Mar 31, 2017

आज देश सेलीब्रेट कर रहा #fenkudivas और #pappudivas



आज 1 अप्रैल पुरी दुनिया में 'मुर्ख दिवस' के रूप में मनाया जाता है। तमाम लोग एक—दूसरे को किस्से, कहानियां या उटपटांग बातें या वायदे कर उल्लू या बकलोल बनाते हैं और यह कह कर खुश होते हैं, 'अप्रैल फूल बनाया, बहुत मजा आया।' 

पर भारत में आज का यह दिन पप्पू और फेंकू दिवस के ​रूप में मनाया जा रहा है। सोशल मीडिया पर यह दोनों ही ट्रेंड कर रहे हैं। ट्वीटर पर फेंकू दिवस पहले स्थान पर ट्रेंड कर रहा है तो पप्पू दिवस चौथे पर है। 

व्यंग्यात्मक लहजे में समझें तो यह पूप्पू और फेंकू दोनों नाम देश की दो राष्ट्रीय पार्टियों के सुरमाओं के नाम हैं। पहले हैं राहुल गाँधी और दूसरे हैं प्रधानमंत्री मोदी। 

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को लोग पप्पू और प्रधानमंत्री मोदी को फेंकू कह कर मजाक बनाते हैं। इन नेताओं के बारे में जनता का आम ख्याल ये है कि राहुल गाँधी राजनीति के बबुआ हैं तो मोदी बड़बोले हैं, जो वायदों और भाषणों से आगे कुछ नहीं करते। 

इन दोनों नेताओं के उपनाम का इतिहास यह है कि मोदी और भक्तों ने राहुल गांधी के उटपटांग बयानों के चलते पप्पू कहना शुरू किया तो राहुल गांधी और उनके लोगों ने मोदी के बड़े—बड़े वायदों के मद्देनजर फेंकू। पर देश के आमलोगों के ये दोनों उपनाम बहुत प्रिय है. आज मुर्ख दिवस १ अप्रैल पर इन नामों का ट्विटर पर ट्रेंड करना इसका प्रमाण भी है। 

13 मजदूरों के उम्रकैद के खिलाफ जंतर मंतर पर प्रतिवाद सभा

जनज्वार। मारुति मजदूरों को उम्रकैद की सजा के विरोध में मज़दूर संघर्ष अभियान (MASA) की तरफ़ से जंतर मंतर, नई दिल्ली में आज 31 मार्च को एक प्रतिवाद सभा आयोजित की गयी। इसमें मासा के विभिन्न घटक मज़दूर सहयोग केंद्र गुड़गांव, रूद्रपुर, इंकलाबी मज़दूर केंद्र, जन संघर्ष मंच हरियाणा, इंकलाबी केंद्र पंजाब, कर्नाटका श्रमिक शक्ति, हिंदुस्तान मोटर SSKU, AIWC, ICTU, IFTU, IFTU (सर्वहारा), TUCI, मारुति सुजुकी वर्कर्स यूनियन मानेसर, होंंडा, डाइकिन, मारुति प्रोविजनल कमिटी के प्रतिनिधि और सहयोगी शामिल रहे।


सभा को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि 13 मारुति मजदूरों को सरकार और पूंजीपतियों के इशारे पर न्यायपालिका ने उम्रकैद की सजा सुनाई है, उसके माध्यम से मज़दूर वर्ग को धमकी दी गयी कि अगर मज़दूर ट्रेड यूनियन बनाने के लिए, ठेका प्रथा खत्म करने के लिए, प्रबंधन की मनमानी के खिलाफ आवाज उठाएंगे तो उनका इस तरह से दमन किया जाएगा। सारे तथ्य, सबूत, न्याय, क़ानून, व्यवस्था पूंजीपतियों के हित में मज़दूरों के ख़िलाफ़ हैं। 

मारुति मजदूरों का संघर्ष स्थायी ठेका मज़दूर की एकता के साथ मालिकाना दमन के ख़िलाफ़ मज़दूर वर्ग के संघर्ष का नेतृत्व कर रहा था। इसलिए इस वर्ग संघर्ष में यूनियन नेतृत्व को निशाना बनाया गया, ताकि मज़दूरों में से कोई नेतृत्व करने के लिए आगे ना आये। मगर सत्ता द्वारा मारुति के आंदोलन को कुचलने के प्रयास के ख़िलाफ़ पूरी दुनिया के मज़दूर भी अपनी वर्गीय एकजुटता के साथ खड़े दिखाई दिए।

मासा ने सभी संघर्षशील मजदूरों और संगठनों से अपील की कि इस संघर्ष को उसी जुझारू तरीके से बरकरार रखें, जिसकी मिसाल मारुति के मज़दूरों ने कायम की है। मालिकों द्वारा बनाये गए ठेका, स्थायी, अप्रैंटिस के विभाजन से आगे बढ़कर इस हमले का विरोध करना होगा, क्योंकि क्योंकि ये विभाजन मालिक के मुनाफे को बढ़ाने के लिए शोषण करने का आधार हैं। 

सभा के दौरान  4—5 अप्रैल के अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय विरोध कार्यक्रम  को सफ़ल बनाने की भी अपील की गयी जिसमें सभी मौजूद संगठनों ने 4—5 अप्रैल को अपने सम्बंधित शहरों में अपने स्तर पर प्रतिवाद करने की घोषणा की। कार्यक्रम के दौरान मासा की तरफ़ से श्रम मंत्री के नाम एक ज्ञापन सौंपा गया।

इसमें 13 मारुति मज़दूरों को रिहा करने, सभी झूठे मुक़दमे वापस लेने, 117 बरी मजदूरों सहित सभी बर्खास्त मज़दूरों को काम पर वापस लेने की मांग की गई। मारुति मज़दूरों को न्याय दिलाने हेतु जंतर मंतर दिल्ली में आयोजित प्रतिवाद सभा में रुद्रपुर, उत्तराखंड से महिंद्रा सीआईए श्रमिक संगठन के साथी भी शामिल थे।

छात्राओं को नंगा करने वाली वॉर्डन बर्खास्त

आरोपी वार्डन ने रखा अपना पक्ष, कहा यह उन शिक्षकों की साजिश जो पढ़ाना नहीं चाहते 
 

मुजफ्फरनगर से संजीव चौधरी की रिपोर्ट 

उत्तर प्रदेश के मुज़फ्फरनगर के कस्तूरबा गाँधी आवासीय विद्यालय में 30 मार्च को हॉस्टल वार्डन सुरेखा तोमर द्वारा विद्यालय की छात्राओं को निर्वस्त्र कर कक्षा में बैठाने का एक बेहद शर्मनाक मामला सामने आया है। हॉस्टल वार्डन की इस घिनौनी करतूत का पीड़ित छात्राओं ने विरोध किया है। आरोपी वॉर्डन को सरकार ने फिलहाल बर्खास्त कर दिया है। घटना के बाद कई छात्राओं के अभिभावक अपनी बच्चियों को स्कूल से घर ले गए हैं। 

गौरतलब है कि मुज़फ्फरनगर के खतौली थाना क्षेत्र के तिगरी गांव स्थित सरकारी कस्तूरबा गाँधी आवासीय विद्यालय का है। विद्यालय में आमतौर पर गरीब परिवार की बच्चियां पढ़ती हैं। इनमें से कुछ बच्चियां महज आठ वर्ष की हैं, जिन्हें अभी ना खाने का पता है और ना ही पीने का। विद्यालय में आठ साल से लेकर 12 वर्ष की बच्चियां अपने परिवार से दूर शिक्षा ग्रहण कर रही हैं। 

खतौली के कस्तूरबा गाँधी बालिका आवासीय विद्यालय में वार्डन ने रविवार 26 मार्च को विद्यालय में अध्यनरत 65 छात्राओं को संयुक्त रूप से कक्षा में ले जाकर नग्न अवस्था में खड़ा किया। वार्डन सुरेखा ने कई घंटों तक कई छात्राओं को पूर्ण रूप से निर्वस्त्र रखा। छात्रायें खुद को अपमानित महसूस करती रहीं, लेकिन वार्डन ने छात्राओं की एक न सुनी। 

महिला वॉर्डन ने छात्राओं के साथ यह सनकी सलूक क्यों किया, यह तथ्य और चौंकाने वाला है। दरअसल वॉर्डन को विद्यालय के टॉयलेट में ब्लड के धब्बे मिले थे जिसे देख विद्यालय की वार्डन आग बबूला हो गईं। जिसके बाद उसने सभी छात्राओं को क्लास रूम में ले गयीं और कुछ छात्राओं को निर्वस्त्र होने के​ लिए कहा और एक—एक कर छात्राओं के मासिक धर्म होने की जांच करने लगीं। 

इस बीच छात्राएं रोती—बिलखती रहीं, लेकिन हिटलर बनी हॉस्टल की वार्डन न तो शर्मिंदा हुई और न छात्राओं की हालत पर उसे तरस आया। वार्डन टॉयलेट में ब्लड को देख समझ चुकीं थीं कि विद्यालय की किसी छात्रा को मासिक धर्म हुआ है, जिसने ये टॉयलेट गंदा किया है। बस वार्डन ने उस छात्रा को ढूंढने के लिए इस घिनौनी करतूत को अंजाम दिया। 

वार्डन की इस हरकत के बाद छात्राओं ने विद्यालय में जमकर नारेबाजी कर विरोध शुरू कर दिया। बवाल मचने पर पहुंचे बेसिक शिक्षा अधिकारी चंद्रकेश यादव ने आनन—फानन में सात सदस्यों की टीम बनाकर इस पूरे मामले की जाँच कर वार्डन सुरेखा पर आरोप सिद्ध होने तक निलंबित कर दिया था। पर अब सरकार ने आरोपी वॉर्डन को बर्खास्त कर दिया है।  

आठवीं पढ़ने वाली छात्रा ने बताया, 'बाथरूम की कुण्डी में खून लग गया था। बड़ी मैम 'वार्डन मैम' ने उसका कुछ उल्टा मतलब निकाला। फिर बड़ी मैम ने हम सभी लड़कियों के कपड़े उतरवाए और दो लड़कियों के गुप्तांग दबाकर चेक करने को कहा। इस बीच मैम लगातार धमकाती रहीं कि जल्दी बताओ कि किसका डेट आया है, नहीं तो सबको पीटूंगी। 

छठवीं कक्षा की छात्रा के मुताबिक, 'मैम ने हमें नीचे बुलाया और कहा कि जिसके—जिसके मासिक धर्म हो रहे हैं वह खड़े हो जाओ। फिर नंगा होने का कहा। हमने बीएसए से इनकी शिकायत कर दी है। अगर यह रहेंगी तो हम लड़कियां यहां नहीं रहेंगी।' 

बवाल मचने के बाद मौके पर पहुंचे परिजन संजीव त्यागी कहते हैं, 'मेरी बेटी कक्षा 6 में है। उसने मुझे पर बताया कि मैडम बच्चियों से कपड़े उतारने को बोल रही हैं। बेटी ने फोन पर बताया कि किसी बच्ची के मासिक धर्म आने पर बाथरूम में कहीं खून का धब्बा लग गया था, जिसके कारण वार्डन ने ऐसा किया। 

आरोपी वार्डन सुनिता का कहना है, 'मैंने ऐसा कुछ नहीं किया, यह सब यहां के स्टाफ की साजिश है। वह नहीं चाहता कि मैं स्कूल में रहूं। उन्हें मेरे होने से ड्यूटी करनी पड़ती है। नंगा कराने वाली बात झूठ है। बाथरूम की दीवार पर खून लगा था इसलिए मैंने जानने के लिए बच्चियों को बुलाया कि किसी के साथ कोई समस्या तो नहीं। कई बार 10—12 साल की लड़कियों का ​मासिक धर्म होता है पर उन्हें कुछ पता नहीं रहता। दूसरा लड़कियां पैड ट्वायलेट के कमोड में डाल देती हैं फिर सैनीटेशन की भारी समस्या हो जाती है। मैंने इस बारे में भी बात की।'

अब ओशो का लिखा छापने पर पत्रकार को हुई जेल

पत्रकार दीपक असीम को 12 दिन तक सिर्फ इसलिए जेल की सींखचों के पीछे रहना पड़ा क्योंकि उन्होंने बतौर विज्ञापन अपने अखबार में ओशो की ​चर्चित पुस्तक 'बिन बाती बिन तेल' का एक हिस्सा प्रकाशित कर दिया था.....

