फाड़ रोने लगी। आवाज लोगों के घरों तक पहुंची तो सभी घरों की बालकनी बच्चों और महिलाओं से भर गयी...

अजय प्रकाश

परसों की बात है। दिन के करीब दस बज रहे थे। दुबारा लौट आयी ठंड के बाद मेरी हिम्मत ठंडे पानी से नहाने की नहीं हुई तो सोचा क्यों न धूप में खड़े होकर थोड़ा गरम हो लिया जाये। धूप की गरमी से अगर हिम्मत बंध गयी तो नहा लूंगा,नहीं तो कंपनियों ने महकने का इंतजाम तो कर ही रखा है। यह सोचकर मैं बालकनी से लगकर सड़क की हरियाली देखने लगा।

तभी एक आटो आकर रुका। उसमें से दो औरतें उतरीं। आगे वाली औरत उतरते ही छाती पीटते हुए गला फाड़ रोने लगी। आवाज लोगों के घरों तक पहुंची तो सेकेंडो में सभी घरों की बालकनी बच्चों और महिलाओं से भर गयी। काम पर नहीं गये कुछ मेरे जैसे मर्द भी झांकने लगे। जिनके कमरे नीचे के फ्लोर में थे वो रोने वाली के आसपास मंडराने लगे। मेरी मां से नहीं रहा गया तो वह नीचे मौका-मुआयना करने के लिए चल दी। मां के नीचे जाते देख बीबी ने पूछा, कहां जा रही हैं?

मां जवाब दिये बगैर चलते बनी तो सामने से पड़ोसी की बीबी ने कहा,‘देहात से आयी हैं,इसलिए वो तो जाये बिना नहीं मानेंगी। मेरी सास भी ऐसी ही हैं।’इस बीच दहाड़ मारती औरत आटो से आगे बढ़ते हुए अपने कमरे की ओर चिल्लाते हुए चल पड़ी,‘अरे हमार बछिया कौन गति भईल तोहार (ओह,मेरी बेटी तेरा क्या हाल हुआ)।'

मेरी बीबी ने उसकी आवाज सुन मुझसे कहा जरा सुनना तो क्या कह रही है भोजपुरी में। मैं अभी कुछ कहता उससे पहले ही कोने वाली मकान मालकिन अपनी बालकनी से बोल पड़ी, ‘बिहार की हैं- छपरा की।’ फिर मैंने कहा, ‘उसकी बेटी को कुछ हुआ है।’

अब उस औरत के रोने-घिघियाने की आवाज शब्दों में बदल चुकी थी। सड़क से ग्राउंड फ्लोर और ग्राउंड फ्लोर से फर्स्ट  फ्लोर होते हुए हमतक बड़ी जानकारी ये आयी कि रोने वाली औरत की बेटी की लाश चार दिन से किसी सरकारी हॉस्पीटल में पड़ी है। बड़ी जानकारी मिलते ही क्यों...क्यों...क्यों, की आवाज तमाम बालकनियों और फ्लोरों पर गूंजने लगी।

अबकी बड़ी जानकारी का विस्तार आया। वह इस प्रकार से कि रोने वाली औरत की मरने के बाद सड़ रही बेटी चार बच्चों की मां है और वह गली की चौथी मकान में बाएं  तरफ किराये पर रहती है। इसी मकान में रहते हुए एक सप्ताह पहले बीमार हुई तो किसी ने ले जाकर सरकारी अस्पताल में भर्ती करा दिया था और मरने के बाद वहीं पड़ी है।

इसके बाद यह सवाल उठा कि क्या वह औरत अकेले ही अस्पताल गयी थी। इस सवाल पर जवाब मिला,‘नहीं। बीमारी की हालत में औरत ने किसी को फोन कर बुलाया था और वही उसे अस्पताल ले गया था। मगर ईलाज के दौरान औरत मर गयी तो वह छोड़कर भाग गया। तबसे लाश अस्पताल में ही पड़ी है।

मृत औरत का कोई खोज-खबर रखने वाला नहीं आया तो अगले दिन अस्पताल प्रशासन ने पुलिस को सूचना दी। मौके पर पहुंची पुलिस ने खोजबीन में औरत के पास से मिले कागज पर लिखे मोबाइल नंबर को मिलाया। पता चला मोबाइल नंबर मृत महिला के पति का है और वह बिहार के छपरा जिला के किसी ब्लॉक का रहने वाला है।


अब बालकनी पर खड़े मुझ जैसे दुखितों का इंट्रेस्ट सस्पेंस में था कि चार बच्चों की मां,ऊपर से बीमार और चार दिन से अस्पताल में पड़ी सड़ रही और पति यहां से हजार-बारह सौ किलोमीटर दूर पड़ा। आखिर माजरा क्या है? तो अब माजरे की पुख्ता जानकारी कुछ इस प्रकार से पसरी- दरअसल जो आदमी उसे अस्पताल में भरती कराने ले गया था वह उसका तीसरा और अंतिम पति था। इससे पहले वह करीब तीन साल एक पंजाबी के साथ रही थी,जबकि शादी उसकी छपरा वाले से हुई थी जो अब उसके मरने के बाद उसकी मां को लेकर दिल्ली आया था।


यह विशेष जानकारी नीचे वाली चाची ने दिया। बकौल चाची- थोड़े दिन पहले एक पंजाबी बैग लेकर आया था और उनसे कह रहा था कि वह अपना बच्चा लेने आया है। उसने चाची को यह भी बताया कि चैथे नंबर का बच्चा उसी का है और सिर्फ वह उसी को ले जाने आया है। पंजाबी से ही चाची को पता चला था कि चार बच्चों की मां बीमार है और अस्पताल में भर्ती है।

तभी किसी महिला ने चाची से पूछ लिया,‘यानी उसे जो अस्पताल ले गया था वह न पंजाबी था न बिहारी। फिर वह कौन था।’इसका जवाब एक दूसरी महिला ने दिया जिसके होंठ खूनी आत्माओं की तरह टहटह लाल हो रहे थे, - अरे वह एक मुसलमान था जिसके साथ वह पिछले कुछ महीनों से रह रही थी।

इसके बाद बालकनी दुखितों ने हां-हूं करते हुए उस औरत के अस्पताल में सड़ने को भगवान का जायज फैसला माना और औरत की मौत को एक बदचलन की मौत करार दिया। हालांकि उसे जानने वाली एक औरत ने ऐसा कहने पर ऐतराज जताया। कहा भी अगर वह दूसरी-तीसरी शादी नहीं करती तो उसके चार बच्चों की लाश यहां भूख से पड़ी रहती। वह तो मुसलमान ही था जो इन बच्चों का पेट पाल रहा था। इससे पहले पंजाबी से भी इसीलिए शादी की क्योंकि बिहारी कुछ करता ही नहीं था, सिवाय बच्चा पैदा करने के।

बहस थोड़ी और आगे बढ़ी तो पता चला बिहारी पहले किसी रबर की फैक्ट्री में काम करता था मगर काम छूट जाने के बाद पिछले तीन वर्षों से उसे काम ही नहीं मिला। सड़ रही लाश के पक्ष में बोलने वाली महिला ने आगे कहा,‘किसी की जवानी नहीं फटती है कि वह बेवजह इस गोद से उस गोद में कूदे। बच्चों का मुंह देख लोग पता नहीं क्या-क्या करते हैं।’

तभी किसी ने फिक्र बिखेरी,‘बेचारे बच्चों को कौन देखेगा।’बच्चों की बात आयी तो पता चला दो बेटियां और दो बेटे हैं। सबसे बड़ी बेटी करीब 12साल की है और बाकी सभी बच्चे उससे छोटे हैं। सामने वाले की बीबी ने नीचे परचून की दूकान के पास इशारा कर दिखाया,‘वह  बैठी है उसकी बड़ी बेटी। बाकी तीनों भाई-बहनों को चाय मट्ठी खिला रही है।’इस दृश्य को महत्वपूर्ण मान सभी ने बालकनी से सिर झुका-झुका कर चाय-मट्ठी का लाइव देखा।

अब बारी लाश को फूंके जाने के बहस को लेकर थी। सड़ रही लाश की मां ने बेटी को एक बार देखने की इच्छा जाहिर की और कहा उसे घर लाया जाये। इस पर सभी बिपर पड़े। तमाशबीनों ने करीब आदेशात्मक ढंग से कहा, ‘सड़ी हुई लाश मुहल्ले में क्यों लानी है, पहले से क्या बिमारियां कम हैं।’ कुछ ने कहा, उस बदचलन ने ऐसा कौन सा महान काम किया है कि अंतिम दर्शन को लाया जाये। आखिरकार तय हुआ कि लाश को अस्पताल से सीधे ‘मशान ले जाया जायेगा।

