Jun 30, 2011

अब डॉक्टर नहीं रहे भगवान

एक जुलाई को डॉक्टर्स डे पर विशेष  
क्या सचमुच, बदलते परिवेश में डॉक्टर अब भगवान कहलाने के लायक नहीं रह गए हैं? क्या उन्हें मरीज की जिंदगी से नहीं, बल्कि रुपए से प्यार है़... 

राजेन्द्र राठौर 

भगवान के बाद धरती पर अगर कोई भगवान है तो वह है डॉक्टर। मगर पिछले कुछ वर्षों में लापरवाही की कई खबरों की वजह से यह पेशा सवालों से घिरता नजर आ रहा है। ज्यादातर डॉक्टरों ने अब सेवाभावना को त्यागकर इसे व्यापार बना लिया है। उन्हें मरीज के मरने-जीने से कोई सरोकार नहीं है। वे मरीज का ईलाज तो दूर, लाश के पोस्टमार्टम करने का भी सौदा करते हैं। उनके लिए आज पैसा ही सबकुछ हो गया है। वहीं कुछ ऐसे चिकित्सक भी है, जिन्होंने मरीजों की सेवा और उनकी जिदंगी की रक्षा को ही अपना मूल उद्देश्य बना रखा है। वे अपने इस मिशन में अकेले ही आगे बढ़ते जा रहे हैं।

इस मुद्दे पर बात इसलिए की जा रही है, क्योंकि आज यानि एक जुलाई को भारत देश में डॉक्टर्स डे मनाया जाता है। दरअसल, भारत में डॉ. बीसी रॉय के चिकित्सा जगत में योगदान की स्मृति में एक जुलाई को डॉक्टर्स डे मनाया जाता है। एक दशक पहले की बात की जाएं तो, उस समय तक डॉक्टरों को भगवान माना जाता था। धरती पर अगर कोई भगवान कहलाता था, वह डॉक्टर ही था। लोग डॉक्टर की पूजा करते थे, आखिर पूजा करते भी क्यों नहीं। डॉक्टर, जिंदगी की अंतिम सांस ले रहे व्यक्ति को फिर से स्वस्थ जो कर देते थे।

पहले डॉक्टरों में मरीज के प्रति सेवाभावना थी। मगर बदलते परिवेश में आज डॉक्टर, भगवान न रहकर व्यापारी बन गए हैं, जिन्हें मामूली जांच से लेकर गंभीर उपचार करने के लिए मरीजों से मोटी रकम चाहिए। पैसा लिए बिना डॉक्टर अब लाश का पोस्टमार्टम करने के लिए भी तैयार नहीं होते। वे परिजनों से सौदेबाजी करते हैं और तब तक मोलभाव होता है, जब तक पोस्टमार्टम की एवज में मोटी रकम न मिल जाए। 

मुझे आज भी वह दिन याद है, जब छत्तीसगढ़ के कोरबा शहर की पुरानी बस्ती निवासी एक गर्भवती महिला अपने पति के साथ गरीबी रेखा का राशन कार्ड लेकर इंदिरा गांधी जिला अस्पताल पहुंची। वहां मौजूद एक महिला चिकित्सक ने जांच करने के बाद आपरेशन करने की बात कहते हुए उस महिला के पति से 10 हजार की मांग की तथा उसे अपने निजी क्लीनिक में लेकर आने को कहा। तब महिला के पति ने रो-रोकर अपनी बदहाली की दास्तां सुनाई, लेकिन उस डॉक्टर का दिल तो पत्थर का था। उसने एक न सुनी और पैसे मिलने के बाद ही उपचार शुरू करने बात कही। इस चक्कर में काफी देरी हो गई और नवजात शिशु की दुनिया देखने से पहले ही अपनी मां के गर्भ में दम घुटकर मौत हो गयी। 

डॉक्टरों की बनियागिरी यही खत्म होने वाली नहीं है। दो दिन पहले ही उसी अस्पताल में पदस्थ एक चिकित्सक ने पोस्टमार्टम के लिए मृतक के परिजनों से सौदेबाजी की। एक दशक के भीतर ऐसे कई मामले सामने आये हैं, जिनको याद करने के बाद डॉक्टर शब्द से घृणा होने लगती है। क्या सचमुच, बदलते परिवेश में डॉक्टर अब भगवान कहलाने के लायक नहीं रह गए हैं? क्या उन्हेंमरीज की जिंदगी से नहीं, बल्कि रूपए से प्यार है़? जी हां, अब डॉक्टरों में समर्पण की भावना नहीं रह गई है, इसीलिए वे मरीजों से लूट-खसोट करने लगे हैं। कई चिकित्सक तो फीस की शेष रकम लिए बिना परिजनों को मृतक की लाश भी नहीं उठाने देते।

हां, मगर कुछ चिकित्सक ऐसे भी है, जिन्होंने इस पेशे को आज भी गंगाजल की तरह पवित्र रखा हुआ है। वर्षों तक सरकारी अस्पताल में सेवा दे चुके अस्थि रोग विशेषज्ञ डॉ. जी.के. नायक कहते हैं कि  दर्द चाहे हड्डी का हो या किसी भी अंग में हो, कष्ट ही देता है। अस्थि के दर्द से तड़पता मरीज जब मेरे क्लीनिक में आता है तो मेरी पहली प्राथमिकता उसका दर्द दूर करने की होती है। दर्द से राहत मिलने पर मरीज के चेहरे पर जो सुकून नजर आता है, वह मेरे लिए अनमोल होता है। 

स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ रश्मि सिंह कहती हैं कि मरीज का इलाज करते-करते हमारा उसके साथ एक अनजाना सा रिश्ता बन जाता है। मरीज हमारे इलाज से स्वस्थ हो जाए, तो उससे बेहतर बात हमारे लिए कोई नहीं हो सकती। मरीज अपने आपको डॉक्टर के हवाले कर देता है, उसे डॉक्टर पर पूरा भरोसा होता है। ऐसे में उसके इलाज और उसे बचाने की जिम्मेदारी डॉक्टर की होनी ही चाहिए। 

डॉक्टरों द्वारा कथित तौर पर लापरवाही बरते जाने के बारे में बत्रा हॉस्पिटल के गुर्दा रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रीतपाल सिंह कहते हैं कि इलाज के दौरान किसी मरीज की तबियत ज्यादा बिगड़ने पर या उसकी मौत होने पर हमें भी पीड़ा होती है, लेकिन हम वहीं ठहर तो नहीं सकते। वह कहते हैं ’कोई भी डॉक्टर जान-बूझकर लापरवाही नहीं करता। हां, कभी-कभार चूक हो जाती है, लेकिन मैं मानता हूं कि डॉक्टर भी इंसान ही होते हैं, भगवान नहीं।  डॉक्टर्स डे के बारे में डॉ. पी.के. नरूला कहते हैं अच्छी बात है कि एक दिन डॉक्टर के नाम है, लेकिन यह न भी हो तो कोई फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि डॉक्टरों को किसी दिन विशेष से मतलब नहीं होता। वे हर दिन तन्मयता से अपना काम करते हैं। 

खैर, राह से भटके चिकित्सकों को अपनी जिम्मेदारियों का अहसास आज भी हो जाए तो, इस पेशे को बदनाम होने से बचाया जा सकता है।


 छत्तीसगढ़ के जांजगीर के राजेंद्र राठौर पत्रकारिता में 1999से जुड़े हैं और स्वतंत्र लेखन का शौक रखते हैं. लोगों तक अपनी बात पहुँचाने के लिए 'जन-वाणी' ब्लॉग लिखते है. 



आरा में नागार्जुन जन्मशताब्दी समारोह संपन्न


नागार्जुन नहीं होते तो हमलोग नहीं होते। और खुद हमारी परंपरा में कबीर और निराला नहीं होते तो नागार्जुन भी नहीं होते...  


सुधीर सुमन

पिछले साल 25-26 जून को समस्तीपुर और बाबा नागार्जुन के गांव तरौनी से जसम ने उनके जन्म शताब्दी समारोहों की शुरुआत की और यह निर्णय किया कि इस सिलसिले का समापन भोजपुर में किया जाएगा। इसीलिए नागरी प्रचारिणी सभागार, आरा में पिछले 25 जून 2011 को नागार्जुन जन्मशताब्दी समापन समारोह का आयोजन किया गया। जनता, जनांदोलन, राजनीति, इंकलाब और कविता के साथ गहन रिश्ते की जो नागार्जुन की परंपरा है, उसी के अनुरूप यह समारोह आयोजित हुआ।

 कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए नक्सलबाड़ी विद्रोह की धारा के मशहूर कवि आलोक धन्वा ने कहा कि नागार्जुन इसलिए बडे़ कवि हैं कि वे वर्ग-संघर्ष को जानते हैं। वे सबसे प्रत्यक्ष राजनीतिक कवि हैं। आज उन पर जो चर्चाएं हो रही हैं, उनमें उन्हें मार्क्सवाद से प्रायः काटकर देखा जा रहा है। जबकि सच यह है कि नागार्जुन नहीं होते तो हमलोग नहीं होते। और खुद हमारी परंपरा में कबीर और निराला नहीं होते तो नागार्जुन भी नहीं होते। नागार्जुन की कविता बुर्जुआ से सबसे ज्यादा जिरह करती है। उनकी कविताएं आधुनिक भारतीय समाज के सारे अंतर्विरोधों की शिनाख्त करती हैं। उनकी काव्य धारा हिंदी कविता की मुख्यधारा है। उनकी जो काव्य-चेतना है, वही जनचेतना है।

विचार-विमर्श के सत्र में ‘प्रगतिशील आंदोलन और नागार्जुन की भूमिका’ विषय पर बोलते हुए जसम के राष्ट्रीय महासचिव प्रणय कृष्ण ने कहा जिन्हें लगता है प्रगतिशीलता कहीं बाहर से आई उन्हें राहुल सांकृत्यायन, डी.डी. कोशांबी, हजारी प्रसाद द्विवेदी और नागार्जुन की परंपरा को समझना होगा। हिंदी कविता में बाबा प्रगतिशीलता की नींव रखने वालों में से हैं। वे शुरू से ही सत्ता के चरित्र को पहचानने वाले कवि रहे। नामवर सिंह 1962 के बाद के दौर को मोहभंग का दौर मानते हैं, लेकिन नागार्जुन, मुक्तिबोध और केदार जैसे कवियों में 1947 की आजादी के प्रति कोई मोह नहीं था, कि मोहभंग होता।तेलंगाना के बाद साठ के दशक के अंत में नक्सलबाड़ी विद्रोह के जरिए किसानों की खुदमुख्तारी का जो संघर्ष नए सिरे से सामने आया, उसने प्रगतिशीलता और वर्ग संघर्ष को नई जमीन मुहैया की और सत्तर के दशक में जनांदोलनों ने नागार्जुन सरीखे कवियों को नए सिरे से प्रासंगिक बना दिया। बीसवीं सदी के हिंदुस्तान में जितने भी जनांदोलन हुए, नागार्जुन प्रायः उनके साथ रहे। लेकिन नक्सलबाड़ी के स्वागत के बाद पलटकर कभी उसकी आलोचना नहीं की, जबकि संपूर्ण क्रांति के भ्रांति में बदल जाने की विडंबना पर उन्होंने स्पष्ट तौर पर लिखा।

आइसा नेता रामायण राम ने नागार्जुन की कविता ‘हरिजन-गाथा’ को एक सचेत वर्ग-दृष्टि का उदाहरण बताते हुए कहा कि इसमें जनसंहार को लेकर कोई भावुक अपील नहीं है, बल्कि एक भविष्य की राजनैतिक शक्ति के उभार की ओर संकेत है। समकालीन जनमत के प्रधान संपादक रामजी राय ने कहा कि बाबा अपने भीतर अपने समय के तूफान को बांधे हुए थे। मार्क्सवाद में उनकी गहन आस्था थी। अपनी एक कविता में उन्होंने कहा था कि 'बाजारू बीजों की निर्मम छंटाई करूंगा।' उनके लिए कविता एक खेती थी, समाजवाद के सपनों की। विचार-विमर्श सत्र की अध्यक्षता डा. गदाधर सिंह, जलेस के राज्य सचिव कथाकार डा. नीरज सिंह, प्रलेस के राज्य उपाध्यक्ष आलोचक डा. रवींद्रनाथ राय और जसम के राज्य अध्यक्ष आलोचक रामनिहाल गुंजन ने की। डा.रवींद्रनाथ राय ने समारोह की शुरुआत में स्वागत वक्तव्य दिया और जनता के राजनैतिक कवि नागार्जुन के जन्मशताब्दी पर भोजपुर में समारोह होने के महत्व के बारे में चर्चा की। डा. गदाधर सिंह ने छात्र जीवन की स्मृतियों को साझा करते हुए कहा कि उनके कविता पाठ में छात्रों की भारी उपस्थिति रहती थी। वे एक स्वतंत्रचेत्ता प्रगतिशील कवि थे। उन्होंने केदारनाथ अग्रवाल, मजाज और गोपाल सिंह गोपाली पर केंद्रित समकालीन चुनौती के विशेषांक का लोकार्पण भी किया।

दूसरे सत्र की शुरुआत युवानीति द्वारा बाबा की चर्चित कविता ‘भोजपुर’ की नाट्य प्रस्तुति से हुई। उसके बाद कवि जितेंद्र कुमार की अध्यक्षता और कवि सुमन कुमार सिंह के संचालन में कविता पाठ हुआ, जिसमें अनेक कवियों ने कविता पाठ किया।

समारोह में शामिल साहित्यकार-संस्कृतिकर्मियों ने 24 जून को अपनी सांस्कृतिक यात्रा की शुरुआत बाबा नागार्जुन के ननिहाल सतलखा चंद्रसेनपुर से की थी, जहां एक सभा में उनके ननिहाल के परिजनों ने उनकी मूर्ति स्थापना, पुस्तकालय और उनके नाम पर एक शोध संस्थान बनाने के लिए एक कट्ठा जमीन देने की घोषणा की। उसके बाद साहित्यकार-संस्कृतिकर्मी दरभंगा और समस्तीपुर में सभा करते हुए पटना पहुंचे और 25 जून को नागार्जुन जन्मशताब्दी समारोह में शामिल हुए।


इस समारोह में बाबा नागार्जुन की कविता पाठ का वीडियो प्रदर्शन और कवि मदन कश्यप का काव्य-पाठ भी होना तय था, लेकिन ट्रेन में विलंब के कारण ये कार्यक्रम अगले दिन स्थानीय बाल हिंदी पुस्तकालय में आयोजित किए गए। कवि-फिल्मकार कुबेर दत्त द्वारा बनाई गई नागार्जुन के काव्य पाठ के वीडियो का संपादन रोहित कौशिक ने किया है और इसके लिए शोध कवि श्याम सुशील ने किया है। करीब 13 मिनट का यह वीडियो नागार्जुन के सरोकार, कविता व भाषा के प्रति उनके विचारों का बखूबी पता देता है। बाबा इसमें मैथिली और बांग्ला में भी अपनी कविताएं सुनाते हैं।

मदन कश्यप के एकल कविता पाठ की अध्यक्षता नीरज सिंह और रामनिहाल गुंजन ने की तथा संचालन कवि जितेंद्र कुमार ने किया। उन्होंने गनीमत, चाहतें, थोड़ा-सा फाव, सपनों का अंत और चिडि़यों का क्या नामक अपनी कविताओं का पाठ किया।


बच्चों के प्रति संवेदनहीनता की महान सांस्कृतिक विरासत !