प्रेमा नेगी

अभिव्यक्ति की आजादी पर हो रहे हमलों के बीच प्रसिद्ध भारतीय विचारक—दार्शनिक ओशो का लिखा भी अब पुनर्प्रकाशित करने पर जेल हो जा रही है। मध्य प्रदेश के इंदौर से निकलने वाले अखबार खजराना लाइव के संपादक दीपक असीम को 12 दिन तक हिंदूवादियों की शिकायत पर सिर्फ इसलिए जेल की सींखचों के पीछे रहना पड़ा क्योंकि उन्होंने बतौर विज्ञापन के रूप में ओशो की ​चर्चित पुस्तक 'बिन बाती बिन तेल' का एक हिस्सा प्रकाशित कर दिया था।

ओशो के लेख का वह हिस्सा जिसके लिए दीपक असीम को जाना पड़ा जेल 
15 मार्च को दीपक असीम की जमानत हुई। उसके बाद उन्होंने सीनियर एडवोकेट आनंदमोहन माथुर के माध्यम से हाईकोर्ट में एक रिट दायर कर पूछा कि किसी पत्रकार के लिखने से शांति भंग कैसे हो सकती है। गौरतलब है कि एसडीएम ने धारा 107—16 में शांति भंग करने का हवाला देते हुए दीपक असीम को नोटिस थमाया था कि क्यों न आपसे 10 हजार रुपए का मुचलका और इतनी ही राशि की जमानत ली जाए। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए कि आप अगले 6 महीने तक शांति भंग करने वाला कोई काम नहीं करेंगे।  

इंदौर के स्थानीय अखबार खजराना लाइव के 27 फरवरी के अंक में ओशो द्वारा लिखित एक लेख प्रकाशित हुआ। जिसके लिए दीपक असीम के खिलाफ धारा 295—ए के तहत मुकदमा दर्ज कर उन्हें जेल भेज दिया गया। प्रकाशित लेख में शिवपुराण के हवाले से ओशो ने शिव—पार्वती के बीच संभोग का वर्णन किया है। वर्णन में खास बात यह है कि शिव और पार्वती संभोग में इस कदर लिप्त होते हैं कि उनसे मिलने आए ब्रह्मा और विष्णु का वह गौर ही नहीं कर पाते। ओशो ने इस कथा में संभोग और समाधि के बीच एक तारतम्य बैठाने की कोशिश की है।

दीपक असीम कहते हैं, ''अखबार की आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए हम विज्ञापन के रूप में ओशो के प्रवचन छापते हैं। प्रवचन जिस स्पेस में छपता है उसका भुगतान जयदेव भट्ट अपने दादा स्वर्गीय भालचंद जी भट्ट की याद में करते हैं। इस बात का डिस्कलेमर भी हम अखबार के हर अंक में छापते हैं। 

दीपक असीम ने कहा, ''ओशो की किताब 'बिना बाती बिन तेल' का अंश अपने अखबार में प्रकाशित करने के बाद जब हिंदुवादियों ने विरोध किया तो मैंने माफी मांग ली। न सिर्फ माफी मांगी बल्कि लिखित तौर पर पूरी सफाई अखबार में भी प्रकाशित की। बावजूद मुझे 3 से 16 मार्च तक जेल में रहना पड़ा। इसका कारण मैं अपनी शादी एक ​मुस्लिम लड़की से होना मानता हूं। हिंदू संगठनों के लोग मानकर चलते हैं कि मैंने मुस्लिम धर्म ज्वाइन कर लिया है, जबकि यह सच नहीं है। जिस तरह यह सच नहीं है कि मैंने हिंदू भावनाओं को ठेस पहुंचाने के लिए कोई लेख प्रकाशित किया है। मुझे बताया गया है कि ओशो ने अपनी पुस्तक 'बिना बाती बिन तेल' में उस किस्से का जिक्र प्रसिद्ध हिंदू धार्मिक ग्रंथ 'शिवपुराण' से साभार किया है। ऐसे में मेरा मुस्लिम लड़की से शादी करना न होता तो ऐसा क्यों होता कि पहले से प्रकाशित, फिर पुनर्प्रकाशित को छापने के जुर्म में मुझे जेल क्यों जाना पड़ता।''

लेख पर माफ़ी मांगने के बावजूद नहीं मिली राहत 
मीडिया की भूमिका

दीपक असीम की गिरफ्तारी को लेकर ज्यादातर हिंंदी के बड़े अखबारों ने अभियोजन पक्ष, पुलिस और हिंदूवादियों का बयान छापा।  प्रभात किरण नाम के अखबार को छोड़ बाकी किसी भी अखबार ने दीपक असीम की गलत गिरफ्तारी का विरोध नहीं किया। न ही यह सवाल उठाया किएक पौराणिक कहानी जो कि शताब्दियों पहले से शिवपुराण में प्रकाशित है, उसके सैकड़ों भाष्य हैं और उनका पुनर्भाष्य है फिर भी असीम दीपक को क्यों गिरफ्तार किया गया।

अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस ने दीपक असीम का पक्ष रखा, वहीं दैनिक भास्कर के प्रसिद्ध और चर्चित स्तंभकार जयप्रकाश चौकसे ने भी दीपक असीम का अपने कॉलम में जिक्र करते हुए बचाव किया।

मीडिया की भूमिका पर दीपक असीम कहते हैं, ''अधिकांश पत्रकार इस मामले में खामोश रहे, लेकिन कुछ लोग थे जो साथ खड़े रहे। आनंदमोहन माथुर और सारिका जैसे लोगों के सहयोग के बिना जमानत तक मुश्किल थी। इनके साथ ही अभय नेमा, संजय वर्मा, अवधेश प्रताप सिंह, विनीत तिवारी और कुछ अन्य लोग भी 12 दिनों तक मेरी रिहाई की अनवरत कोशिश में लगे रहे। कुछ प्रगतिशील संगठन भी साथ रहे।'' 

आप में कुमार विश्वास की हालत क्या हो गयी भगवान!

कभी अरविंद की आत्मा हुआ करते थे विश्वास, लेकिन अब वह आहत मन से बस एक ही धुन गुनगुना रहे हैं....कौन सुनेगा किसको सुनाएं इसलिए चुप रहते हैं...

जनज्वार। लंबे समय से आम आदमी पार्टी में हाशिए पर पड़े कुमार विश्वास का ट्वीट ही इन दिनों उनका भरोसेमंद साथी साबित हो रहा है। पार्टी में उनकी कोई पूछ नहीं दिख रही। पंजाब चुनाव इसका सबसे माकूल उदाहरण है जहां उनको पार्टी द्वारा पूछा ही नहीं गया। और दिल्ली के एमसीडी चुनाव में उनकी राजनीतिक हैसियत इस कदर प्रभावहीन हो गयी है कि टिकट चाहने वाले भी उनके दरवाजे की ओर रुख नहीं कर रहे। 

ऐसे में विश्वास कभी खुद की, कभी उधार की तो कभी किसी और की गजलें—नज्में ट्वीट कर अपना दुख जगसाया कर रहे हैं। पर मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल तवज्जो पाने की हर कोशिश को कुछ यों इनकार कर रहे हैं मानो उनका विश्वास को लेकर स्थायी भाव बन गया हो कि तुम रहो या जाओ हमें क्या, तुम सुनो और सुनाओ हमें क्या?  

27 मार्च को कुमार विश्वास ने एक ट्वीट किया, 

'वो जिनके पास हुकुमत भी है, हुजूम भी है,
वो इस फकीर से क्यों पूछें रास्ता क्या है।' 



कुमार विश्वास के इस ट्वीट पर हमेशा की तरह पाठकों की प्रतिकियाएं आईं। कुछ ने समझा, कुछ समझकर आप के राजनीतिक गलियारों में संदेश लेकर पहुंचे और कुछ ने सीधे विश्वास से मोर्चा लिया।

दिलचस्प यह था कि इस बार मोर्चा किसी और ने नहीं अरविंद केजरीवाल के बहुत नजदीकी और पीएस वैभव ने लिया। बिना किसी लाग—लपेट और छिपाव के वैभव ने सीधे अपने ​ट्वीट में लिखा, 

पिछले चार चुनावों ने सिखाया: 
जब—जब जीते वो पहले फ्रेम में दिखे 'क्रेडिट लेते' 
हारते ही फकीर बन गए, शायद बड़े कलाकार ऐसे ही होते हैं।

मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के बहुत खास माने जाने वाले वैभव के इस ट्वीट के बाद पार्टी के बहुत से कार्यकर्ता कुमार विश्वास के खिलाफ पिल पड़े। 'आम आदमी सेना' के सोशल मीडिया पेज पर विश्वास के खिलाफ तेजी से लिखा जाने लगा। 

देखते ही देखते गालियों, फब्तियों और कुमार विश्वास की आत्मा 'भाजपाई' होने के दावे आम आदमी सेना के पेज पर होने लगे। लोग कहने लगे इतने रोते क्यों हो, जहां आंसू पोछे जाएँ वहां चले जाओ।

वहीं कुमार विश्वास के भी ट्ववीट पर पाठकों ने खूब कहा—सुना। कुछ ने दुख में दुख जताया तो कुछ ने चुटकियां लीं। कई पाठकों ने कुछ इस भाव में कहा कि अरविंद केजरीवाल नहीं पूछ रहे तो यहां कविता लिखने से कुछ न होगा। कुछ ने सुझाव दिया गलत रास्ता चुनोगे तो यही होगा। 

खैर, बात बढ़े और मीडिया की खबर बने उससे पहले ही समझदारी दिखाते हुए अरविंद केजरीवाल के खास और उनके पीएस की भूमिका निभाने वाले विभव ने अपना ट्वीट हटा दिया। अब उनका ट्वीटर अकाउंट 'ट्वीट्स आर प्रोटेक्टेड' श्रेणी में डाल दिया गया है। जो कुछ इस तरह दिख रहा है,




पर कुमार विश्वास को अरविंद केजरीवाल और पार्टी का यह रवैया लगातार दुखित किए हुए है। राज्यसभा की कुल तीन सीटें दिल्ली से आम आदमी पार्टी के हिस्से हैं। एक समय में विश्वास को एक सीट का प्रबल दावेदार माना जा रहा था, पर ऐसा अब हो पाएगा इस पर खुद विश्वास भी विश्वास नहीं करते।

ऐसे में देखना यह है कि विश्वास का ट्ववीटर आंदोलन कितना साथ दे पाता है, खासकर तब जबकि कार्यकर्ताओं और स​​मर्थकों में उनकी छवि कभी खुद के कारण तो कभी साजिशों के कारण लगातार क्षरित हुई है। 

बहरहाल, विश्वास का एक नया ट्वीट -

Mar 30, 2017

चलो जंतर मंतर

यूनियन बनाने, ठेका मज़दूरों को स्थायी करने की मांग उठाने, मज़दूर हितों के लिए आवाज़ उठाने के अपराध में कई मारुति मजदूरों को हुई उम्रकैद के विरोध में मजदूर अधिकार संघर्ष अभियान (मासा) ने जंतर मंतर चलो का आह्वान किया है। मासा की अगुवाई में कल 31 मार्च, को सुबह 11 बजे जंतर—मंतर को प्रतिवाद सभा आयो​जित की जाएगी।

मासा के मुताबिक मजदूरों के हो रहे उत्पीड़न और उनके हक में आवाज उठाने की एवज में 13 मारुति मज़दूरों को उम्रकैद की सजा दी गई है। इस अभियान के जरिए उनको रिहा किए जाने की मांग उठाई जाएगी, साथ ही इसी अपराध से बरी हुए 117 मारुति मजदूरों को काम पर वापिस लेने की मांग भी उठाई जाएगी।

तमाम मजदूर मुुद्दों को लेकर दिल्ली स्थि​त जंतर मंतर पर यह प्रतिवाद सभा आयोजित की जाएगी। सभा में पूंजीपतियों और सरकार के इशारे पर न्यायपालिका द्वारा मज़दूर विरोधी फैसला देने के खिलाफ भी आवाज उठाई जाएगी। मजदूर उत्पीड़न के खिलाफ विभिन्न विभिन्न जन संगठन कल इस कार्यक्रम में हिस्सा लेंगे। 

अखबार वाले कराते हैं सांप्रदायिक हिंसा — शहीद भगत सिंह

 भगत सिंह ने 90 साल पहले लिख दिया था मीडिया का सच

जनज्वार। मीडिया और सरकार के बारे में करीब 90 साल पहले भगत सिंह ने जो कहा था, उसे जब आज पढ़ेंगे तो लगेगा कि भगत सिंह हमारे—आपके समय का सच ही बयान कर रहे हैं। पढ़ते हुए लगेगा कि कोई हमारे बीच का ही आदमी बहुत ही सुचिंतित तरीके से अपनी बात कह रहा और दुष्परिणामों को ध्यान में रखते हुए मीडिया को सांप्रदायीकरण से बाज आने की हिदायत दे रहा है।

भगत सिंह का यह लेख 'सांप्रदायिक दंगे और उनका इलाज' पहले के मुकाबले आज के दौर में बहुत प्रासंगिक हो चुका है। खासकर तब जबकि मीडिया के ज्यादातर माध्यम सत्ताधारी पार्टियों के मुखपत्र बन चुके हैं, पत्रकार उनके प्रवक्ता और संपादक—एंकर पार्टियों के अध्यक्ष की भूमिका निभाने लगे हैं। 

जून 1928 में ‘किरती’ नाम के अख़बार में छपे लेख में भगत सिंह लिखते हैं, 'दंगों के पीछे सांप्रदायिक नेताओं और अख़बारों का हाथ है... वही नेता जिन्होंने भारत को स्वतंत्र कराने का बीड़ा अपने सिरों पर उठाया हुआ था और जो ‘समान राष्ट्रीयता’ और ‘स्वराज-स्वराज’ के दमगजे मारते नहीं थकते थे, वही या तो अपने सिर छिपाए चुपचाप बैठे हैं या इसी धर्मांधता के बहाव में बह चले हैं. सिर छिपाकर बैठने वालों की संख्या भी क्या कम है? लेकिन ऐसे नेता जो सांप्रदायिक आंदोलन में जा मिले हैं, ज़मीन खोदने से सैकड़ों निकल आते हैं. जो नेता हृदय से सबका भला चाहते हैं, ऐसे बहुत ही कम हैं. और सांप्रदायिकता की ऐसी प्रबल बाढ़ आई हुई है कि वे भी इसे रोक नहीं पा रहे. ऐसा लग रहा है कि भारत में नेतृत्व का दिवाला पिट गया है.'