इस प्रस्ताव पर अस्पताल जाने को लिए दो-चार लोग तैयार हो गये। तैयार होने वालों में मानद पति के क्षेत्र और जाति के लोग थे। इसके अलावा जो लोग मौके पर पहले से खड़े थे, उन्होनें नौकरी या अन्य जरूरी कामों का वास्ता देकर जा पाने में असमर्थथा जाहिर की। हालांकि चलन में ऐसा नहीं है। गाड़ी का इंतजाम हो जाने पर अंतिम संस्कार में जाने वालों से गाड़ी आमतौर पर भर जाती है।

खैर!अब हमारे बीच से सड़ी लाश को राख हुए दो दिन बीत चुके हैं और राख का मानद पति ‘छपरा वाला’,राख का कर्मकांड करने गांव जा चुका है। इस बीच मुहल्लेवालों ने महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाते हुए मानद पति को ‘रखवाला’ का तमगा दे, राख के बाकी दो पतियों को मजावादी करार दे दिया है। मानद के जाते-जाते एक औचक सवाल मुहल्ले वालों ने उसके लिए जरूर छोड़ा था, ‘मानद, क्या कभी चारों बच्चों में से किसी एक पर भी अपनी औलाद होने का फक्र कर सकेगा।’

और इसी सवाल के साथ कहानी का इंड हो गया था। लोग बालकनी से इस सकून के साथ वापस लौटे थे कि एक बदचलन औरत के मरने, सड़ने और अंततः राख होने में मुहल्ला भागीदार नहीं हुआ और सभ्य बना रहा।





Feb 20, 2011

और आंखें पत्थर की लगा दीं



मोतियाबिंद से त्रस्त गरीबों को क्या पता था कि जिन आंखों की रोशनी पाने की उम्मीद में वे डॉक्टरों के यहां जा रहे हैं, वे डॉक्टर उनकी आंखें ही छीन लेंगे और वे अपराधी भी  नहीं माने जायेंगे...


चैतन्य भट्ट

मध्य प्रदेश के मंडला जिले के पच्चीस आदिवासी अपनी आँखें डाक्टरों की लापरवाही के कारण गंवा चुके हैं। आदिवासियों को डाक्टरों की लापरवाही का उस समय शिकार होना पड़ा जब वे ‘योगीराज चेरिटेबल ट्रस्ट’ के निःशुल्क मोतियाबिन्द आपरेशन कैंप में इलाज के लिए आये थे। डॉक्टरों ने आदिवासी मरीजों को भरमाने के लिए मोतियाबिंद ग्रस्त आखों को निकाल पत्थर की आँखे लगा दी थीं।

जबलपुर से करीब सौ किलोमीटर दूर मंडला में पिछले वर्ष 11सितंबर को योगीराज चैरिटेबल ट्रस्ट ने मोतियाबिंद कैंप लगाया था। दूर-दराज से आपरेशन के लिए आये गरीबों में वह पचीस आदिवासी भी थे जो मोतियाबिंद की वजह से जिंदगी ठीक से नहीं जी पा रहे थे। अपनी आँखों से पहले की तरह दुनिया देख सकें की उम्मीद में डाक्टरों के दर पर आये आदिवासियों को क्या पता था कि जिंदगी में बची बाकी रोशनी भी वे गवां बैठेंगे।



डॉक्टरों की देन   :  पत्थर की आंख दिखाता एक पीड़ित
दूसरी तरफ  रसूखदारों की सरपरस्तरी में चल रहे योगीराज चेरिटेबल ट्रस्ट अस्पताल का बाल बांका भी नहीं हुआ है। घटना के चार महीने बाद भी अस्पताल ने एक धेले का मुआवजा नहीं दिया है। घटना के बाद मंडला के जिला कलेक्टर ने अस्पताल को यह निर्देश दिये थे कि वे हर पीड़ित मरीज को तीस तीस हजार रूपये बतौर मुआवजा दे और पेंशन के रूप में हर महिने पांच-पाचं सौ रूपये भी अस्पताल प्रबंधन अदा करे।

आँखें गँवा चुके आदिवासी और उनके परिजन मुआवजे की आस में हर उस दरवाजे जा रहे है जहां से उन्हें न्याय की उम्मीद है। लेकिन राज्य की भाजपा सरकार, जिला प्रशासन, सीएमओ से लेकर योगीराज चेरिटेबल ट्रस्ट तक के अधिकारियों के कानों में जूं नही रेंग रही है। इतना ही नहीं  जबलपुर के विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम, जिन्हें घटना की जांच का जिम्मा सौंपा गया था, उन्होंने भी आपरेशन करने वाले दोषी डाक्टरों को ‘क्लीनचिट’ देकर पीड़ितों के जख्मों पर नमक छिडका है।

गौरतलब है कि गरीब और आदिवासी इलाका होने के कारण जैसे ही लोगों को पता चला कि निःशुल्क मोतियाबिन्द आपरेशन कैंप लगा है तो धनाभाव के कारण निजी चिकित्सालयों में इलाज न करा पाने वाले मरीजों का तांता लग गया। मामला गरीबों का होने के कारण अस्पताल प्रबंधन ने भी खूब लापरवाही बरती और इतने बड़े कैंप का आयोजन बगैर स्वास्थ्यअधिकारियों के इजाजत के ही कर डाला।

आसपास के गांवों झिरिया,बनिया तारा,मलवा खेहरी से तीस मरीज मुफ्त आपरेशन का प्रलोभन देकर लाये गये। मरीजों में महिलायें और पुरूष दोनों शामिल थे,जिनका आपरेशन अस्पताल के डाक्टरों ने बाहर से आये डाक्टरों के साथ किया। दो दिन बाद मरीजों के आंखों की पट्टियां  खोलकर उनकी जांच के बाद उन्हें अपने अपने घरों को जाने के लिये कह दिया गया. मुफ्त में हुए आपरेशन की खुशी में डूबे इन आदिवासियों को इसके बाद के परिणामों के बारे में कोई कल्पना ही नहीं थी। मरीजों को क्या पता था कि जिन आँखों में वे रोशनी की आस कर रहे है वे बहुत जल्दी पथरा जाने वाली हैं।

आपरेशन का एक सप्ताह ही बीता था और मरीजों की आखों में पानी और मवाद आना शुरू हो गया। पीडितों ने अस्पताल से सम्पर्क किया तो उन्हें अस्पताल बुलवाया गया। डाक्टरों ने दुबारा आपरेशन किया, लेकिन डॉक्टरी लापरवाही के कारण इन्फेक्शन इतना ज्यादा हो गया था कि उसका इलाज कर पाना डाक्टरों के बस का नहीं रह गया।

ऐसे में उन शातिर डाक्टरों ने अपना गुनाह छुपाने के लिए गरीब और अप़ढ़ आदिवासियों की संक्रमित आंखें  निकाल पत्थर की आंखें लगा दीं.अस्पताल की ओर से डाक्टर परवेज खान ने भी स्वीकार किया कि ‘संक्रमण ज्यादा था इसलिए आंख निकालने के अलावा कोई दूसर उपाय नहीं था। अगर ऐसा नहीं होता तो स्वस्थ आंख भी खराब हो सकती थी।’


एक असली आखों की जगह पत्थर की आंखे लगा देने की बात सामने आई तो जिला कलेक्टर केके खरे ने अस्पताल प्रबंधन को आदेश दिया कि वह पीड़ितों को तीस हजार रूपये मुआवजा और पांच सौ रूपये मासिक पेंशन दे। इसके साथ जिला प्रशासन ने जबलपुर मेडिकल  कालेज के एसोसिऐट प्रोफेसर डॉ. परवेज सिददीकी, डॉ. पवन अग्रवाल, नेत्र विशेषज्ञ डॉ. हितेश अग्रवाल के अलावा जिला चिकित्सालय मंडला के नेत्र विशेषज्ञ डॉ. तरूण अहिरवार की जांच के लिएक उच्चस्तरीय टीम बनाई गयी।


आंख की जगह पत्थर लगाकर भरमाया
 विशेषज्ञ टीम ने अपनी रिपोर्ट कहा कि घटना के डेढ़ महीने बाद हुई की जांच में इन्फेक्शन का कोई ठोस कारण बता पाना संभव नहीं है। जाहिर है इस रिपोर्ट के बाद दोषी डॉक्टरों को क्लीनचिट मिलनी ही थी  और वह मिल भी गयी। उसके बाद योगीराज चेरिटेबल ट्रस्ट  अस्पताल के हौसले बुलंद हो गये और उसने कलेक्टर के मुआवजे वाले आदेश को धता बताते हुये मुआवजे के आदेश को अनसुना कर दिया।

अपनी आंख गंवा चुकी ग्राम झिरिया की रहने वाली रेवती बाई मोंगरे अपनी व्यथा सुनाते कहती हैं,‘मैं अपनी आखों का आपरेशन ही नहीं करवाना चाहती थीं,पर अस्पताल के लोगों की बातों में आकर मैंने आपरेशन करवा लिया.मुझे उन्हें नहीं मालूम था कि आँखें ठीक होना तो दूर रोशनी और दोनों आँखें ही चली जायेंगी.