बच्चों के प्रति संवेदनहीनता हमारे देश की सांस्कृतिक विरासत है। साम्राज्यवाद की विरासत का सुख भोगने वाले बुद्धिजीवियों और उनके रहबरों ने बच्चों को एक नेता के जन्म-दिन पर याद करने की वस्तु से कुछ ज्यादा नहीं समझा है...

राजेश चन्द्र

बच्चों की दुनिया एकदम अलग होती है,जिज्ञासा और निश्छलता से भरी हुई। उनमें रचनात्मक कल्पनाशीलता सबसे ज्यादा होती है,पर उनकी संवेदनशीलता को प्रेरित कर पाना आसान नहीं होता। दुर्भाग्य से हमारे यहां बाल साहित्य बहुत ही कम उपलब्ध है और बच्चों के नाटक तो नहीं के बराबर।

हमारे प्रमुख साहित्यकारों ने बच्चों के लिए लेखन को बहुत कम महत्व दिया है,पर साहित्यिक गोष्ठियों में अक्सर यह शिकायत सुनने को मिल जाया करती है कि नई पीढ़ी को न तो साहित्य और उसकी विरासत की कोई जानकारी है, न उससे कोई लगाव। हमारे गंभीर साहित्यकार भी जब बाल साहित्य की रचना करते हैं तो वे उन बच्चों की उपेक्षा करते हैं जो सामने हैं। उनकी कल्पना में आदिम युग का कोई मोगली-नुमा बच्चा तैरता रहता है, जो शायद पहली बार मनुष्यों की दुनिया में आया है। उसकी आंखों में अचरज है, पर दिमाग खाली। इसलिए हमारे साहित्यकार बच्चों के लिए लिखते समय 'एक था राजा एक थी रानी' या 'बंदर मामा पहन पाजामा' से आगे बढ़ते ही नहीं।

आज के बच्चों की मानसिकता अंतरराष्ट्रीय सीमाएं पार कर रही है। कम्प्यूटर, मोबाइल और इंटरनेट ने उसके सामने सूचनाओं और मनोरंजन का ऐसा मायावी संसार खोलकर रख दिया है जिसमें उड़ने की ललक उन्हें असमय ही वयस्क बना रही है,पर हम उन्हें कुत्ता-बिल्ली या तोता-मैना के दोहे सुनाकर रोक लेना चाहते हैं। आज के शोरगुल और भागमभाग वाले दौर में बच्चे ऐसे दोराहों पर खड़े हैं, जहां आपसी संघर्ष है, होड़ है, परीक्षा का भय है, माता-पिता की महत्वाकांक्षाएं हैं, कुछ कर दिखाने का दबाव है। ढेरों अभिलाषाएं-इच्छाएं हैं और इनसे बनती-बिगड़ती प्रवृत्तियां-मनोवृत्तियां।

वे अपने अंतर्द्वंदों के साथ अकेले हैं,कोई नहीं है जो उन्हें समझे,उनकी समस्याओं का निराकरण करे। अहर्निश चलने वाले टीवी चैनलों ने बच्चों की तमाम संभावनाओं को निचोड़कर उन्हें विश्व बाजार के डरावने भीड़-भरे गलियारों में हत्यारी संभावनाओं के हवाले कर दिया है। लोरी सुनने की जिनकी उम्र है,ऐसे हजारों-हजार बच्चे चैनलों की गलाकाट प्रतियोगिता में नाच-गाकर दूसरों के लिए बसंत बुन रहे हैं और यह जानते हुए भी कि वे एक अंधी सुरंग में ढकेले जा रहे हैं,हम कुछ नहीं करते सिवाय तालियां बजाने के। ऐसे में साहित्य उनका दोस्त हो सकता था,जो उनके मनोविज्ञान को समझता और उनका मार्गदर्शन करता। पर वहां भी उनके नाम पर एक अबूझ सन्नाटा पसरा है।

वास्तव में बच्चों के प्रति संवेदनहीनता हमारे देश की सांस्कृतिक विरासत है। साम्राज्यवाद की विरासत का सुख भोगने वाले संभ्रांत वर्गों,इन वर्गों से निकले बुद्धिजीवियों और उनके रहबरों ने बच्चों को एक नेता के जन्म-दिन पर याद करने की वस्तु से कुछ ज्यादा नहीं समझा है। दूसरों की सुख-सुविधा, मुनाफा और अय्याशी के लिए जिस देश के करोड़ों बच्चे जानवरों से भी ज्यादा बदतर जिंदगी जीने को मजबूर हों, उस देश में यह उम्मीद करना कि यहां हर एक बच्चे को कभी-न-कभी रंगमंच से जुड़ने का मौका मिलेगा ताकि वह भाषा, साहित्य, सामाजिकता, सहयोग भावना, आत्मविश्वास और अनुशासन सीख सके और आगे चलकर एक बेहतर नागरिक बन सके-एक तरह की विलासिता ही लगती है।

 बाल रंगमंच गहरी कलात्मक संभावनाओं के साथ-साथ शिक्षा व्यवस्था के सर्जनात्मक रूपों से भी जुड़ा हुआ है। देश की सामान्य रंगमंचीय गतिविधि के लिए वह एक नई दिशा और नया आयाम प्रस्तुत करता है किंतु अभी वह अपनी प्रारंभिक अवस्था में ही है। यह सही है कि आज देश के कई महानगरों में बच्चों का नियमित रंगमंच मौजूद है और पिछले कुछ दशकों में बाल रंगमंच के महत्व को व्यापक स्वीकृति मिली है, पर आज भी वह हमारी शिक्षा का अंग नहीं बन पाया है।

बचपन में कोमल मन पर पड़े संस्कार जीवन भर हमारे भीतर बने रहते हैं और अपनी कारगर भूमिका निभाते हैं। बाल नाटकों और रंगमंच का बच्चों की प्रतिभा के विकास के लिहाज से महत्व समझने, आज के बच्चों के भय, उलझनों और छोटी-बड़ी मुश्किलों से सीधे जुड़ने तथा बाल रंगमंच के जरिए बच्चों को नया,खुशहाल समाज बनाने के सपने और नए विचारों से खेल-खेल में जोड़ने की सबसे पहले शुरुआत करने वाली रेखा जैन का समूचा जीवन ही बाल रंगमंच को समर्पित रहा।

बच्चों के लिए उमंग का सफ़र


वर्ष 1979 में उमंग की स्थापना कर बाल रंगमंच को एक राष्ट्रीय अभियान का स्वरूप देने वाली रेखा जैन ने अपने रंग-जीवन की शुरुआत 1942-43में इप्टा आंदोलन के जन्म के साथ की थी। वर्ष 1956 में दिल्ली आने तथा 'दिल्ली चिल्ड्रंस थिएटर' से जुड़कर उन्होंने बाल रंगमंच के सर्वांगीण विकास को अपना जीवन-ध्येय बना लिया। तब से लेकर अप्रैल 2010 में शरीर त्यागने तक बाल रंगमंच के क्षेत्र में 50 से भी अधिक वर्षों के उनके समग्र योगदान को समझने की कोशिश अभी भी उसी चरण में है, जिस चरण में बाल रंगमंच को एक गंभीर रंगकर्म के तौर पर स्वीकृति देने और अपनाने की मानसिकता है।

बाल रंगमंच के महत्व और उत्कृष्टता को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से रेखा जैन ने वर्ष 2009 में उमंग बाल रंग सम्मान की स्थापना की थी। उनके निधन के बाद अब यह सम्मान रेखा जैन बाल रंग सम्मान के नाम से दिया जाता है। इस वर्ष यह सम्मान प्रख्यात लेखक और रंगकर्मी सतीश दवे को दिया गया है। डॉ. हरिकृष्ण देवसरे और बंसी कौल के बाद सतीश दवे यह सम्मान पाने वाले तीसरे रंगकर्मी हैं।

'उमंग' के वार्षिक बाल रंग शिविर के समापन समारोह के अवसर पर पिछले वर्ष 15 जून को कमानी सभागार में सम्मानित सतीश दवे बाल रंगमंच के जरिए तीस वर्षों से बच्चों की सांस्कृतिक और सामाजिक चेतना के विकास में मौलिक और महत्वपूर्ण योगदान के लिए चर्चित रहे हैं। इस अवसर पर उमंग ने कर्नाटक के प्रसिद्ध रंगकर्मी के.जी.कृष्णमूर्ति के निर्देशन में वैदेही का लिखा नाटक ‘गोपू गणेश-झुमझुम हाथी‘ का भव्य मंचन भी किया।

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के 1994 के स्नातक कृष्णमूर्ति ने 1990 में ‘किन्नर मेला‘ की स्थापना की और बाल रंगमंच को लोक और परंपरा से जोड़ते हुए उसे एक नई रंगभाषा दी। 'गोपू गणेश-झुमझुम हाथी' एक पौराणिक मिथक के माध्यम से बच्चों को खेल-खेल में पर्यावरण के प्रति जागरूक बनाता है। नाटक में वन्य प्राणियों का सुंदर-सजीला संसार है, जिसे स्वार्थी मनुष्यों की लोलुपता लील जाना चाहती है। गोपू और झुमझुम हाथी की निष्कलंक मैत्री,गणेश और चांद की सदेह उपस्थिति तथा पुलिस की चिरपरिचित अकर्मण्यता प्रस्तुति को रोचक बनाती है। निर्देशक ने यक्षगान शैली और सुंदर गीतों के उपयोग से नाटक को अदभुत और आनंदकारी रूप दिया है।

आज के स्वकेंद्रित उपभोक्तावादी समाज में जहां बच्चे अंतर्मुखी, अकेले होकर अवसाद का शिकार हो रहे हैं, ऐसे रंग शिविरों की एक बड़ी भूमिका इस वजह से भी है कि बच्चे वहां स्वयं को अभिव्यक्त करना,दोस्त बनना-बनाना,परस्पर भागीदारी और समूह में जीने का आनंद लेना सीखते हैं। इस 'उमंग' पर हर बच्चे का हक होना चाहिए, पर काश यह बात हमारे नीति-निर्धारकों को समझ में आती।

 

स्वतंत्र पत्रकार और कला समीक्षक.





9.30 की डीटीसी बार

रात 9 बजे के बाद  डीटीसी बस 'बियर बार' में बदल जाती है. घर लौटते कई ‘मर्द’ पीछे की सीट में अपनी महफ़िल जमा लेते है और मोबाइल या एमपीथ्री पर गाना बजने लगता है...


विष्णु शर्मा

जब भी लाल रंग की डीटीसी की चर्चा होती है दोस्त बताते है कि रात के 9 बजे के बाद अक्सर इसके अंदर बियर बार सा माहौल हो जाता है.

साथियों की इस बात पर पहले तो यकीन नहीं हुआ लेकिन बाद में हमने खुद इस बात की जाँच करने का इरादा बनाया. रात 9 बजे कॉफी हाउस से निकल कर सिन्ध्या हाउस से आंबेडकर नगर जाने वाली 522 नंबर की बस में चढ गए. वहां महफ़िल जैसा कुछ नहीं था पर शराब की महक बस में भरी हुई थी. इधर उधर जांचने से लगा कि कोई दीवाना नशा करके बैठा होगा. हम पीछे जा कर बैठ गए. थोड़ी देर बाद हम देखते है कि एक साहब पेप्सी की बोतल निकाल कर गटक रहे है.लेकिन तेज महक बता रही थी कि मामला कुछ और ही है.जब दोबारा बोतल खुली और पेप्सी गटकी गई तो यकीन हो गया कि ये हरकत उन हज़रत की है.

हमने जब उनसे पुछा कि वे बस में शराब क्यों पी रहे है तो पहले वे बोतल दिखा कर कहने लगे कि पेप्सी है लेकिन जब मामला गरम होने लगा तो माफ़ी मांगने लगे. फिर उठ कर चल दिए. बस से बाहर निकल कर हमे गलियां और उतर कर आने की चुनौती देने लगे. हम नहीं उतरे. हमसे एक सीट आगे बैठी संगीता हमें बताने लगी,  ‘अरे ये तो रोज का मामला है.मेरी छुट्टी रोज 8 बजे खत्म होती है और मैं इस एहसास के साथ बस में चढती  हूँ  कि आज भी कोई शराबी मेरे साथ बतमीज़ी कर सकता है.’
हमने डीटीसी के कंडक्टर से पूछा कि वह क्यों बस में ऐसा होने देता है तो उसने बताया कि दिन में ऐसा करने की हिम्मत कोई नहीं करता क्योंकि टिकट चेक करने वाले बस में कभी भी चढ जाते है लेकिन रात में कभी चेक करने वाले नहीं आते और लोग मनमानी करने लगते है.उसने यह भी कहा कि एक दो बार शुरू में उसने हस्तक्षेप करने की कोशिश की लेकिन जब उसकी पिटाई होने लगी तो कोई बचाने नहीं आया. कंडक्टर फरीदाबाद का रहने वाला है और उसे इस बात अफ़सोस है कि दिल्ली में लोग गलत देखने पर भी उसके खिलाफ नहीं बोलते. रात में वह पिटाई के डर से टिकट भी लोगों से नहीं मांगता.

बातों- बातों में  हमें कई किस्से पता चले. राजेश, जो खानपुर का रहने वाला है, ने बताया कि सबसे ज्यादा ऐसी हरकत पंचशील और जी. के. के रहने वाले करते है. वे लोग बियर पीते है और लड़कियों के साथ बतमीजी करते है. कई बार तो ऐसी गन्दी गाली देते है कि शर्म आ जाती है.

