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चुनाव 2012

कलह से सुलह तक

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इतनी फजीहत के बाद भी हरीश रावत को अभी कुछ नहीं मिला है। राजनीति का वह समय खत्म हो गया जब गुट के लोगों को कुछ पद मिल जाने पर मुखिया खुश हो जाया करता था। छह महीने बाद मुख्यमंत्री बनने के लिए हरीश रावत यह सारी जुगत कर रहे हैं...

अजय प्रकाश 

'उत्तराखंड में कांग्रेस की सरकार बन गयी। मंत्रियों ने शपथ ले ली। एक गुट के विधायक को स्पीकर बना दिया गया, तीन असंतुष्टों को उपहार में मंत्री पद मिला और भाजपा विपक्ष बैठ गयी। यानी निर्दलीय ब्लैकमेल नहीं करेंगे, बसपा और हिस्सा नहीं मांगेगी। भाजपा तोड़-फोड़ में नहीं जुटेगी-इसकी गारंटी केंद्र या राज्य का कोई एक कांग्रेसी नहीं दे सकता। बेहतर होगा आप नेताजी के आने पर उन्हीं से बात करें।' उत्तराखंड के एक कांग्रेसी नेता के पीए ने ये बातें गुस्से में भले कहीं हों, लेकिन अब यही आशंका राज्य की जनता और राजनीतिक विश्लेषकों को भी है। 

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चुनाव परिणामों की घोषणा 6 मार्च को होने के बाद प्रदेश की कुल 70 में से 32 सीटें कांग्रेस के हिस्से में आयीं और भाजपा 31 पर अटक गयी। बाकी सीटें तीन निर्दलियों, एक यूकेडी (पी) गुट और बसपा के हिस्से आयीं। सत्ता तक पहुंचने के इस खेल में एक सीट से भाजपा पिछड़ गयी और राज्यपाल मार्गरेट अल्वा ने कांग्रेस को बहुमत साबित करने का मौका दिया। कांग्रेस ने पहली सफलता हासिल करते हुए भाजपा को छोड़ सभी दूसरों को अपने पाले में कर लिया, जिसके बाद स्वाभाविक तौर पर कांग्रेस को सरकार बना लेना चाहिए था, मगर ऐसा नहीं हो सका और रूठों को मनाने में तीन सप्ताह लग गये। 

रूठों को मनाने की इसी प्रक्रिया में अभी भी केंद्रीय मंत्री हरीश रावत दुखित हैं। वे मीडिया को जारी एक विज्ञप्ति में कहते हैं, ‘हरिद्वार की जनता से माफी मांगता हूं। मुझे मुख्यमंत्री नहीं बन पाने का खेद है।’ हरीश रावत हरिद्वार क्षेत्र से सांसद हैं। सवाल है कि 11 विद्रोही विधायकों के अगुआ हरीश रावत देहरादून में 26 मार्च को आयोजित शपथ ग्रहण सामारोह में पहुंचने से एक दिन पहले ही मीडिया में यह खबर क्यों जारी करते हैं। खासकर तब जबकि उनके धड़े के तीन विधायकों को मंत्री, उनके नजदीकी पूर्व मंत्री गोविंद सिंह कुंजवाल को विधानसभा स्पीकर और महेंद्र सिंह महरा को कांग्रेस ने राज्यसभा के लिए अपना उम्मीदवार बना दिया गया हो। 

चुनाव परिणामों की घोषणा के बाद केंद्रीय राज्य मंत्री हरीश रावत को उत्तराखंड मुख्यमंत्री पद का प्रबल दावेदार माना जा रहा था। इसके लिए राज्य मंत्री नेद अच्छे-बुरे सारे रास्ते भी आजमाये, मगर दिल्ली में बैठे कांग्रेस अलाकमान को एक ऐसे मुख्यमंत्री की तलाश थी, जो राज्य की जरूरत से नहीं केंद्र के इशारे पर चल सके।  इस शर्त के मद्देनजर टिहरी सांसद विजय बहुगुणा सबसे बेहतर चुनाव हो सकते थे और हुए भी। दूसरे शब्दों में इसे विवादों से उपर होना भी कहा जाता है, जैसा कि बहुगुणा समर्थक कह रहे हैं।  