इसी लेख में भगत सिंह मीडिया की भूमिका को और स्पष्ट करते हुए आगे लिखते हैं, 'अख़बार वाले सांप्रदायिक दंगों को भड़काने में विशेष हिस्सा लेते रहे हैं। पत्रकारिता का व्यवसाय, किसी समय बहुत ऊंचा समझा जाता था. आज बहुत ही गंदा हो गया है. यह लोग एक-दूसरे के विरुद्ध बड़े मोटे-मोटे शीर्षक देकर लोगों की भावनाएं भड़काते हैं और परस्पर सिर फुटौवल करवाते हैं. एक-दो जगह ही नहीं, कितनी ही जगहों पर इसलिए दंगे हुए हैं कि स्थानीय अख़बारों ने बड़े उत्तेजनापूर्ण लेख लिखे हैं. ऐसे लेखक बहुत कम हैं, जिनका दिल व दिमाग़ ऐसे दिनों में भी शांत हो.' 

आखिर में शहीद भगत सिंह अखबार और मीडिया के कर्तव्यों को रेखांकित करते हैं, 'अख़बारों का असली कर्तव्य शिक्षा देना, लोगों से संकीर्णता निकालना, सांप्रदायिक भावनाएं हटाना, परस्पर मेल-मिलाप बढ़ाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता बनाना था, लेकिन इन्होंने अपना मुख्य कर्तव्य अज्ञान फैलाना, संकीर्णता का प्रचार करना, सांप्रदायिक बनाना, लड़ाई-झगड़े करवाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता को नष्ट करना बना लिया है. यही कारण है कि भारतवर्ष की वर्तमान दशा पर विचार कर आंखों से रक्त के आंसू बहने लगते हैं और दिल में सवाल उठता है कि ‘भारत का बनेगा क्या?’

(आरोही पब्लिकेशन की ओर से प्रकाशित संकलन ‘इंकलाब जिंदाबाद’ से साभार और संपादित)

देश में बनेगा 100 करोड़ का पशु चिकित्सालय


पशुओं को बेहतर इलाज मुहैया कराने के लिए टाटा ट्रस्ट ने मुंबई में पीपुल फॉर एनिमल्स 'पेटा' के साथ मिलकर मुंबई के कलंबोली में अत्याधुनिक मल्टी स्पेशलिटी अस्पताल बनाने की घोषणा की है। अनुमान है कि दो साल में बनाए जाने वाले इस अस्पताल के निर्माण में 100 करोड़ से ज्यादा की लागत आएगी।

केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस और टाटा ट्रस्ट के चेयरमैन रतन टाटा की उपस्थिति में एक कार्यक्रम के दौरान इस अस्पताल को बनाने की घोषणा हुई। 

प्रदेश के मुख्यमंत्री देवेंद्र फणनवीस ने टाटा ग्रुप को धन्यवाद देते हुए कहा, 'मुझे यकीन है कि यह पहल महाराष्ट्र के लोगों को लाभप्रद साबित होगी। मैं आप सबको विश्वास दिलाता हूं कि महाराष्ट्र सरकार हर तरह से इस योजना को पूरा करने में सहयोग करेगी।' 

9,000 वर्ग मीटर बनने जा रहा यह अस्पताल भारत का सबसे अत्याधुनिक पशु अस्पताल होगा, जिसमें इमरजेंसी और आपीडी होगा। इसमें सभी छोटे—बड़े जानवरों का इलाज किया जाएगा। 

Mar 29, 2017

गुजरात में इंजीनियरिंग के 80 प्रतिशत छात्र बेरोजगार

71 हजार इंजीनियरिंग की सीटों में से 27 हजार पर नहीं ले रहा कोई छात्र एडमिशन

देश भर में विकास का डंका पीटने वाले प्रधानमंत्री मोदी के गृहराज्य गुजरात में उच्च शिक्षा हासिल करने वाले युवाओं की बेकारी का आंकड़ा हतप्रभ कर देने वाला है। आॅल इंडिया कॉउंसिल फॉर टे​क्नीकल एजुकेशन 'एआइसीटीई' के अनुसार गुजरात में इंजीनियरिंग पढ़ने वाले 80 प्रतिशत छात्र नौकरी पाने से वंचित रहे जाते हैं, सिर्फ 20 फीसदी छात्रों को ही नौकरी मिल पाती है। 



टाइम्स आॅफ इंडिया में छपी हरिता दवे की रिपोर्ट के मुताबिक गुजरात में इंजीनियरिंग पढ़ रहे छात्रों में सबसे बुरा हाल सिविल इंजीनियरों के प्लेसमेंट का है। इनका सिर्फ 5 फीसदी ही प्लेसमेंट हो पाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह हालत इसलिए है कि पढ़ाई, कार्स और काम में बहुत फर्क है।

एआइसीटीई के 2015—2016 के आंकड़ों के अनुसार कम्प्यूटर साइंस में 11 हजार 190 छात्र पास हुए लेकिन 3 हजार 407 को केवल काम मिला। उसी तरह मैकेनिकल इंजीनियरिंग में 17 हजार 28 छात्र उत्तीर्ण हुए और 4 हजार 524 को नौकरी मिल पाई। 

डिग्री लेकर कैंपस से बाहर निकलने वाले ज्यादातर छात्रों को पता ही नहीं कि उनकी डिग्री का असल मतलब क्या है? गुजरात चैंबर आॅफ कॉमर्स एंड इं​डस्ट्री के अध्यक्ष विपिन पटेल छात्रों की बेकारी के लिए सरकार को दोषी ठहराते हैं। उनका कहना है कि सरकार रिटायर्ड अधिकारियों को 15 लाख देकर नौकरियों पर रख रही है, लेकिन युवा डि​​ग्रीधारी युवा बेकारी फांक रहे हैं।'   

इस आंकड़े पर संदेह उठाने वालों का कहना है कि छात्रों को रोजगार केवल कैंपस में ही नहीं मिलता बल्कि वह बाहर भी रोजगार करते हैं और कुछ नौकरियां नहीं करते। लेकिन एआइसीटीई इन आंकड़ों को अपने स्रोत में शामिल नहीं करती है,  जिससे बेकारी की भयावहता बड़ी दिखती है।

पंडितों और ईश्वर की शरण में ​क्रांतिकारी गायक गदर




वामपंथी सांस्कृतिक आंदोलन के 'लाल सितारा' का मंदिर—मंदिर घुटना टेकना बताता है कि आंदोलन में निराशा गहरे पैठ चुकी है...

जनज्वार। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के सम​र्थक कहे जाने वाले सांस्कृतिक संगठन जन नाट्य मंडली के संस्थापक क्रांतिकारी गायक गदर आजकल मंदिर—मंदिर घूम रहे हैं। वे भगवान से अच्छी बारिश और लोगों के दुःख दूर करने की मनौती मांग रहे हैं। वे छात्रों को वेद पढ़ने और विवेकानंद के रास्ते पर चलने का उपदेश दे रहे हैं और जगह जगह अपने नए गुरु मंदिरों में पुजारी के आगे झोली फैलाकर ब्राह्मणवाद के एक सच्चे हिन्दू कार्यकर्ता बनने के लिए आशीर्वाद मांग रहे हैं।

पिछले 5 दशकों से हजारों वामपंथी और सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं के प्रेरणास्रोत रहे 67 वर्षीय क्रांतिकारी गायक गदर का वामपंथी आंदोलनों से मोहभंग की खबरें तो कुछ वर्ष पुरानी हैं लेकिन मंदिर—मंदिर मत्था टेकने की जानकारी नई है। हालांकि दिसंबर में भी ऐसी खबरें आई थी जिसमें कहा गया था कि वह जगह—जगह पंडितों के साथ बैठकर पूजा—पाठ कर रहे हैं।

खबरों के मुताबिक वह पिछले हफ्ते भोंगरी जिले के यदाद्रि मंदिर गए और भगवान लक्ष्मीनरसिम्हा की आरती उतारने के बाद उन्होंने मंदिर के पुजारी से आशीर्वाद लिया। इससे पहले जनवरी महीने में उन्होंने पालाकुरथी में प्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर में भगवान शिव की भजनों के साथ पूजा की। इससे पहले वे सिद्दिपेट जिले में कोमुरावेल्ली मल्लाना मंदिर भी जा चुके हैं और लोगों को भगवान शिव के भजन सुना चुके हैं।

आंदोलनकारियों और वामपंथी कैडरों के बीच क्रांतिकारी गीतों और व्यवस्था विरोधी सांस्कृतिक आंदोलन के अगुआ माने जाने वाले गदर का यह व्यक्तित्व परिवर्तन बहस का विषय बना हुआ है।

कैडरो और वामपंथ समर्थकों  में सवाल यह भी है कि  जिस ब्राह्मणवाद, पुरोहितगिरी, सामंतवाद  और ईश्वरीय अवधारणा के खिलाफ सांस्कृतिक आंदोलन खड़ा करने में गदर ने अपना जीवन लगाया, उम्र के इस आखिरी पड़ाव पर कौन सी निराशा उन्हें मंदिरों और पुरोहितों के चौखट तक ले गयी ?

Mar 28, 2017

सेना ने दर्ज कराया स्टिंग करने वाली पत्रकार पर मुकदमा

जनज्वार। देश सेवा की भावना से सेना में भर्ती होने वाले सैनिकों का इस्तेमाल सैन्य अधिकारी घरेलू नौकर के रूप में करते हैं, इस बात को स्टिंग के जरिए उजागर करने वाली पत्रकार पूनम अग्रवाल पर सेना ने नासिक में मुकदमा दर्ज कराया है।

 पत्रकार द्वारा सैनिकों के किए स्टिंग के बाद एक सैनिक लांस नायक रॉय मैथ्यू ने आत्महत्या कर ली थी। 

लांस नायक मैथ्यू केरल के कोलम जिले के एझुकोन के रहने वाले थे। उनकी तैनाती  महाराष्ट्र के नासिक जिले के देओलाली छावनी में थी। छावनी में ही सैनिक मैथ्यू का शव खाली बैरक की छत से 4 मार्च को लटकता मिला था। पुलिस बयानों के मुताबिक जवान की मौत करीब 3 दिन पहले हो चुकी थी। 

स्टिंग वीडियो वायरल होने के बाद 25 फरवरी से ही मैथ्यू देओलाली में आर्टिलरी सेंटर से लापता थे। 

मैथ्यू ने भी अन्य सैनिकों की तरह पत्रकार से कहा था कि 'सहायक' के रूप में सैन्य अधिकारी हमारा इस्तेमाल व्यक्तिगत नौकर की तरह करते हैं। पत्रकार के स्टिंग में भी सैनिक अधिकारियों के कुत्ते टहलाते और सब्जी लाते देखे जा सकते हैं।

गौरतलब है कि सेना ने स्टिंग ऑपरेशन करने वाली वेबसाइट 'द क्वींट' की भूमिका पर उसी समय सवाल उठाए थे। कहा था कि सेना के ​ठीकानों पर गुप्त कैमरों से स्टिंग करना और उसे सार्वजनकि करना प्रतिबंधित है। इस मामले में रक्षा राज्य मंत्री सुभाष भामरे ने मैथ्यू की रहस्यमय मौत संसद में बयान देना पड़ा था। वहीं तत्कालीन गृहमंत्री मनमोहन पर्रिकर ने सैनिक की आत्महत्या को 'छिटफुट घटना' बताकर सरकार की किरकिरी करा दी थी। 

नासिक में सेना ने पत्रकार पूनम अग्रवाल के खिलाफ विभागीय गुप्त मामलों का खुलासा करने और आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में मुकदमा दर्ज कराया है। यह सेना के उस पत्र के बाद हुआ था जिसमें पुलिस को कहा गया था कि पत्रकार पर उचित धाराओं के तहत मुकदमा कर कार्यवाही करे। 

पत्रकार पूनम अग्रवाल ने इंडियन एक्सप्रेस मुकदमा दर्ज होने के बाद हुई बातचीत में बताया, 'इस मामले में मेरी सैन्य अधिकारियों से मुलाकात हुई। स्टिंग का जरिया और बातचीत दिखा दिया था। पर उस दौरान अधिकारियों ने यह नहीं ​कहा कि यह सब प्रतिबंधित है।' 

Mar 27, 2017

मम्मी पापा का सर्जिकल स्ट्राईक, रोमियो और योगी

ललित सती

एक अंग्रेज़ी गाना है - आई एम किसिंग यू। बढ़िया गाना है। ऊपी का रोमियो भी किस करना चाहता है, जूलियट भी चाहती है। लेकिन कहाँ करे। अपने घर में? जूलियट के घर में? वहाँ तो कोई स्कोप नहीं है। स्कूल में? वहाँ भी कोई स्कोप नहीं। सड़कों पर, किसी झील के किनारे? समाज की आँखें सजग हैं। कहीं कोई स्कोप नहीं। 