कहीं से न्याय मिलता न देख आदिवासियों ने न्यायालय में गुहार लगायी है। आदिवासियों की ओर से मंडला के स्थानीय अधिवक्ता हमीद खान, विजय जंघेल और उनके सहयोगियों की मदद से एक परिवाद दायर किया है, जिसमें उन्होंने पीड़ितों के लिए तीन लाख रूपये मुआवजे की मांग की है।



 राज एक्सप्रेस और पीपुल्स समाचार में संपादक रह चुके चैतन्य भट्ट फिलहाल स्वतंत्र पत्रकार के रूप में काम कर रहे हैं। वे तीस बरसों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।




Feb 19, 2011

भाषा - भूगोल का अधिनायक और लेखक

लेखक वस्तुतः अपनी भाषा का मूलनिवासी या आदिवासी होता है। उसकी भाषा ही उसका जल,जंगल,ज़मीन और जीवन हुआ करती  है। किसी लालच या अन्य उन्माद में सभ्यताएं हमेशा आदिवासियों को विस्थापित करती आयी हैं...


उदय प्रकाश

‘मोहन दास’ को दिये गये साहित्य अकादमी पुरस्कार को स्वीकार करते हुए, इस संदर्भ में अपनी ओर से कुछ कहना है। यह एक परंपरा रही है। मेरे असमंजस और दुविधा की शुरूआत ही यहीं से होती है, मैं क्या कहूं ?

मुझे लिखते-पढ़ते हुए कई दशक हो चुके हैं। लिखने की शुरूआत बचपन से ही कर दी  थी, जब खड़ी हिंदी बोली ठीक से आती भी नहीं थी। तब कभी यह सोचा नहीं था कि इसी भाषा  में एक दिन लेखक बनना है। ऐसा लेखक,जिसकी सामाजिक अस्मिता और जीवन का आधार किसी एक भाषा में लिखने तक ही सीमित होकर रहता है।

रोलां बाथ जिसे ‘पेपर बीइंग’कहते थे। तरह-तरह के कागजों पर स्याही में लिखे या छपे अक्षरों-शब्दों में किसी तरह अपना अस्तित्व बनाता हुआ प्राणी। आज के समय में वे होते तो कहते आधिभौतिक  आभासी व्योम में द्युतिमान अक्षर या शब्द के द्वारा अपने होने को प्रमाणित करता कोई अस्तित्व। यानी कहीं नहीं में, कहीं होता कोई प्राणी। ‘ए वर्चुअल नॉनबीइंग।’यानी ‘ए सोशल नथिंग।’  किसी अप्रकाशित को महाशून्य में प्रकाशित करने की माया रचता भासमान अनागरिक। आकाशचारी ‘नेटजन’।

बचपन जैसा असुरक्षित और भटकावों से भरा रहा, उसे देखते हुए, आकांक्षा यही थी कि आगे चलकर एक सुरक्षित और अपेक्षाकृत स्थिर वास्तविक जीवन मिले। इसके लिए वास्तविक कोशिश भी की। परिश्रम किया। परीक्षाओं में अंक अच्छे लाए। यह सारा प्रयत्न उसी भाषा में किया, जिसमें लेखक के रूप में उपस्थित और जीवित रहता था।

सोचा कोई नौकरी  मिल जाएगी तो वास्तविक जीवन गुज़र जाएगा। समाज-परिवार की जिम्मेदारी निभ जाएगी। किसी मध्यवर्गीय नागरिक की तरह। फिर एक समय, जब युवा होने की दहलीज़ पर ही था, यह लगा कि अपने लिए तो सभी जीते हैं। इतना आत्मकेंद्रित क्या होना। जो किताबें पढ़ता था, उनसे भी यही प्रेरणा मिलती थी कि अपने समय को अधिक न्यायपूर्ण,सुंदर,मानवीय और उत्तरदायी बनाना चाहिए।

इतिहास ऐसे प्रयत्नों के बारे में, उन प्रयत्नों की सफलताओं-असफलताओं के बारे में बताता था। उपन्यास, कविताएं, दर्शन, विज्ञान और मानविकी की तमाम पुस्तकों में ऐसे संकेत और विवरण थे। कलाएं भी इसका उदाहरण बनती थीं। नितांत अकेलेपन और एकांतिक पलों में उपजने वाली भाषिक क-वाचिक अभिव्यक्तियों या अन्य कलाओं में भी यह प्रयत्न दिखाई देता था।

लेकिन इन सबमें सबसे प्रगट और शायद अधिक ठोस,साफ और आसान-सा उपक्रम जहां दिखता था, उसे राजनीति या सामाजिक कर्म कहते हैं। तो मैं उधर भी गया। इस सबके पीछे ऐसा लगता है कि कोई महान मानवीय-सामाजिक कार्य करने,बड़ा परिवर्तन लाने का कोई आत्मबलिदानी आदर्श या क्रांतिकारी लक्ष्य किसी समय रहा होगा। जिस पीढ़ी का मैं था, वह पीढ़ी ही कुछ-कुछ ऐसी थी।

आज इस उम्र में,इतनी दूर आकर कह सकता हूं कि शायद वह सारा प्रयत्न भी मेरी अपनी ही सुरक्षा और अस्तित्व की चिंता से जुड़ा हुआ था। एक स्तर पर वह कहीं गहराई से व्यक्तिगत भी था। शायद हम किसी भी परिवर्तन की कोशिश में तभी सम्मिलित होते हैं,जब हम उसमें स्वयं अपनी मुक्ति और अपनी स्थितियों में बदलाव देखते-पाते हैं।

मेरे पास भाषा और अपने शरीर के अलावा कोई दूसरा साधन और ऐसा माध्यम नहीं था, जिससे मैं दूसरों,और इस तरह अपने भविष्य को सुरक्षित बनाने के लिए ऐसा सामाजिक प्रयत्न कर सकता। तो एक दीर्घ समय तक,बल्कि अपने जीवन के सबसे बड़े हिस्से को,मैंने वहीं खर्च किया। यही सोचते हुए कि एक ऐसे समाज और समय में,जिसमें मेरे जैसे अन्य सभी सुरक्षित और स्वतंत्र होंगे, उसमें मैं भी स्वतंत्रता और नागरिक वैयक्तिक गरिमा के साथ रह सकूंगा।

आज इतने वर्षो के बाद भी मुझे लगता है कि मैं इस भाषा, जो कि हिंदी है, के भीतर, रहते-लिखते हुए,वही काम अब भी निरंतर कर रहा हूं,जबकि जिन्हें इस काम को भाषेत्तर  या व्यावहारिक सामाजिक धरातल पर संगठित और सामूहिक तरीके से करना था,उसे उन्होंने तज दिया है। इसके लिए दोषी किसी को ठहराना सही नहीं होगा। वह समूची सभ्यता का बदलाव था। मनुष्यता के प्रति प्रतिज्ञाओं से विचलन की यह परिघटना संभवतः पूंजी और तकनीक की ताकत से अनुचर बना डाली गई सभ्यता का छल था।

मुझे ऐसा लगता है कि इतिहास में कई-कई बार ऐसा हुआ है कि सबसे आखिर  में,जब सारा शोर, नाट्य और प्रपंच अपना अर्थ और अपनी विश्वसनीयता खो देता है,तब हमेशा इस सबसे दूर खड़ा, अपने निर्वासन, दंड, अवमानना और असुरक्षा में घिरा वह अकेला कोई लेखक ही होता है, जो करुणा, नैतिकता और न्याय के पक्ष में किसी एकालाप या स्वागत  में बोलता रहता है। या कागज़ पर लिखता रहता है। किसी परित्यक्त अनागरिक होते जाते बूढ़े की अनंत बुदबुदाहट,कभी किसी पुरानी स्मृतियों के कोहरे और अंधंरे से निकलती और कभी किसी स्वप्न के बारे में संभाव्य-सा कुछ इशारा करती। इसे ‘सॉलीलाक्वीस’ कहते हैं।

मैं ज़रा-सा भाग्यशाली इसलिए हूं कि इस स्वगत को सुनने वाले बहुत से लोग मुझे अपनी ही नहीं, दूसरी अन्य भाषाओं में भी मिल गये हैं। इसमें हमारे अपने देश की भी भाषाएं हैं और दूसरे कुछ देशों  की भी।

एक प्रश्न हमेशा हमारे सामने आ खड़ा होता है। वह यह कि जिस धरती पर मैं भौतिकरूप से रहता हूं, जिस शहर, समाज या राज्य में, उसका मालिक कौन है? किसका आधिपत्य उस पर है? किसी नागरिक, प्रजा या मनुष्य रूप में उस मालिक ने मुझे कितनी स्वतंत्रता दे रखी है? उसकी हदबंदियां और ज़ंजीरें कहां-कहां हैं?