लोग बताते है कि यह ऐसी  बस के आने के बाद बढ़ा है.ऐसा नहीं कि पहले ऐसा नहीं होता था लेकिन तब शीशे सफ़ेद होते थे और हवा के लिए खुले रखने पड़ते थे ऐसे में जब कोई ऐसा करता था तो बाहर आवाज़ लगाकर पुलिस को बुलाना आसान होता था.लेकिन रंगीन  शीशों  के कारण और दरवाज़ा बंद होने के चलते आदमी अंदर कुछ भी करे, मरे, पीटे, गाली  दे बाहर पता नहीं चलता.

संगीता बताती है कि रात में बस का सफर जोखिम भरा होता है.क्योंकि चेक करनेवाले कभी नहीं आते इस लिए लोगों में डर नहीं होता.कई बार उसे लगता है कि उसके साथ बदतमीजी होने वाली है लेकिन भगवन का शुक्र है कि ऐसा अब तक नहीं हुआ.

जब हम खानपुर से लौट रहे थे तब सच में बार जैसा माहौल था.पीछे की सीट में 5शरीफजादे बियर पी रहे थे और बीच की सीट पर नमकीन रखा हुआ था.और जैसा कि साथियों से सुना था संगीत भी बज रहा था. हमने बस के रंगीन शीशे पर नज़र दौडाई, बंद दरवाज़े को परखा फिर सोचा कुछ नहीं बोलते.  


Jun 29, 2011

क्यों दी गयी जीतन मरांडी को फांसी ?


झारखंड की गिरीडिह अदालत ने हाल ही में चिलखारी हत्याकांड मामले में जिन चार लोगों को फांसी की सजा मुकर्रर की है,उनमें राज्य के लोक कलाकार जीतन मरांडी भी हैं। जीतन मरांडी क्रान्तिकारी जनवादी मोर्चा (आरडीएफ)के सदस्य हैं। आरडीएफ के सचिव राजकिशोर और साईंबाबा की ओर से जीतन मरांडी की गिरफ्तारी पर जारी प्रेस विज्ञप्ती...

लोक कलाकार जीतन मरांडी को गिरडीह की निचली अदालत ने चिलखारी केस में दोषी  करार देकर फांसी की सजा दे दी। 27 अक्तुबर 2007 को चिलखारी में झारखंड़ के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी के बेटे की अनुप मरांड़ी सहित 19 लोगों की गोली लगने से मौत हुई थी। इस केस में जीतन मरांडी को जानबुझ कर फंसाया गया है क्योंकि एक जन कलाकार के रूप में जीतन मरांडी अपने संगठन झारखंड एभेन और क्रान्तिकारी जनवादी मोर्चा के जरिए राज्य की जनविरोधी नीतियों और दमनात्मक कार्यवाहियों की खिलाफत करता था।

वह विस्थापन, कारपोरेट लूट और राजकीय दमन के खिलाफत गीतों, नाटकों और लेखन के माध्यम से कर रहा था। सार्वजनिक मंचों पर इन गीतों के माध्यम से वह जन जागरूकता फैलाने के कारण सरकार की जनविरोधी की खिलाफत के कारण जीतन मरांडी कई बार जेल गया है। उसके ललकारते स्वर को रोकने के लिए इस बार उसे चिलखारी केस में फंसा दिया क्योंकि उसने प्रभात खबर में तीन कड़ियों में छपे लेख में झारखंड़ के नक्सलवादी आन्दोलन के कारणों को खंगालते हुएराज्य की जनविरोधी भूमिका और जनता के नक्सलवादियों से लगाव का खुलासा किया था। 5 अप्रैल 2008 को इस लेख की अन्तिम कड़ी छपते ही उसे रांची पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया जब वह रातू रोड़ में विस्थापन विरोधी जनविकास आन्दोलन की राज्य परिषद् की बैठक के बाद अपने घर लौट रहा था।

जीतन मरांडी पर सरकार ने पहले राजद्रोह का मुकदमा दर्ज किया गया जिसमें आरोप लगाया कि 1 अक्तुबर 2007को रांची में राज्यपाल भवन की समक्ष हुई राजनैतिक बंदी रिहाई रैली में उसने सरकार के खिलाफ उकसाउ भाषण दिया था। इसके बाद उसपर मानों केस लादने का सिलसिला सा शुरू कर दिया गया। चिलखारी केस के अलावा थाना गांव के दो केस,पीरटांड थाने में एक केस और तिसरी थाने में दो केस भी उस पर लाद दिए।

गौरतलब है कि पीरटांड और तिसरी थाने में दर्ज केस के दौरान तो जीतन मरांडी अलग-अलग केसों के सिलसिले में जेल में था। इससे सरकार की जीतन की आवाज को चुप कराने की मंशा को साफ हो जाती है। चिलखारी केस में भी पुलिस अधिकारियों ने पहले जीतन मरांडी के होने की सम्भावना से इन्कार किया था। चिलखारी घटना की रिपोर्ट करते हुए प्रभात खबर अखबार ने जीतन मरांडी को आरोपी ठहराते हुए उसकी तस्वीर प्रथम पृष्ठ पर छाप दी थी। बाद में प्रभात खबर के सम्पादक ने जीतन मरांडी से इस गलती की सार्वजनिक तौर पर माफी मांगी थी।

उसी दौरान पुलिस उच्चाधिकारियों ने भी बयान दिया था कि चिलखारी केस का आरोपी जीतन मरांडी सांस्कृतिककर्मी जीतन मरांडी नहीं है बल्कि माओवादी कमांडर जीतन मरांडी है। परन्तु बाद में पुलिस ने सांस्कृतिक जीतन मरांडी और माओवादी कमांडर जीतन मरांडी दोनों को ही चिलखारी घटना में आरोपी बना दिया। सांस्कृतिक जीतन मरांडी को घटना में आरोपी बनाने के लिए तीन नए गवाहों को शामिल कर लिया। इस तरह जीतन मरांडी को फंसाने की साजिश रची गई।

चौबीस  मार्च 2009 को जीतन मरांडी को चिलखारी केस की सैशन कोर्ट की पेशी में लाया गया था। जब जीतन मरांडी सैशन हाजत में अन्य बन्दियों के साथ बैठा था तो एक आदमी,जो खुद को गिरिडीह टाउन थाना प्रभारी बता रहा था,उससे आकर मिला और बाद में चला गया। बाद में सिपाही ने जीतन को जबरन अकेले ही सैशन हाजत से बाहर निकाला और उसे सैशन कोर्ट में ले गया। सैशन हाजत से निकलते ही गिरिडीह टाउन थाना प्रभारी ने वहां खड़े लोगों को कहा कि यह जीतन मरांडी है,इसे पहचान लो। बाद में सभी लोग जीतन के पीछे-पीछे सैशन कोर्ट तक गए। सैशन कोर्ट में जीतन मरांडी को बगैर हाजिरी के दस्तखत करवाए ही वापिस लौटाने की कोशिश की जिसपर जीतन मरांडी ने ऐतराज भी जताया।

दरअसल पुलिस ने केस जिन गवाहों को जीतन मरांडी की पहचान करवा दी थी, उन्होनें ही बाद में जीतन मरांडी के घटना स्थल पर मौजूद होने की गवाही दी। जीतन मरांडी ने उपरोक्त घटना के बारे में न्यायालय को अवगत भी करवाया था।

गौरतलब है कि इन गवाहों में चिलखारी केस के मृतकों के परिवार का एक भी सदस्य नहीं हैं। सभी बाबूलाल मरांडी की पार्टी झारखंड विकास मोर्चा के कार्यकर्ता हैं। इन्ही गवाहों के बयान के आधार पर निचली अदालत ने जीतन मरांडी को फांसी की सजा दे दी। जीतन मरांडी की सजा भारत के अपराधिक न्याय प्रणाली के सरकार और पुलिस की कठपुतली होने का पर्दाफाश करती है जो सरकार के विचार से असहमत लोगों को,अन्याय के खिलाफ और जनहित में आवाज उठाने वाले लोगों को खासकर भारत के सर्वाधिक शोषित और उत्पीड़ित आदिवासीयों,दलितों,पिछड़ों और अल्पसंख्यकों को फांसी की सजा देती है।

चिलखारी केस में फांसी की सजा पाने वाले जीतन मरांडी,मनोज रजवार,छत्रापति मंड़ल और अनिल राम भी आदिवासी,दलित और पिछड़े जातियों के अत्यन्त गरीब परिवारों से हैं। न्यायिक प्रक्रिया और आपराधिक न्याय प्रणाली के दुरूपयोग कर जीतन मरांडी को दिलवाई गई फांसी की सजा दिलवाने के केस भारत में कोई नई बात नहीं है। इससे पहले आंध्र प्रदेश के क्रान्तिकारी नेता किस्ता गौड़ और भूमैया को भी फांसी की सजा दी गई थी। बारा केस में पांच लोगों को फांसी की सजा दे दी।

उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश भगवती ने माना है कि ‘कई बार पुलिस गवाहों को तैयार करती है ताकि पुलिस की विचार को सही प्रमाणित किया जा सके।’इसी केस में उच्चतम न्यायालय ने प्रावधान किया था कि फांसी की सजा ‘दुर्लभतम से दुर्लभ' केस में दी जाए। इस निर्णय के बावजूद भारत की न्यायायिक प्रणाली में मौत की सजा रेवडियों की तरह बांटी जा रही है।

एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 2006 से 2007 के दौरान कम से कम 140 लोगों को मौत की सजा सुनाई गई थी। विश्व के 139 देश फांसी की सजा समाप्त कर चुके हैं। परन्तु विश्व के सबसे बड़ा लोकतन्त्र होने का दावा करने वाली सरकार फांसी की सजा को खत्म करने को तैयार नहीं है क्योंकि वह फांसी की सजा का सर्वाधिक प्रयोग आन्दोलनकारियों और समाज परिवर्तन का सपना देखने वाले लोगों की आवाज चुप कराने के लिए करती है ताकि वह शोषण और लूट कायम करने के लिए बनाई जा रही नीतियों को बगैर विरोध के लागू कर सके।

क्रान्तिकारी जनवादी मोर्चा मांग करता है कि जीतन मरांडी सहित अन्य लोगों की फांसी की सजा तुरन्त रद्द की जाए तथा उन्हें बाइज्जत बरी किया जाए। जीतन मंराड़ी के खिलाफ साजिश करने वाले राजनैतिज्ञों,पुलिस अधिकारियों को सजा दी जाए। फांसी की सजा खत्म किया जाए। मोर्चा सभी प्रबुद्ध लोगों, जनतांत्रिक संगठनों से अपील करता है कि जीतन को न्याय दिलाने की लड़ाई को तेज करने के लिए एकजुट हो।


 

छोटे नाटक की लंबी कहानी

रवीन्द्रनाथ ठाकुर के 150वें जन्मवर्ष पर तोता-कहानी का मंचन
सौ बरसों से भी पहले की लिखी रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कहानी में ये ज़रूर जोड़ा गया कि रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने शिक्षा व्यवस्था की इस विसंगति पर प्रहार करके ही नहीं छोड़ दिया बल्कि सही में शिक्षा कैसी होनी चाहिए, ये विश्वभारती और शांतिनिकेतन की स्थापना करके बताया...

विनीत तिवारी

इन्दौर। रवीन्द्रनाथ ठाकुर लिखित ”तोता कहानी“ शिक्षा प्रणाली की विसंगतियों को उजागर करती है। मुश्किल से दो पेज की ये कहानी मशहूर शिक्षाशास्त्री पाउलो फ्रेयरे की शिक्षा संबंधी अवधारणाओं का एक सरल कहानी में रूपांतरण है। फ्रेयरे के मुताबिक शिक्षा की प्रक्रिया में विद्यार्थी को गुल्लक या बैंक समझकर उसके भीतर ज्ञान ठूँसा या जमा किया जाता है, जबकि विद्यार्थी एक जीवंत इकाई है। वो हासिल ज्ञान को सँवार-सुधार या खारिज कर सकता है। कहानी में राजा एक तोते को पढ़ा-लिखाकर बड़ा विद्वान बनाने की सनक का शिकार हो जाता है और उसके लिए बेहतरीन सोने का पिंजरा बनाने से लेकर महापंडितों तक का प्रबंध किया जाता है।

उन्मुक्त, स्वच्छंद उड़ने वाला तोता सोने के पिंजरे के पीछे किताबों के ढेर में दब जाता है। राजा कुछ समय बाद निरीक्षण कर देखता है कि अब तोता टें-टें-टें नहीं करता, उड़ने के लिए फड़फड़ाता नहीं, तो वो सोचता है कि ज्ञान ने इसे सभ्य व सुसंस्कृत बना दिया है लेकिन हक़ीक़त ये होती है कि तोता कुछ सीखा नहीं होता। उल्टे वो सब भूल गया होता है जो उसे पहले आता था - प्रकृति से प्रेम, आकाश में उड़ान, अपनी जुबान, जो भी उसका अपना सहज था, वो सब।

सौ बरसों से भी पहले की लिखी रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कहानी में ये ज़रूर जोड़ा गया कि रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने शिक्षा व्यवस्था की इस विसंगति पर प्रहार करके ही नहीं छोड़ दिया बल्कि सही में शिक्षा कैसी होनी चाहिए, ये विश्वभारती और शांतिनिकेतन की स्थापना करके बताया। नाटक के हिस्से के तौर पर शांतिनिकेतन के बारे में जानकारी देने में नाटक की पकड़ ढीली पड़ने का रिस्क था लेकिन पोस्टरों और कविता के माध्यम का खूबसूरत इस्तेमाल करते हुए तथा दर्शकों में वैकल्पिक शिक्षा को जानने की उत्सुकता के पलों को समझते हुए ये हिस्सा भी काफी रोचक रहा।

पढ़ते हैं बच्चे जहाँ पेड़ों के नीचे
गिलहरी भी उनकी कक्षा में बैठ जाती है पीछे
आम की कैरी टपकती है उत्पल के सर पर
टीचर के पीछे उड़ती है तितली फरफर
ऐसी शिक्षा में लगता है बच्चों का मन
कहते हैं उस जगह को शांतिनिकेतन।

14 जून 2011 को हुए इस नाटक का निर्देशन सारिका श्रीवास्तव ने किया। पटकथा लेखन एवं निर्देशन में डॉ. जया मेहता एवं विनीत तिवारी ने सहयोग किया। संगीत दिया अभिनय करने वाले बच्चों में से ही एक राज ने। नाटक में सूत्रधार जैसी भूमिका में बोलती क़िताब बनकर आयी महिमा, नाटक के मुक्ष्य क़िरदार तोते की भूमिका में पीयूष ने और तोते को पढ़ाने वाले अंतरराष्ट्रीय ख्याति के प्रकाण्ड विद्वानों की भूमिका में अमन, खुशी और सुनीता को काफी सराहना मिली। गुलरेज़, सुलभा, रुचिता, शारदा मोरे, अरविंद बौरासी, अशोक दुबे, प्रमोद बागड़ी, आस्था तिवारी, विनीता हेमनानी ने मंच के पीछे की जिम्मेदारियाँ निभाईं।

