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अम्बेडकर विश्वविद्यालय में एक महिला की दर्दनाक मौत

उमा के तीनों बच्चे अभी भी अपनी मां का इंतजार कर रहे हैं.उन्हें बताया गया है कि उनकी मां इलाज के लिए अस्पताल गयी है. बच्चों का मासूम दिल यही मान कर बैठा है कि माँ डाक्टर के यहाँ से वापस आ जाएगी. बच्चों को देख कर मन यही कहता है कि काश ये कठोर सच झूठ हो जाये...

लखनऊ के अम्बेडकर विश्वविद्यालय में चल रहे निर्माण कार्य में लगी एक महिला मजदूर उमा की आज दोपहर तीसरी मंजिल से गिरने से मौत हो गयी. तीसरी मंजिल से गिरी उमा की मौत समय रहते नजदीकी अस्पताल में नहीं ले जाने की वजह से हुई. ठेकेदार की लापरवाही से हुई मौत के बाद निर्माण कार्य में लगे दूसरे मजदूर बेहद भयभीत हैं और उन्हें डर है कि मरने वालों में अगली गिनती उनकी भी हो सकती है.

उमा के घायल होने पर गिरा खून  

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उमा आज तीन दिन बाद फिर काम पर इस उम्मीद में आई थी कि ठेकेदार उसे उसका बकाया पैसा दे देगा और वह अपने गाँव लौट जाएगी. उमा को क्या मालूम था कि आज उसकी जिंदगी का ही आखिरी दिन होगा और वह गाँव जाने की बजाय इस दुनिया से ही चली जाएगी. चार महीने पहले उमा अपने पति सोनाराम और तीन छोटे बच्चों शिवा 4 साल, विशाल 3 साल,और छोटू 1 साल के साथ ग्राम खरखोद, तहसील पामगढ़, जहाँगीर चाँपा, छत्तीसगढ़ से लखनऊ के अम्बेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय में मजदूरी करने आई थी.

गौरतलब है कि बाबासाहेब भीम राव अम्बेडकर केन्द्रीय विश्वविद्यालय में इन दिनों निर्माण काम चल रहा है. उन्हीं में से एक सेंट्रल लाइब्रेरी में आज सुबह साढ़े ग्यारह बजे काम करने वाली महिला मजदूर उमा तीसरे मंजिल से नीचे आ गिरी. उमा के गिरने की खबर सुनकर मजदूरों के बीच अफरा-तफरी मच गयी और साथी मजदूर उसे मजदूर उमा को अस्पताल ले जाने की कोशिश में लग गए.

लेकिन उमा को अस्पताल ले जाने का साधन न होने की वजह से उसके शरीर से लगातार खून बहता रहा. लगभग आधे घंटे के बाद दो युवक उसे मोटर साईकिल पर ले कर सरदार पटेल डेंटल हास्पिटल पहुचे, जहाँ से उसे मेडिकल कालेज ट्रामा सेंटर के लिए रेफर कर दिया गया. ट्रामा सेंटर में करीब ढाई बजे उमा की मौत हो गयी.

उमा के तीनों बच्चे अभी भी अपनी मां का इंतजार कर रहे हैं.उन्हें बताया गया है कि उनकी मां इलाज के लिए अस्पताल गयी है. बच्चों का मासूम दिल यही मान कर बैठा है कि माँ डाक्टर के यहाँ से वापस आ जाएगी. बच्चों को देख कर मन यही कहता है कि काश ये कठोर सच झूठ हो जाये.

उमा की झुग्गी में बुझा हुआ चूल्हा,बेतरतीब फैला सामान और परिवार पर पहाड़ के टूटने की खबर से बेखबर अलमस्त खेलते बच्चे - ये सब देखकर कोई पत्थर भी रो पड़े. चार साल का शिवा जब अपनी तोतली जुबान से कहता है.. अम्मा डाक्टर के पास सुई लगवाये गयी है तब कलेजा मुंह को आने को होता है.बाकी दो बच्चे तो इतने छोटे है कि उन्हें पता ही नही कि उनकी जिन्दगी उजड़ चुकी है.

अमानवीयता की हद तो तब हो गयी जब उमा के गिरने पर उसके पति और दूसरे मजदूरों को रोता देख साइड इंचार्ज शुक्लाजी ने कहा," तुम लोग ऐसे रो रहे हो जैसे कोई मर गया हो. इसे ले जाने के लिए क्या कोई हेलीकाप्टर मगायें, मोटर साईकिल मंगा रहे है अब नौटंकी बंद करो" उमा लगभग आधे घंटे तक तड़पती रही फिर कहीं उसे मोटर साइकिल पर बैठा कर ले जाया गया.