और ठीक इसी से जुड़ा हुआ,इसी प्रश्न के साथ, इसी प्रश्न का दूसरा हिस्सा भी सामने आ जाता है कि जिस भाषा में मैं लिखता हूं, उस भाषा का मालिक कौन है? वह कौन सी सत्ता है, जिसके अधीन यह भाषा है? जैसा मैंने अभी कहा, लेखक और कुछ नहीं, भाषा में ही अपना अस्तित्व हासिल करता कोई प्राणी होता है।

भाषा ही उसका कार्यक्षेत्र,उसका देश,उसका घर और उसका अंतरिक्ष होता है। उसकी संपूर्ण सत्ता भाषा में ही अंतर्निहित होती हैं। लेकिन मैंने अक्सर पाया है कि भाषा और भूगोल,या शब्द और राज्य,दोनों को अपने अधीन बनाने वाली सत्ता एक ही होती है। कई तरह के प्रतिपक्षी और प्रतिभिन्न पाठों में प्रकट होते शब्दाडंबरों या डेमॉगागी के आर-पार वर्चस्व की वही संरचनाएं रहती हैं, जो किसी धरती के नागरिक या किसी भाषा के लेखक की स्वतंत्रता को नियंत्रित, अनुकूलित या अधीन करती हैं।

हर तरह की ऐसी सत्ता,मुझे अनिवार्य रूप से लगता है कि अपने मूल चरित्र में सर्वसत्तावादी होती है। इतिहास ने और मेरे अपने ही जीवन की स्मृतियों और अनुभवों ने इस धारणा को पुष्ट ही किया है। यह सत्ता राज्य-व्यवस्था ही नहीं, किसी भी भाषा में विनिर्मित उन विचार-सरणियों को भी अधिगृहीत कर लेती हैं,जिनमें सबकी मुक्ति की कोई संभावना होती है। पिछले दो-ढाई दशकों के मेरे अनुभवों और संज्ञान ने यह बोध मुझे दिया है।

इसीलिए,जिस भाषा में मैं लिखता और रहता हूं, वह मेरे लिए, सिर्फ ‘हिंदी’ नहीं रह जाती। वह जीवन और यथार्थ का एक ऐसा जटिल प्रश्न बन कर उपस्थित होती है,जिसे किसी कथा या कविता या अपने किसी बयान में कहता हुआ मैं सत्ताओं के संदेह के घेरे में अक्सर आता रहता हूं। इसके बाद इस जगह मैं चुप रहूंगा।

मैं स्मरण दिलाना चाहूंगा कि पिछली सदी के ठीक बीतते ही, जब सब नयी सहस्राब्दी के स्वागत की मुद्रा में थे, मैंने एक लंबी प्रेमकथा लिखी थी -‘पीली छतरी वाली लड़की’। आप अगर ध्यान दें, तो लोकरंजक सरलता के उस सहज पाठ में भाषा और महुष्य का गहरा अनुचिंतन और विखंडन एक साथ विन्यस्त था। अपने नये कविता संग्रह-‘एक भाषा हुआ करती है’का भी ध्यान मैं दिलाना चाहूंगा।

मुझे लगता है कि लेखक हो जाने की अस्मिता हासिल होने के बाद उसकी स्वतंत्रता किसी भी जातीय, सांप्रदायिक, धार्मिक, लैंगिक या राजनीतिक या डेमॉगागिक वर्चस्व से नियंत्रित होती ही है। हर लेखक को,अगर उसने अन्य अस्मिताओं के सारे आवरण और कवच उतार दिये हैं और उसके पास अपने जीवन और अपने आत्म की रक्षा के लिए भाषा के अतिरिक्त कोई दूसरा उपकरण नहीं बचा है, तो उसे हमेशा अपनी इस पराधीनता या औपनिवेशीकरण से मुक्ति का प्रयत्न करना ही पड़ता है।

मेरा यह भी मानना है और इसे मैं पिछले लंबे अर्से से कहता आ रहा हूं कि लेखक वस्तुतः अपनी भाषा का मूलनिवासी या आदिवासी होता है। उसकी भाषा ही उसका जल, जंगल, ज़मीन और जीवन हुआ करता है। किसी लालच या अन्य उन्माद में सभ्यताएं हमेशा किसी आदिवासियों को उसके स्थान से विस्थापित करती आयी हैं।

यह सिर्फ किसी कोलंबस का ऐतिहासिक वृत्तांत भर नहीं है,बल्कि एक ऐसा सर्वव्यापी सच है,जो आज तक देखी-जानी गई हर तरह की सत्ता-संरचना को शर्मसार कर सकती है।

आज जब मैं यहां आपके सामने अपना यह वक्तव्य पढ़ रहा हूं, उस समय आप सब देख रहे हैं कि पूंजी और तकनीक की ताकतों के साथ जुड़ी लोभ की सत्ता ने किस व्यापक पैमाने पर हिंसा और संवेदनहीनता के साथ निरस्त्र मूलनिवासियों को उनकी जड़ों से उखाड़ना शुरू किया है। यह एक तरह का सभ्यता का उन्माद है।

एक ऐसा मनोरोग जो किसी खास जगह नहीं, बल्कि संसार के सभी वंचित, वध्य, सत्ताहीन और शांत मूलनिवासियों के जीवन में ‘होलोकास्ट’पैदा कर रहा है। कई साल पहले मिशेल फूको की किताब ‘सभ्यता और उन्माद’ पढ़ी थी, उसे इस डरावने ढंग से प्रमाणित होते अपने सामने देख रहे हैं

भाषा भी पूंजी और तकनीक के साथ जुड़ी लोभी सत्ता-संरचनाओं की चपेट में है। इसके विस्तार में मैं नहीं जाना चाहूंगा। उतना समय भी नहीं है। लेकिन इतना ज़रूर कहना चाहूंगा कि भाषा भी अब एक जिंस और एक उत्पाद भर मान ली गई है और इससे जुड़े जितने भी अकादेमिक,व्यापारिक और राजकीय उद्यम हैं,उस लेखक की उसमें कहीं कोई जगह नहीं है। वह विस्थापन के ठीक उसी बिंदु पर है, जिसमें हमारे समय की वंचित मूलनिवासी मनुश्यता है।

मैं साहित्य अकादेमी को धन्यवाद देता हूं और उस निर्णायक मंडल के लिए कृतज्ञता ज्ञापित करता हूं,जिसने मेरी लंबी कहानी या आख्यान ‘मोहन दास’को यह सम्मान दिया। जाहिर है,कोई भी पुरस्कार किसी भाषा और भूमि में किसी मनुष्य का पुनर्वास तो नहीं कर सकता,लेकिन व्यक्तिगत रूप से मैं अपनी खुशी यहां प्रकट करता हूं।

यह खुशी इसलिए अर्थ रखती है कि इस राज्य के एक नागरिक के रूप में मैं कुछ अपेक्षाकृत सुरक्षित-सा अनुभव कर रहा हूं। आप सबका हृदय से आभार।

(लेखक उदय प्रकाश ने यह वक्तव्य 16 फरवरी को अपनी कृति 'मोहन दास' को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिलने के अवसर पर दिया था. )


बजट में न्याय के लिए कितना पैसा


सरकार बार-बार देश में न्यायायिक सुधार को लेकर अपनी प्रतिबद्धता की बात दोहरा चुकी है, लेकिन सारा का सारा मामला बजट में आकर अटक जाता है...