शिविर के दौरान ही रोशन नायर ने एक तरफ़ बच्चों को डान्स करना और शरीर के अंगों की हिचक खोलना सिखाया तो दूसरी तरफ परमाणु ऊर्जा, फुकुशिमा, चेर्नोबिल और जैतापुर जैसे मसलों को आसान तरह से बच्चों की उत्सुकताओं में शरीक कर दिया। दिल्ली से आये प्रसिद्ध चित्रकार अशोक भौमिक ने बच्चों को 21 मई 2011 को बगैर चित्रकारी सीखे बड़े ही आसान और सरल तरीके से पोस्टर बनाने सिखाये, जिसमें बच्चों ने बहुत सारे पोस्टर बनाये।


उसके पूर्व 20 अप्रैल को जैतापुर व चेर्नोबिल के संबंध में बच्चों को जानकारी दी गई जिसके आधार पर उन्होंने परमाणु विनाश के विषय पर अनेक पोस्टर बनाये।पंखुरी मिश्रा ने बच्चों एवं उनके अभिभावकों को शिक्षा अधिकार अधिनियम की जानकारी दी और बच्चों के भविष्य के लिए इस कानून का इस्तेमाल करने की अपील की। अशोक दुबे ने बच्चों को प्रोत्साहित करते हुए याद्दाश्त बढ़ाने एवं आवाज़ में भाव-प्रवणता लाने के व्यायाम बताए और इस रंगशाला को ”मस्ती के मस्तानों की पाठशाला“ का नाम दिया। बच्चों के शिविर के दौरान बनाये गए पोस्टर भी इस मौक़े पर प्रदर्शित भी किये गए।

नवीन माध्यमिक शासकीय विद्यालय, मोतीलाल की चाल के हेडमास्टर श्री ओ.पी.मोहनिया और श्री चंद्रप्रकाश महावर, प्रभारी, जनशिक्षा केंद्र, नेहरू नगर ने इस कार्यशाला हेतु विद्यालय का हॉल उपलब्ध करवा कर सहयोग प्रदान किया।कार्यक्रम की मुख्य अतिथि कॉमरेड पेरीन दाजी व इकाई अध्यक्ष श्री विजय दलाल ने शिविर के सफल संचालन के लिए बच्चों और सारिका को बधाई दी और सभी बच्चों को इप्टा के शिविर के प्रमाण-पत्र वितरित किये।

Jun 28, 2011

बंद चाय बागानों को चलाएगी सरकार


चाय बागानों में 50 हजार से ज्यादा आदिवासी श्रमिक परिवारों  के पास जीविका का कोई साधन उपलब्ध नहीं है. रोटी और भोजन की बात तो दूर इन बंद चाय बगानो में पीने का पानी भी उपलब्ध नहीं है...

राजन कुमार 

पश्चिम बंगाल की नवनिर्वाचित सरकार ने राज्य के आदिवासियों के प्रति अपनी विशेष चिंता प्रदर्शित करते हुए आदिवासियों की खाद्य सुरक्षा प्रदान करने के लिए सुलभ मूल्य पर चावल की आपूर्ति हेतु 156 करोड़ रूपयों की राशि आवंटित करने की घोषणा की है। मुख्यमंत्री ने  उत्तर बंगाल के 16 बंद चाय बागानों  को लेकर  खाद्य मंत्री ज्योति प्रिय मलिक को विशेष रूप से निर्देष दिया है कि वे आगामी 30जून के अंदर उत्तर बंगाल के बंद चाय बगानों का दौरा करके सरकार को रिपोर्ट पेश करें।

सरकार द्वारा आवंटित उपरोक्त राशि के तहत बीपीएल एवं अन्नपूर्णा और अन्त्योदय कार्डधारियों को दो रूपया प्रति किलो के दर से चावल उपलब्ध किया जायेगा एवं इस उद्देश्य से अगले तीन माह के लिए 1 लाख 22 हजार 256 मैट्रिक टन चावल खरीदा जायेगा। उधर केन्द्र सरकार द्वारा उसी अनुपात में फुड कार्पोरेशन ऑफ  इण्डिया द्वारा चावल की आपूर्ति करने की घोषणा की गयी है। 16बंद चाय बागानों  के बारे में उपलब्ध जानकारी पर वर्तमान सरकार को भरोसा नहीं  है क्योंकि  ये सूचना पूर्ववर्ती सरकार द्वारा संकलित की गयी थी।

इनमें  से 15चाय बगान जलपाईगुड़ी जिले में  और एक चाय बगान दार्जलिंग जिले में है। एक मोटे अनुमान के साथ इन चाय बगानो में 50 हजार से ज्यादा आदिवासी श्रमिक परिवार के पास जीविका का कोई साधन उपलब्ध नहीं है. रोटी और भोजन की बात तो दूर इन बंद चाय बगानो में पीने का पानी भी उपलब्ध नहीं है,ना ही परिवारों को आवासीय सुविधा या बिजली उपलब्ध है। अत: मुख्यमंत्री ने बंद चाय बागानो की दुरावस्था पर आवश्यक कदम उठाने का निर्णाय लेकर सराहनीय कार्य किया है।

प्रश्न उठता है कि उपरोक्त 16चाय बागान क्यों  बंद हैं और इनकी विषय में राज्य सरकार के श्रम विभाग द्वारा आज तक क्या कार्रवाई की गयी है। क्या कारण है कि चाय बगान के मालिकों द्वारा जब कभी भी चाय बगान में ताला बंदी की घोषणा कर दी जाती है यह ताला बंदी का नोटिस चिपकाकर चाय बगान के मालिक या मैनेजर रात के अंधेरे मे चाय बगान छोड़ कर भाग जाते हैं और चाय बागान के मजदूरों के वेतन,राशन, पानी, बिजली, दवा, के लिए किसी तरह की व्यवस्था नही की जाती है।

बंद चाय बागानों के बारे में राज्य सरकार को ठोस एवं कठोर कदम उठाने की आवश्यकता है। ठोस कानूनी कार्रवाई द्वारा चाय बागान मालिकों को सतर्क कर देने की आवश्यकता है कि वे मनमाने ढंग से चाय बागान बंद करके न भाग सके। बंद चाय बागानों को अविलम्ब खुलवाने की दिशा में भी राज्य सरकार को आवश्यक कानूनी एवं शासकीय कार्रवाई करने की आवश्यकता है। नवनिर्वाचित सरकार के सामने बंद चाय बागान एक चुनौती हैं  जो उद्योगों के विषय में सरकार नीति और कार्यक्रम को उजागर करेंगी।

उसी तरह जंगल महल में पश्चिम मिदनापुर जिला के 13 ब्लाक और बाकुड़ा जिले के 5 ब्लाक एवं संपूर्ण पुरूलिया जिला में जनसंख्या पर गौर किया जाये तो यह भी आदिवासियों की जनसंख्या 35प्रतिशत से ज्यादा है और इनके साथ है कुर्मी महतो सम्प्रदाय के लोग जिनकी संख्या 30प्रतिशत है। कुर्मी महतो एवं आदिवासी की भाषा एवं संस्कृति में एक रूपता है। इनकी भाषा संथाल, मुण्डारी , कुर्माली , कुड़ुख इत्यादी है। उल्लेखनीय है कि 1935 तक कुर्मी महतो समुदाय भी अनुसूचित जनजाति में शामिल था। सरकारी अवहेलना के कारण जंगल महल का यह कुर्मी महतो एवं आदिवासी समुदाय आर्थिक दृष्टि से पिछड़ा रह गया। नई सरकार ने जंगल महल के आदिवासियों के विकास के लिए विशेष पैकेज की घोषणा करके उनका ध्यान रखा।

गौरतलब है कि राष्ट्रीय स्तर पर अनुसूचित जातियों,जनजातियों पिछडे वर्गों ,अल्पसंख्यकों , महिलाओं आदि के उन अधिकारी की बहाल करने का जिक्र नहीं   है, जिनमें एक के बाद एक सरकार घेर तिरस्कार का रवैया अपनाए रही। यहां तक कि उपेक्षित वर्गों की सत्ता में आनुपातिक हिस्सेदारी देने वाले संवैधानिक प्रावधानों की भी ठीक से लागू नही किया गया। जिसका फलस्वरूप आज भी सरकारी नौकरियों मे 2006-07की कार्मिक विभाग की रिपोर्ट के अनुसार श्रेणी एक और दो में अनुसूचित जातियो का प्रतिशत 11.9 और 13.7 ( कुल 16 .00 ) की तुलना में अनुसूचित जातियों को 4.3 और 4.5 (7.5 की तुलना में ) रहा है।

इन उपेक्षित वर्गों की समस्याओं का आकलन केवल राशन कार्ड,बीपीएल कार्ड, एवं मनरेगा, योजनाओं के संन्दर्भ में होता है। इस का उद्देश्य इन उपेक्षित वर्गों को भीखमंगेपन के स्तर पर रोजाना 20 रूपयें) किसी तरह जिंदा रखना है। इन हालातों के बीच अगर नयी सरकार इन तबकों और क्षेत्र के लिए कुछ करती है तो बेहतर होगा.



उभरते हुए लेखक और ब्लॉग संचालक.







पेट्रोलियम की महंगाई रोकने के सुझाव


जब सरकार रसोई-गैस,डीजल,केरोसिन और पेट्रोल की कीमतें बढाने के मामले में इन कम्पनियों की ओर से हस्तक्षेप कर सकती है तो इन कम्पनियों के खर्चों को नियन्त्रित करने के लिये हस्तक्षेप क्यों नहीं करती...

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

सरकार जब भी रसोई-गैस, डीजल, केरोसीन और पेट्रोल की कीमतें बढाती है, सरकार की ओर से हर बार रटे-रटाये दो तर्क प्रस्तुत करके देश के लोगों को चुप करवाने का प्रयास किया जाता है.पहला तो यह कि कि अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के भाव बढ गये हैं,जो सरकार के नियन्त्रण में नहीं है. दूसरा तर्क यह दिया जाता है कि रसोई-गैस, डीजल, केरोसीन और पेट्रोल की आपूर्ति करने वाली कम्पनियों को भारी घाटा हो रहा है,इसलिये रसोई-गैस, डीजल, केरोसीन और पेट्रोल की कीमतें बढाना सरकार की मजबूरी है.


उसके बाद राष्ट्रीय मीडिया की ओर से हर बार सरकार को बताया जाता है कि यदि सरकार अपने करों को कम कर दे तो रसोई-गैस, डीजल, केरोसीन और पेट्रोल की कीमतें बढने के बजाय घट भी सकती हैं और आंकड़ों के जरिये यह सिद्ध करने का भी प्रयास किया जाता है कि रसोई-गैस, डीजल, केरोसीन और पेट्रोल की आपूर्ति करने वाली कम्पनियों को कुल मिलाकर घाटे के बजाय मुनाफा ही हो रहा है, फिर कीमतें बढाने की कहॉं पर जरूरत है.

मीडिया और जागरूक लोगों की ओर से उठाये जाने वाले इन तर्कसंगत सवालों पर सरकार तनिक भी ध्यान नहीं देती है और थोड़े-थोड़े से अन्तराल पर रसोई-गैस,डीजल,केरोसीन और पेट्रोल की कीमतें लगातार और बेखौफ बढाती ही जा रही है,जिससे आम गरीब लोगों की कमर टूट चुकी है.राजनैतिक दल भी औपचारिक विरोध करके चुप हो जाते हैं.

दूसरी तरफ लोगों में सरकार के इस अत्याचार का संगठित होकर प्रतिकार करने की क्षमता नहीं है.मध्यम एवं उच्च वर्ग जो हर प्रकार से प्रतिकार करने में सक्षम है,वह एक-दो दिन चिल्लाचोट करके चुप हो जाता है.ऐसे में आम-अभावग्रस्त लोगों को इस दिशा में कुछ समाधानकारी मुद्दों को लेकर सड़क पर आने की जरूरत है.कारण कि रसोई गैस एवं केरोसिन की कुल खपत का करीब 40 प्रतिशत व्यावसायिक उपयोग हो रहा है, जिसके लिये मूलत: इनकी कालाबाजारी जिम्मेदार है, जिसमें सरकार के अफसर भी शामिल हैं.

जाहिर इसकी सजा कालाबाजारी में शामिल माफियाओं-अफसरों को होनीचाहिए,जबकि डीजल, रसोई गैस एवं केरोसिन की कीमतें बढ़ाकर जनता पर सरकार अत्याचार कर रही है.रसोई-गैस,डीजल, केरोसिन   और पेट्रोल की आपूर्ति करने वाली कम्पनियों के कर्मचारियों और अफसरों को जिस प्रकार की सुविधा और वेतन दिया जा रहा है,वह उनकी कार्यक्षमता से कई गुना अधिक है,जिसका भार अन्नत:देश की जनता पर ही पड़ता है, जब सरकार रसोई-गैस,डीजल, केरोसिन और पेट्रोल की कीमतें बढाने के मामले में इन कम्पनियों की ओर से हस्तक्षेप कर सकती है तो इन कम्पनियों के खर्चों को नियन्त्रित करने के लिये हस्तक्षेप क्यों नहीं करती है?

जब भी इस बारे में सरकार के नियन्त्रण की बात की जाती है तो सरकार इसे कम्पनियों का आन्तरिक मामला कहकर पल्ला झाड़ लेती है,जबकि कम्पनियों द्वारा अर्जित धन की बर्बादी के कारण होने वाले घाटे की पूर्ति के लिये सरकार रसोई-गैस, डीजल, केरोसीन और पेट्रोल की कीमतें बढाने के लिये इन कम्पनियों की ओर से जनता पर भार बढाने में कभी भी संकोच नहीं करती है



प्रेसपालिका अख़बार के संपादक और भ्रष्टाचार व् अत्याचार अन्वेषण संस्थान के अध्यक्ष.
 
 
 

Jun 27, 2011

'हिंसा प्रेमी है हमारी सरकार' - पीवी राजगोपाल

भूमि सुधार की मांगों को लेकर 2007 में मध्य प्रदेश के ग्वालियर से 25 हजार किसान पदयात्रा कर दिल्ली पहुंचे थे,जिसे ‘जनादेश’यात्रा कहा गया। एकता परिषद के बैनर तले हुई जनादेश यात्रा के बाद सरकार ने भूमि सुधारों को सामयिक बनाने के लिए ‘भूमि सुधार परिषद्’ का गठन किया था। हाल ही में एकता परिषद् के अध्यक्ष पीवी राजगोपाल दिल्ली दौरे पर थे। उनसे कई मसलों पर विस्तृत बातचीत हुई थी, पेश है प्रमुख अंश...  

