छात्रों द्वारा प्रिंसिपल की पिटाई और कॉलेज प्रशासन द्वारा छात्रों के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज करवाना शर्मनाक और चिंता का विषय है, लेकिन कॉलेज में जारी असंतोष के इतिहास को देखें तो कॉलेज प्रशासन और जीबीटीयू के आला अधिकारी गुनाहगार दिखाई देते हैं...
आशीष वशिष्ट
गौतमबुद्व प्राविधिक विश्वविद्यालय (जीबीटीयू) के फैकल्टी ऑफ़ आर्किटेक्चर, लखनऊ (पूर्ववर्ती गर्वमेंट कॉलेज ऑफ़ आर्किटेक्चर) में 1 फरवरी को जो कुछ भी हुआ उसने गुरू-शिष्य के रिश्ते को तार-तार कर दिया। साथ ही प्रशासनिक उदासीनता, पुलिस बर्बरता, तकनीकी विश्वविद्यालय प्रशासन के ढुलमुल रवैये से निराश और हताश छात्रों की पोल पट्टी भी खोल कर रख दी।
छात्रों द्वारा प्रिंसिपल की पिटाई और कॉलेज द्वारा छात्रों के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज करवाना शर्मनाक और चिंता का विषय है, लेकिन कॉलेज में जारी असंतोष के इतिहास को देखें तो छात्रों से ज्यादा कॉलेज प्रशासन और जीबीटीयू के आला अधिकारी गुनाहगार दिखाई देते हैं।

छात्रों की मांग को कॉलेज प्रशासन लंबे समय अनसुना करता चला आ रहा था। छात्रों ने कॉलेज के प्रिंसिपल से लेकर गर्वनर तक अपनी बात रखी लेकिन उनकी समस्या का समाधान किसी ने नहीं किया। जिस डिग्री के लिए छात्रों ने दिन रात मेहनत की अभिभावाकों ने लाखों रूपये फीस व पढ़ाई पर खर्च किये, लेकिन जब उस डिग्री की बदौलत एक अदद अच्छी और इज्जतदार नौकरी बाजार में न मिल पाए तो भारी भरकम डिग्री की कीमत एक कागज का टुकड़े से अधिक नहीं आंकी जा सकती है।
सवाल है कि छात्रों और उनके अभिभावकों का क्या दोष? जब फैक्लटी ऑफ़ आर्किटेक्चर सरकारी कॉलेज है, जब काउंसिल ऑफ़ आर्किटेक्चर, दिल्ली ने कॉलेज को नो-एडमिशन की कैटगरी में रखा हुआ है तो कॉलेज काउंसिल की आपत्तियां दूर करने की बजाय पिछले पांच वर्षों से छात्रों को प्रवेश कैसे दे रहा है? कॉलेज के निर्णय पर प्राविधिक विश्वविद्यालय प्रशासन और स्वयं चांसलर बीएल जोशी और कुलपति प्रो0 कृपाशंकर सिंह चुप क्यों हैं ? सवाल यह भी है कि प्रिंसिपल प्रो0 मुकुल सिंह किसके बूते इस तरह मनमानी कर रहे हैं?
चांसलर एवं राज्यपाल जोशी ने आंदोलनरत छात्रों को राजभवन बुलाकर बातचीत की, फिर भी कोई ठोस कार्रवाई क्यों नहीं हुई? क्या छात्रों ने कॉलेज से नाजायज मांग की थी? क्या कॉलेज को सीओए दिल्ली से पंजीकरण की जरूरत नहीं है? अगर जरूरत नहीं है तो छात्रों का पंजीकरण काउंसिल क्यों नहीं कर रही है? अपनी जायज मांगों के लिए आंदोलनकारी छात्र-छात्राओं पर लाठी चार्ज और आपराधिक धाराओं में मुकदमा दर्ज करवाना क्या न्यायोचित और न्यायसंगत है?
गौरतलब है कि करीब पांच साल पहले सीओए दिल्ली की निरीक्षण टीम ने सत्र 2005-06 में कॉलेज के निरीक्षण के दौरान कॉलेज में फैकल्टी की कमी और तमाम अन्य आधारभूत सुविधाओं और संसाधनों की कमी के अभाव में मानकों के अनुरूप नहीं पाया था। काउंसिल ने ‘आर्किटेक्ट एक्ट, 1972’ की धारा 20 के तहत कार्रवाई करते हुए कॉलेज को ‘नो एडमिशन’ की श्रेणी में डाल दिया था।
कॉलेज पर मुख्य आरोप
काउंसिल ने इस बाबत लिखित सूचना उच्च शिक्षा विभाग, मानव संसाधन विकास मंत्रालय भारत सरकार एवं मुख्य सचिव उत्तर प्रदेश को दे दी थी। वर्तमान में भी काउसिल की बेवसाइट पर कॉलेज को नो एडमि’ान कैटगरी मे दिखाया जा रहा है। काउंसिल की कार्रवाई के विरोध में कॉलेज प्रशासन ने हाई कोर्ट की शरण ली थी। पिछले 6 सालों में अदालती कार्रवाई का नतीजा नहीं निकल पाया है। काउंसिल चाहता है कि कॉलेज पहले मुकदमा वापिस ले तभी कॉलेज को रजिस्ट्रेशन देने के बारे में विचार किया जा सकता है।