संजय स्वदेश

केंद्रीय बजट आने वाला है। मीडिया अपेक्षित बजट पर चर्चा करा रही है। पर इन चर्चाओं में अन्य कई मुद्दों की तरह न्यायापालिका पर खर्च की जाने वाली राशि पर कोई हो-हल्ला नहीं है।

एक अकेले न्यायापालिका ही है जिसने कई मौके पर सरकार की जन अनदेखी कदम पर अंकुश लगाने की दिशा में पहल की। न्यायपालिका के दामन पर कई बार भ्रष्टाचार के दाग लगे। इसके बाद भी आम आदमी उच्च और उच्चतम न्यायालय के प्रति विश्वसनीयता बनी हुई है। पर किसी सरकार ने न्यायपालिका को मजबूत करने के लिए कभी अच्छी खासी बजट की व्यवस्था नहीं की। इसका दर्द भी पिछले दिनों उच्चतम न्यायालय के एक खंडपीठ के बयान में उभरा।

खंडपीठ    ने साफ कहा कि कोई भी सरकार नहीं चाहती कि न्यायपालिका मजबूत हो। यह सही भी है। देश महंगाई और भ्रष्टाचार की आग में जल रहा है। भ्रष्टारियों के मामले में अदालत में लंबित पड़ रहे हैं। हाल ही में केंद्रीय कानून मंत्री वीरप्पा माइली ने भी बयान दिया था कि केंद्र ने न्यायिक सुधार की दिशा में पहल कर दिया है, जिससे मामलों का जल्द निपटारा होगा। कोई भी केस कोर्ट में तीन साल से ज्यादा नहीं चलेगा और  भ्रष्टाचार के मामले में एक साल के अंदर न्याय मिलेगा।

कानून मंत्री के कहे मुताबिक  ऐसा हो जाए तो  निश्चय ही भ्रष्टाचारियों में खौफ बढ़ेगा। वर्तमान कानून में भ्रष्टाचारियों को कठोर सजा का प्रावधान नहीं है। त्वरित न्याय की दिशा में फास्ट ट्रैक्क अदालतों के गठन हुए थे। इन पर भी धीरे-धीरे मामलों का बोझ बढ़ता गया। न्याय में देरी की स्थिति ज्यों की त्यों बनी हुई है। मामलों के लंबे खिंचने से उनके हौसले बुलंद है।

सरकार बार-बार देश में न्यायायिक सुधार को लेकर अपनी प्रतिबद्धता की बात दोहरा चुकी है। लेकिन सारा का सारा मामला बजट में आकर अटक जाता है। जिसको लेकर कभी देश में गंभीर बहस नहीं हुई। स्वतंत्र कृषि बजट,दलित बजट आदि की तो खूब मांग उठती है,पर अदालत की मजबूती के लिए गंभीर चर्चा नहीं होती है। इस ओर ध्यान उच्चतम न्यायालय के खंडपीठ के दर्द भरे बयान के बाद ही गया।

भारी भरकम बजट देकर यदि सरकार न्यायपालिका को मजबूत कर दे तो देश में कई समस्याओं का समाधान सहज ही हो जाएगा। देशभर के अदालतों के लाखों मामलों में तारिख पर तारिख  मिलती जाती है। जनसंख्या और मामलों के अनुपात में देश में अदालतों की संख्या ऊंट के मुंह में जीरा साबित होती रही है। दरअसल मामलों की बढ़ती संख्या और सरकार की उदासिनता के कारण ही न्यायपालिका का आधारभूत ढांचा ही चरमराने लगा है।


अदालतों की कम संख्या न्यायापालिका की वर्तमान व्यवस्था में निर्धारित अविध में सरकार त्वरित न्याय की गारंटी नहीं दे सकती है। जिन प्रकरणों से मीडिया ने जोरशोर से उठाया वे भी वर्षों तक सुनवाई में झूलती रही है। दूर-दराज में होने वाले अनेक सनसनीखेज प्रकरणों में पीड़ित दशकों से न्याय की आशा लगाये हैं। प्रकरणों के लंबित होने से तो लोगों के जेहन से यह बात ही निकल जाती है कि कभी कोई वैसा प्रकरण भी हुआ था। अनेक लोग तो न्याय की आश लगाये दुनिया से चल बसे। मामला बंद हो गया। कई लोगों को जवानी में लगाई गई गुहार का न्याय बुढ़ापे तक नहीं मिला। लिहाजा, त्वरित न्याय की मांग हमेशा होती रही है।

पिछले दिनों सरकार ने भी त्वरित न्याय आश्वासन तब दिया जब जब देशभर में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक आंदोलन की सुगबुगाहट हुई। प्रमुख शहरों में भ्रष्टाचार के खिलाफ रैली निकली, सीबीसी थॉमस को लेकर सरकार कटघरे में आई। आदर्श सोसायटी घोटाले को लेकर हो हल्ला हुआ। काले धन को स्वदेश वापसी को लेकर सरकार की फजीहत हुई। फिलहाल देश की नजरे वर्ल्ड कप क्रिकेट और आने वाले बजट पर टिकी है।
 
बहुत कम लोगों के जेहन में बजट में न्यायपालिका की उपेक्षा को लेकर टिस उभर रही होगी। यदि सरकार ने बजट में न्यायपालिका के लिए खजाना खोला तो निश्चय ही न्यायपालिका को मजबूती मिलेगी। लेकिन पिछली सरकार की परंपरा को देखते हुए ऐसा लगता नहीं कि सरकार न्यायापालिका पर मेहरबान होगी। जाहिर है  न्यायपालिका की मजबूती सरकार की मनमानी का अंकुश साबित होगा।
 
 

 दैनिक नवज्योति के कोटा संस्करण से जुड़े संजय स्वदेश देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं व पोटर्ल से लिए स्वतंत्र लेखन करते हैं . उनसे sanjayinmedia@rediffmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.
 
 
 
 
 
 

Feb 18, 2011

मैं गंवार हूं...



अशोक विश्वास

चम्मच से मुझे खाने की आदत नहीं

छूरी की मुझे जरूरत नहीं

मैं खाता हूं ज़मीन काटकर

मैं खाता हूं सबको बांटकर

इसलिए कि मैं गंवार हूं



मेरे बच्चे स्कूल में पढ नहीं पाते

बेरहम दुनिया से लड नहीं पाते

तभी तो वो सफलता की सीढी चढ नहीं पाते

इसलिए कि मैं गंवार हूं



जीवन भर मैं औरों के लिए बनाता हूं महल

हर काम की मुझसे ही होती है पहल

फिर भी मैं रहता हूं झोपडी में

दुख और गरीबी ही है मेरी टोकरी में

इसलिए कि मैं गंवार हूं



गरीबी ही है मेरी हमजोली

बीमारी मेरी दीवाली

और मौत ही मेरी होली

ये सब इसलिए क्योंकि मैं गंवार हूं



(अशोक, सरगुजा में सामाजिक कार्यकर्ता हैं. उनकी यह कविता सीजीनेट स्वर  से साभार ली जा रही है.)   



लीपापोती की महान भारतीय परम्परा


नेता हो या अधिकारी अथवा समाज के किसी और तबके का कोई भी व्यक्ति, सभी की मनोवृति ऐसी बन चुकी देखी कि वह सब कुछ बुरा ठीक-ठाक दर्शाना चाहता है...

निर्मल  रानी   

आजकल  भ्रष्टाचार का मुद्दा चर्चा का मुख्य   विषय बना हुआ है। ऐसा लगता है कि आगामी लोकसभा चुनाव में 'भ्रष्टाचार' ही चुनाव का केंद्र बिंदु होगा। परंतु यदि हम भ्रष्टाचार के इन कारणों की तह में जाने की कोशिश करें तो हम यह पाएंगे कि हमारे देश में लीपापोती करने की  आदत सी बन चुकी है.

नेता हो या अधिकारी अथवा समाज के किसी और तबके का कोई भी व्यक्ति लगभग सभी की मनोवृति ऐसी बन चुकी है   कि वह सब कुछ ठीक-ठाक दर्शाना चाहता है. इसी तथाकथित 'ठीक-ठाक' के थोथे प्रदर्शन के पीछे छुपा होता है छोटे से लेकर बड़े से बड़ा भ्रष्टाचार, घोटाला, लापरवाही, अकर्मण्यता, हरामखोरी, रिश्वतखोरी तथा ढेर सारी गैजिम्मेदारियां आदि।

आज के तथाकथित वीआईपी गण कहीं न कहीं आते-जाते रहते हैं। इनका भी कोई न कोई मार्ग होता है और कभी कभी शहरों के व्यस्त बाज़ारों या रास्तों से भी इन्हें गुज़रते हुए जलसे-जुलूस में आना जाना पड़ता है।  वीआईपी के गुज़रने वाले रास्ते में गड्ढे हैं तो भले ही वह विगत कई महीनों व कई वर्षों से क्यों न हों तथा जनता उन गड्ढों में कितनी बार गिर कर अपना नुकसान क्यों न कर चुकी हो,परंतु जब विशिष्ट व्यक्ति अर्थात हमारे 'सेवक'को उस रास्ते से गुज़रना है तो उन गड्ढों को  तत्काल भर दिया जाता है। कूड़े करकट के ढेर हटा इन रास्तों के किनारे चूने का छिड़काव भी कर दिया जाता है तथा रंगीन झंडियां आदि लगाकर उनका स्वागत किया जाता है।