पीवी राजगोपाल से अजय प्रकाश की बातचीत 


कालेधन के खिलाफ दिल्ली में अनशन कर रहे बाबा रामदेव और उनके सहयोगियों पर  हमला कर सरकार ने आखिर क्या संदेश देना चाहा है?
तानाशाही और धोखे की यह सरकारी नीति बहुत दिन तक कारगर नहीं होगी। अगर देश की जनता लाइन लगाकर सरकारों को बना सकती है तो वह सरकार की चूलें भी हिला सकती है। हमारी सरकार अहमक है और उसे हिंसा पसंद है। पहले सरकार कश्मीरी युवकों को गोली मारती है फिर बात करती है, किसानों पर गोली दागती है फिर मांगें मानती है, उल्फा के युवाओं को तबाह करने के बाद शांतिवार्ता करती है। यहां तक कि अहिंसा में विश्वास  करने वाले संगठनों को सरकार पहले हिंसक घोषित  करती है,फिर वार्ता की तरफ बढ़ती है। हमारी हिंसाप्रेमी सरकार को अपनी जनता के प्रति इस व्यवहार को जितनी जल्दी हो सके बदल लेना चाहिए।

छत्तीसगढ़ में एकता परिषद् पर माओवादियों से संबंध और उस पर प्रतिबंध की खबरों की क्या सच्चाई है?
यह सरकार के उसी अभियान का हिस्सा है ,जिसके तहत वह अहिंसक संगठनों को हिंसक करार देने पर तुली है। दरअसल, आदिवासी इलाकों के जल, जंगल और जमीन की लूट का निर्णय सरकार कर चुकी है। अब वह सिर्फ लूट के समर्थकों को ही राज्य हितैषी मानती है और बाकियों को दुश्मन। इस लूट के खिलाफ पहला मोर्चा आदिवासियों ने संभाला है इसलिए सरकार के वे सबसे बड़े दुश्मन हैं। सरकार आदिवासियों और उनके संघर्षों के साथ खड़े विभिन्न संगठनों-समूहों को सबक सिखाने के लिए तैयार बैठी है। सबक सिखाने के लिए वह नक्सलवाद से निपटने के बहाने आदिवासियों के पक्ष में खड़े हो रहे लोगों को नक्सली करार देकर दमन के एक ही डंडे से सबका आसान शिकार कर रही है। आसान इसलिए है कि जिनका नक्सलवाद में विश्वास नहीं है,जो संगठन अहिंसा के रास्ते आदिवासियों की लूट का पुरजोर विरोध कर रहे हैं, उनको भी राज्य नक्सली बताकर आदिवासियों के संघर्षों से अलग कर देना चाहता है। उसी के नतीजे के तौर पर एकता परिषद पर भी प्रतिबंध की खबरें उड़ाई जा रही हैं।

छत्तीसगढ़ में एकता परिषद् पर प्रतिबंध की खबर के बाबत राज्य प्रशासन  से संगठन की कोई बात हो पायी है ?
छत्तीसगढ़ के एक दैनिक में पीयूसीएल के प्रतिबंध लगाने संबंधी समाचार छपा था। उसी में एकता परिषद की गतिविधियों को संदिग्ध और प्रतिबंध लगाये जाने की खबर थी। इस बाबत परिषद के कुछ साथी राज्य के पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन  से मिले थे। महानिदेशक ने ऐसी किसी कार्यवाही से इनकार किया और अनभिज्ञता जाहिर की। दरअसल, इसमें मुझे राजनीतिक खेल ज्यादा लगता है।

कैसा राजनीतिक खेल?
छत्तीसगढ़ के ज्यादातर जिलों में एकता परिषद् का मजबूत जनाधार होने के कारण राज्य की भाजपा सरकार और आरएसएस समय-समय पर हमारे खिलाफ दुष्प्रचार  करते रहते हैं। पहले आरएसएस ने एकता परिषद् पर क्रिश्चियन  धर्म फैलाने का आरोप लगाया और अब माओवादियों से संदिग्ध संबंध होने की अफवाह फैला रहे हैं। एकता परिषद् पर यह आरोप दिग्विजयसिंह जब मुख्यमंत्री थे तब भी लगता था, और अब भी लग रहा है। जो मुद्दों से भटकाने की साजिश है। मैंने सभी मंत्रियों को पत्र लिखा कि पुलिस,फॉरेस्ट गॉर्ड कब से माओवाद और समाजवाद के ज्ञाता हो गये,जो सबको माओवादी बताते रहते हैं। मैंने मंत्रियों से पूछा कि क्या इन गार्डों को गांधी दर्शन और माओ दर्शन  का पाठ पढ़ाया गया है।
दरअसल, इन्हें चुनौती हमारे अहिंसात्मह आंदोलन से है, जिसको किसी आसान रास्ते ये किनारे लगा देने की फिराक में हैं। वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था में जनता को सही राजनीति की तरफ मोड़ना, अधिकारियों को जिम्मेदार बनने के लिए मजबूर करना राजनीतिक पार्टियों के लिए मुख्य खतरा है। वह ऐसे किसी संगठन को जनता के बीच पैठ  नहीं बनाने देना चाहते, जो सही मायने में जनता को लोकतंत्र में भागीदारी के लिए उत्तेजित करे।

कुछ महीनों पहले आपने सरकार और माओवादियों से बातचीत में मध्यस्थ की भूमिका निभाने की बात कही थी, क्या सरकार ने कोई दिलचस्पी दिखायी ?
हमने इच्छा इसलिए जाहिर की,क्योंकि चंबल क्षेत्र में डाकुओं को समर्पण कराने का एक अनुभव हमारे पास है। हम जानते हैं कि हिंसा में भरोसा करने वाले संगठनों से कैसे वार्ता की जाये, लेकिन यह वार्ताएं आदिवासी हितों को ताक पर रखकर संभव नहीं हैं। कौन नहीं जानता कि आदिवासी इलाकों में जारी अन्याय,अत्याचार और शोषण को रोककर माओवादियों को पसरने से रोका जा सकता है, मगर सरकार मदद नहीं लेना चाहती क्योंकि वह हिंसा को खत्म नहीं करना चाहती। अगर मैं पत्रकार पी.साईनाथ की किताब के शीर्षक ‘एव्रीबॉडी लव ड्रॉट्स’की तर्ज पर कहूं तो आदिवासी इलाकों में ‘एव्रीवन लव कंफ्लिक्ट’।

मतलब हिंसा को जान-बूझकर कायम रखा जा रहा है?
बिल्कुल। इसका सबसे बड़ा फायदा खनन कंपनियों को है। किसी ने 50एकड़ की लीज ली और खुदाई 100 एकड़ में हो रही है। कौन उसकी तहकीकात करने वाला है? अगर जनता लूट पर ऐतराज करती है तो उसे राज्य माओवादी समर्थक या उनका जासूस बताकर सारी जिम्मेदारी से ही बच जाता है। संघर्ष का इलाका है,सुरक्षा बल और नक्सली एक दूसरे को मार रहे हैं,आदि का बहाना बनाकर सरकारी कर्मचारी कभी सुचारू रूप से काम नहीं करते । जबकि संघर्ष के इन इलाकों में कर्मचारियों को सामान्य क्षेत्रों से अधिक भत्ता मिलता है। तीसरे हैं ठेकदार जो इस इलाके में बहुत खुश हैं। उन्होंने सड़क,पुल,स्कूल बनाये या नहीं, कोई पूछने वाला नहीं है। कहीं से कोई सवाल उठे तो इस क्षेत्र में एक ही जवाब है नक्सली समस्या।
ऐसा नहीं कि माओवादियों को इसमें कोई नुकसान है। राज्य के अत्याचारी रवैये से लगातार उनके कॉडरों की भर्ती हो रही है और उन्हें अवैध खनन से भरपूर टैक्स मिल रहा है। मैं नक्सलियों से पूछना चाहता हूं कि अगर वे हथियार से ही देश की तकदीर बदलने में भरोसा करते हैं तो उन्होंने कभी किसी मित्तल, टाटा या एस्सार जैसों को शिकार क्यों नहीं बनाया? माओवादी अगर खनन के विरोध में हैं तो कभी किसी खनन मालिक और माफिया को क्यों नहीं बंधक बनाते। मेरी राय में आदिवासियों की जीत एक अहिंसक मजबूत आधार वाले जनांदोलन के जरिये ही हो सकती है।

कई बार सरकार जनता के दबाव में कुछ कानून बनाने के लिए तैयार हो भी जाती है, लेकिन उसका अमल कैसे सुनिश्चित हो?
जिन अधिकारियों के कारण क्षेत्र में काम पूरा नहीं हुआ है,जब तक उन्हें सजा देने का कड़ा प्रावधान नहीं होगा, तब तक सही ढंग से कानून के लागू किये जाने की उम्मीद बेमानी है। उदाहरण के तौर पर छत्तीसगढ़ को लीजिए। वहां पिछले 63 वर्षों में दस से अधिक आइएएस और आईपीएस मुस्तैद हुए होंगे। उनकी मुस्तैदी के परिणाम के तौर पर सरकार अब स्वीकार करती है कि आदिवासियों के साथ ऐतिहासिक अन्याय हुआ है। फिर इन अधिकारियों की सजा क्यों नहीं है?अगर किसी नौकर के रहते घर में चोरी हो जाये तो माना जाता है कि वह अपने काम के काबिल नहीं है। उसी तर्ज पर इन अधिकारियों की पेंशन क्यों नहीं बंद होती, सस्पेंड क्यों नहीं किये जाते।

ऐसी हालत क्यों है?
आपातकाल के दौर में मेरे यहां केरल में एक नाटक होता था। उसमें राजा का आदेश था कि जब वह सोया हो तो किसी तरह का शोर नहीं होना चाहिए। एक दिन रात में चोर आया तो कुत्ते भोंकने लगे। चूंकि राजा का आदेश शोर नहीं करने का था, इसलिए सभी कारिंदे कुत्तों की ओर दौड़े। चोरों ने इत्मीनान से लूट का सामान बांधा और चलते बने। कुछ ऐसी ही स्थिति हमारे देश की है। शांति और न्याय की बात करने वाले लोग देश के दुश्मन होते जा रहे हैं और कॉरपोरेट डकैत सरकार के हितैषी बने बैठे हैं।

लेकिन विरोध की ताकत भी तो बहुत बिखरी हुई है?
इसे हम भी शिद्दत से महसूस करते हैं,इसलिए एकता परिषद् की कोशिश है कि छोटे-मोटे अंतरविरोधों को छोड़, व्यापक एकता की ओर बढ़ा जाये।

गरीबों के बीच भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई माहौल क्यों नहीं बन पाता है?
गरीबों के बीच असल मुद्दा तो जल,जंगल और जमीन का ही है। मगर ऐसा नहीं है कि गरीबों में भ्रष्टाचार के खिलाफ रोष नहीं है। भ्रष्टाचार को लेकर देश में कई संघर्ष हुए हैं,बेशक उसकी व्यापकता अन्ना हजारे के मध्यवर्गीय आंदोलन की तरह नहीं रही है।

तो क्या भ्रष्टाचार के खिलाफ मध्यवर्ग और गरीब एक मंच पर आ सकते हैं?
पहले आजादी,फिर जयप्रकाश नारायण के आंदोलन के जरिये यहां के मध्यवर्ग ने अपने हिस्से में बढ़ते भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाईयां तो लड़ीं,मगर जैसे ही मामला गरीबों के ऊपर किये जा रहे भ्रष्टाचार का आया तो ये बिदक गये। कारण कि गरीबों के लिए पहले भ्रष्टाचारी (ज्यादातर)यही लोग थे, जो अन्ना के साथ संघर्ष में भ्रष्टाचार के  खिलाफ दिख रहे थे।
मध्यवर्ग अपने लिए बेहतर लोकतंत्र चाहता है,लेकिन अपने से नीचे के तबके के लिए वह भी शोषक है। वह क्षणभर भी कोक और पेप्सी या दूसरी कंपनियों के उत्पादन से जुड़े भ्रष्टाचार को, कामगारों पर हो रहे भ्रष्टाचार को नहीं सुनना चाहता। वह नहीं चाहता कि किसान उसको कोल्ड ड्रिंक त्यागने के लिए कहे और बताये कि उसके खेत और पारिस्थिकी कैसे इन कंपनियों ने बर्बाद कर रखे हैं। इसलिए अन्ना के आंदोलन को पूरा समर्थन देते हुए भी एकता परिषद् की कोशिशरहेगी कि मध्यवर्ग और देश के गरीबों को भ्रष्टाचार के खिलाफ एक साथ खड़ा किया जाये। शुचिता और त्याग की भावना वाले जुझारू युवा ऐसा कर सकते हैं और उसी कीमत पर भ्रष्टाचार के खिलाफ मुकम्मल लड़ाई संभव हो सकती है।

क्या यह एकता संभव होगी। खासकर तब जबकि दोनों वर्गों की जरूरतें अलग-अलग हैं?
इस देश के नब्बे फीसदी आंदोलन जल, जंगल, जमीन और जीवन जीने के संसाधनों की मांग को लेकर हैं। ऐसे में जरूरी है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ दिल्ली से शुरू हुए आंदोलन को व्यापक पहुंच वाला बनाया जाये और समाज के सभी तबकों को साथ लाया जाये। इस मसले पर तमाम संगठनों की बैठक हुई है और शीघ्र ही अन्ना हजारे के हस्ताक्षर से देशभर के संगठनों को चिट्ठियांजायेंगी और एक राष्ट्रव्यापी बैठक की तैयारी है।

लोकपाल मसौदा समिति में शामिल अन्ना हजारे की टीम को चुनावी पार्टियों ने चुनाव लड़ने की चुनौती दी है, इस बारे में आप क्या कहते हैं?
इस बहस में दम नहीं है। देश का हर आदमी जानता है कि हमारे देश के ज्यादातर जनप्रतिनिधि गुंडई, पैसा और जातिगत आधार पर चुने जाते हैं। दूसरी बात कि अगर चुनावी दल नागरिक समाज के लोगों के लिए चुन के आने की पात्रता की शर्त रखते हैं तो पहला सवाल देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और योजना आयोग की उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहुलवालिया पर उठता है,जो बिना चुने ही इस देश की तकदीर का फैसला कर रहे हैं। ऐसे में मेरी राय है कि जो देश आजादी के 63 साल बाद जनता को बुनियादी सुविधा उपलब्ध कराने में अक्षम रहा हो,उस देश के शासकों को जनता की ओर से उठ रहे सवालों पर चिढने और तानाशाहीपूर्ण रवैया अपनाने की बजाय संयत हो समाधान खोजना चाहिए।

