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जेएनयू में होंगे चुनाव पर वह बात नहीं होगी

यह फैसला जीत से अधिक हार है. इसका कारण यह है कि यदि लिंगदोह समिति की सिफारिशों को देखा जाए तो समझा जा सकता है कि जिन मामलों में छूट मिली है वे तकरार के मुद्दे थे ही नहीं. यह शिक्षा के व्यावसायिक कारण की ओर एक कदम है जिसके परिणाम नकारात्मक होंगे...

 

jnulogoनई दिल्ली (जनज्वार).  सुप्रीम कोर्ट ने उम्र एवं उपस्थिति पर जे.एम. लिंगदोह समिति की सिफारिशों में छूट देते हुए मौजूदा अकादमिक सत्र के लिए जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ (जेएनयूएसयू) का चुनाव कराने की आज अनुमति दे दी. न्यायामूर्ति ए.के. गांगुली की अध्यक्षता वाली सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने जेएनयूएसयू का चुनाव लड़ने के लिए जरूरी अधिकतम उम्र सीमा 30 वर्ष तक बढ़ाते हुए 75 प्रतिशत उपस्थिति की अनिवार्यता समाप्त कर दी.

इस खबर पर प्रतिक्रिया देते हुए जेएनयू में नेपाल के माओवादी आंदोलन पर शोध कर रहे पवन पटेल ने कहा कि यह फैसला जीत से अधिक हार है. इसका कारण यह है कि यदि लिंगदोह समिति की सिफारिशों को देखा जाए तो समझा जा सकता है कि जिन मामलों में छूट मिली है वे तकरार के मुद्दे थे ही नहीं. उन्होंने आगे कहा कि मुख्य सवाल राजनीती का है न कि 'प्रतिशत' या 'उपस्थिति' का. 

लिंगदोह समिति लागू होने की स्थिति पर जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि, ' यह छात्रों को राजनीती से दूर करने का प्रयास है. यदि शिफरिशें लागू होती है तो आप सरकार की नीतियों पर सवाल नहीं उठा सकते, जो कि जेएनयू चुनावों की पहचान है. यहाँ चुनावों में जोर अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रिय हितों पर होता है, उन्हें मुद्दा बना कर चुनाव लड़े जाते है. 

उन्होंने हैरानी जताई कि समिति द्वारा यह स्वीकार कर लेने के बावजूद कि जेएनयू मॉडल बेहद उम्दा है तो भी इसे लागू नहीं होने देना कैसे ठीक हो सकता है? उन्होंने कहा कि इसके लागू हो जाने के बाद छात्र संघ के पास बहुत ही सिमित अधिकार रह जायेंगे और वह प्रशासन की कठपुतली बन जाएगा. उन्होंने यह भी कहा कि यह शिक्षा के व्यावसायिक कारण की ओर एक कदम है जिसके परिणाम नकारात्मक होंगे. 

लिंगदोह समिति द्वारा 2006 में की गई सिफारिशों के अनुसार, 28 वर्ष से अधिक उम्र और 75 प्रतिशत से कम उपस्थिति वाला कोई भी विद्यार्थी देश में किसी भी विश्वविद्यालय के छात्र संघ का चुनाव लड़ने के लिए पात्र नहीं है. जेएनयू के विद्यार्थियों ने इन दो शर्तो में छूट देने की इस आधार पर मांग की थी कि चूंकि यह खासतौर से एक अनुसंधान विश्वविद्यालय है, जहां उपस्थिति अनिवार्य नहीं है.अक्टूबर 2008 में सर्वोच्च न्यायालय ने जेएनयूएसयू के चुनाव पर रोक लगा दी थी, क्योंकि युनिवर्सिटी में उपस्थिति का कोई मापदंड नहीं है.

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