होटल में कमरा लेने के पैसे नहीं। वे पार्क पहुँचते हैं। किसी झाड़ की आड़ में बैठते हैं। वहाँ पुलिस आ टपकती है। छुप के इसलिए करते हैं लगता है जैसे कोई अपराध करने जा रहे हों। अपराध ही ठैरा। दोनों ने अपने-अपने माँ-बाप को कभी एक दूसरे को बाँहों में लेते नहीं देखा, चूमते हुए देखना तो बहुत दूर की बात है। स्त्री पुरुष संबंध क्या होते हैं वे क्या जानें।

बचपन में पता चला था कि भगवान जी की वजह से बच्चा हो जाता है, बाद में लगा नहीं, कुछ ऐसा नहीं। बस, इतना समझ आया कि रात के अँधेरे में कोई सर्जिकल स्ट्राइक होती है और बच्चे हो जाते हैं, और बस इत्ता ही होता है स्त्री-पुरुष संबंध। लड़का मसें भींजने के साथ अँधेरे में छाती पर हाथ मारना, दबोच लेना टाइप शिक्षा तो अपने सीनियरों से पा लेता है, इससे अधिक परिवार से उसे कुछ ज्ञान नहीं मिल पाता, न स्कूल में कि किसी स्त्री से कैसे व्यवहार किया जाए। 

ऐसे पिछड़े परिवेश से आने वाले लड़कों से समझदार लोग कहते हैं - ऐ नालायक, प्रेम महज देह नहीं और यदि प्रेम करते हो तो बग़ावत कर डालो। लड़का, न लड़की, समझ नहीं पाते किससे बग़ावत करें। समझदार कहता है- ग़र बग़ावत नहीं कर सकते तो डूब मरो चुल्लू भर पानी में। चुल्लू भर पानी में डूबना संभव नहीं तो एक दिन रोमियो जूलियट फाँसी खा लेते हैं या किसी नदी में डूब मरते हैं हिंदुस्तान में। इति वार्ता हो जाता है, समाज की संस्कृति बची रह जाती है। समझदार की बात भी सही साबित हो जाती है कि ये जनता ही मूरख व कायर है।

जो स्पेस हम अपने नौजवानों का छीन रहे हैं, फ्री सेक्स, देह की भूख टाइप फ़ालतू बातें करके, हम नहीं जानते हम कितने असामान्य इंसान तैयार कर रहे हैं। स्त्रियों की तो मुझे नहीं पता, लेकिन पुरुषों में जिन पुरुषों को स्त्रियों का सानिध्य मिला यानी स्त्री का एक इंसान के रूप में सहज स्वाभाविक सानिध्य मिला। जिन्होंने प्रेम किया। जिनके जीवन में कम पाबंदियाँ रहीं। 

ब्रह्मचर्य के नाम पर पैंतीस-चालीस बरस तक ब्याह होने तक जिन्हें लोहे का लंगोट नहीं पहनना पड़ा, वे कहीं बेहतर पुरुष होते हैं। बूढ़े ठरकियों से अधिक बेहतर ढंग से युवा लोग प्रेम के मायने समझते हैं। युवापन में देह के रहस्य जान लेने की उत्सुकता तो होती है, देह पा लेने की ज़िद नहीं। युवापन में आदमी होता है कहीं अधिक संवेदनशील, कहीं बेहतर इंसान।

ठरकी बुड्ढे क्या ज्ञान पेलते हैं, इसे छोड़िए। अपने नौजवानों को स्पेस दीजिए। पार्कों में नहीं है तो घरों में ही दीजिए। यकीन मानिए ये कोई पाप नहीं।

न तो मजनू के पिंजड़े लड़कियों से होने वाली छेड़छाड़ को रोक सके, न कोई एंटी-रोमियो स्क्वाड रोक पाएगा। बस एक भ्रम अवश्य कुछ समय, कुछ बरसों के लिए क्रिएट हो जाएगा, जैसा विमुद्रीकरण के मामले में हुआ।

एकदम नारकीय जीवन में पशुवत जीवन जीते आदमी को प्रेम तो इंसान बना सकता है, मगर कोई डंडा नहीं। न कोई लोहे की लंगोट।

पाखंड के लिए आप भले किसी योगी, साधु, संत, मौलवी, "समझदार" के भक्त बने रहें, अपने बच्चों को तो जीवन दें। सुख मिलेगा।
(ललित सती सामाजिक मसलों पर रोचक टिप्पणियां लिखते हैं. यह टिप्पणी उनके वॉल से )

कमाई ​कला के दलालों के हिस्से और बेगारी आर्टिस्टों के

विश्व थियेटर दिवस पर विशेष 

कुछेक अपवादों को छोड़ दिया जाये तो सार्थक और मूल्यवान रंगमंच कभी भी अनुदान पर निर्भर होकर नहीं हुआ है। इन अपवादों की भी छानबीन करें तो हमें पता चलता है कि जिन रंगकर्मियों ने अनुदान लेकर बेहतर नाटक किये वे अनुदान के बिना भी बेहतर थियेटर करने की क़ाबिलियत रखते रहे हैं...

राजेश चंद्र

हबीब तनवीर अनुदान लेते थे, पर उनका थियेटर अनुदान की वजह से नहीं था। पोंगा पंडित जैसे नाटक अनुदान के बग़ैर भी उसी प्रभावशीलता के साथ हो सकते हैं, जिस तरह अनुदान लेकर। पर ज़्यादातर अनुदानकर्मी रंगकर्मी करते क्या हैं? 5-5 लाख लेकर दो कौड़ी के नाटक नहीं करते। 


कुछ ठेके पर नाटक का मंचन करवा लेते हैं। कुछ पुराने नाटक को दुहरा कर काम चला लेते हैं। कुछ नाटक ही नहीं करते, पूरा हजम कर जाते हैं। कुछ बीच का रास्ता निकालने की कोशिश करते हैं। यानी कुछ नाटक में भी लगा दो और कुछ अपने लिये भी रख लो। यह अनुपात रंगकर्मी में बचे ज़मीर का समानुपाती हुआ करता है, जो वैसे भी सैकड़ों में से किसी एक में मिलता है।

यह हाल तो प्रस्तुति अनुदान का है, पर अगर सैलरी ग्रांट या वेतन अनुदान की बात करें, जिसके अंतर्गत देश में सैकड़ों निर्देशकों को प्रतिवर्ष 10 से 25 लाख रुपये सरकार देती है, उसकी लूट का पैमाना व्यापम जैसे किसी भी महाघोटाले से छोटा नहीं होगा। यह अनुदान अभिनेताओं के वेतन के लिये है, पर उसका 60-70 फीसदी, और कहीं-कहीं तो 90 फीसदी हिस्सा रंगमंडल संचालक या निर्देशक हजम कर जाते हैं।

अभिनेताओं की हैसियत ज़्यादातर रंगमंडलों में दास या बेग़ार खटने वाले मज़दूर से अधिक नहीं होती। देश भर में कुकुरमुत्तों की तरह उग आने वाले इन  रंगमंडलों का, जिनमें से ज्यादातर केवल काग़ज पर हैं, आपसी नेटवर्क इतना मज़बूत है कि इस गोरखधंधे का विरोध करने वाले अभिनेता को फिर कभी किसी रंगमंडल में काम नहीं मिलता। सी.ए. से फर्जी प्रमाणपत्र बनवा कर, तस्वीरें भेज कर और मंत्रालय के बाबुओं को खुश कर अनुदान हड़प लिये जाते हैं। 

मंत्रालयों में पैठ रखने वाले ताक़तवर रंगकर्मियों ने अलग-अलग लोगों के नाम से कई-कई रंगमंडल बना रखे हैं और वे नये रंगमंडलों के लिये ग्रांट पास करवाने के बदले भरपूर कमीशन भी खा रहे हैं। ऐसे सफेदपोश रंगकर्मी आज सभी राज्यों में कमीशन एजेन्ट का काम कर रहे हैं।

थियेटर में ग्रांट के वितरण और प्रबंध के लिये सरकार ने एनएसडी को नोडल एजेन्सी बना रखा है। थियेटर में बहने वाली भ्रष्टाचार और लूट की महागंगा की गंगोत्री यही ब्राह्मणवादी संस्था है।एनएसडी आज नाटक करने की, कथ्य समझने की तमीज़ नहीं सिखाती, वह उन्हें कुछ ट्रिक्स और फारमूले सिखा देती है, पांच लाख-दस लाख के अनुदान को खपाना सिखाती है, गलत-सही बिल बनाना और प्रोजेक्ट प्रपोज़ल बनाना सिखाती है, ताकि अनुदान के लिये फ़ाइट करने लायक नाटक उसके प्रशिक्षित लोग किसी प्रकार कर लें। एनएसडी प्रशिक्षण के नाम पर आज देश को धोखा देने के अलावा कुछ नहीं करती। इस पर कभी और बात होगी।

आज थियेटर में अनुदान बंद हो जाये तो 80 फीसदी रंगकर्मी रंगकर्म छोड़ देंगे। अनुदान अपने साथ एक संस्कृति भी लेकर आता है, भ्रष्टाचार, समझौतापरस्ती, अवसरवाद और लोलुपता की! रंगकर्मी एक बार समझौतापरस्त और बेईमान हो गया तो फिर वह रंगकर्मी कहां रह गया! जब आप अनुदान की पात्रता के हिसाब से अपने रंगकर्म का स्वरूप निर्धारित करते हैं, कथ्य और शैली चुनते हैं, तो फिर कथ्य और नीयत और क्वालिटी तो पहले ही संदिग्ध हो जाती है। अगली बार के अनुदान की फिक़्र तो और जानलेवा होती है।

विकास परियोजनाओं के नाम पर देश भर के आदिवासी और दलित विस्थापित हो रहे हैं, उजाड़े जा रहे हैं, उनके जल, जंगल, ज़मीन और संस्कृति की जैसी भयावह तबाही रची जा रही है, वह रंगमंच से क्यों गायब है? बस्तर और दन्तेवाड़ा जैसी जगहों पर, मणिपुर में, असम में, कश्मीर में मानव अधिकारों को बर्बर तरीके से कुचला जा रहा है, वह हमारे नाटकों का विषय क्यों नहीं है? कभी अखलाक, कभी पानसरे, कभी कलबुर्गी और कभी किरवले। रोज़ समाज के सोचने समझने वाले, हाशिये पर जीने वाले लोग मारे जा रहे हैं, दलितों की बस्तियां जलायी जा रहीं हैं, उनको आत्महत्या के लिये मजबूर किया जा रहा है, नंगा कर घुमाया जा रहा है, ये हमारे नाटकों में क्यों नहीं आता? किसानों की इतने बड़े पैमाने पर हो रही आत्महत्याएं रंगमंच में क्यों जगह नहीं पातीं?

इन सवालों का अकेला जवाब यही है कि अनुदान लेकर आप इन मुद्दों पर सवाल नहीं उठा सकते। आपको अनुदान और पुरस्कार मिलता ही इसीलिये है कि आप यह सब नाटक और रंगमंच में नहीं आने दें। जनता के सामने व्यवस्था को कठघरे में खड़ा नहीं कर सकते आप अनुदान लेकर। अनुदान सरकार इसी मकसद से देती है। लोग यह मकसद आगे बढ़ कर पूरा कर रहे हैं।

अनुदान-विमर्श आज रंगमंच का सबसे अपरिहार्य और प्राथमिक सरोकार बन गया है! सारी मेधा और प्रतिबद्धता इसी जोड़-तोड़ और बचाव में चुक रही है! इससे पता चलता है कि हम जिसे रंगकर्म मान रहे हैं उस मान्यता और समझ में ही बहुत भारी लोचा उत्पन्न हो गया है! अगर रंगमंच को, उसकी सामाजिक-राजनीतिक भूमिका को, उसके गौरवशाली इतिहास को बचाना है तो रंगकर्म को सरकारी बैसाखी से मुक्त करना अपरिहार्य हो गया है। इस दिशा में संगठित होना आज एक बड़ा कार्यभार है।

एनएसडी आज तमाम संसाधनों पर वर्चस्व और एकाधिकार की वजह से केन्द्र में नहीं है! वह श्रेष्ठ और विशिष्ट थी,  तभी रंगमंच के सारे संसाधन और शक्तियां उसके पास हैं! एनएसडी के स्नातक श्रेष्ठ और विशिष्ट होते हैं, इसीलिये उनका सारे संसाधनों और अवसरों पर पहला और नैसर्गिक अधिकार है! यह सोच क्या वैसी नहीं है कि ब्राह्मण जन्म से ही श्रेष्ठ होते हैं, इसलिये उन्हें शेष समाज पर वर्चस्व और नियंत्रण का नैसर्गिक और दैवीय अधिकार है! जैसे अंग्रेज हमसे श्रेष्ठ और महान थे, इसलिये हम पर अपना शासन और अन्याय-उत्पीड़न थोपना उनका विशेष और नैसर्गिक अधिकार था! 