एनएसयूआइ का आइसा पर गुंडा प्रदर्शन

जनज्वार. झारखंड की राजधानी रांची में 23 जून को लोकपाल बिल के मौजूदा मसौदे को कारगर बताने पहुंचे मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल को विरोध का सामना करना पड़ा था। विरोध कर रहे संगठन ‘आइसा’ से जुड़े छात्र मांग कर रहे थे कि लोकपाल के दायरे में प्रधानमंत्री के भ्रश्टाचार की जांच को शामिल किया जाये। लेकिन मंत्री साहब के सामने किया गया आइसा का यह विरोध कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई को पच नहीं सका और उससे जुड़े छात्रों ने विरोध कर रहे छात्रों को दौड़ा-दौड़ा कर बुरी तरह पीटा। मारपीट में आइसा के राष्ट्रीय  अध्यक्ष संदीप सिंह समेत कई छात्रों को चोट आयी है।

 गौरतलब है कि लोकपाल बिल के मौजूदा मसौदे को लेकर अन्ना हजारे की टीम और सरकारी प्रतिनिधियों के बीच उभरे मतभेद के बाद कांग्रेस ने तय किया है कि उसके नेता और मंत्री जनता में अपने अच्छे और सच्चे लोकपाल के बारे में जनता को जानकारी देंगे। उसी अभियान के तहत रांची के अशोक होटल में मीडिया को संबोधित करने सिब्बल पहुंचे थे, जहां कांग्रेस के राजनीतिक भविश्य एनएसयूआइ ने नागरिक समाज द्वारा तैयार लोकपाल को लागू करने की मांग पर लातों-घूसों से अपना पक्ष रखा।

एनएसयूआइ की गुंडई का यह ‘अहिंसात्मक’ प्रदर्शन  संगठन के प्रदेश अध्यक्ष कुमार राजा और महासचिव शाहनवाज के नेतृत्व में रांची के अषोक होटल के सामने हुआ। एनएसयूआइ के लोग संदीप सिंह के इस बात से खफा थे कि उन्होंने पत्रकार के बतौर कपिल सिब्बल से सवाल पूछ दिया था और मंत्री जी असहज हो गये थे। संदीप सिंह के मुताबिक ‘वह आइसा के राश्ट्रीय अध्यक्ष के साथ समकालीन जनमत नाम की पत्रिका के नियमित लेखक है। इसी हैसियत से उन्होंने जानना चाहा कि ‘सरकार प्रतिदिन टैक्सों में कॉरपोरेट समूहों को 240 करोड़ की छूट क्यों देती है।’

उनके इस सवाल का कपिल सिब्बल जवाब देते उससे पहले ही एनएसयूआइ से जुड़े पांच-छह लोगों ने संदीप को धक्का देना और फिर पहचान पत्र मांगना षुरू कर दिया। पहचान पत्र नहीं दिखा पाने की स्थिति में उनलोगों ने संदीप को धक्का मारकर बाहर कर दिया। पहचान के बावत संदीप ने बताया कि ‘समकालीन जनमत पंजीकृत पत्रिका नहीं है, इसलिए पहचान पत्र जारी नहीं करती।’

कांफ्रेंस हाल से बाहर कर दिये जाने के बाद संदीप अपने साथियों के साथ मिलकर कपिल सिब्बल और कांग्रेस की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ नारेबाजी करने लगे, जिसका जवाब कांग्रेस के छात्र संगठन ने ‘अहिंसात्मक’ लातों-घूसों से दिया। हालांकि हमलावरों और प्रदर्षनकारियों की संख्या बराबर थी, लेकिन प्रदर्षनकारी टकहराहट में नहीं गये और उन्होंने बचाव करना ही लोकतंत्र के लिए जरूरी समझा।

पहले पत्रकार और फिर छात्र संगठन के नेता के रूप में संदीप ने दोहरी भूमिका क्यों निभायी के बारे में उनकी सफाई है, ‘अगर चिदंबरम्-सिब्बल-अभिशेक मनु कांग्रेस के नेता और पूंजीपति समूहों के वकील हो सकते हैं तो मैं छात्र नेता और पत्रकार क्यों नहीं हो सकता।’

बहरहाल, आइसा के  अध्यक्ष संदीप सिंह ने कुमार राजा और अन्य के खिलाफ नामजद रिपोर्ट दर्ज करा दी है, लेकिन अबतक किसी आरोपी की गिरफ्तारी रांची पुलिस नहीं कर सकी है। सीपीआइएमल की राज्य समिति ने भी बयान जारी कर घटना की भर्त्सना की है और दोशियों की गिरफ्तारी मांग की है। पत्रकार संगठन जेयूसीएस की ओर से जारी विज्ञप्ती में इसे पत्रकार बिरादरी पर हमला बताया गया।

अमेरिकी ‘रडार’ पर अब पाक परमाणु ठिकाने?

एबटाबाद की कार्रवाई में पाकिस्तान ने अपनी क्षमता व चौकसी का जो प्रदर्शन किया था वह भी अमेरिका देख चुका है। एबटाबाद में की गई अमेरिकी कार्रवाई के बाद पाकिस्तानी विरोध के स्वर का स्तर भी अमेरिका भांप चुका है...

तनवीर जाफरी


पाकिस्तान की इस्लामाबाद स्थित सबसे बड़ी सैन्य अकादमी के बिल्कुल निकट एबटाबाद नामक संवेदनशील रिहायशी क्षेत्र में जहां कि कई पूर्व व वर्तमान सैन्य अधिकारियों के बंगले हैं,अमेरिकी सैन्य अधिकारियों ने गत् 1/2मई की रात अलकायदा प्रमुख ओसामा बिन लाडेन को ढूंढ निकाला तथा उसे वहीं मार गिराया।

इस घटना के बाद अमेरिका ने भी पाकिस्तान से यह कहा था कि ‘वह प्रमाणित करे कि ओसामा बिन लाडेन के एबटाबाद में गत् कई वर्षों से छिपे होने की जानकारी पाक सेना को नहीं थी’। ऐसे में अगला सवाल यह उठता है कि क्या ओसामा बिन लाडेन के खात्मे के बाद अब ‘अमेरिकी रडार’पर पाकिस्तान स्थित परमाणु शस्त्र आ चुके हैं?
पिछले दिनों पाकिस्तान में एक आला सैन्य अधिकारी ब्रिगेडियर अली को पाक सेना द्वारा आतंकवादियों व आतंकी संगठनों से संबंध होने के संदेह में गिरफ्तार किया गया है। ब्रिगेडियर अली का परिवार गत् तीन पुश्तों से पाक सेना की ‘सेवा’करता आ रहा है। अली स्वयं गत् दो वर्षों से रावलपिंडी स्थित सैन्य मुख्यालय में तैनात थे।

पाकिस्तानी परमाणु सैन्य केंद्र : कैसे बचे आतंकियों से
ब्रिगेडियर अली की गिरफ्तारी के बाद एक बार फिर पिछले दिनों कराची के नेवल बेस पर हुए पाकिस्तान के अब तक के सबसे बड़े आतंकी हमले को लेकर बने उस संदेह की पुष्टि हो जाती है,जिसमें यह कहा जा रहा था कि कराची के अति सुरक्षित नेवल बेस पर इस प्रकार का सुनियोजित आतंकी हमला तथा इसमें लड़ाकू विमानों को नष्ट किए जाने सहित भारी सैन्य सामग्री को नुकसान पहुंचाया जाना आदि बिना किसी भीतरी सहायता या जानकारी के कतई संभव नहीं था।

उधर पाकिस्तान-अफग़ानिस्तान सीमांत क्षेत्र के वज़ीरिस्तान इलाक़े में बढ़ते जा रहे चरमपंथी वर्चस्व को लेकर भी पाकिस्तान दोहरी भूमिका में दिखाई दे रहा है। उत्तरी वज़ीरिस्तान वही इलाक़ा है जहां बड़ी संख्या में तालिबान लड़ाके तो मौजूद हैं ही इनके साथ ही अलकायदा के लड़ाके भी इस क्षेत्र में पूरी तरह सक्रिय हैं। और इसी क्षेत्र में हक्क़ानी नेटवर्क से जुड़े आतंकी संगठनों का भी पूरा दबदबा है। इसी क्षेत्र में चरमपंथी संगठनों ने नाटो सेना के कई सैन्य काफिलों  पर हमले किए। कई रसद सामग्रियों से भरी कानवाई तबाह कर दी और कई बार इनके तेल डिपो व पार्किंग में खड़े तेल टैंकर व टैंक आदि तबाह कर डाले।
इस क्षेत्र को जहां अमेरिका दुनिया का सबसे अशांत क्षेत्र व आतंकवादियों का सबसे बड़ा केंद्र मान रहा है वहीं पाकिस्तान इसी इलाक़े को शांत व स्थिर क्षेत्र बता रहा है। अब यहां सवाल यही उठता है कि पाकिस्तान उत्तरी वज़ीरिस्तान में इन चरमपंथी संगठनों के विरूद्ध भरपूर ताक़ त इस्तेमाल क्यों नहीं कर रहा है। क्या इसलिए कि पाक सेना इन आतंकी संगठनों से खौफ़ खाती है या फिर इसलिए कि ‘अपनों’के विरूद्ध ऐसी कार्रवाई की पाकिस्तान कोई खास ज़रूरत महसूस नहीं कर रहा है।

 यदि उपरोक्त दोनों ही बातें गलत हैं फिर अमेरिका से चरमपंथी संगठनों के विरूद्ध कार्रवाई के नाम पर धन उगाही किए जाने का आखिर  क्या औचित्य है?हां उत्तरी वज़ीरिस्तान में बड़ी सैन्य कार्रवाई न करने को लेकर पाकिस्तान एक महत्वपूर्ण बात यह ज़रूर कर रहा है कि ‘पाकिस्तान फ़िलहाल  उत्तरी वजीऱीस्तान में बड़ी सैन्य कार्रवाई करने की जल्दी नहीं महसूस कर रहा है’। पाकिस्तान का कहना है कि वह अपने ‘हितों’को ध्यान में रख कर ही कोई भी कार्रवाई सुनिश्चित करेगा।

‘हित’ और ‘अहित’ के इसी परिपेक्ष में अब कयास इस बात के भी लगाए जाने लगे हैं कि अमेरिका अपने दूरगामी हितों के मद्देनज़र क्या पाकिस्तान में मौजूद परमाणु हथियारों पर भी अपना नियंत्रण करने की योजना बना रहा है? क्या ओसामा बिन लाडेन जैसे दुनिया के सबसे खतरनाक आतंकवादी के खात्मे के बाद अब ‘अमेरिकी रडार’पर पाकिस्तान स्थित परमाणु शस्त्र आ चुके हैं?

पाकिस्तान में निरंतर बढ़ती जा रही आतंकी हिंसक घटनाएं,वहां सिलसिलेवार हो रहे आत्मघाती हमले,आए दिन किसी वकील,पत्रकार,नेता या अधिकारियों का मारा जाना,सैन्य ठिकानों तथा सुरक्षा संस्थानों को निशाना बनाकर किए जाने वाले चरमपंथी हमले तथा पीरों-फकीरों की दरगाहों पर व मस्जिदों में नमाज़ पढऩे वालों पर होने वाले चरमपंथी हमले अमेरिका को यह सोचने के लिए मजबूर कर रहे हैं कि चरमपंथी ताकतों के बढ़ते हुए यह हौसले कहीं किसी दिन उन्हें इस योग्य न बना दें कि वह पकिस्तान में रखे परमाणु हथियारों पर भी अपना नियंत्रण कर बैठें।

खासतौर पर ऐसी परिस्थितियों में जबकि चरमपंथी पाकिस्तान के सैन्य व सुरक्षा तंत्र के भीतर भी अपनी सेंध लगा चुके हों? इन हालात में यदि अमेरिका आप्रेशन जेरोनिमों की ही तर्ज  पर उससे भी कई गुणा बड़ा कमांडो आप्रेशन कर पाकिस्तान के परमाणु हथियारों को अपने नियंत्रण में लेने तथा पाकिस्तान से अन्यत्र ले जाने के लिए कोई बड़ी कार्रवाई करे तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

जहां तक पाकिस्तान के प्रतिरोध की क्षमता का प्रश्र है तो दोनों ही देश यानी अमेरिका व पाकिस्तान एक दूसरे की ताकत व एक दूसरे के पास मौजूद हथियारों से भी भली भांति वाकिफ  हैं। एबटाबाद की कार्रवाई में भी पाकिस्तान ने अपनी क्षमता व चौकसी का जो प्रदर्शन किया था वह भी अमेरिका देख चुका है। इतना ही नहीं बल्कि एबटाबाद में की गई अमेरिकी कार्रवाई के बाद पाकिस्तानी विरोध के स्वर का स्तर भी अमेरिका भांप चुका है। इन हालात में यह कहना गलत नहीं होगा कि लाडेन की मौत के बाद अब अमेरिकी ‘रडार’ पर पाक स्थित परमाणु ठिकानों के आने की भी पूरी संभावना है।

लेखक हरियाणा साहित्य अकादमी के भूतपूर्व सदस्य और राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मसलों के प्रखर टिप्पणीकार हैं.