विपक्षी पार्टी भाजपा के एक विधायक जो कि कांग्रेसी मंत्री हरीश रावत के नजदीकी हैं, हरीश रावत द्वारा की जा रही कुछ और तैयारियों का खुलासा करते हैं। भाजपा विधायक के मुताबिक इतनी फजीहत के बाद भी हरीश रावत को अभी कुछ नहीं मिला है। राजनीति का वह समय खत्म हो गया, जब गुट के लोगों को कुछ पद मिल जाने पर मुखिया खुश हो जाया करता था। छह महीने बाद मुख्यमंत्री बनने के लिए हरीश रावत यह सारी जुगत कर रहे हैं।’ विधायक आगे कहते हैं कि पार्टी अध्यक्ष को मंत्री पद से त्यागपत्र देने के बाद वे मंत्रालय जा नहीं सकते, क्योंकि यह हथियार डालना हो जायेगा। वे मंत्रालय नहीं जायेंगे और कांग्रेस अलाकमान को इसके लिए तैयार करेंगे कि वह छह महीने बाद विजय बहुगुणा से इस्तीफा दिलवाये। इसके लिए वह कांग्रेस के नये निशंक बन जायेंगे और हर कीमत पर विजय बहुगुणा को विधानसभा चुनाव हरवाने की कोशिश करेंगे। अगर कांग्रेस ऐसा नहीं करती है तो हरीश रावत पार्टी तोड़ भी सकते हैं।’ 

हरिद्वार इलाके से हार चुके एक विधायक अपने 10 वर्षों के राजनीतिक अनुभव का वास्ता देते हुए कहते हैं, ‘अगर पार्टी नहीं टूटती है तो कांग्रेस की सरकार पांच साल तक बड़े आराम से चलेगी। मौजूदा सरकार को गिराने या नयी सरकार बनाने में निर्दलियों का या बसपा का कोई रोल नहीं होगा। कांग्रेस को समर्थन दे रहे विधायक अब अपनी पार्टियों के नहीं मंत्री बनने के बाद सरकार के हो गये हैं और पद पाने का उनका अंतिम लक्ष्य पूरा हो चुका है।’ पूर्व विधायक उत्तराखंड क्रांति दल का उदाहरण देते हैं, ‘पिछली भाजपा सरकार को यूकेडी के तीन विधायकों का समर्थन हासिल था और पूरी पार्टी ही भाजपा की होकर रह गयी। विधायक पुष्पेश त्रिपाठी ने विरोध किया पर समर्थन देना बंद नहीं किया। इसलिए यह कयास कि निर्दलीय और बसपाई कुछ नया गुल खिला सकते हैं, अटकलें भर है। अब जो करेंगे हरीश रावत करेंगे। 

विधायक की यह बात इसलिए भी सही है क्योंकि विपक्षी पार्टी भाजपा को तो विधायक दल का नेता चुनने में ही परेशानी का सामना करना पड़ा तो वह मुख्यमंत्री कहां से बना पायेगी। भाजपा में चुनाव से पहले ही मुख्यमंत्री पद के बारह उम्मीदवार गिनाये जा रहे थे। राज्य में प्रमाणित सच की तरह यह सभी जानते हैं कि पूर्व मुख्यमंत्री खंडूड़ी को कोटद्वार विधानसभा सीट से निशंक ने हरवाया है। चुनाव से पहले निशंक द्वारा पार्टी में हिमेश खरकौल को शामिल करना और चुनाव प्रचार के आखिरी दिन 28 जनवरी को कोटद्वार में खरकौल का शराब और पैसे के साथ पकड़ा जाना उसी षडयंत्र का एक प्रामाणिकता थी। 

यह दीगर बात है कि प्रदेश अध्यक्ष बिशन सिंह चुफाल इस सवाल को हंसकर टाल देते हैं और कांग्रेसी दुष्प्रचार कहकर काम चलाते हैं। खंडूड़ी के एक नजदीकी नेता की राय में, ‘चुफाल की यह हंसी दरअसल आत्मस्वीकारोक्ति है। प्रमाण सहित पूरी जानकारी देने के बाद भी जब केंद्र में बैठे नेता निशंक को पार्टी से बेदखल नहीं कर पा रहे, तो चुफाल अपने गले में फांस क्यों लगायें।' चुनाव परिणामों के आने के ठीक बाद दिल्ली से उत्तराखंड पहुंचे भाजपा के पूर्व अध्यक्ष राजनाथ सिंह और महासचिव अनंत कुमार से निशंक ने कहा था, अगर उन्हें पार्टी मुख्यमंत्री बनाये तो वह निर्दलियों को साथ लेकर सरकार बना सकते हैं। दोनों नेताओं ने निशंक की इस योजना को नकार दिया था। 