दिल्ली  में राष्ट्रमंडल खेलों से ऐन   पहले गिरा था पुल  
पिछले दिनों अम्बाला के बराड़ा कस्बे में एक फ्लाईओवर का उद्घाटन हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा द्वारा किया गया। वैसे भी इस  निर्माण की गति शुरु से ही बहुत धीमी थी। किसी प्रकार यह तैयार हुआ। इस फ्लाईओवर के दोनों ओर स्ट्रीट लाईट का प्रबंध किया गया है,चूना-सफेदी की गई तथा उसपर लगे बिजली के खंभों को सिल्वर पेंट द्वारा चमकाया गया। आपको यह जानकर आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि जिस स्थान पर उद्घाटन का पत्थर लगा था उसी स्थान तक लगे बिजली के खंभों को पेंट किया गया, वह भी आधा-अधूरा।

ऐसी ही एक घटना अंबाला छावनी के मुख्य  बस स्टैंड के उद्घाटन के समय की याद आती है. स्वर्गीय बंसी लाल हरियाणा के मुख्यमंत्री के रूप में अपनी सत्ता के अंतिम दिन गुज़ार रहे थे। जाते-जाते वह अपने नाम की अधिक से अधिक उद्घाटन शिलाएं तमाम सरकारी इमारतों में लगाकर जाना चाह रहे थे। उन्हीं इमारतों में से एक भवन अंबाला छावनी बस अड्डे का भी था। उस नवनिर्मित हुए बस अड्डे का काम अभी भी पूरी नहीं हुआ था कि मुख्यमंत्री कार्यालय द्वारा बस अड्डे के भवन के उद्घाटन करने की तिथि घोषित हो गई।

दिन-रात तेज़ी से काम कर सरकार को यह बता दिया गया कि बस अड्डा पूरी तरह से ठीक-ठाक है तथा उद्घाटन के लिए तैयार है। वह तिथि व निर्धारित समय आ गया। मुख्यमंत्री आए उद्घाटन समारोह बस स्टैंड के मुख्य  विशाल शेड में संपन्न हुआ। अभी मुख्यमंत्री महोदय का भाषण चल ही रहा था कि काफी तेज़ बारिश शुरु हो गई। इस भारी बारिश के चलते पूरे सभा स्थल की छत टपकने लगी। चारों ओर पानी ही पानी हो गया। गोया जिस प्रकार की लीपापोती प्रशासन ने करनी चाही उसकी पोल प्रकृति ने खोलकर रख दी।

लीपापोती तथा सब ठीकठाक दिखाई देने जैसी कमज़ोर व खोखली परंपरा कोई गांव,शहर या राज्यस्तर तक ही सीमित नहीं है। बल्कि दुर्भाग्यवश शायद यह प्रवृति हमारी परंपराओं में ही शामिल हो चुकी है और राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर के आयोजनों में भी हम अपनी इसी प्रवृति या परंपरा के शिकार होते देखे जाते हैं।

पिछले  वर्ष भारत में पहली बार राष्ट्रमंडल खेल आयोजित हुए। यह तो भला हो हमारे देश के खिलाडिय़ों का जिन्होंने अप्रत्याशित रूप से सौ से अधिक पदक जीतकर देश की इज़्ज़त बचा ली। क्योंकि शासन व प्रशासन के लोगों की तरह खेल जैसी प्रतिस्पर्धाओं में लीपापोती या जबरन सब ठीक-ठाक है कहने से पदक कतई हासिल नहीं हो सकता। अन्यथा इस आयोजक मंडल के सदस्यों ने तो देश की नाक कटवाने में अपनी ओर से तो कोई कसर ही बाकी नहीं रखी थी।

 ज़रा कल्पना कीजिए कि उन विदेशी मेहमानों को या विदेशी खिलाडिय़ों को आज जब यह पता लग रहा होगा कि भारत में हुए राष्ट्रमंडल खेल आयोजन समिति की अमुक-अमुक हस्तियां जो कल तक अहंकार तथा सत्ता का प्रतीक बनी हुई दिखाई दे रहीं थीं,वही हस्तियां आज जांच एजेंसियों द्वारा की जाने वाली पूछताछ,संदेह व फज़ीहत की शिकार हैं तो उनके दिलो-दिमाग पर हमारे देश की क्या छवि बन रही होगी?

यह ऐसे निठल्ले,हरामखोर तथा घोटालेबाज़ शासनिक व प्रशासनिक अधिकारियों व जिम्मेदार लोगों की ही देन थी कि राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारी के दौरान कभी कोई पुल गिर गया तो तमाम जगहों पर गड्ढे नहीं भरे जा सके। कई भवनों को आधा-अधूरा रखकर ही उन पर लीपापोती कर दी गई और आख़िरकार  ऐसे तमाम गड्ढों को व गंदगी,कूड़ा-करकट आदि को छुपाने के लिए उन बेशकीमती होर्डिंग्स  का सहारा लिया गया जिन्हें किन्हीं अन्य स्थानों पर लगाने के लिए बनवाया गया था। कहीं गमले रखकर अपनी इज़्ज़त बचाने की कोशिश की गई तो कहीं रातोंरात घास व पौधे लगाकर लीपापोती की गई।

इन्हीं सब लापरवाहियों के परिणामस्वरूप ही निकल कर आया है देश का सबसे बड़ा राष्ट्रमंडल खेल घोटाला। लीपापोती करने व सब कुछ ठीक-ठाक है जैसा थोथा प्रदर्शन करने से हमें बाज़ आना चाहिए तथा जहां भी इस प्रकार की कोशिशें की जा रही हों,उसका न सिर्फ पर्दाफाश करना चाहिए बल्कि सामाजिक स्तर पर इनका विरोध भी किया जाना चाहिए। ऐसी परंपराओं का प्रबल विरोध निश्चित रूप से देश में भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने में सहायक साबित होगा।




लेखिका सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर लिखती हैं, उनसे mailto:nirmalrani@gmail.com  पर संपर्क किया जा सकता है.







Feb 17, 2011

महाशिवरात्रि का आनंद लेने बराड़ा आयें

अम्बाला.सबसे ऊंचा रावण बनाए जाने का विश्व कीर्तिमान स्थापित करने के बाद अब हरियाणा के अंबाला जिले के  बराड़ा कस्बे में महाशिवरात्रि का विशाल एवं भव्य आयोजन दो मार्च को होने  जा रहा है। बराड़ा के श्रीरामलीला क्लब एवं ओंकार कलामंच के संयुक्त प्रयास से  आगामी दो मार्च को निकाली जाने वाली महाशिवरात्रि की विशाल शोभायात्रा की तैयारियां इन दिनों चरम पर हैं।

आयोजक  संस्था के संस्थापक अध्यक्ष राणा तेजिंद्र सिंह चौहान ने महाशिवरात्रि की तैयारियों के बारे में बताया कि अपने निरंतर आयोजन के दो दशक पूरे कर चुकने के बाद इस वर्ष भी शोभा यात्रा में तमाम प्रमुख विशालकाय प्रतिमाएं एवं आकर्षक झांकियां जनता एवं भक्तजनों के दर्शनार्थ प्रस्तुत की जाएंगी।



इन विशालकाय प्रतिमाओं एवं झांकियों में शिव  परिवार,शेर सहित दुर्गा माता,पंचमुखी हनुमानजी,जल प्रवाह करती गंगा मैया,शिव जटाओं से निकलती शिवगंगा,शिरडी वाले साईं बाबा,मूषक पर सवार गणेश जी,कृष्ण-बकासुर,विष्णु-गरुड,शिवलिंग,कमल में विराजमान ब्रह महाकाल,बाल्मीकि जी,राधा-कृष्ण,गऊ माता आदि प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त शंकर जी बारात की झांकी भी प्रस्तुत की जाएगी। विशेषरूप से इस बार आगरा के शंकर जादूगर शोभायात्रा में अपने जादू के शानदार करतब भी दिखलाएंगे।

तेजिंद्र चौहान ने बताया कि इस वर्ष महाशिवरात्रि में शोभायात्रा की रौनक बढाऩे हेतु देश की जिन सुप्रसिद्ध बैंड पार्टियों को आमंत्रित किया गया है वे हैं,रवि बैंड मेरठ,अशोक बैंड सहारनपुर,पंजाब बैंड सहारनपुर,हीरा बैंड शामली,पंजाब बैंड ज्वालापुर,सुंदर बैंड मुजफ्फरनगर ,सोनू बैंड रुड़की,लक्ष्मी बैंड करनाल,हीरा बैंड यमुना नगर,रवि बैंड अंबाला,न्यू हीरा बैंड पंचकुला,लक्ष्मी बैंड कुरुक्षेत्र,हीरा बैंड सरसावा आदि।