जिस प्रकार हिटलर के जन्मजात महान और श्रेष्ठ लोग दुनिया पर शासन करने निकल पड़े, उसी प्रकार जन्म से ही श्रेष्ठ और विशिष्ट संस्थान एनएसडी के श्रेष्ठ और विशिष्ट स्नातक भारतीय रंगमंच को विजित करने निकल पड़े! सारे संसाधनों पर, सारे ग्रांट पर, सारी कमिटियों पर, सारे पुरस्कारों पर, सारे महोत्सवों पर, सभी संस्थानों पर एकाधिकार करने और थियेटर को अपने अनुसार हांकने का उन्हें महान, विशिष्ट, जन्मजात और दैवीय अधिकार प्राप्त है! 

राजेश चंद्र वरिष्ठ रंग समीक्षक। कई नाटक लिख और निर्देशित कर चुके हैं। 

सरदार जोक्स पर फाइनल फैैसला आज, सबको है इंतजार

जनज्वार। बहुचर्चित और सरदार जोक्स पर प्रतिबंध लगाने के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट आज विस्तृत आदेश पारित करेगा। पिछले दिनों 7 फरवरी, 2017 को हुई सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सरदार जोक्स पर प्रतिबंध लगाने से मना कर दिया था। मगर साथ ही यह भी कहा था कि अगर इससे किसी की भावनाएं आहत होती हों तो वह कानूनन केस जरूर दर्ज कर सकता है।

गौरतलब है कि दिल्ली की 54 वर्षीय सिख वकील हरविंदर चौधरी ने सरदार जोक्स पर पिछले साल सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की थी। इस मामले में अदालत ने कहा था कि किसी समुदाय विशेष के लिए गाइडलाइन गठित की जानी काफी पेंचीदा काम है, मगर यह जरूर है कि किसी जोक विशेष से किसी को कोई परेशानी होती है तो वह कानून के अनुसार केस दर्ज करा सकता है।  

7 मार्च, 2017 को इस मामले में की गई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अगर अदालत किसी किसी धर्म या जाति विशेष पर कोई दिशा निर्देश जारी कर देगी तो इस फैसले के बाद अन्य दूसरी जातियां और धर्म भी इसी फैसले को आधार बनाकर अपनी मांगें मनवाएंगे। जहां तक हंसी की बात है तो उस पर कोई नियंत्रण नहीं है। कोई हंसता है, कोई नहीं हंसता.

गौरतलब है कि वकील हरविंंदर चौधरी ने सुप्रीम कोर्ट में दायर अपनी याचिका में कहा था कि इंटरनेट पर मौजूद हजारों वेबसाइटें  सरदारों के नाम पर चुटकुले बेचती हैं, जिनमें सरदारों का बुद्धू, पागल, मूर्ख, बेवकूफ़, अनाड़ी और अंग्रेज़ी भाषा की अधूरी जानकारी रखने वाला कहते हुए मजाक उड़ाया जाता है। 

मन की बात में पहले भोजन बर्बादी पर भाषण दिया और फिर भोजन बर्बादी के कार्यक्रम के मेहमान बन गए

मोदी जी 'मन की बात' किस रिश्तेदार को सुनाते हैं, जब खुद वही करते हैं जो दूसरे पैसे वाले मंत्री, विधायक और पूंजीपति करते हैं। क्या उनकी नैतिक जिम्मेदारी नहीं कि ऐसे कार्यक्रमों का बहिष्कार कर अपने रईस मंत्रियों को सबसे पहले भोजन बर्बादी करने से रोकें.....

जनज्वार। मोदी जी ने जब कल मन की बात में खाने की बर्बादी पर भाषण दिया और बचाने की की अपील की तो देश को बहुत अच्छा लगा। देश के आम नागरिकों को लगा कि जिस देश की 80 फीसदी आबादी को ठीक से दो समय का भोजन नहीं मिलता, वहां इस तरह की बर्बादी रोकने पर पहल एक सकारात्मक और जरूरी प्रयास है।  
वैंकेया  नायडू  द्वारा ट्विटर पर शेयर की गई एक फोटो
पर थोड़ी ही देर में उनके बाकि बयानों की तरह यह भी खालिस ड्रामा साबित हुआ। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के शब्दों में कहें तो 'जुमला।' आपको याद होगा कि मोदी जी के हर खाते में पंद्रह लाख के बयान को अमित शाह ने मोदी जी का चुनावी जुमला बता दिया था। तब भाजपा और प्रधानमंत्री की बहुत किरकिरी हुई थी। 

कल 'मन की बात' करने के बाद मोदी जी अपनी सरकार के वरिष्ठ मंत्री वैंकेया नायडू के यहां एक भव्य कार्यक्रम में पहुंचे। वैंकेया नायडू मोदी सरकार में शहरी विकास के साथ शहरी गरीबी उन्मूलन मंत्री हैं। मंत्री ने अपने आवास पर 'उगादि' का आयोजन रखा था जिसमें सैकड़ों की सख्या में मेहमान पहुंचे, जिसमें बड़ी संख्या में मीडियाकर्मी भी थे। उगादि दक्षिण भारत में नववर्ष का दिन होता है। मंत्री का ताल्लुक दक्षिण भारत के आंध्र प्रदेश से इसलिए उन्होंने अपने यहां कार्यक्रम रखा था। 

प्रधानमंत्री मन की बात करने के बाद जब इस कार्यक्रम में पहुंचे तो वहां मेहमानों को भोजन में बारहों तरह का व्यंजन परोसा गया। मंत्री जी खुद ही खुशी—खुशी दर्जनों व्यंजनों की फोटो लगाते रहे। उपर लगी तस्वीर भी मंत्री जी द्वारा शेयर की गयी तस्वीरों में से एक है। गौरतलब है कि हमारे देश में हर साल भंडारण के अभाव में ही 50,000 करोड़ रुपए यानी कुल खाद्यान्न उत्पादन का 40 फीसदी बर्बाद हो जाता है। यह बर्बादी केंद्र सरकार के मुताबिक ब्रिटेन के सालाना अनाज उत्पाद के बराबर है।  

ऐसे में सवाल बस यह कि फिर मोदी जी 'मन की बात' किस रिश्तेदार को सुनाते हैं, जब खुद वही करते हैं जो दूसरे पैसे वाले मंत्री, विधायक और पूंजीपति करते हैं। क्या उनकी नैतिक जिम्मेदारी नहीं कि ऐसे कार्यक्रमों का बहिष्कार करें और अपने रईस मंत्रियों को सबसे पहले भोजन बर्बादी करने से रोकें। ऐसे कार्यक्रमों में छप्पन भोग क्यों जरूरी हैं, जबकि 3—4 तरह के व्यंजनों से काम चल सकता है। 

हालांकि भोजन की बर्बादी को रोकने के लिए कई प्रदेशों ने स्वाग्तयोग्य कदम भी उठाए हैं। जम्मू कश्मीर सरकार ने तो शादियों में भोजन की बर्बादी को रोकने के लिए कानून तक बनाया है कि हर शादी में मीनू और खाने की मात्रा पहले ही तय कर ली जाए, ताकि खाना बर्बाद न जाए। वहीं सांसद रंजीत रंजन खाने की बर्बादी रोकने के लिए संसद में बिल पेश कर चुके हैं। 

मोदी अपने शहंशाह मानसिकता वाले मंत्रियों को बताएं कि देश का नब्बे फीसदी आमजन आज भी अपने बच्चे को रोज एक गिलास दूध नहीं दे पाता, बुंदेलखंड और विदर्भ रोज अपने बच्चे को दाल नहीं दे पाता और बंगाल, मध्यप्रदेश और उड़ीसा से लेकर उत्तर प्रदेश तक कुपोषित बच्चों वाले राज्यों में आज भी टॉप में आते हैं।

क्या दिखावे की बजाए मोदी को जीवन में उतारने वाली मन की बात नहीं करनी चाहिए। सवाल यह इसलिए भी बड़ा है कि खाने का यह भव्य आयोजन वह मंत्री कर रहा है जो शहरी व गरीबी उन्मूलन के लिए जिम्मेदार है और उन्मूलन की हालत यह है कि आज की तारीख में सरकारी आंकड़ों के मुताबिक बहुतायत शहरी आबादी गरीब है और उसे दो जून का संतुलित भोजन तो छोड़िए, भरपेट भोजन उपलब्ध नहीं है। 

Mar 26, 2017

भाजपा सुशासन का एक सीन यह भी

तस्वीर में दिख रहे युवक 14 किलोमीटर दूर से कंधे पर एक मरीज को लादकर ईलाज कराने के लिए लाए हैं क्योंकि वहां सरकार एंबुलेंस की व्यवस्था नहीं कर सकती।

जी हां, भाजपा शासित छत्तीसगढ़ में फिर एक बार स्वास्थ्य व्यवस्था को तार—तार कर देने वाली तस्वीर सामने आई है। जन सुविधाओं के बड़े—बड़े वायदे करने वाली छत्तीसगढ़ सरकार की हालत यह है कि वह अपने राज्य की सबसे बड़ी आदिवासी आबादी को स्वास्थ्य की बुनियादी सुविधाएं भी नहीं मुहैया करा पा रही है।

आदिवासी बहुतायत वाले दंतेवाड़ा में आज 14 किलोमीटर पैदल चलकर एक मरीज के परिजन उसे अस्पताल लेकर पहुंचे। तस्वीरों से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि कैसे  14 किलोमीटर दूर से  कंधे पर मरीज को लेकर लोग पहुंचे होंगे।


सिर्फ 10 कॉरपोरेट 5 लाख करोड़ के कर्जदार और 9 करोड़ किसानों का कर्ज 12 लाख करोड़

बैंकों से लेकर नीति आयोग तक किसानों को कर्ज देने के मसले पर नाक—भौं सिकोड़ रहे हैं, पर सरकार और रिजर्व बैंक 70 हजार करोड़ से अधिक डकार जाने वाले डिफॉल्टरों का नाम बताने की हिम्मत नहीं कर पा रहे...

राजेश रपरिया 

भारतीय स्टेट बैंक की प्रमुख अरूंधति भट्टाचार्य के किसानों की कर्जमाफी से वित्तीय अनुशासन बिगड़ने के बयान से तूफान आ गया है। उन्होंने कहा कि चुनावों के वक्त किसानों का कर्ज माफ करना सही नहीं है। अगर ऐसा होता है तो हर चुनाव में कर्ज माफी की उम्मीद की जाएगी। इस बयान ने किसानों के गहरे जख्मों पर नमक तो छिड़का ही है, बल्कि बैंकिंग उद्योग को भी कठघरे में खड़ा कर दिया है। 

बैंको की बढ़ती अनर्जक आस्तियों (नॉन परफार्मिंग एसेट्स —एनसीए) से अर्थव्यवस्था और केंद्र सरकार की परेशानियां बढ़ गयी हैं, जबकि प्रमुख सरकारी बैंक की मुखिया अपने बयानों में ऐसे पेश आ रही हैं मानो देश की बढ़ती आर्थिक मुश्किलों का मुख्य कारण किसान ही हों। मार्च 2016 तक बैंकों की कुल कर्जराशि 70 लाख करोड़ रुपए थी, जिसमें उद्योग की हिस्सेदारी 41.71 फीसदी और कृषि कर्ज 13.49 फीसदी थी।



जाहिर है बड़े लोगों और कारोबारियों पर ही बैंकों का सबसे ज्यादा कर्ज फंसा हुआ है। पिछले 15 महीनों में बैंकों का एनपीए दोगुने से ज्यादा हो गया है। सितंबर 2015 में एनपीए 3 लाख 49 हजार 556 करोड़ रुपए के थे, जो सितंबर 2016 में बढ़कर 6 लाख 68 हजार 825 करोड़ रुपए के हो गए। विश्वविख्यात अंतरराष्ट्रीय वित्त कंपनी 'स्टैंडर्ड एंड पुअर्स' का अनुमान है कि इस वित्त वर्ष में एनपीए बढ़कर 9 लाख करोड़ रुपए के पार कर जाएंगे। रिजर्व बैंक का तर्क है कि आर्थिक हालात खराब होने से कर्ई बार कर्जदार समय से कर्ज नहीं चुका पाता है। पर आर्थिक विकास दर में सुधार आने से एनपीए में कमी आएगी और रिकवरी बढ़ जाएगी। 

लेकिन विडंबना यह है कि रिजर्व बैंक और अन्य बैंक इस तरह के लाभ किसानों को देने को तैयार नहीं हैं। फिर विलफुल डिफॉल्टरों (जो कर्जदाता जानबूझ कर कर्ज वापस नहीं करते, जबकि कर्ज वापस करने की उनकी हैसियत होती है) का आंकड़ा और नाम क्यों छुपाया जाता है, इसका कोई वाजिब तर्क न रिजर्व बैंक के पास है और न ही केंद्र सरकार के पास। यह कर्जदार गलत हथकंडों और सांठगांठ से भारी मात्रा में बैंकों से कर्ज पाते हैं, जो बैंकों, बड़े लोगों और राजनेताओं के कारनामों का जीता—जागता पुराण है। जनता के पैसों पर यह डिफॉल्टर बेनामी संपत्तियां बनाते हैं और विलासिता में करोड़ों—करोड़ रुपए उड़ा देते हैं। गौरतलब है कि 10 बड़े कॉरपोरेट समूहों पर 5 लाख 73 हजार 682 करोड़ रुपए का कर्ज है। यह जानकारी राज्य सभा में वित्त राज्यमंत्री संतोष गंगवार ने दी है। 