बड़े दायरे में फैले इस विश्विद्यालय में बड़े पैमाने पर निर्माण चल रहा है, पर किसी भी साईट पर न तो कोई अम्बुलेंस है न ही किसी प्रकार के सुरक्षा उपकरण. सेफ्टी बेल्ट और हेलमेट के बिना ही मजदूरों को निर्माणाधीन बहुमंजिली इमारतों पर काम करना पड़ता है. यहाँ-वहाँ बिजली के नंगे खुले तार कभी भी किसी की मौत की वजह बन सकते है. मजदूर इतनी खतरनाक जगह में काम कर रहे हैं पर उनकी सुरक्षा के इंतजाम ये है की उनके लिए प्रथम उपचार तक की व्यस्था न तो विश्वविद्यालय ने की है और न ही ठेकेदार ने. अगर इन सब बातों का ध्यान रखा जाता तो शायद उमा की जान बच सकती थी.

काम कर रहे मजदूरों ने बताया कि ठेकेदार ने ढाई महीने से उनकी मजदूरी नहीं दी है. उमा भी अपनी मजदूरी लेकर घर जाना चाहती थी पर ठेकेदार ने पैसे देने के बजाय, तीन दिन के लिए उसे काम करने से ही रोक दिया. आज दोबारा काम पर उमा की वापसी इसी शर्त पर हुई कि वह फिलहाल पैसे की मांग नहीं करेगी.

मजदूरों के मुताबिक यहाँ पर १३० रुपये प्रतिदिन के हिसाब से मजदूरों को पैसे दिए जाते है और काम के दौरान किसी प्रकार कुछ खाने पीने को भी नही दिया जाता. उन्ही में से एक मजदूर कहा है कि 'बाहर काम का १८० रूपये से २०० रूपये तक मिल जाता है साथ में चाय -पानी अलग से, पर यहाँ ज्यादा काम होने की वजह से हम ५० रुपये कम पर ही काम करने को राजी है. यहाँ पर हमारी स्थिति तो बंधुआ मजदूर जैसी है न हमें पैसे मिल रहे है और न हम जा पा रहे है.'uma-child

छत्तीसगढ़ से आये करीब सभी ५० मजदूर चाहते हैं कि वो उमा की लाश छत्तीसगढ़ में ही जलाए. इसके लिए ठेकेदार उनकी बकाया ढाई महीने की मजदूरी और तीन बच्चों को देखते हुए उमा का मुवावजा उसके पति सोनाराम को दे दे. और वो सब उमा के परिवार के साथ छत्तीसगढ़ चले जाएँ. मजदूरों में डर समा गया है कि जो वारदात उमा के साथ हुई है वो उनके साथ भी हो सकती है.

 ठेकेदार तो चुनाव लड़ रहे हैं...

सेन्ट्रल लाइब्रेरी बनाने का ठेका आर. के. कंस्ट्रकशन ने ले रखा है. एक मजदूर ने बताया कि यह आर. के. सिंह की कंपनी है, जोकि जनवादी पार्टी से विधान सभा का चुनाव लड़ रहे है इस वजह से ठेकेदार साहब यहाँ नही है.

सामाजिक रूप से पिछड़े दलित और हांसिये के लोगों की समस्याओं के अध्यन व निवारण के लिए विश्यविद्यालय में सेंटर फार सोशल एक्सक्लूजन एंड इन्क्लूजिव पालिसी का एक सेंटर बनाया गया है, जिसका उद्देश्य गरीब,पिछड़े व दलितों को विकास की मुख्यधारा में शामिल कराना व उन्हें आर्थिक व सामजिक सुरक्षा दिलाना है. यह सेंटर सेन्ट्रल लाइब्रेरी ठीक बगल में है. इस पर मजदूरों की ये दयनीय स्थिति व इस तरह की घटना का घट जाना इस सेंटर की आवश्यकता और औचित्य पर गहरा सवालिया निशान खड़ा करता है .

(इस रिपोर्ट को लेखक  अनुराग अनंत/ संदीप ठाकुर/ परिणय संदीप बाबा साहेब भीम राव अम्बेडकर केन्द्रीय विश्विद्यालय के छात्र हैं.)

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