इसके अतिरिक्त मेरठ के प्रसिद्ध शहनाई वादक रूपाशंकर और साथी शोभायात्रा में जहां अपनी शहनाई पेश करेंगे,वहीं मेरठ के रविशंकर शहनाई वादक,रविशंकर ताशा पार्टी मेरठ तथा शमशाद एंड पार्टी,पंजाबी ढोल चंडीगढ़ भी महाशिवरात्रि के अवसर पर अपने हुनर व कला का शानदार प्रदर्शन करेंगे।

राणा तेजिंद्र चौहान के अनुसार महाशिवरात्रि की यह विशाल शोभा यात्रा बराड़ा स्थित नई अनाज मंडी से दो मार्च को प्रात:10बजे आरंभ होकर अपने निर्धारित मार्गों से होते हुए लगभग तीन किलोमीटर का मार्ग तय कर बराड़ा गांव में पहुंचेगी जहां इस कार्यक्रम का समापन होगा।

चंद्रकांत देवताले को कविता समय सम्मान


''पहला कविता समय सम्मान हिंदी के वरिष्ठतम कवियों में एक चंद्रकांत देवताले को और पहला कविता समय युवा सम्मान  युवा कवि कुमार अनुपम को दिया जायेगा.“दखल विचार मंच”और “प्रतिलिपि” के सहयोग से हिंदी कविता के प्रसार, प्रकाशन और उस पर विचार विमर्श के लिए की गयी पहल कविता समय के अंतर्गत दो वार्षिक कविता सम्मान स्थापित करने का निर्णय संयोजन समिति द्वारा लिया गया.

समिति के चारों सदस्यों –बोधिसत्व,पवन करण,गिरिराज किराडू और अशोक कुमार पाण्डेय –ने सर्वसहमति से वर्ष २०११ के सम्मान चंद्रकांत देवताले और कुमार अनुपम को देने का फैसला लिया. कविता समय सम्मान के तहत एक प्रशस्ति पत्र और पाँच हजार रुपये की राशि तथा कविता समय युवा सम्मान के तहत एक प्रशस्ति पत्र और ढाई हजार रुपये की राशि प्रदान की जाएगी.
कविता समय सम्मान हर वर्ष ६० वर्ष से अधिक आयु के एक वरिष्ठ कवि को दिया जायेगा जिसकी कविता ने निरंतर मुख्यधारा कविता और उसके कैनन को प्रतिरोध देते हुए अपने ढंग से,अपनी शर्तों पर एक भिन्न काव्य-संसार निर्मित किया हो और हमारे-जैसे कविता-विरोधी समय में निरन्तर सक्रिय रहते हुए अपनी कविता को विभिन्न शक्तियों द्वारा अनुकूलित नहीं होने दिया हो.

कविता समय युवा सम्मान ४५ वर्ष से कम आयु के एक पूर्व में अपुरस्कृत ऐसे कवि को दिया जायेगा जिसकी कविता की ओर, उत्कृष्ट संभावनाओं के बावजूद, अपेक्षित ध्यानाकर्षण न हुआ हो. इस वर्ष के सम्मान ग्वालियर में २५-२६ फरवरी को हो रहे पहले कविता समय आयोजन में प्रदान किये जायेंगे.''

Feb 16, 2011

वे घसीटते रहे ... मैं गिड़गिड़ाती रही



ये आदिवासी लड़की एक आंगनबाड़ी कार्यकर्ता है.इसे बालों से बांधकर केंद्रीय सुरक्षा बल के जवानों ने गाँव की गालियों में घसीटा था. इस  इंटरव्यू की एक प्रति राष्ट्रीय  महिला आयोग की अध्यक्ष और कांग्रेसी सांसद गिरिजा व्यास के हाथ में भी सौंपी गयी थी. परन्तु न्याय मिलना तो दूर, कोई जाँच करने की भी जहमत नहीं की गयी.

आंगनबाड़ी कार्यकर्ता से सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार की बातचीत











Feb 15, 2011

साम्राज्यवादी स्थिरता का जनतांत्रिक विकल्प


होस्नी मुबारक का सबसे परममित्र व सहयोगी अमेरिका भी इस समय मिस्र की जनता-जनार्दन के सुर से अपना सुर मिलाने में अपनी भलाई समझ रहा है...

तनवीर जाफरी

मिस्र में 11फरवरी 2011 का दिन इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया. देश की सत्ता पर 30 वर्षों तक क़ब्ज़ा जमाए 82 वर्षीय राष्ट्रपति होस्नी मुबारक को भारी जन आक्रोश के चलते राजधानी क़ाहिरा स्थित अपने आलीशान महल अर्थात राष्ट्रपति भवन को छोड़ कर शर्म-अल-शेख़ भागना पड़ा। तमाम अन्य देशों के स्वार्थी, क्रूर एवं सत्ता लोभी तानाशाहों की तरह ही मिस्र में भी राष्ट्रपति होस्नी मुबारक ने अपनी प्रशासनिक पकड़ बेहद मज़बूत कर रखी थी।

ऐसा प्रतीत नहीं हो पा रहा था कि मुबारक को अपने जीते जी कभी सत्ता से अपदस्थ भी होना पड़ सकता है। परंतु यह सारे कयास उस समय धराशायी हो गए जबकि शांतिपूर्ण एवं अहिंसक राष्ट्रव्यापी जनाक्रोश के साथ 18 दिनों तक चले लंबे टकराव के बाद अखिऱकार मुबारक को अपनी गद्दी छोडऩी ही पड़ी। मुबारक के तीन दशकों के शासन के दौरान देश में जहां भ्रष्टाचार,बेरोज़गारी,भूखमरी तथा गरीबी ने पूरे देश में पैर पसारा वहीं राष्ट्रपति मुबारक स्वयं दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति बनने में पूरी तरह सफल रहे।

होस्नी मुबारक और ओबामा : नहीं काम आयी अमेरिकी सलाह

मुबारक के धन कुबेर होने का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे इस समय लगभग 70 अरब डालर की संपत्ति के स्वामी हैं। जबकि माईक्रो सॉफ्ट कंपनी के प्रमुख बिल गेटस तथा मैक्सिको के व्यवसायी कार्लोस स्लिम हेल जैसे विश्व के सबसे बड़े उद्योगपति 52 से लेकर 53 अरब डॉलर तक के ही मालिक हैं। खबरें आ रही हैं कि मुबारक की लंदन,मैनहट्टन तथा रेडियोड्राईवे में भी काफी संपत्तियां हैं तथा स्विस बैंक सहित अन्य कई देशों में इनके खाते भी हैं। यह भी समाचार है कि स्विस बैंक ने उन खातों को बंद करने की घोषणा की है जिनपर होस्नी मुबारक के खाते होने का संदेह है।

मिस्र  में आए इस भारी जनतांत्रिक परिवर्तन की और भी ऐसी कई विशेषताएं रहीं जो काबिले ग़ौर हैं । मध्यपूर्व एशिया के सबसे मज़बूत देश होने के बावजूद यहां आए राजनैतिक परिवर्तन में न तो कोई सैनिक क्रांति हुई न ही किसी प्रकार की खूनी क्रांति.जनता भी पूरी तरह अहिंसा व शांति के रास्तों पर चलते हुए 18दिनों तक लगातार किसी हथियार व लाठी डंडे के बिना क़ाहिरा के तहरीर चौक सहित मिस्र के अन्य कई प्रमुख शहरों में मुबारक विरोधी प्रर्दशन करती रही। जनता की केवल एक ही मांग थी कि मुबारक गद्दी छोड़ो और देश में जनतंत्र स्थापित होने दो।

राष्ट्रपति मुबारक ने इन अट्ठारह दिनों के प्रदर्शन के दौरान ऐसी कई चालें चलीं जिनसे कि वे स्वयं को कुछ दिनों तक और राष्ट्रपति के पद पर बनाए रख सकें। उन्होंने अपने अधिकार भी उपराष्ट्रपति को हस्तांरति करने की बात कही। बाद में उन्होंने अपने एक संबोधन में मिस्रवासियों से यह वादा भी किया कि वे अगला राष्ट्रपति चुनाव भी नहीं लड़ेगें। परंतु जनता की तो बस एक ही मांग थी -मुबारक फौरन गद्दी छोड़ दो। आखिऱकार मुबारक ने जनाक्रोश को दबाने के लिए हिंसा का रास्ता चुनने का भी एक असफल प्रयास किया।