अपनी रिपोर्टों के लिए चर्चित न्यूज वेबसाइट न्यूज लॉन्ड्री ने इन डिफॉल्टरों के नाम उजागर किए। समाचार साइट फर्स्ट पोस्ट की एक रिपोर्ट के अनुसार 7129 बैंक खातों को डिफॉल्टर घोषित किया गया है, जिन पर 70 हजार 540 करोड़ का कर्ज है। इस साइट पर 18 बड़े कर्जदारों के नाम भी हैं। मोटा अनुमान है कि तकरीबन एक लाख करोड़ रुपए ये डकार गए हैं। इनमें विजय माल्या का नाम जगजाहिर है। पर उषा इस्पात समूह के 17 हजार करोड़ रुपए के कर्ज डकारने की पूरी दास्तान जानकर न केवल किसी के होश उड़ जाएंगे, बल्कि गुस्सा भी आएगा कि एक छोटा—सा कर्ज देने के लिए बैंक कितने चक्कर लगवाता है, दस्तावेज मांगता है। पर इन डिफॉल्टरों को कर्ज पर कर्ज देने में इन्हें कोई परेशानी नहीं आती है। सच तो यह है कि इन बड़े आदमी के आगे बैंकों की बोलती बंद हो जाती है। ऐसा तब है जबकि रिजर्व बैंक बताता है कि कृषि कर्ज में किसान कर्ज ही नहीं कृषि कारोबार कर्ज भी शामिल रहता है । 

नवंबर 2016 में वित्त राज्यमंत्री पुरुषोत्तम रुपाला ने राज्यसभा में बताया कि सितंबर 2016 तक कुल कृषि कर्ज 12 लाख 60 करोड़ रुपए थे। इनमें से 7.75 लाख करोड़ के कृषि ऋ़ण थे और 4.84 लाख करोड़ रुपए के दीर्घकालिक कर्ज। उन्होंने यह भी साफ किया कि कृषि कल्याण कोष में किसानों की कर्ज अदायगी का कोई इरादा सरकार का नहीं है। कागज पर पिछले 15 सालों में कृषि कर्ज 8 गुना से ज्यादा बढ़े हैं, लेकिन उस अनुपात में किसानों खासकर छोटे, लघु और सीमांत किसानों के कर्ज नहीं बढ़े हैं। 

बजट भाषण में किसान 
किसानों के लिए 10 लाख करोड़ के कृषि कर्ज का लक्ष्य रखा गया है, जो लगभग बैंकों के संभावित कुल एनपीए के बराबर है। 

रिजर्व बैंक के आंकड़ों पर मूलत: आधारित आर. राम कुमार और पल्लवी चौहान का शोधपत्र साफ बताता है कि बैंकिंग सेवा के भारी विस्तार और लक्ष्यों के बावजूद सीमांत किसानों की कर्ज निर्भरता सूदखोरों पर बढ़ी है। देश में 95 फीसदी सीमांत, लघु और छोटे किसान हैं जिनके पास एक, दो या पांच हेक्टेयर या उससे कम खेत हैं। देश की कुल कृषियोग्य भूमि का 68.7 फीसदी हिस्सा इन किसानों के पास है। इन किसानों के लिए अरसे से किसानी घाटे का सौदा बन गयी है। बाजार और मौसम की मार से उन्हें कोई कारगर सुरक्षा प्राप्त नहीं है। 


सरकार नहीं जानती किन पूंजीपतियों के कर्ज माफ हुए 
बैंकों ने बड़े कर्जदारों के 1.14 करोड़ रुपए के कर्ज तीन सालों 2013—2015 के कर्ज को बट्टे खाते में डाल दिए। राजनीतिक बयानबाजी में इसे कर्जमाफी कहा जाता है। वित्त राज्यमंत्री संतोष गंगवार ने राज्य सभा में बताया है कि 2015—2016 में भी 59 हजार 547 करोड़ रुपए बैंकों ने बट्टे खाते में डाले हैं। पर आश्चचर्य यह है कि जिन बड़े कर्जदारों के कर्ज बट्टे खाते में डाले गए हैं, इसकी जानकारी न रिजर्व बैंक के पास है न ही केंद्र सरकार के पास है। 

पिछले कुछ सालों में सवा 2 लाख से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं। 2015 में 8 हजार 7 किसानों ने आत्महत्या की। यह प्रवृत्ति बढ़ रही है। इससे साफ जाहिर है कि देश में किसानों की आर्थिक हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। तमिलनाडु में सदी का सबसे भयंकर सूखा पड़ा है। वहां के किसान 60 फीसदी सूद पर कर्ज लेने को मजबूर हैं, जबकि केंद्र सरकार का निर्देश किसानों को 7 फीसदी पर कर्ज देने का है। वहीं केरल में 115 साल बाद का सबसे भयंकर सूखा पड़ा है, जिसके लिए केंद्र सरकार से 1000 करोड़ रुपए की मदद चाहिए। बैंकों ने पिछले 10—15 सालों में सवा 3 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा बट्टे खाते में डाल दिए हैं तो किसानों का कर्ज क्यों नहीं माफ किया जा सकता है। केंद्र सरकार को छोटे, सीमांत और लघु किसानों की कर्ज अदायगी के बारे में संजीदगी से सोचने का वक्त है। उत्तर प्रदेश में फसली ऋणों की घोषणा अपने भाषणों में कर सकते हैं, तो बाकि देश के किसानों ने क्या गुनाह किया है। 

एनपीए का नुकसान छोटे कर्जदारों और किसानों को 
बैंकों के एनपीए पिछले कुछ सालों से बेहिसाब बढ़े हैं। बढ़ते एनपीए से बैंकों की कर्ज देने की क्षमता कम होती है और कर्ज की ब्याज दरें अनावश्यक रूप से ज्यादा बनी रहती हैं। इसका असली खामियाजा छोटे बचतकर्ताओं और कर्जदारों को भुगतना पड़ता है। बैंक की भाषा में छोटे कर्जदारों को 'स्मॉल ब़रोअर' कहा जाता है। 1991 में शुरू हुए उदारीकृत अर्थव्यवस्था के दौर से छोटे कर्जदारों की हिस्सेदारी 63 फीसदी से घटकर 32 फीसदी रह गयी है। टाटा इंस्टीट्यूट आॅफ सोशल साइंसेज के आर रामकुमार और पल्लवी चौहान के शोधपत्र में पुख्ता ढंग से यह बात सामने आयी है कि बैंकिंग उद्योग किसानों से दूर केवल बड़े लोगों और कारोबारियों का बन कर रह गया है। 

(राजेश रपरिया वरिष्ठ आर्थिक पत्रकार हैं। यह लेख दैनिक भास्कर से साभार।)

Mar 25, 2017

सदी के सबसे भयंकर सूखे के बीच खड़ा नरमुंड लिया किसान

हर तीसरे घर में अपने मुखिया के खो जाने के बाद दुख में व्याकुल लोग मिल जाएंगे। तबाही का ये मंजर है कि अक्टूबर 2016 से आत्महत्याओं का आंकड़ा 254 पहुंच गया.....

आकांक्षा 

जंतर मंतर के सामने अपने आगे नरकंकालों की खोपड़ियां लिए धरने पर बैठे कुछ लोग सूनी आंखों से अपना दर्द बयान कर रहे हैं। पिछले कुछ दिनों से खबरों में यही तस्वीर दिखाई जा रही हैं। ये लोग कोई और नहीं तमिलनाडु के किसान हैं। देश का अन्नदाता कहे जाने वाले किसान की ये दुर्दशा हो गई है कि खेतों की बजाय खोपड़ियां लिए प्रदर्शन करने को मजबूर हैं। वजह भयंकर सूखे के हालात, जो अकाल जैसी स्थिति में बदलते जा रहे हैं। 

भारत का दूसरा बड़ा चावल उत्पादक प्रदेश तमिलनाडु आज सदी के भीषण सूखे से जूझ रहा है। हालात इतने बदतर हो गए हैं कि पिछले दो महीनों में 65 किसानों ने आत्महत्या कर ली। दिन पर दिन स्थिति और बिगड़ती ही जा रही है। अक्टूबर 2016 से ये सिलसिला लगातार बढ़ता ही जा रहा है। इन हालातों को देखते हुए एआईडीएमके के नेता पन्नीरसेलवम ने जनवरी 2017 में तमिलनाडु के 32 जिलों के सूखे की चपेट में होने की रिपोर्ट केंद्र सरकार को दी है। तकरीबन 13,305 गांव बुरी तरह से प्रभावित हुए हैं। 

गौरतलब है कि पूरे तमिलनाडु में औसत से 35 से 85 प्रतिशत बारिश कम हुई है, जिसकी सीधी मार फसलों पर पड़ी है। सूखे के हालात और भी बदतर तब हुए जब कर्नाटक ने कावेरी नदी का पानी रोक लिया। इन सब  कारण पहले तो सामान्य से 40 से 50 प्रतिशत खेती नहीं हुई, जो हुई वह भी बिना पानी बर्बाद हो गई। फसलों से लहलहाने वाले खेत आज बंजर भूमि में तब्दील होकर रह गए और किसान हताशा के बोझ तले दब गए। तमिलनाडु के साथ आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और केरल के कुछ हिस्से भी सूखे से जूझ रहे हैं। 

हताशा का मंज़र

तमिलनाडु के औसत किसान के पास एक से तीन एकड़ जमीन है, जिस पर 15000 से 18000 रुपए प्रति एकड़ तक का खर्च आता है। लेकिन 2016 से हालात ऐसे बदले कि देखते ही देखते कृषि दर सामान्य से 40 से 50 प्रतिशत घट गयी। जिन किसानों की फसलें लहलहाने का और कटाई के बाद खुशियां मनाने का वक्त था, वह सूखे की चपेट में ऐसी आई कि घरों में मातम पसर गया। हर तीसरा घर मातम मनाता नजर आता है। 

एक किसान अपनी 3 एकड़ की फसल की बर्बादी को देखकर इस कदर टूटा कि अपने बेटे को चाय लाने के बहाने भेजकर आत्महत्या कर ली। फसलों की बर्बादी और कर्ज की लटकती तलवारों से निजात पाने का सिर्फ एक यही तरीका किसानों के पास रह गया है। 

तमिलनाडु के हर तीसरे घर में अपने मुखिया के खो जाने के बाद दुख में व्याकुल लोग मिल जाएंगे। तबाही का ये मंजर है कि अक्टूबर 2016 से आत्महत्याओं का आंकड़ा 254 पहुंच गया। पिछले दो महीनों में 65 किसानों ने भी यही रूख अपनाया। लेकिन सरकारी कागजों में ये आंकड़ा सिर्फ 17 तक ही पहुंचा। तमिलनाडु किसान संगठन के नेता बी आर पंडियन ने सरकार पर गुमराह करने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि सरकार सही आंकड़े छुपा रही है जिससे हालात और बिगड़ सकते हैं।

सरकार का रुख

बर्बाद होती फसलें लगातार बढ़ती आत्महत्याओं और धरने प्रदर्शन के बाद सरकार ने तमिलनाडु को 10 जनवरी, 2017 को सूखाग्रसित राज्य घोषित कर दिया। सरकार ने करीब 10 दिन पहले नागापटटीनम और थंजावूर जैसे भारी तबाही वाले जिलों में किसान परिवारों को 3 लाख रुपए मदद के रूप में दिए। किसानों की प्रति एकड़ बर्बाद हुई फसलों का मुआवजा देने का वादा भी किया गया। केंद्र ने सूखाग्रसित तमिलनाडु के लिए करीब 2014 करोड़ रुपए की सहायता राशि अनुमोदित की है। राज्य सरकार को केंद्र से 39000 करोड़ रुपए की मदद की उम्मीद थी। 

इस बारे में किसान संगठन अध्यक्ष बी पंडियन का कहना है ये राशि घड़े में एक बूंद के समान है। सरकार ने प्रति एकड़ जमीन के हिसाब से भी क्षतिपूर्ति देने का वादा किया है। इसमें कावेरी नदी के आसपास वाले किसानों को 25000 प्रति एकड़ दिए जाएंगे, जबकि अन्य किसानों को 21000 से 26000 प्रति एकड़ के बीच आपदा राहत कोष से सहायता मिलेगी। सर्वे के मुताबिक कावेरी नदी के आसपास करीब 80000 एकड़ फसल बर्बाद हुई है। यूं तो सरकार ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत 130,000 धान के खेतों का बीमा किया हुआ था, जिसके अंतर्गत करीब 95 प्रतिशत किसानों के खेत आते हैं। कुल मिलाकर 11 करोड़ की प्रीमियम राशि भी किसानों तक पहुंच जाए, तो आत्महत्या जैसे हताशा भरे कदम से तो निजात मिलेगी।

सरकार के वादों से उम्मीद की जा सकती है कि किसानों की बदतर स्थिति में थोड़ा सुधार आएगा। लेकिन ये तभी मुमकिन है जब सरकार और किसानों के बीच के लंबे फासले को घटाया जा सके, ताकि मदद की गुहार लगाते किसानों को कुछ लाभ मिल सके।

