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आचार संहिता को जेब में रखते कांग्रेसी

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मीडिया में छाये रहने के लिए राहुल उलटी-सीधी बयानबाजी और हरकतें कर रहे हैं। सस्ती लोकप्रियता के लिए सार्वजनिक तौर पर अपनी गुस्से और हताशा को सरेआम करना, कागज फाड़कर रोष  प्रकट करना जाहिर करता है कि वह अभी राजनीति के अमूल बेबी की श्रेणी में खड़े हैं... 

जनज्वार (लखनऊ). राहुल जैसे जानकार नेता का चंद वोटों और सस्ती लोकप्रियता व वाहवाही की खातिर जानबूझकर आदर्श चुनाव आचार संहिता का पालन न करने से देश  में गलत मैसेज जाता है। राहुल से पहले उनके बहनोई राबर्ट वाड्रा, कानून मंत्री सलमान खुर्शीद  और इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा चुनाव आचार संहिता की धज्जिया उड़ा चुके हैं। 

राहुल के आचरण से पहले से ही मनमानी और उदण्डता पर उतरे कांग्रेसी नेताओं के हौंसले और बुलंद हो गए। राहुल पर केस दर्ज होने के बाद केंद्रीय मंत्री एवं कानपुर के सांसद श्रीप्रकाश  जायसवाल ने जिस तीखी बोली में प्रतिक्रिया दी और बयानबाजी की वो उनके कद और पद को शोभा नहीं देता है। राहुल की अनुशासनहीनता से चार्ज हुए केंद्रीय इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा ने दूसरी बार चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन करके साबित कर दिया कि कांग्रेसी नेताओं  की नजर में कानून, आचार संहिता और नियमों की कोई कद्र नहीं है। congress-up

बेनी प्रसाद, सलमान खुर्शीद, दिग्विजय सिंह जैसे नेताओं की भले ही कोई मजबूरी हो कि वो जानबूझकर विवादित बयान और नियम-कानून का तोड़ते हों, लेकिन राहुल की ऐसे क्या मजबूरी थी कि वो आदर्श  आचार संहिता को तोड़ने का गुनाह कर बैठे। क्या राहुल खुद को नियम, कानून और संविधान से ऊपर समझते हैं? क्या राहुल की नजर में कानून और संवैधानिक संस्थाओं के लिए कोई इज्जत नहीं है? क्या राहुल ये समझते हैं कि कानून तोड़कर वो मुस्लिम वोटरों को प्रभावित कर लेंगे? क्या राहुल राजनीति की शुचिता, सिद्वांत, सद्आचरण, नियम और शालीनता भुला बैठे हैं? क्या यह समझा जाए कि मिशन 2012 में अपेक्षित सफलता न मिलने की खीझ है। 

राहुल की पाक-साफ छवि, युवाओं को राजनीति में अवसर और प्रोत्साहित देने की नीति, किसान, मजदूर, महिलाओं और दलितों के मुद्दे उठाने की पहल ने उन्हें पिछले एक दशक में राष्ट्रीय राजनीति में स्थापित किया ही है। पिछले एक दशक में जनता ने उन्हें कई रूपों में देखा है। विरोधियों के निशाने पर वो शुरू से ही बने हुए हैं, लेकिन राहुल ने कभी भी संयम नहीं खोया और शालीनता और चालाकी से स्थिति का सामना किया है। 

लेकिन यूपी में पार्टी की खोई जमीन और जनाधार को वापिस पाने का सवाल राहुल ही नहीं पूरे गांधी परिवार के लिए नाक का बाल बन गया है। मगर चंद घिसे-पिटे नेताओं के भरोसे मिशन 2012 को हासिल करने में लगे राहुल को पहले चरण के चुनाव 8 फरवरी के बाद पार्टी की वकत पता चल गयी थी। राहुल को जो सब्जबाग उनके भरोसेमंद चम्मचे और मुंहलगे नेताओं ने दिखाए थे, उनकी एक ही झटके में हवा निकल गई। 

राहुल आज जो कुछ भी कर रहे हैं वो वोटरों को लुभाने से अधिक कुछ और नहीं है। राहुल और उनके साथी-बराती सोची समझी रणनीति के तहत मीडिया का ध्यान अपनी ओर खींचने और चैबीस घंटे मीडिया में छाये रहने के लिए उलटी सीधी बयानबाजी और हरकतें कर रहे हैं। राहुल युवा नेता है, उन्हें राजनीति के क्षेत्र में लंबी यात्रा करनी है, और महत्वपूर्ण पदों पर आसीन भी होना है। ऐसे में राहुल का सस्ती लोकप्रियता बटोरने और सार्वजनिक तौर पर अपनी खीझ, गुस्से, निराशा  और हताशा  को कागज फाड़कर पेश  करना उन्हें चाकलेट और अमूल बेबी की श्रेणी में खड़ा करता है। 

राहुल देश  की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी और देश  के सबसे बड़े राजनीतिक घराने से संबंध रखते हैं। ऐसे में वोटरों को रिझाने, खुश  करने के लिए उन्हें सड़क छाप या सी ग्रेड के नेताओं की भांति जनता को अपनी ओर आकर्षित करने और मजमा लगाने के लिए कागज फाड़ने और कानून तोड़ने की कोई जरूरत नहीं है। राहुल को जनता सुन रही है, समझ रही है और तोल रही है। समस्या यह है कि राहुल बड़ी तेजी से राजनीति की सीढि़या चढ़ना चाहते हैं जो इतना आसान नहीं है, जितना उनकों उनके सिपाहसिलार और राजनीतिक गुरूओं ने समझाया है। 

राहुल की कानून तोड़ने की घटना से पार्टी में अनुशासनहीनता और कानून तोड़ने की घटनाओं में वृद्वि होगी। भविष्य में सलमान खुर्शीद  और बेनी प्रसाद जैसे नेताओं की लंबी लाइन लग जाएगी जो पार्टी और देशहित में नहीं होगा। आज जिस तरह से राहुल की अगुवाई में कांग्रेसी नेता चुनाव आयोग पर वार पर वार कर रहे हैं वह केवल कांग्रेस पार्टी के लहू में घुली सत्ता की बदगुमानी के अलावा और कुछ नहीं है। 

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