रजिस्ट्रेशन की मांग को लेकर पिछले लगभग छह महीनों से छात्र आंदोलन की राह पर हैं। सितंबर 2011 में छात्रों ने बड़ा आंदोलन किया था। इस दौरान छात्रों ने कक्षाओं का बहिष्कार किया और पढ़ाई नहीं की। करीब एक पखवाड़े तक छात्रों के अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर रहने के बाद विवि प्रशासन छात्रों ने फैक्लटी को मान्यता दिलाने के लिए त्वरित कार्रवाई करने का छात्रों को आश्वासन दिया था। मगर छह महीने बीत जाने के बाद भी कॉलेज प्रशासन अपनी गड़बड़ी का कोई हल छात्रों के सामने नहीं पेश कर सका है।
छात्रों के अनुसार वर्तमान में कॉलेज में 12 फैकल्टी मेम्बर है, जिनमें 9 स्थायी और 3 अतिथि प्रवक्ता हैं। पहले से ही फैक्लटी की कमी से जूझ रहे कॉलेज में वर्ष 2009 में सीटों की संख्या 40 से बढ़ाकर 60 कर दी। पढ़ाई के लिए जरूरी कम्प्यूटर, उच्च स्तर की लाइब्रेरी और दूसरे आधुनिक साधनों व सुविधाओं का टोटा है, जिससे छात्रों की पढ़ाई प्रभावित होती है। पीडि़त छात्रों ने कहा कि शैक्षिक यात्रा के नाम पर छात्रों से हर साल हजारों रूपये वसूले जाते हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि कई सालों से कोई न कोई बहाना बनाकर शैक्षणिक यात्रा टाल दी जाती है।
प्रदेश की राजधानी में स्थित फैकल्टी ऑफ़ आर्किटेक्चर के प्रबंधन की मनमानी का आलम यह है कि काउंसिल की आपत्तियों के बाद भी बैचलर ऑफ़ आर्किटेक्चर के दो बैच के छात्र अपनी पढ़ाई पूरी करके जा चुके हैं। रजिस्ट्रेशन न होने की वजह से पास आउट हो चुके छात्र सरकारी नौकरी के लिए आवेदन नहीं कर सकते हैं। प्राईवेट संस्थानों में भी नौकरी जान-पहचान और कम वेतन के साथ ही मिल पा रही है। मान्यता के अभाव में छात्र प्राईवेट प्रेक्टिस भी नहीं कर पा रहे हैं।
कॉलेज में असंतोष की शुरूआत
कालेज प्रशासन पर दबाव बनाने के लिए छात्रों ने 8 दिसंबर 2011 से शुरू होने वाले सेमेस्टर परीक्षाओं के बहिष्कार करने की चेतावनी दी थी। छात्रों के आंदोलन और नाराजगी से घबराए विवि प्रशासन ने तानाशाही रवैया अपनाना शुरू कर दिया था। 7 दिसंबर को छात्रों ने काउंसिल ऑफ़ आर्किटेक्चर से रजिस्ट्रेशन की मांग क्या उठाई कि उसके अगले दिन गुरूवार को कालेज प्रशासन ने छात्रावास के गेट पर ताला लगाकर छात्रों को कैद कर दिया गया, ताकि वह बाहर निकल कर आंदोलन ना कर सकें।

केवल प्रथम वर्ष के छात्रों को परीक्षा देने के लिए बाहर जाने दिया गया और छात्रों ने काली पट्टी बांधकर परीक्षा दी। कॉलेज के प्रिसिंपल प्रो. मुकुल सिंह ने छात्रों का सकारात्मक जवाब देने की बजाय डांटकर चुप कराने की कोशिश की थी, उस समय भी प्रिसींपल की कदम की निंदा और आलोचना हुई थी। 28 दिसंबर को प्राविद्यिक विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह के दौरान कॉलेज के रजत पदक विजेता छात्र योगेन्द्र पाल सिंह यादव और स्वर्ण पदक विजेता आश्फा सिद्दकी ने चांसलर एवं राज्यपाल बीएल जोशी से मंच पर डिग्री लेने से इंकार करके हडकंप मचा दिया था।
चांसलर बीएल जोशी ने मामला की गंभीरता को समझते हुए छात्रों को उसी दिन राजभवन मुलाकात के लिए बुलाया था। लेकिन छात्रों का आरोप है कि गर्वनर से मुलाकात के एक महीने बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हो पाई है। ऐसे में किसकी बात पर भरोसा और यकीन किया जाए ये समझ नहीं आता है। योगेन्द्र पाल सिंह यादव के अनुसार ‘जिस डिग्री से नौकरी न मिल पाए उसक क्या फायदा, मेरा तो कैरियर ही तबाह हो गया है।’ योगेन्द्र की तरह कॉलेज से पास आउट हो चुके छोटी-मोटी नौकरी करने को मजबूर हैं, क्योंकि बिना मान्यता के बाजार में कोई महत्व नहीं है।
उधर छात्र अपने हाथों से कॉलेज को सजाने-संवारने में लगे थे। छात्रों ने बताया था कि कॉलेज के विकास के लिए युनिवर्सिटी से फंड आया है। बुनियादी सुविधाओं से लेकर वर्किग ऐरिया तक को कॉलेज के छात्र-छात्राएं अपने हाथ से रंगपोत और दुरूस्त करने में जुटे थे। कॉलेज के छात्र-छात्राओं ने बताया था कि कॉलेज प्रशासन की हठधर्मिता, अदालती कार्रवाई के कारण छात्रों का भविष्य चौपट हो रहा है। कॉलेज प्रिंसिपल और विश्वविद्यालय प्रशासन मिलकर छात्रों के कैरियर से खिलवाड़ कर रहे हैं।
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