मानसून की मार 

मौसम विभाग के अनुसार तमिलनाडु में इस बार 70 प्रतिशत मानसून कम रहा, जिसका सीधा असर भूमिगत जल स्तर पर पड़ा जो 85 प्रतिशत कम हो गया। जाहिर है बिना पानी के फसलें बुरी तरह बर्बाद हो गईं। मौसम विभाग के मुताबिक जून से सितंबर के बीच आने वाले दक्षिण पश्चिम मानसून पिछले 140 सालों में सबसे खराब रहा। यही हाल उत्तर पूर्वी मानसून का भी रहा, जो तमिलनाडु से होता हुआ आंध्र प्रदेश के तटीय इलाकों दक्षिण कर्नाटक और केरल से होकर जाता है। 145 सालों में दूसरी बार ये खराब मानसून रहा। इसका सीधा असर जल स्त्रोतों पर पड़ा, जो 20 प्रतिशत तक सूख गए। 

इसी के साथ पेयजल का संकट भी गहराने लगा है। सरकार की ओर से नदी नहरों के मरम्मत के लिए भी करोड़ों का प्रावधान रखा गया है जिससे किसानों को मनरेगा के तहत काम मिल सके। मनरेगा योजना में भी 100 दिन से बढ़ाकर 150 दिन कर दिए गए हैं, ताकि काम करने वाले किसानों की रोजी रोटी चल सके। 


आकांक्षा युवा पत्रकार हैं।
editorjanjwar@gmail.com

Mar 24, 2017

वीसी के सामने कांफ्रेंस में पीटा महिला कर्मचारी को

जनज्वार। बुंदेलखंड विश्वविद्यालय की जूनियर स्टोर इंचार्ज डॉक्टर पुष्पा गौतम की पिटाई का वीडियो सामने आने के बाद कल बुंदेलखंड दलित अधिकार मंच ने झांसी मेडिकल कॉलेज उनसे मुलाकात की। पुष्पा गौतम पर हुए जानलेवा हमले के बाद से ही वह मेडिकल कॉलेज में भर्ती हैं। 

पुष्पा गौतम से मुलाकात करते दलित अधिकार मंच के लोग 

बुंदेलखंड दलित अधिकार मंच के कुलदीप बौद्ध ने बताया कि वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि पांच - सात पुरुष कर्मचारी पुष्पा गौतम को लाल—घूसों और कुर्सी उठाकर मार रहे हैं लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन ने दोषी सात कर्मचारियों के साथ पुष्पा गौतम को क्यों निलंबित कर दिया है, समझ से परे है। 

गौरतलब है कि 18 मार्च को परिक्षाओं के मद्देनजर वीसी की उपस्थिति में झांसी के बुंदेलखंड विश्व​विद्यालय के सभी प्रशासनिक कर्मचारियों की बैठक चल रही थी। बैठक में जैसे ही पुष्पा गौतम ने बताना शुरू किया कि उनसे पिछले कुछ महीनों से तीन—चार कर्मचारी नेता दो लाख रुपया मांग रहे हैं तभी वह नेता पुष्पा पर पिल पड़े। 

अस्पताल में कुलदीप बौद्ध को मामले की जानकारी देते हुए पुष्पा गौतम ने बताया कि मारने वाले कर्मचारी ज्यादातर पिछड़ी जाति से हैं और मैं दलित। अशोक कुशवाहा, संतोष कुशवाहा, उमेश करोलिया, मुकेश शर्मा आदि लोग समय—समय पर मुझ पर दबाव बनाते थे और कहते थे तुम बहुत कमाती हो दो लाख हमें भी दो। हमारे विभाग का एक चपरासी भी इनके साथ है। वह एक ​दिन ड्यूटी पर नहीं आया तो मैंने अनु​पस्थिति दर्ज कर दी। इस पर उसने मुझे धमकी दी। बाद में उसने उन लोगों को भी धमकोने के लिए बुलाया जिनका नाम मैंने उपर बताया। फिर वो लोग दो लाख को लेकर कहने लगे। मैंने कह दिया, मैं नहीं दूंगी और अब मैं वीसी से शिकायत करूंगी। और उस दिन मैं शिकायत ही करने के लिए उठी थी और मामले की जानकारी ही दे रही थी कि इन लोगों ने मुझपर हमला कर दिया। 

फिलहाल मुकदमा दर्ज हो गया है। पर एक भी आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं हुई है। आरोपी फोन पर धमकी देकर एसएसटी एक्ट के तहत दर्ज मामले को वापस लेने की बात कर रहे हैं। पर पुष्पा गौतम का कहना है कि मैं पीछे नहीं हटुंगी, मैं दोषियों को सजा दिला के रहुंगी। 

पुष्पा गौतम पर हमले का वीडियो 

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Mar 23, 2017

योगी के एंटी रोमियो दल की करतूत देखकर खून न खौला तो पानी है

उत्तर प्रदेश में एंटी रोमियो दल कैसे काम कर रहा है उसको जानना है तो आप तीन मिनट का यह ​वीडियो जरूर देख लें। लखनऊ  के राममनोहर लोहिया पार्क का यह वीडियो बताने के लिए काफी है कि आपने कैसी और किसकी सरकार चुनी है। जिस तरह वीडियो में लड़के—लड़कियों का बेइज्जत किया जा रहा है, मारा—पीटा जा रहा है, उसको देख कर आपका खून खौल जाएगा कि इसी दिन के लिए भाजपा को पूर्ण बहुमत की सरकार दी थी। 

इतना याद रखिए अगर यह सिलसिला चलता रहा और आप तमाशा देखते रहे तो एक दिन आप, आपकी बहन, प्रेमिका, दोस्त शिकार किए जाएंगे और तब कहने वाला कोई न होगा ! 


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Mar 22, 2017

दलित लड़की का गैंगरेप, विरोध करने पर भाई की उंंगलियां काटीं

योगी जी की पुलिस पहले गैंगरेप के सबूत मिटाती है फिर चार दिन बाद ​मुकदमा दर्ज करती है


जनज्वार। मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठते ही एक्शन में आए योगी आदित्यनाथ के प्रदेश की स्थिति यह है कि वहां चार ब्राह्मण जाति के लड़के जीतू, बॉबी, रितेश और प्रवीण पहले एक नाबालिग दलित लड़की का गैंगरेप करते हैं, भाई द्वारा विरोध करने पर उसकी उंगलियां काटते हैं, पेट में चाकू से 10 बार से ज्यादा वार करते हैं, मरा हुआ जानकर छोड़ जाते हैं और पिता शिब्बू जब इन घटनाओं को बताने के लिए पुलिस को फोन करते हैं तो इलाके का एसएचओ पीड़िता के बाप को एक रात हवालात की हवा खिलाकर कुटाई करता है कि तुम अपना केस वापस लो, मासूम लड़कों को बलात्कार जैसे संगीन आरोप में न फंसाओ, उनकी जिंदगी बर्बाद हो जाएगी। 

और जब पिता ऐसा नहीं करता है तो आरोपियों के परिजन 17 वर्षीय नाबालिग पीड़िता के पिता के घर की छत में छेद करते हैं, उसे बाहर निकालते हैं, दम भर कु​टाई करते हैं और फिर घर लूटकर फूंक देते हैं। जिसमें दो मोटरसाइकिलों समेत सबकुछ जलकर खाक हो जाता है। साथ ही आरोपियों के परिजन धमकाते हैं अब राज बदल गया है. भाजपा विधायक अनिल शर्मा भी हमारा, पुलिस भी  हमारी. इस बीच वाल्मिकी परिवार खेतों—खलिहानों के रास्ते भागते हुए बुलंदशहर जाकर अपनी जान बचाता है। लूटपाट, आगजनी और जान से मारने की कोशिश के मामले में  मनोज, मनोज की घरवाली, पंकज, मुकेश, मनीष, नीतू, सोनू, राधा शर्मा,  शिवदत्त, सत्ता, वीरेंद्र और सोमू पर मुकदमा दर्ज है। पर एक भी गिरफ्तारी अबतक नहीं हुई है।

जी, हां। यही हुआ है यूपी के बुलंदशहर जिला के थाना जहांगिराबाद के ​कटियावली गांव में। गांव में तीन घर वाल्मिकी और पूरा गांव ब्राह्मणों का है। 14 मार्च की शाम 7.30 बजे अपने घेर (घर से अलग थोड़ी दूर पर जहां जानवरों को पालते हैं) पर पीड़िता जानवरों को बांधकर लौटने की ही वाली थी कि चार ब्राह्मण जाति के लड़कों ने उसको दबोच कर गैंगरेप किया। रेप करने वाले चारों आरोपियों की उम्र 20 से 30 साल के बीच है। 

पीड़ित पक्ष के वकील रणवीर सिंह लोधी बताते हैं, '14 मार्च की घटना का मुकदमा 18 मार्च को दर्ज हुआ। जहांगीराबाद थाना प्रभारी श्यामवीर ​सिंह ने मुकदमा दर्ज करने की बजाए पीड़िता के पिता को ही हवालात में डाल दिया और मुकदमा नहीं लिखाने पर दबाव बनाने लगे। दो दिन बाद में जब ये लोग मेरे पास आए तो एसएसपी सोनिया सिंह के हस्तक्षेप पर धारा 376, एसएसटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज हुआ है। हालांकि अब तक चारों में से किसी आरोपी की गिरफ्तारी पुलिस नहीं कर सकी है। पुलिस ने यह जरूर किया है कि आरोपियों के साथ मिलकर ज्यादातर सबूत मिटा दिए हैं।'

मुकदमा दर्ज कराए जाने के बाद पीड़ित परिवार गांव लौटने की हिम्मत नहीं कर पा रहा। मगर सरकार की ओर से अब तक पीड़ित परिवार के लिए न तो रहने की कोई व्यवस्था, न सुरक्षा और न ही कोई आर्थिक मदद मिली है। पीड़िता के भाई को बुलंदशहर जिला अस्पताल से दिल्ली रेफर कर दिया गया है। वहां के डॉक्टरों ने बताया कि पीड़िता के भाई राजा की हालत नाजुक है, उसे बेहतर ईलाज की जरूरत है। 

गौरतलब है कि 14 मार्च की शाम पीड़िता की चीख सुन उसका भाई राजा उसको बचाने के लिए दौड़ा आया। भाई को देख चारों ने लड़की को छोड़ उस पर हमला कर दिया। दरिंदों ने बचाव करते भाई के हाथ की चार उंगलियां काट दीं और 10 बार से ज्यादा बार चाकू से वार किया। इस जघन्य वारदात की सूचना के लिए पीड़िता के पिता ने रात में कई बार पुलिस के 100 नंबर पर फोन किया पर कोई नहीं आया। पीड़िता के पिता शिब्बू अन्य रिेश्तेदारों के साथ बेटे को नजदीकी अस्पताल में ले गए। 

Mar 21, 2017

भाजपा का एक छोटा सा साक्षात्कार

भाजपा की विकास यात्रा पर वरिष्ठ लेखक राजकिशोर ने लिया व्यंग्यात्मक साक्षात्कार 

प्रश्न : तुम्हारा नाम क्या है?
उत्तर : भाजपा कुमारी
प्रश्न : किस की बेटी हो?
उत्तर : आर एस एस पांडे की
प्रश्न : तुम्हारी उम्र?
उत्तर : यही कोई सैंतीस साल।
प्रश्न : उम्र के हिसाब से तो काफी फैल गयी हो।
उत्तर : मत पूछिए। एक बार ऐसी बीमार पड़ी थी कि मेरा वजन बस दो किलो रह गया था।
प्रश्न : उस के बाद सेहत कैसे बनी?
उत्तर : मैं नियमित रूप से वर्जिश करती हूँ। सुबह छह से सात। लाठी भाँजने में कई बार फर्स्ट आ चुकी हूँ। कुछ घरानों से टॉनिक भी आ जाता है।
प्रश्न : फिर भी इतनी जल्दी, इतना विकास?
उत्तर : अंकल, इस में मेरा दोष नहीं है। मेरी फ्रेंड्स सिकुड़ती गयीं और उन की जगह मुझे मिलती गयी। अब तो मैं ही मैं हूँ।
प्रश्न : तब तो तुम्हारी अभिलाषा पूरी हो चुकी होगी।
उत्तर : अभी कहाँ। इतनी उम्र हो गयी, पर शादी नहीं हुई। कुँवारी हूँ।
प्रश्न : क्या किसी खास लड़के का इंतजार कर रही हो?
उत्तर : हाँ, भारत कुमार।
प्रश्न : पर उस के पीछे तो और भी लड़कियाँ पड़ी हैं - रेशमा है, कावेरी है, उज्ज्वला है, ललिता है, गुलनार है, नालंदा है...
उत्तर : यही तो चुनौती है। पर पापा कहते हैं, लगी रहो, एक न एक दिन सफलता जरूर मिलेगी।
प्रश्न : आजकल भारत कुमार बहुत बीमार है। कुपोषित है। उस का पूरा शरीर दर्द करता है। उसका स्वास्थ्य लौटाओगी, तभी तो उसे पाओगी।
उत्तर : जितना होता है, करती ही हूँ। पर मेरा लक्ष्य कुछ और है।
प्रश्न : तुम्हारा लक्ष्य क्या है?
उत्तर : पकड़ुआ विवाह करना। पर और लोग भी इसी फिराक में हैं। किसी के हिस्से में हाथ आते हैं, किसी के हिस्से में पैर। पूरा किसी के हाथ में नहीं आता।
प्रश्न : ऐसे हाथ नहीं आने वाला। उसे सर्वांग सुंदरी चाहिए।
उत्तर : इस समय मुझ से सुंदर कौन है?
प्रश्न : सो तो है। पर तुम्हारी हथेली में यह खून कैसे लगा? कहाँ से आ रही हो?
उत्तर : चुप कीजिए। आप जैसे देशद्रोहियों का जवाब मैं नहीं देती।

जब 'जुमला' ही राजनीतिक रणनीति बन जाए

मोदी का कब्रिस्तान-श्मशान वाला जुमला सम्प्रेषण में कारगर रहा| अखिलेश ने इसकी काट के लिए प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र बनारस को ‘चौबीस घंटे बिजली’ जैसे तर्क का सहारा लिया| हिंदुत्व के अखाड़े में साख गंवा चुके विकास का यह अदना—सा तर्क मोदी की निर्बाध भावनात्मक अपील के सामने नहीं ठहर सका.....