कुमाऊं  क्षेत्र से भाजपा के ईमानदार कहे जाने वाले एक विधायक कहते हैं, ‘मुख्यमंत्री दौड़ के लिए चल रही मारामारी पर मीडिया हर बार हतप्रभ क्यों होती है? रेस पहली बार तो हुई नहीं है। अगले विधानसभा चुनावों तक हर पांच में से एक विधायक और प्रदेश के पांचों सांसद भी मुख्यमंत्री बनने की कोशिश में लग जायें तो मुझे आश्चर्य नहीं होगा। यह मारामारी जनप्रतिनिधित्व के लिए नहीं लूट का सरगना बनने के लिए है। निशंक साहब इसके ताजा उदाहरण हैं।’ 

उत्तराखंड के पत्रकार सुधीर कुमार कहते हैं, ‘राज्य में मुख्यमंत्री और विवाद अब बहस का विषय नहीं, राजनीति का हिस्सा है। राज्य बनने के साथ अस्तित्व में आये राजनीति के इस अंधे मोड़ के खत्म होने की संभावना फिलहाल नहीं है। राज्य गठन के बाद 2002 से शुरू हुए निर्वाचन के बाद से हर विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री पद के बढ़ते दावेदारों की गिनती इसी का प्रमाण है।’ पूर्व मुख्यमंत्री और कवि रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ अपनी एक कविता में इस पीड़ा को यूं बयान करते हैं, ‘अभी भी जंग जारी है, वेदना सोयी नहीं है।’ 

(द पब्लिक एजेंडा से साभार)

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विवादों के मुख्यमंत्री बने बहुगुणा

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विकल्पहीनता की स्थिति में उत्तराखण्ड की सत्ता उन्हीं पार्टियों के लिए सियासी खेल बनकर रह गयी जो राज्य निर्माण के कट्टर विरोधी थीं। पहली अंतरिम सरकार में नित्यानंद स्वामी को पैराशूट मुख्यमंत्री बनाकर भाजपा ने नवगठित राज्य के साथ भद्दे मजाक की शुरुआत की........

सुधीर कुमार 

मुंबई उच्च न्यायालय के न्यायाधीश रहते हुए घी में चर्बी मिलाने के एक ही मामले में दो फैसला देने वाले टिहरी सांसद विजय बहुगुणा आज उत्तराखंड के 7वें मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके हैं। विरासत में मिली राजनीति के कर्णधारों में शामिल विजय बहुगुणा उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा के बेटे, उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रीता बहुगुणा के भाई और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री बीएस खंडूड़ी के ममेरे भाई हैं।

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विधानसभा चुनावों के बाद सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी कांग्रेस के इस नये मुख्यमंत्री के सामने पहला कार्यभार जनता की जिम्मेदारियों को निभाने का नहीं, बल्कि सरकार टिकाये रखने का है। प्रदेश की हरिद्वार सीट से सांसद और केंद्रीय मंत्री हरीश रावत विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री बनाये जाने के खिलाफ मैदान में उतर चुके हैं और उन्होंने मंत्री पद छोड़ दिया है। अल्मोड़ा सांसद प्रदीप टम्टा भी उनके इस मुखालफत अभियान साथ दे रहे हैं और कहा जा रहा है कि अगर हरीश रावत को बेहतर आफर मिला तो वह पार्टी तोड़ नयी पार्टी की घोषणा कर सकते हैं।

गौरतलब है कि विकल्पहीनता की स्थिति में उत्तराखण्ड की सत्ता उन्हीं पार्टियों के लिए सियासी खेल बनकर रह गयी जो राज्य निर्माण के कट्टर विरोधी थीं। पहली अंतरिम सरकार में नित्यानंद स्वामी को पैराशूट मुख्यमंत्री बनाकर भाजपा ने नवगठित राज्य के साथ भद्दे मजाक की शुरुआत की, जो आजकल विलुप्त ही हैं।

राज्य के पहले आम चुनाव में जनादेश कांग्रेस को मिला और नेतृत्व को लेकर स्थानीय नेताओं की सिर फुटौव्वल ने नारायण दत्त तिवारी की लॉटरी निकालने में मदद की। यह वही नारायण दत्त थे जिन्होंने राज्य निर्माण के लिए हुए अप्रतिम आंदोलन के दौरान वक्तव्य दिया था कि 'पृथक उत्तराखण्ड राज्य का गठन उनकी लाश पर ही होगा।' मौका मिलते ही तिवारी का भूत राज्य की पीठ पर लद गया।

