अभी तक महाविद्यालयों में अनुमोदित शिक्षकों के वेतन के लिए बैंक में खाते नहीं खुले हैं और न ही वेतन भुगतान किया गया। कुलपति को केवल विवि परिसर नजर आ रहा है, जबकि उन 300 के लगभग निजी कालेजों पर उनका ध्यान नहीं दिया जा रहा है जहां न तो शिक्षक हैं, न ही शैक्षाणिक गतिविधियां...
विभूति नारायण ओझा
स्ववित्तपोषित व वित्तविहीन महाविद्यालय शिक्षक एसोसिएशन की एक बैठक में मांग कि गयी कि गोरखपुर के दीनदयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय से सम्बद्ध लगभग 300 महाविद्यालयों की जिम्मेदारी से बचने वाले कुलपति प्रो. पीसी त्रिवेदी को अपनी असफलता स्वीकार करते हुए पद से इस्तीफा दे देना चाहिए। उनके द्वारा ढेर सारी असफलताओं के बीच अपनी कुछ उपलब्धियां गिनाना सतही बयानबाजी प्रतीत होता है।
जनवरी 19 को कुलपति त्रिवेदी का इस विश्वविद्यालय में एक वर्ष का कार्यकाल पूरा हो गया है। अपने कार्यकाल की उपलब्धियां गिनाते हुए उन्होंने विश्वविद्यालय के विकास के लिए लायी गयी विभिन्न योजनाओं की बात कही थी। मगर उनकी भावी योजनाओं में स्ववित्तपोषित महाविद्यालय से सम्बन्धित शिक्षकों के हो रहे शोषण, बिना शिक्षण कार्य के ही कालेजों के संचालन सहित अन्य बिन्दुओं के समाधान की बातें शामिल नहीं थी।
इसीलिए नाराज स्ववित्तपोषित महाविद्यालय शिक्षकों ने इसका विरोध किया है। इसके पूर्व ये शिक्षक अपनी मांगों को न सुने जाने को लेकर भिक्षाटन का कार्य भी कर चुके हैं। अपनी समस्याओं से वे कई बार कुलपति, उच्चाधिकारियों व राजभवन तक को अवगत करा चुके हैं, मगर उनकी कोई बात नहीं सुनी जाती है।
अपनी मांगों को संज्ञान में न लिये जाने के कारण ये शिक्षक एक बार फिर आन्दोलन के मूड में है। स्थिति यह है कि प्रशासन केवल परिसर को ही संवारने में लगा है, कहीं से भी कालेजों पर इनका कुछ अंकुश नहीं है। एसोसिएशन के पदाधिकारियों ने विश्वविद्यालय से संबद्ध स्ववित्तपोषित कालेजों में शिक्षकों और शिक्षा की स्थिति में सुधार लाने की अपनी असमर्थता स्वीकारते हुए कुलपति से इस्तीफा देने की मांग की है।
महाविद्यालय शिक्षक एसोसिएशन के प्रवक्ता डॉ. चतुरानन ओझा ने कहा कि कुलपति के आने के बाद जो भी उम्मीदें जगी थी, अब वह खत्म हो चुकी हैं। उनकी अभी तक की असफलता के बाद भी भावी योजनाओं में स्ववित्तपोषित कालेजों में शासनादेशों का पालन करवाना कहीं भी शामिल नहीं है।
अभी तक महाविद्यालयों में अनुमोदित शिक्षकों के वेतन के लिए बैंक में खाते नहीं खुले हैं और न ही वेतन भुगतान किया गया। कुलपति को केवल विवि परिसर नजर आ रहा है, जबकि उन 300 के लगभग निजी कालेजों पर उनका ध्यान नहीं दिया जा रहा है जहां न तो शिक्षक हैं, न ही शैक्षाणिक गतिविधियां। लगातार शिक्षकविहीन कालेजों-शिक्षकों की घोर उपेक्षा की जा रही है।
एसोसिएशन के महामंत्री डॉ.दिलीप मिश्रा का मानना है कि कुलपति में उच्च शिक्षा को सुधारने की इच्छा होती तो वह उन महाविद्यालयों की मान्यता व सम्बद्धता समाप्त करने की कार्यवाही कर चुके होते। लेकिन वह भोली-भाली हिन्दी भाषी क्षेत्र में अपनी पहचान स्थापित करके नाम कमाने के लिए आनलाइन क्म्यूटरीकृत कार्यों में व्यस्त है।
उनके अन्दर तनिक भी नैतिकता होती तो स्थिति सुधारने की प्राथमिकता तय करते। प्रवेश, परीक्षा और परिणाम भी समय से न दे पाने वाला पूर्वांचल के इस विश्वविद्यालय प्रशासन को इन कालेज और शिक्षकों की तनिक भी चिन्ता नहीं है। कुलपति ने तो इस विश्वविद्यालय को मात्र डिग्री डिस्ट्रीब्यूशन सेण्टर मान रखा है।
एसोसिएशन के उपाध्यक्ष डॉ. विवेवकानन्द के मुताबिक अन्य विश्वविद्यालय जहां उच्च शिक्षा की मुकक्मल व्यवस्था कर रहे है, वहीं कुलपति को परिसर के बाहर की स्थिति से कोई मतलब नहीं दिखता। वर्षों से उपेक्षा के शिकार पीएचडी डिग्रीधारक प्रबंधकों के शोषण के शिकार हो रहे हैं। ऐसे में कुलपति यदि कार्यवाही कर शिक्षकों और छात्रों को हक दिलाने में असमर्थ है तो उन्हें इस्तीफा देकर वापस चले जाना चाहिए।
गौरतलब है कि ये शिक्षक पिछले कई वर्षों से अपनी मांगों को लेकर हैं, लेकिन इन्हें सिर्फ आश्वासनों का झुनझुना थमा दिया जाता है। इस बार हद इसलिए हो गयी कि कुलपति त्रिवेदी ने उन्हें कुछ आश्वावासन देने से भी इंकार कर दिया।
दूसरी तरफ कुलपति का कहना है कि वे कुछ नहीं कर सकते, सबकुछ ऊपर से तय होता है।पिछले दिनों कुलपति ने कहा भी था कि प्रवेश परीक्षा और परिणाम समय से कराना उनकी पहली प्राथमिकता है।