विकास नारायण राय

जुमलेबाजी में गलत क्या है? प्राचीन यूनानी दार्शनिक अरस्तू के अनुसार एक प्रभावी जुमला (rhetoric) तीन तत्वों के मिश्रण से बनेगा- एथोस, पथोस और लोगोस, यानी संवादकर्ता की साख, जुमले की भावनात्मक अपील और उसमें निहित तर्क| नरेंद्र मोदी की चुनावी सफलता ने सम्प्रेषण की इस कला को आज देश की सामयिक राजनीति में स्थापित कर दिया है| उत्तर प्रदेश के हालिया चुनाव में सभी ने देखा कि कैसे अखिलेश के ‘काम बोलता है’ पर मोदी का जवाबी जुमला ‘कारनामा बोलता है’ भारी पड़ा| 

इस लिहाज से मायावती मैदान में कहीं थी ही नहीं| 2015 में स्वयं मोदी का ‘कितने लाख करोड़ दूँ’ जैसा नाटकीय जुमला बिहार में औंधे मुंह धराशायी गिरा था| बिहार चुनाव के समय मोदी हर बैंक खाते में विदेशों से लाया पंद्रह लाख काला धन जमा करने में चूक गए व्यक्ति हुआ करते थे, जबकि उत्तर प्रदेश संस्करण में विमुद्रीकरण के घोड़े पर सवार उस दिशा में बढ़ते एक योद्धा|

अरस्तू ने इसे ‘तकनीक’ कहा| हालाँकि, राजनीतिक जुमला एक तरह से भाषा के कलेवर में छिपी राजनेता की अविश्वसनीयता का भी सूचक है| भविष्य के वादे के दम पर वर्तमान को अपने साथ ले जा पाने का उसका व्यावहारिक कौशल! साध्य को पाने का साधन! उत्तर प्रदेश की अभूतपूर्व सफलता के समानंतर पंजाब की करारी हार में मोदी ने यह भी पाया होगा कि उनका जुमला कौशल बादल परिवार की शून्य बराबर साख से गुणा होकर शून्य ही रह गया| जब साख नहीं तो जुमला काम नहीं आता, नाकाफी सिद्ध होते हैं अकेले दम भावनाओं की अपील और तर्कों के फलसफे| 

बेशक, लोगों को प्रभावित करने के लिए जरूरी नहीं कि साख सच्चाई या जवाबदेही के धरातल पर टिकी हो; जरूरी होता है लोगों का जुमले से तारतम्य| इंदिरा गाँधी के मशहूर, बेहद सफल राजनीतिक जुमले ‘गरीबी हटाओ’ की तरह| वैसे ही जैसे सदाबहार बन गया है परिवार नियोजन का सरकारी जुमला, ‘हम दो हमारे दो’|

मोदी ने ताजातरीन चुनावी दौर तक आते-आते महत्वपूर्ण ‘कोर्स करेक्शन’ किये हैं| बिहार चुनाव के समय उनकी छवि कृषि भूमि हड़पने पर उतारू, बुलेट ट्रेन और क्रोनी कॉर्पोरेट की संगत में दस लाख का नामधारी सूट पहन विदेशों में वक्त गुजारने वाले बड़बोले प्रधानमंत्री की बन रही थी| आज वे रसोई गैस, शौचालय, सकल आवास, बेटी बचाओ, कर्ज माफी, ईमानदार शासन और गुंडाराज से मुक्ति जैसे समावेशी मुद्दों की ब्रांडिंग को लालायित नेतृत्व के रूप में उभरते लग रहे हैं| 

मोदी के विकास केन्द्रित जुमलों को साख यहाँ से मिली ईमानदारी की भावनात्मक अपील और सुशासन की तर्क शक्ति तो उनमें पहले भी कम न थी| ध्यान रहे कि एक भी मुस्लिम को उम्मीदवार बना पाने में असमर्थ भाजपा का मुख्य राजनीतिक जुमला, ‘सबका साथ सबका विकास’ साख और तर्क के मानदंड पर फिसड्डी रहा| मात्र एक भावना भर प्रेषित करने से यह पार्टी की कमजोर कड़ी सिद्ध हुआ| इसे मुस्लिमों, ईसाइयों और दलितों ने जैसे पहले नाकारा था वैसे ही अब भी| स्वीकारा तो दूसरों ने भी नहीं| हालाँकि भाजपा घाटे में नहीं रही क्योंकि पंजाब के बादलों की ही तरह उत्तर प्रदेश में यादवों की ब्रांड साख भी जीरो रही| लिहाजा, राहुल-अखिलेश के ‘यूपी को युवा साथ पसंद है’ वाली संयुक्त जुमलेबाजी का नतीजा कांग्रेस के लिए सिफर निकला|

सफल चुनावी जुमला और कुछ नहीं सही वोटर निशाने पर लगा शब्द बाण ही है| इस चुनावी दौर में हमने देखा कि इसका वाहक आशा, भय, घृणा, असुरक्षा, राष्ट्रवाद, विकास, कुछ भी हो सकते हैं| इसकी प्रभावी ताकत में संदेह नहीं| अपने हिंदुत्व वोट बैंक के चुनावी ध्रुवीकरण के लिए भाजपा पारंपरिक रूप से विरोधियों पर तुष्टीकरण का आरोप मढ़ती आयी है| 

अब की बार उत्तर प्रदेश में इसे सिरे चढ़ाने के लिए पार्टी को राम मंदिर या मुजफ्फरनगर का ढोल पीटने की जरूरत नहीं पड़ी| मोदी का कब्रिस्तान-श्मशान और ईद-दीवाली वाला जुमला सम्प्रेषण में कारगर रहा| अखिलेश ने इसकी काट के लिए प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र बनारस को ‘चौबीस घंटे बिजली’ जैसे तर्क का सहारा लिया|हिंदुत्व के अखाड़े में साख गंवा चुके विकास का यह अदना—सा तर्क मोदी की निर्बाध भावनात्मक अपील के सामने नहीं ठहर सका|

भारत निर्माण में सकारात्मक राजनीतिक जुमलों की ताकत बखूबी महसूस की गयी है| स्वतंत्रता संग्राम में ‘आजादी हमारा जन्म सिद्ध अधिकार’, ‘बन्दे मातरम’, ‘इन्कलाब जिंदाबाद’, ‘भारत छोडो’ और ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा’ का सिलसिला स्वतंत्र भारत में ‘जय जवान जय किसान’ और ‘हर जोर जुल्म से टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है’ तक बना रहा | इस बीच ‘आपातकाल अनुशासन पर्व’, ‘हम मंदिर वहीं बनायेंगे’, ‘तिलक, तराजू और तलवार......’ और ‘उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण’ बेहद विवादग्रस्त राजनीतिक जुमले बनकर देश के राजनीतिक क्षितिज पर उभरे| 

इस क्रम में देखें तो मोदी के जुमलों की चुनावी लय फिलहाल विकासवादी और विभाजक दोनों रही है| देर-सबेर वोटर को ही नहीं उन्हें भी इस घाल-मेल से निकलते दिखना होगा| अकेले गांधी जी ही यह जुमला बोल सकते थे- जो परिवर्तन दुनिया में देखना चाहते हो स्वयं में पैदा करो| यह था उनकी साख का राज! आज के दिन मोदी शायद देश में एकमात्र सक्रिय महत्वपूर्ण राजनेता हैं जो अपने श्रोताओं की आँख में आँख डाल कर कह सकते हैं, ‘न खाऊँगा न खाने दूंगा’| प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने कितनी ही बार करतल ध्वनि के बीच यह जुमला दोहराया होगा| 

हालाँकि, आपको बिना किसी अर्थशास्त्री के बताये भी पता है कि नोटबंदी ने काले धन पर कोई असर नहीं डाला | बैंकों का एनपीए लगातार बढ़ता जा रहा है| विजय माल्या, मोदी सरकार की आँखों में आँखें डालकर हजारों करोड़ की देनदारी के साथ देश से उड़न छू हो गया| क्रोनी कॉर्पोरेट तंत्र पहले जैसा ही फल-फूल रहा है| मणिपुर और गोवा में भाजपा सरकारें वोट से नहीं खोट से बनी हैं| तो क्या, महत्वपूर्ण है कि ‘न खाऊँगा न खाने दूंगा’ की मोदी साख बरकरार है|


मनमोहन सिंह इस जुमले का सिर्फ पहला आधा भाग कह सकते थे, ‘न खाऊँगा’, और मायावती सिर्फ शेष आधा, ‘न खाने दूंगी’| क्या मोदी के जुमलों की अंतर्वस्तु और उनकी सार्वजनिक वक्तृता शैली की तुलना हिटलर से की जा सकती है, जैसा कि उनके कई विरोधी दावा करते रहे है| इसके समर्थन में मुख्यतः मोदी की विशाल भीड़ से एकाकार होने के क्रम में नाटकीय भंगिमाओं और उनके गुजरात दौर के सांप्रदायिक पूर्वाग्रहों का हवाला दिया जाता है| 

जैसे हिटलर जर्मन श्रमिक से एकजुटता दिखाने के लिए अपने साढ़े चार वर्ष के एक साधारण सैनिक के जीवन का भावुक हवाला दिया करता था, क्या मोदी का चाय वाला अवतार भी वही मकसद हासिल करता नहीं लगता? शब्दों के दोनों चितेरे राष्ट्रवादी फासिस्ट अपील से अपने श्रोताओं पर जादुई असर छोड़ते नजर आते हैं| लेकिन, भिन्न कालखण्डों के भिन्न राजनीतिक सन्दर्भों की कोई भी तुलना अकादमिक हो सकती है, जरूरी नहीं व्यावहारिक भी हो| अरस्तू वर्णित राजनीतिक जुमलों की अपील के तत्व बेशक दोनों में हों, वे उसी गहन रूप में आज भी हम पर असर करते हों, तो भी देश-काल सापेक्षता के निर्णायक महत्व को नकारा नहीं जा सकता है| हिटलर युद्ध उन्माद की उपज था| मोदी का जमाना ट्वीट का जमाना है|

भारत में ऐसे विचारकों की भी कमी नहीं जो भारतीय प्रधानमंत्री के राजनीतिक सम्प्रेषण को अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के खांचे में रखना चाहेंगे| लेकिन सच्चाई यह है कि जुमलेबाजी की कला में ट्रम्प बहुत पीछे छूट जाते हैं| उनकी शैली दो टूक बात कहने वाली रही है, लगभग जुमला-विरोधी| दरअसल, इस क्षेत्र में मोदी की तुलना ट्रम्प के पूर्ववर्ती राष्ट्रपति ओबामा से करनी अधिक दुरुस्त होगी, जो निर्विवाद रूप से शब्दों के कुशलतम चितेरे गिने जाते हैं| राष्ट्रपति चुनाव प्रचार में ओबामा को उनकी नीतियों से कहीं ज्यादा उनके नपे-तुले शब्दों के लिए विरोधियों की घोर आलोचना सुननी पड़ी थी| 

उनके बारे में यहाँ तक कहा गया कि शब्द ही जिसके लिए सबकुछ हैं, उसका भरोसा कैसे किया जा सकता है| उत्तर प्रदेश में अखिलेश और राहुल ने भी लगातार मोदी के ‘मन की बात’ पर सवाल खड़ा किया कि वे ‘काम की बात’ कब शुरू करेंगे? यहाँ तक कि, याद कीजिये, 2014 में लोकसभा अभियान स्वयं मोदी ने भी ओबामा के मशहूर चुनावी जुमले ‘यस वी कैन’ से ही शुरू किया था| 

राजनीतिक जुमलों के अध्ययनकर्ता संपादक सैम लीथ का सटीक निष्कर्ष है कि जुमला शब्दों को शक्ति देने का काम करता है| इसका सटीक ज्ञान नागरिक को भी सत्ता के इस्तेमाल और उसके विरोध दोनों की समझ देगा |