पहले तो मुबारक ने सेना से प्रदर्शनकारियों से निपटने को कहा। जब सेना ने जनतंत्र की मांग करने वाले प्रदर्शनकारियों के विरूद्ध बल प्रयोग से इंकार कर दिया उसके बाद मुबारक ने स्थानीय पुलिस कर्मियों को सादे लिबास में घोड़ों व ऊंटों पर सवार होकर प्रदर्शनकारियों से मुठभेड़ कर उन्हें खदेडऩे को कहा। इसके परिणामस्वरूप क़ाहिरा में थोड़ा बहुत तनाव ज़रूर पैदा हुआ लेकिन मुट्ठीभर सरकारी मुबारक समर्थकों को भारी जनसैलाब के मुकाबले पीछे हटना पड़ा।

मिस्र में आए इस ऐतिहासिक बदलाव के पीछे इंटरनेट पर चलने वाली फेसबुक जैसी कई सोशल नेटवर्किंग साईट की भी बहुत अहम भूमिका रही। यही वजह थी कि आम जनता एक दूसरे के सीधे संपर्क में आकर सड़कों पर निकल आई। इस आंदोलन को न तो किसी विशेष राजनैतिक दल ने संचालित किया न ही इस ऐतिहासिक परिवर्तन के पीछे किसी नेता विशेष का कोई हाथ नज़र आया। हां टयूनीशिया की उस घटना ने मिस्रवासियों को अवश्य प्रेरणा दी जिसमें कि जनक्रांति के कारण ही कुछ दिनों पूर्व ही वहां के तानाशाह एवं प्रमुख ज़ैनुल आबदीन बिन अली को देश छोड़कर भागने के लिए मजबूर होना पड़ा।

मिस्रवासी होस्नी मुबारक द्वारा की जाने वाली लगातार उपेक्षा से तंग आ चुके थे। इसमें कोई संदेह नहीं कि मुबारक जब 1975 में उपराष्ट्रपति बने तथा उसके बाद 1981 में अनवर सादात की हत्या के बाद राष्ट्रपति की कुर्सी पर विराजमान हुए,उस शुरुआती दौर में मिस्री अवाम उन्हें बेहद प्यार करती थी। यहां तक कि अपने शासनकाल के दौरान उन्होंने अपने सैकड़ों विरोधियों,विरोधी नेताओं,धार्मिक नेताओं तथा अपने विरुद्ध साजि़श रचने का संदेह करने वालों को मौत के घाट उतारा। उन्होंने अपने शासन के दौरान अपने विपक्षी दलों को सिर नहीं उठाने दिया। परंतु जनता यह सब कुछ देखती व सहन करती रही।

मिस्र के आम लोग अमेरिकी नीतियों के आमतौर पर विरोधी थे। परंतु होस्नी मुबारक मध्यपूर्व एशिया में अमेरिका के सबसे परम मित्र बने रहे। फिर भी जनता खा़मोश रही। 1979 में मिस्र-इज़राईल के मध्य एक संधि हुई। यह भी मिस्री अवाम ने न चाहते हुए भी स्वीकार किया लेकिन अपनी बदहाली,बेरोज़गारी तथा अपने बच्चों के भविष्य के प्रश्रचिन्ह को वह सहन नहीं कर सकी।

होस्नी मुबारक का सबसे परममित्र व सहयोगी अमेरिका भी इस समय मिस्र की जनता-जनार्दन के सुर से अपना सुर मिलाने में ही अपनी भलाई समझ रहा है। कल तक स्थिर सरकार की बात कह कर होस्नी मुबारक को समर्थन देने वाला अमेरिका अब जनतांत्रिक व्यवस्था को ही मिस्र में ज़रूरी समझ रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा जो कि अपनी अहिंसक विचारधारा के लिए भी दुनिया में जाने जाते हैं तथा मिस्र में ही क़ाहिरा में असलामअलैकुम कह कर अमेरिका व दुनिया के मुस्लिम देशों के बीच फैले मतभेद को दूर करने का प्रयास किया था,उन्होंने भी क़ाहिरा की शांतिपूर्वक एवं अहिंसक जनक्रांति पर संतोष व्यक्त करते हुए कहा है कि 'प्रदर्शनकारियों ने इस विचार को झूठा साबित कर दिया है कि इंसाफ हिंसा के माध्यम से ही प्राप्त किया जा सकता है।

प्रदर्शनकारी बार-बार यह नारे लगा रहे थे कि वे शांति बनाए रखेंगे। मिस्र में अहिंसा का नैतिक बल था। आतंकवाद नहीं, बिना सोचे-समझे मारकाट नहीं, और इसी इतिहास ने न्याय की ओर करवट ली। अपने इस वक्तव्य से अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा ने मिस्र की नीतियों को लेकर भविष्य में होने वाले अमेरिकी परिवर्तन की ओर साफ इशारा कर दिया है कि अब अमेरिका मिस्र में मुबारक सरकार जैसी तथाकथित स्थिरता की नहीं बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों व मानवाधिकारों की रक्षा की दुहाई देता हुआ नज़र आ रहा है।

मुबारक के गद्दी छोडऩे व क़ाहिरा छोड़कर जाने के बाद मिस्र को लेकर कई तरह की चिंताएं ज़ाहिर की जा रही हैं। इस समय मिस्र की सेना की आलाकमान के प्रमुख फ़ील्ड मार्शल मोह मद हुसैन तंतावी हैं। इन्होंने शीघ्र ही देश में निष्पक्ष चुनाव कराने तथा देश की बागडोर जनता के हाथों में सौंपने का संकेत दिया है। परंतु मिस्र तथा टयूनीशिया के हालात के बाद अब सबसे बड़ी चिंता अमेरिकी व यूरोपीय देशों के साथ-साथ उन मध्यपूर्व एशियाई देशों को भी है जोकि छोटी-मोटी सैन्य शक्ति के बल पर अपनी राजशाही या तानाशाही का शासन चला रहे हैं।

इनमें सबसे अधिक चिंता सऊदी अरब जैसे धनी एवं तेल संपन्न देश को है तो अरब-इज़राईल शांति प्रक्रिया पर पडऩे वाले संभावित प्रभाव को लेकर भी दुनिया में चिंता बनी हुई है। अमेरिका व उसके सहयोगी देशों को अब इस बात की फिक्र भी सताने लगी है कि कहीं मिस्र में आया यह परिवर्तन ईरान के बढ़ते प्रभाव को भी और अधिक उर्जा न प्रदान करे। इसके अतिरिक्त पश्चिमी देशों की चिंता इस बात को लेकर भी है कि मिस्र की क्रांति इस्लामी कट्टरपंथ के विरुद्ध चल रहे पश्चिमी देशों के संघर्ष को भी प्रभावित कर सकते हैं।

उधर मुस्लिम ब्रदरहुड अथवा इवानुल मुस्लमीन जैसे कट्टरपंथी संगठनों के मिस्र की राजनीति में पडऩे वाले संभावित प्रभाव को लेकर भी चिंता जताई जा रही है। उधर यूरोपीय देशों को इस बात की फिक्र सता रही है कि नई मिस्री शासन व्यवस्था अथवा नई निर्वाचित सरकार मिस्र से होकर गुज़रने वाली उस स्वेज़ नहर को कहीं बंद न कर दे जिससे होकर प्रतिदिन लगभग 50तेलवाहक जहाज़ यूरोप की ओर गुज़रते हैं। और यह रास्ता यूरोप व मध्यपूर्व एशियाई देशों के मध्य की 6हज़ार किलोमीटर की दूरी कम करता है। बहरहाल मिस्र में आए इस राजनैतिक परिवर्तन का मध्य पूर्व एशिया तथा पश्चिमी देशों पर वास्तव में क्या प्रभाव पड़ेगा यह तो मिस्र में गठित होने वाली नई जनतांत्रिक सरकार द्वारा घोषित नीतियों के बाद ही पता चल सकेगा।

होस्नी मुबारक की बिदाई के बाद लगभग पूरी दुनिया में जश्र तथा जनआंदोलन के प्रति समर्थन का वातावरण देखा जा रहा है.समर्थन को देख यह समझने में परेशानी नहीं होनी चाहिए कि दुनिया के लोग अब जागरुक हैं. ऐसा लग रहा है कि जनता अब तानाशाहों द्वारा विश्वस्तर पर मचाई जाने वाली लूट-खसोट तथा धन-संपत्ति के अथाह संग्रह को भी और अधिक सहन करने के मूड में नहीं हैं। इसलिए संभव है कि टयूनीशिया तथा मिस्र जैसे हालात का सामना अभी कुछ और देशों को करना पड़े जो जनता की आकांक्षाओं पर खरे नहीं उतर पा रहे हैं।



 लेखक हरियाणा साहित्य अकादमी के भूतपूर्व सदस्य और राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मसलों के प्रखर टिप्पणीकार हैं.उनसे tanveerjafri1@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.