 
 

Jun 26, 2011

मध्यप्रदेश में किसान आंदोलन पर पुलिसिया हमला


जनज्वार.छिंदवाड़ा जिले के अदानी पेंच पावर प्रोजेक्ट द्वारा की गयी मनमानी के खिलाफ आज 26 जून को आयोजित किसान महापंचायत पर पुलिस दमन का कहर बरपा हुआ है। पुलिस ने आंदोलनकारियों पर बर्बर लाठी चार्ज किये और आंसू गैर के गोले छोड़े। पर्यावरण मंत्रालय की अनुमति के बगैर हुए अवैध निर्माण कार्यो को ध्वस्त करने और जमीनें वापस लौटाने की मांग को लेकर किसान संघर्ष समिति की ओर से आज किसानों ने महापंचायत का आयोजन किया था।

किसान महापंचायत में भाग लेने जा रहे किसानों को पुलिस ने धमकाया तथा अलग अलग गांव से गिरफ्तार किया। विरोध में भाग लेने पहुंचे पूर्व विधायक और किसान नेता सुलीलम् को तड़के छिन्दवाडा पुलिस ने रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार कर शाम को नागपुर रेलवे स्टेशन पर रिहा किया। वहीं किसान आंदोलन का नेतृत्व कर रहे आराधना भार्गव को पुलिस ने भूलामोहगांव से जबरदस्ती घसीटकर गिरफ्तार किया। उनके साथ मौके पर पूर्व विधायक महेशदत्त मिश्रा भी मौजूद थे।

प्रशासन पर दबाव न बने इसके लिए पुलिस ने 12किसानों को अमरवाडा उपजेल भेज दिया है तो 44 किसान छिन्दवाड़ा जेल में बंद हैं। सुनीलम ने  राज्य सरकार की दमनकारी भूमिका पर आक्रोश  व्यक्त करते हुए कहा है कि 22मई के जानलेवा हमले के बाद किसान संघर्ष  समिति की और से शांतिपूर्ण तरीके से पदयात्रा की गई थी तथा 10हजार किसानों ने छिन्दवाडा पहुंचकर अपनी मांगों को शांतिपूर्ण तरीके से मुख्यमंत्री तक पहुंचाने के लिए जिलाधीश महोदय को ज्ञापन सौंपा था। किसानों का कहना है कि स्थानीय पुलिस प्रशासन अदानी कम्पनी के एजेन्ट के तौर पर कार्य कर रहा है। जिन लोगों ने किसानों की जमीनों पर अवैधानिक निर्माण कार्य किया है उनकी गिरफ्तारी करने की बजाय किसानों को गिरफ्तार किया जा रहा है।

डॉ0सुनीलम् ने राज्य सरकार द्वारा की गई कार्यवाही को लोकतंत्र की हत्या बताते हुए कहा कि हर नागरीक को संविधान में स्वतंत्र अभिव्यक्ति का अधिकार दिया,लेकिन सरकार संविधान पर कुठाराघात करने पर आमदा है। डॉ0सुनीलम् ने कहा कि जानलेवा हमले,पुलिस की लाठी और गिरफ्तार ने किसानों को आक्रोषित करने का काम किया है। जिसके गंभीर परिणाम सरकार को भुगतने पड सकते हैं, जिसकी पूरी जिम्मेदारी स्थानिय पुलिस प्रशासन की होगी।

आंदोलनकारियों की अगली रणनीति के मुताबिक 27जून को जनसंगठनों का प्रतिनिधि मण्डल राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग से मुलाकात करेगा और वे 30जून को भोपाल में मानव अधिकार आयोग के अध्यक्ष से मुलाकात कर किसानों के मानव अधिकार बहाल कराने की मांग करेंगे।



सरकारी नीतियों के विरोधी हू जिया रिहा


चीन में सरकार की नीतियों के एक प्रमुख विरोधी हू जिया को जेल से रिहा कर दिया गया है.उनकी पत्नी ज़ेंग जिंज्ञान ने इस ख़बर की पुष्टि की है और कहा है कि वे बीजिंग में अपने परिवार के साथ हैं...

ग़ौरतलब है कि पिछले बुधवार को चीन के जाने माने कलाकार और कार्यकर्ता आई वेईवेई को दो महीने की पुलिस हिरासत के बाद रिहा कर दिया गया था. हू जिया की रिहाई उस समय हुई है जब चीन के प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ यूरोप की यात्रा पर हैं और शनिवार रात को ब्रिटेन में बरमिंघम पहुँचे हैं.वे ब्रिटेन की तीन दिवसीय यात्रा के दौरान ब्रिटेन में चीनी पूँजी निवेश को बढ़ाने के प्रयासों पर चर्चा करेंगे.

हू जिया पर चीन की सरकार ने विद्रोही गतिविधियों को उकसाने के आरोप लगाए थे. वर्ष 2008 में 37 वर्षीय हू जिया को दोषी पाया गया था और उन्हें साढ़े तीन साल की जेल की सज़ा सुनाई गई थी.

मेरे पति घर लौट आए हैं और अपने माता-पिता और मेरे साथ हैं.मैं इस समय इंटरव्यू नहीं देने चाहती क्योंकि इससे मुश्किलें पैदा हो सकती हैं हू जिया पर पांच लेख लिखने से संबंधित आरोप लगाए गए थे. साथ ही उन पर आरोप थे कि पत्रकारों को इंटरव्यू देते समय उन्होंने चीनी सरकार की आलोचना की थी.

उस समय चीन की सरकार समाचार एजेंसी ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि हू ने 'अफ़वाहें फैलाईं और लोगों को उकसाया था.' हू जिया नागरिक अधिकारों के मुद्दों पर, पर्यावरण और एड्स से संबंधित मुद्दों पर सक्रिय रहे हैं. वर्ष 2008 में बीजिंग ओलंपिक के दौरान उन्होंने चीन की सरकार के नाम एक 'ओपन लेटर' लिखी थी जिसका शीर्षक था - द रियल चाइना एंड द ओलंपिक्स यानी 'चीन का असली चेहरा और ओलंपिक खेल.'

इस पत्र में चीन में मानवाधिकारों के हनन के ख़त्म करने का आहवान किया गया था. वर्ष 2007 में हू जिया और उनकी पत्नी ने लगातार पुलिस की निगरानी में रहने के अपने अनुभवों का एक डॉक्यूमेंट्री बनाई थी जिसके बाद उन्हें घर पर नज़रबंद कर दिया गया था.उन्हें यूरोपीय संघ ने अपने सर्वोच्च मानवाधिकार पुरस्कार साखारोव अवार्ड से सम्मानित किया था.

हू जिया की पत्नी ज़िंग जिंज्ञान ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स को बताया,"मेरे पति घर लौट आए हैं और अपने माता-पिता और मेरे साथ हैं. मैं इस समय इंटरव्यू नहीं देना चाहती क्योंकि इससे मुश्किलें पैदा हो सकती हैं."मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने लगातार चिंता ज़ाहिर की है कि हू जिया की रिहाई के बाद चीन की सरकार उन पर कड़े प्रतिबंध लगा सकती है. चीन की सरकार ने फ़िलहाल इस बारे में कोई टिप्पणी नहीं की है.

बीबीसी से साभार

झारखण्ड में कलाकार को फांसी


जनज्वार.झारखण्ड के गिरिडीह जिले की अदालत ने चिलखारी हत्याकांड मामले में 23जून को चार माओवादियों को फांसी की सजा सुनाई है.झारखण्ड के इतिहास में यह पहली बार है कि माओवादियों को किसी मामले में फांसी की सजा हुई है. सजायाफ्ता लोगों में मनोज रजवार, छत्रपति मंडल, अनिल राम और जीतन मरांडी हैं, जिनमें जीतन मरांडी झारखंड के प्रसिद्ध प्रगतिशील लोक कलाकार हैं.

चिलखारी में 26अक्टूबर 2007 को हुई गोलीबारी में 19 लोगों की जान गई थी. मृतकों में झारखण्ड के  पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी का बेटा अनूप भी था.माओवादियों ने यह हमला तब किया था जब वहां एक रंगारंग  कार्यक्रम चल रहा था.इस मामले को रेयरेस्ट ऑफ़ द  रेयर मानते हुए  जिला और सत्र न्यायधीश इन्द्रदेव मिश्र ने सजा सुनाई है.  हालाँकि अदालत के इस फैसले का झारखंड में व्यापक विरोध हो रहा है.फांसी की सजा के विरोध में झारखण्ड के कई जेलों में बंद कैदी भी हैं और वे  आमरण अनशन कर रहे हैं.

बायीं  ओर जीतन और उनकी पत्नी : एक नए विनायक  
 जीतन मरांडी के खिलाफ हुए फैसले के बारे में झारखण्ड बचाओ आन्दोलन और पीयूसीएल का कहना है कि जीतन को फर्जी तरीके से फंसाया गया है.  संगठन के मुताबिक संदिग्धों में एक जीतन मरांडी था, जो फरार होने में सफल रहा. पुलिस उसे पकड़ने में अब तक नाकाम रही है और हमारे संगठन के मानवअधिकार कार्यकर्ता जीतन मरांडी को इस मामले में अभियुक्त बना दिया,जबकि हत्याकांड के वक्त वह गांव में नहीं थे.संगठन का दावा है कि पुलिस मानवाधिकार कार्यकर्ता जीतन मरांडी के खिलाफ फर्जी गवाह पेश कर उन्हें मौत की सजा दिलाने में सफल रही है. 

संगठन की जारी विज्ञप्ति के मुताबिक  जीतन मरांडी नक्सलवादी नहीं है,वे एक सांस्कृतिक और मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं. जीतन मरांडी एक प्रतिभाशाली कलाकार है, वे संगीत बनाते है, गीत लिखते है,और नुक्कड़ नाटक करते है.वे अपनी कला का इस्तेमाल गिरिडीह जिले के गावों में लोगो का मनोरंजन करने और उनकी जीवन की समस्यों के बारे में उन्हें जागरूक करने में करते है.ऐसे में जाहिर है कि वहां के प्रशासन और पुलिस के लिए वे एक खतरनाक व्यक्ति थे और वे उन्हें सबक सिखाने का मौका तलाश रहे थे.

झारखण्ड बचाओ आन्दोलन से जुड़े लोगों का आरोप है कि 'पुलिस ने हत्याकांड में शामिल असली जीतन मरांडी को पकड़ने का किसी भी प्रकार का प्रयास नहीं किया.उनके लिए हमारे साथी को पकडना और उसे आरोपी बताना बहुत आसान था.पुलिस के लिए तथा कथित ‘गवाह को पेश करना कोई बड़ी बात नहीं थी जो अदालत में कबूल करते कि उन्होंने मरांडी को हत्याकांड की जगह देखा था और कोर्ट के लिए ये तथा कथित  गवाह सजा मुकर्रर  करने के लिए काफी थे.

वो सुबह कभी तो आएगी

जैसे ही कोर्ट ने सजा दी मरांडी ने कोर्ट परिसर में जोर जोर से ‘वो सुबह कभी तो आएगी’गीत गाना शरू कर दिया.जीतन की पत्नी अपर्णा ने भी 2साल के अपने बच्चे को गोद में उठाये हुए उनकी आवाज़ के साथ अपनी आवाज़ मिला दी.इस सजा के पीछे की कहानी एक राजनीतिक षड़यंत्र है जो पूर्व मुख्य मंत्री की पार्टी के नेताओं और पुलिस की मिलीभगत में रचा गया है ताकि जनता को डरा कर चुपचाप दमन सहते रहने को मजबूर किया जा सके.

 कोर्ट में जतीन ने घोषणा की कि वे इस सजा के खिलाफ अपील करेंगे. कोर्ट से बाहर  उनकी बीबी अपर्णा ने भी इस बात की पुष्टि की.अपर्णा के कहा कि वह न केवल उच्च न्यायालय  में बल्कि राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग में भी सजा के खिलाफ अपील करेंगी.

Jun 25, 2011

राष्ट्रपति से माओवादियों के कुछ सवाल जवाब

छत्तीसगढ़ की विधानसभा को सम्बोधित करते हुए 24 जून को राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने माओवादियों से हिंसा का रास्ता छोड़ने को कहा . राष्ट्रपति की इस अपील पर माओवादी क्या और क्यों  सोचते हैं, उस पूरे तर्कशास्त्र  को रखती  माओवादियों की ओर से  जारी प्रेस विज्ञप्ति ...


रायपुर प्रवास के दौरान राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल ने आज, यानी 24 जून 2011 को हमारे सामने यह प्रस्ताव रखा है कि 'माओवादी हिंसा छोड़कर बातचीत के लिए आगे आएं और मुख्यधारा से जुड़ जाएं ताकि आदिवासियों के विकास में शामिल हुआ जा सकें।' राष्ट्रपति का प्रस्ताव ऐसे समय सामने आया है जबकि भारतीय सेना के करीब एक हजार जवान बस्तर क्षेत्र के तीन जिलों में अपना पड़ाव डाल चुके हैं ताकि देश की निर्धनतम जनता पर जारी अन्यायपूर्ण युद्ध - ऑपरेशन गी्रनहंट में शिरकत कर सकें।

राष्ट्रपति ऐसे वक्त ‘वार्ता’ की बात कह रही हैं जबकि खनिज सम्पदा से भरपूर देश के कई इलाकों से प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के बाबत् सरकारों और कार्पोरेट कम्पनियों के बीच वार्ता के कई दौर पूरे हो चुके हैं और लाखों करोड़ रुपए के एमओयू पर दस्तखत किए जा चुके हैं। वे ‘वार्ता’ की बात तब कह रही हैं जबकि बस्तर क्षेत्र में 750 वर्ग किलोमीटर का वन क्षेत्र, जिसके दायरे में दर्जनों गांव और हजारों माड़िया आदिवासी आते हैं, सेना के हवाले करने का फैसला बिना किसी वार्ता के ही लिया जा चुका है।


देश की ये सर्वप्रथम महिला राष्ट्रपति हमें ऐसे समय हिंसा छोड़ने की हिदायत दे रही हैं जबकि इसी छत्तीसगढ़ राज्य के दक्षिणी छोर पर स्थित ताड़िमेट्ला, मोरपल्ली, पुलानपाड़ और तिम्मापुरम गांवों में सरकारी सशस्त्र बलों के हाथों बलात्कार और मारपीट की शिकार महिलाओं के शरीर पर हुए जख्म भरे ही नहीं। वे ऐसे समय हमें हिंसा त्यागने की बात कह रही हैं जबकि न सिर्फ इन गांवों में, बल्कि दण्डकारण्य, बिहार-झारखण्ड, ओड़िशा, महाराष्ट्र, आदि कई प्रदेशों में, खासकर माओवादी संघर्ष वाले इलाकों या आदिवासी इलाकों में सरकारी हिंसा रोजमर्रा की सच्चाई है।

दरअसल सरकारी हिंसा एक ऐसा बहुरूपिया है जो अलग-अलग समय में विभिन्न रूप धारण कर लेता है। जैसे कि अगर आज का ही उदाहरण लिया जाए, तो रातोंरात मिट्टी तेल पर 2 रुपए, डीजल पर 3 रुपए और रसोई गैस पर 50 रुपए का दाम बढ़ाकर गरीब व मध्यम तबकों की जनता की कमर तोड़ देने के रूप में भी होती है, जो पहले से महंगाई की मार से कराह रही थी। लेकिन राष्ट्रपति को इस ‘हिंसा’ से कोई एतराज नहीं!