जनता ने 2007 में जनादेश भाजपा को दिया। भाजपा ने स्थानीय नेतृत्व विकसित करने का प्रयास किया। जनभावनाओं के अनुरूप स्थायी नेतृत्व प्रदान करने में वह पूरी तरह नाकामयाब रही। भुवन चन्द्र खंडूड़ी, भगत शिंह कोश्यारी और रमेश पोखरियाल 'निशंक' के बीच हुए घमासान ने राज्य में मुख्यमंत्रियों के यक्ष प्रश्न को भाजपा ने जब तक हल किया, तब जनता ने उसे ही गलत साबित किया।

मौजूदा चुनाव में भी भाजपा-कांग्रेस नेतृत्व में मुख्यमंत्री की कुर्सी हथियाने को लेकर घमासान रहा और टिकट बंटवारे को लेकर भारी अनियमितता रही। फलस्वरूप दोनों ही दलों दर्जन भर से ज्यादा विधायकों ने चुनावी समर में ताल ठोंकी। कांग्रेस की तीन बागी जीते, चार मुकाबले में रनर-अप रहे और कुल मिलाकर 10 प्रत्याशियों ने 10,000 के आसपास वोट बटोरे।

इन सभी सीटों पर कांग्रेस प्रत्याशी 5000 से कम वोटों से पराजित हुए। जमीनी हकीकत से बेखबर पार्टी के विभिन्न प्रभारी कांग्रेस को मिलने वाली 40-42 सीटों के आंकड़े को 32 तक पटकने में सफल रहे। गुटबाजी का आलम यह रहा कि भाजपा के दिग्गजों ने पार्टी के भीतर ही बने रहते हुए एक-दूसरे को हराने में कोई भी कोर-कसर नहीं छोड़ी।

छोटे राज्य की सियासत से खेलने वाली कांग्रेस ने जनता व कार्यकर्ताओं की भावना का मखौल बनाना जारी रखा। हाईकमान ने सभी विधायकों को दरकिनार कर विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री की कमान सौंपने का फैसला किया। बहुगुणा का प्रदेशव्यापी वजूद ही नहीं है।

वानप्रस्थ में अपने राजनीतिक कैरियर की शुरुआत करने वाले विजय बहुगुणा का एक सांसद के रूप में भी कोई उल्लेखनीय प्रदर्शन नहीं है। भितरघातियों से फली-फूली कांग्रेस को नेतृत्व दे पाने में भी बहुगुणा अक्षम ही साबित होंगे। कांग्रेसियों का अगला प्रयास उन्हें चुनाव में हराना ही होगा।

यशपाल आर्य, हरक सिंह रावत और हरीश रावत जैसे जाने-माने प्रादेशिक नेताओं की दावेदारी को दरकिनार कर कांग्रेस ने राज्य में ब्राह्मण लाबी की दबंगई को ही और ज्यादा मजबूत किया है। गौरतलब है कि राज्य के अब तक के सभी मुख्यमंत्री ब्राह्मण रहे हैं। कोश्यारी जरूर ठाकुर थे, परन्तु उनका संधी अतीत उन्हें ब्राह्मण ही बनाता है।

इस समय कांग्रेस के पास यशपाल आर्य के रूप में एक काबिल दलित मुख्यमंत्री राज्य को देने का मौका था। ऐसा करने पर कांग्रेस को उत्तर प्रदेश सहित राष्ट्रीय स्तर पर एक संदेश देने का भी अवसर मिलता। यशपाल मुख्यमंत्री पद के स्वाभाविक दावेदार इसलिए भी थे कि उनके नेतृत्व में कांग्रेस ने अच्छा प्रदर्शन किया था। यह प्रदर्शन और अच्छा हो सकता था, अगर उनके बताये प्रत्याशियों को टिकट दिया गया होता।

बहुगुणा के रूप में पैराशूट मुख्यमंत्री की घोषणा कर कांग्रेस ने पार्टी और राज्य को अगले पांच सालों तक गुटबाजी का दंश झेलने को भी अभिशप्त कर दिया है। हरीश रावत और हरक सिंह रावत के बगावती तेवरों ने अपशकुन के संकेत दे भी दिये हैं।

एक सक्षम, स्थानीय और जमीन से जुड़े नेता हासिल करने की जनभावना को समझने में शायद कांग्रेस और भी कई साल लगाए और अगले चुनावों में भी 'फलां हैं जरूरी' का नारा लगाते हुए अपनी 'कुकुरगत' कराये।

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Last Updated on Tuesday, 13 March 2012 20:15

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