भारत की यह प्रथम नागरिक हमें उस ‘मुख्यधारा’ में लौटने को कह रही हैं जिसमें कि उस तथाकथित मुख्यधारा के ‘महानायकों’ - घोटालेबाज मंत्रियों, नेताओं, कार्पोरेट दैत्यों और उनके दलालों के खिलाफ दिल्ली से लेकर गांव-कस्बों के गली-कूचों तक जनता थूं-थूं कर रही है। वो ऐसी ‘मुख्यधारा’ में हमें बुला रही हैं जिसमें मजदूरों, किसानों, आदिवासियों, दलितों, अल्पसंख्यकों, महिलाओं आदि के लिए अन्याय, अत्याचार और अपमान के अलावा कुछ नहीं बचा है।

प्रतिभा पाटिल हमें उस पृष्ठभूमि में वार्ता के लिए आमंत्रित कर रही हैं, जबकि ऐसी ही एक पेशकश पर हमारी पार्टी की प्रतिक्रिया सरकार के सामने रखने वाले हमारी पार्टी के प्रवक्ता और पोलिटब्यूरो सदस्य कॉमरेड आजाद की हत्या इसी सरकार ने एक फर्जी झड़प में की थी। इत्तेफाक से उनकी शहादत की सालगिरह ठीक एक हफ्ता बाद है, जबकि साल भर पहले करीब-करीब इन्हीं दिनों में चिदम्बरम और उनका हत्यारा खुफिया-पुलिस गिरोह उनकी हत्या की साजिश को अंतिम रूप दे रहे थे। कॉमरेड आजाद ने वार्ता पर हमारी पार्टी के दृष्टिकोण को साफ तौर पर देश-दुनिया के सामने रखा था और उसका जवाब उनकी हत्या करके दिया था आपकी क्रूर राज्यसत्ता ने। और उसके बाद भी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को पकड़कर जेलों में कैद करने का सिलसिला लगातार जारी रखा हुआ है।

60-70 साल पार कर चुके वयोवृद्ध माओवादी नेताओ को जेलों में न सिर्फ अमानवीय यातनाएं दी जा रही हैं, बल्कि उन्हें बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं से भी वंचित रखकर प्रताड़ित किया जा रहा है। उन पर 10-10 या 15-15 राज्यों के झूठे केस लगाए जा रहे हैं, ताकि ताउम्र उन्हें जेल की कालकोठरियों में बंद रखा जा सके।

इसलिए देश की जनता से हमारा आग्रहपूर्वक निवेदन है कि - आप महामहिम राष्ट्रपति से यह मांग करें कि ‘शांति वार्ता’ की पेशकश करने से पहले उनकी सरकार जनता पर जारी युद्ध - ऑपरेशन ग्रीन हंट बंद करे; बस्तर में सेना का ‘प्रशिक्षण’ बंद करे; और तमाम माओवाद-प्रभावित इलाकों से सेना व अर्धसैनिक बलों को वापस ले। अगर सरकार इसके लिए तैयार होती है तो दूसरे ही दिन से जनता की ओर से आत्मरक्षा में की जा रही जवाबी हिंसा थम जाएगी।

आप महामहिम राष्ट्रपति से यह मांग करें कि ‘विकास’ की बात करने से पहले उनकी सरकार कार्पोरेट घरानों और सरकारों के बीच हुए तमाम एमओयू रद्द करे। बलपूर्वक जमीन अधिग्रहण की सारी परियोजनाओं को फौरन रोके; उनकी सरकार यह मान ले कि जनता को ही यह तय करने का अधिकार होगा कि उसे किस किस्म का ‘विकास’ चाहिए।

आप महामहिम राष्ट्रपति से यह मांग करें कि ‘मुख्यधारा’ में जुड़ने की बात करने से पहले सरकार सभी घोटालेबाजों और भ्रष्टाचारियों को गिरफतार कर सजा दे। विदेशी बैंकों में मौजूद सारा काला धन वापस लाए। घोटालों और अवैध कमाई में लिप्त तमाम मंत्रियों और नेताओं को पदों से हटाकर सरेआम सजा दे।


सीपीआइ (माओवादी) के केन्द्रीय  कमेटी की यह विज्ञप्ति अभय के नाम से जारी हुई है, इसे यहाँ दखल की
दुनिया ब्लॉग से साभार प्रकाशित किया जा रहा है .

पर्यावरण और विकास के बीच पाखंड


सरकार की उदासीनता,लाहपरवाही और जनता की अज्ञानता के चलते योजनाओं से अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं हो रहे हैं। प्रदूषण सूचकांक -2010 में भारत का 123वां स्थान है और लगातार हम निम्न से निम्नतम् स्थान की ओर खिसकते जा रहे हैं...
 
डॉ0 आशीष वशिष्ठ

हाल ही में पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने विश्व की विशालतम स्टील कंपनी ‘पास्को’को उड़ीसा में प्लांट लगाने की सशर्त इजाजत दी है। जिस क्षेत्र में ये प्लांट स्थापित किया जाएगा वो क्षेत्र वनस्पतियों और प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर है। सरकार को भलीभांति मालूम है कि उस क्षेत्र में उद्योग स्थापित करने से जंगल और जमीन को भारी नुकसान होगा,बावजूद इसके प्लांट लगाने देने की अनुमति प्रदान करना उसकी की नीति और नीयत को ही दर्शाता है। 

सरकार का पक्ष है कि देश के विकास के लिए औद्योगिक विकास आवश्यक है। दुनिया के हर मुल्क में बड़े-बड़े उद्योग स्थापित हैं, लेकिन भारत में सरकारी मशीनरी इतनी भ्रष्ट हो चुकी है कि एक बार उद्योग स्थापित होने के बाद लेनदेन का खेल शुरू हो जाता है। किसी भी उद्योग को देंखे, ऐसा हो ही नहीं सकता कि वहां पर्यावरण कानूनों का उल्लंघन न होता हो। और सरकारकी आंख तब तक नहीं खुलती, जब तक कोई हादसा न हो जाए। 

पिछले दिनों ही लखनऊ के रिहायशी इलाके राजाजीपुरम में प्लाई बनाने की यूनिट और एक अन्य कारखाने में भीषण आग लगने के बाद प्रशासन की आंख खुली। आनन-फानन में इन औद्योगिक इकाईयों पर सख्त कार्रवाई का नाटक किया गया। लखनऊ की तरह  देश के हर छोटे-बड़े शहर के रिहायशी इलाकों में धडल्ले से सैकड़ों कारखाने चल रहे हैं। इनमें पर्यावरण कानूनों का खुलेआम उल्लंघन किया जाता है। पुलिस-प्रशासन की नाक के नीचे मानकों को ताक पर रखकर पर्यावरण और समूचे समाज की सेहत से खिलवाड़ आम बात है।

देश में पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण नियत्रंण के लिए कानूनों का भारी बस्ता तो हमारे पास है, लेकिन उनका पालन करवाने की इच्छाशक्ति नहीं है। सरकारी तंत्र की उदासीनता और सरकार की लाहपरवाही के कारण ही अन्य देशों से खतरनाक कचरा हमारे तटबंधों पर आसानी से उतार जाता है। ऐसी कई घटनाएं पूर्व में घट चुकी हैं और अक्सर ऐसे वाकया सुनाई देते रहते हैं।

कुछ समय पहले दिल्ली में संपन्न हुए सतत विकास शिखर बैठक-2011में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि ‘सतत विकास को सुनिष्चित करने की रणनीति का केन्द्रीय सिद्धांत   यह है कि आर्थिक पहलुओं का फैसला करने वाले सभी लोगों या संगठनों को इस बात के लिए प्रोत्साहित किया जाए कि वे पर्यावरण अनुकूल बातों को हमेशा ध्यान में रखें।’अपने भाषण में प्रधानमंत्री ने जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटने के मौजूदा मानकों को नाकाफी बताया। उनके मुताबिक अवशिष्ट प्रदूषण से निपटने के लिए ऐसा प्रवधान होना चाहिए कि प्रदूषण फैलाने वाले भुगतान करें। उनके विचार और सरकार के कारनामों में स्पष्ट विरोधाभास दिखाई देता है। वाकई पीएम पर्यावरण को लेकर इतने चिंतित है तो ‘पास्को’ को अनुमति क्यों दी गई।

पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण की रोकथाम के लिए सरकार और सरकारी मशीनरी कितनी गंभीर है उसकी सच्चाई हाल ही में भारत के नियंत्रक महालेखा परीक्षक (कैग) की ताजा रिपोर्ट से पता चलती है। केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के कामकाज पर पहली बार जारी पर्यावरण ऑडिट रिपोर्ट में कैग ने जंगलों की सेहत सुधारने, जैव-विवधता और नदियों को बचाने समेत कईं मोर्चे पर योजनाओं के क्रियान्वयन में उदासीनता को लेकर फटकार लगाई है। रिपोर्ट के अनुसार परियोजनाओं के लंबित उपयोगिता प्रमाणपत्र के अंबार को लेकर भी आश्चर्य जताया है। 

इसके अलावा पर्यावरण मंत्रालय में वित्त वर्ष 2008-09के आंकड़ों की पड़ताल में पाया कि परियोजनाओं की पर्याप्त निगरानी नहीं की गई, जिसके कारण वे अपना उद्देश्य ही पूरा नहीं कर पाई। रिपोर्ट के अनुसार पेड़ लगाने की 93 फीसदी परियोजनाएं अपने निर्धारित लक्ष्य को हासिल नहीं कर पाई है। कैग सरकारी संस्था है और जब सरकारी संस्था स्वयं सरकार की गतिविधियों पर सवाल उठा रही है तो जमीनी हालातों का सहज अनुमान लगाया जा सकता है।

सरकारी उदासीनता और ओछी राजनीति के कारण ही देश में नदी प्रदूषण की समस्या दिनों-दिन गंभीर रूप धारण करती जा रही है। चाहे नदियों को प्रदूषण मुक्त करने से लेकर नदियों पर बांध बनाने तक की हर छोटी-बड़ी योजना और पर्यावरण से जुड़े अहम् मसलों पर केंद्र और राज्य सरकारों के मध्य विवाद आम बात है। केंद्र और राज्य सरकारों की राजनीति के फेर में पर्यावरण जैसा अहम् मुद्दा पिस जाता है।

गंगा और यमुना नदी को प्रदूषण मुक्त करने के लिए अब तक करोड़ों रूपये खर्च किए जा चुके हैं, बावजूद इसके अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं हो पाए हैं। जिन राज्यों से होकर गंगा नदी गुजरती है वहां की सरकारों का अपेक्षित सहयोग न मिल पाने के कारण गंगा को प्रदूषणमुक्त कर पाने में दिक्कतें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। वहीं केन्द्र सरकार के साथ ही साथ राज्य सरकारें भी गंगा को साफ-सुथरा बनाने के लिए कोई ठोस कार्ययोजना पर काम नहीं कर रही हैं। 

उत्तराखंड में हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट की बाढ़ आई हुई है,वहीं उत्तर प्रदेश में गंगा एक्सप्रेस हाईवे योजना अपने उफान पर है। वर्तमान में गंगा एक्षन प्लान को राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना (एनआरसीपी) के साथ विलय कर दिया गया है, बावजूद इसके स्थिति में मामूली सुधार भी नहीं आया है। गंगा नदी को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए विश्व बैंक ने भी मदद का हाथ आगे बढ़ाया है। उसने इस कार्य के लिए 26 लाख अरब डालर की राशि स्वीकृत की है, जो पीएम की अध्यक्षता वाले राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण के माध्यम से खर्च किया जाएगा। अगर ईमानदारी से इस धनराशि से उपयोग किया गया तो स्थिति में सुधार हो सकता है।
पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद कानपुर में चमड़ा शोधन इकाईयों को बड़ी मुश्किल से बंद करवाया जा सका है। केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की एक रिपोर्ट के अनुसार गंगा के तट पर बसा कानपुर देश का सर्वाधिक प्रदूषित शहर है। गंगा की भांति यमुना नदी में भी प्रदूषण का स्तर सारी हदें पार कर रहा है। हरियाणा और उत्तर प्रदेश मे स्थित औद्योगिक इकाईयां और घरेलू कचरा नदी जल को जहर में तब्दील कर रहा है। पिछले साल चम्बल अभ्यारणय में जहां यमुना नदी का प्रदूषित जल आकर चम्बल नदी में मिलता है,वहां सैंकड़ों घड़ियालों की मौत सुर्खियों में रही है। हाल ही में इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में मछलियों के भी मरने की खबरें आ रही हैं। इन सब घटनाओं के बाद भी सरकार महज कागजी कार्रवाई कर अपनी डयूटी पूरी कर रही है।


भारतीय संविधान विश्व का पहला संविधान है जिसमें पर्यावरण संरक्षण के लिए विषिष्ट प्रावधान है। लेकिन यहां पर्यावरण की स्थिति गंभीर रूप धारण करती जा रही है। सरकार के एजेंडे में पर्यावरण का स्थान काफी नीचे है, तभी तो कड़ाई से पर्यावरण कानूनों और प्रावधानों का पालन नहीं हो रहा है। असलियत यह है कि हमारी विकास रणनीति में पर्यावरण और विकास के बीच सांमजस्य बैठाने का प्रयास कभी किया ही नहीं गया है। यही कारण है कि समूची विकास योजनाआं में पर्यावरण संरक्षण का प्रश्न उपेक्षित ही रहता है। ज्यादातर मामलों में विकास का तर्क देकर जंगल के जंगल उजाड़ना, नदियों का रूख मोड़ने से लेकर उनके पानी को प्रदूषित करना, भूजल का अंधाधुंध दोहन, खेती के लिए रासायनिक उर्वरकों-कीटनाषको के बेलगाम इस्तेमाल आदि को खुद सरकारें प्रोत्साहित करती रही है।

पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण की रोकथाम के लिए अनेक परियोजनाएं चलाई जा रही हैं,लेकिन सरकार की उदासीनता,लाहपरवाही और जनता की अज्ञानता के चलते योजनाओं से अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं हो रहे हैं। प्रदूषण सूचकांक -2010 में भारत का 123वां स्थान है और लगातार हम निम्न से निम्नतम् स्थान की ओर खिसकते जा रहे हैं। बढ़ती जनसंख्या, गरीबी, शहरीकरण, खेती के लिए कम होती धरती, बढ़ता औद्योगिककरण, अनियंत्रित  विकास और पर्यावरण के महत्ता को न समझने के कारण देश में आने वाले दिनों में पर्यावरण से जुड़ी समस्यायों  में बड़ा इजाफा होना तय है।


 
स्वतंत्र पत्रकार और उत्तर प्रदेश के राजनितिक -सामाजिक मसलों के जानकार.