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‘शिक्षा विधेयक गुलामों की पीढ़ी तैयार करेगा’

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पढ़ाई के लिए पूंजी निवेश नहीं कर पाने वाले छात्रों को इस मिशन के तहत व्यावसायिक और हुनरमंद शिक्षा दी जायेगी। देश की बहुतायत आबादी अनपढ़ गुलाम कामगारों के रूप में तब्दील होती चली जायेगी और नीति नियंता स्टार प्राप्त निजी विश्वविद्यालयों से निकलेंगे... 

प्रसिद्ध शिक्षाविद अनिल सदगोपाल से अजय प्रकाश की बातचीत

anil-sadgopalउच्च शिक्षा में बदलाव के लिए संसद में जो बिल लंबित हैं, उससे किस तरह का सुधार संभव है?

संसद में शिक्षा को लेकर पांच बिल पास कराने की तैयारी है, जिसका दो टूक मकसद शिक्षा को पूरे तौर पर बाजार के हवाले कर देना है। विश्व व्यापार संगठन और गैट्स (जीएटीएस) के इशारे पर इन बिलों के माध्यम से सरकार निजीकरण का कानूनी फ्रेमवर्क तैयार कर शिक्षा जैसे बुनियादी अधिकार के सवाल को वैश्विक बाजार के हवाले करना चाहती है। इसका प्रयास 2005 से चल रहा है और सरकार ऐसा करने में सफल होती है तो यह एक अपरिर्वनीय फैसला होगा, जिसको हमारी पीढि़यां भुगतने के लिए अभिशप्त होंगी।

संसद में शिक्षा के पांचों लंबित विधेयकों में आप किसको सर्वाधिक खतरनाक मानते हैं?
विदेशी शैक्षिक संस्थान विधेयक, शैक्षिक न्यायाधिकरण विधेयक, तकनीकी शैक्षिक संस्थानों-मेडिकल शैक्षिक संस्थानों और विश्वविद्यालयों में अनुचित व्यवहार पर प्रतिबंध विधेयक, उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए राष्ट्रीय प्रत्यायन नियामक प्राधिकरण विधेयक और उच्च शिक्षा विधेयक संसद में लंबित हैं और ये सभी एक दूसरे के पूरक हैं। इस बार संसद में शिक्षा संबंधी प्रस्तावित विधेयकों में सार्वजनिक-निजी साझेदारी, शैक्षिक वित्त निगम और नवाचार के लिए विश्वविद्यालय विधेयक शामिल थे और ये सभी बिल खतरनाक हैं। उदाहरण के तौर पर राष्ट्रीय एक्रिडीटेशन बिल का लिजीये। इस बिल के माध्यम से सरकार संस्थानों की गुणवत्ता के आधार पर उन्हें ग्रेड देगी। जाहिर है इसके बाद देश में थ्रीस्टार-फाइव स्टार होटलों की तरह काॅरपोरेट विश्वविद्यालय खुलेंगे और उसी आधार पर छात्रों से लाखों में फीस वसूली की जायेगी। दूसरी तरफ सरकार 500 विश्वविद्यालयों और 25 हजार से अधिक सरकारी संस्थानों की सुविधाओं में लगातार कटौती कर रही है, जिससे निजीकरण के इन कानूनों के लागू होने के बाद धीरे-धीरे सरकार शिक्षा की जिम्मेदारी से तौबा कर ले।

शिक्षा में बढ़ते माफियाओं के असर के लिए आप किसको जिम्मेदार मानते हैं?
जब हम शिक्षा को मुनाफे का माल बनाकर बाजार में बेचेंगे तब उसका अपना एक आर्थिक तंत्र तैयार होगा, जिसमें बिचैलिये भी होंगे, बैंक भी होगा और इन सब को संचालित करने के लिए माफिया भी। निजी संस्थानों में तकनीकी, विज्ञान, मेडिकल, प्रबंधन और कला आदि विषयों के लिए मौजूदा समय में भी लाखों रूपये सलाना वसूले जा रहे हैं, जो आगे चलकर एकाएक बढ़ेंगे। लाखों की फीस चुकाने के लिए उनके दरवाजे पर बैंक भी होंगे। ऐसे में शिक्षा का निजीकरण भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाले छात्रों की फौज तैयार करेगा, जो अपनी पढ़ाई का खर्चा वसूलने के लिए हर तरीका अख्तियार करेंगे। ऐसा नहीं करने की स्थिति में बैंक और माफिया उनकी संपत्ति जब्त करने से लेकर जेल भिजवाने के लिए खड़े होंगे। पढ़ाई के लिए लोन को चुकाने के प्रक्रिया में छात्र इतने उलझा दिये जायेंगे कि वे काॅरपोरेट घरानों के लिए मुनाफा बनाने के रोबोट का काम करेंगे, सामाजिक सरोकार उनके शब्दकोश में होगा ही नहीं।

शिक्षा का निजीकरण पीढि़यों की सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना पर किस तरह असर करेगा?
इस विधेयक के बाद शिक्षा के पूराने मूल्य सिर के बल खड़े हो जायेंगे। मुनाफे के लिए पढ़ाई का व्यापार करने पर आमादा काॅरपोरेट घराने राष्ट्र निर्माण के लिए सजग युवाओं की पौध नहीं बल्कि पैसा कमाने के दिमाग तैयार करेंगे। ये गुलामों की एक आधुनिक पीढ़ी होगी। इनके लिए संघर्ष और सामाजिक सवाल मजाक या पहेली जैसे होंगे। हमारे युवाओं में साहित्य और इतिहास के प्रति एक उपेक्षा का भाव भरा जा रहा है क्योंकि शिक्षा सेंटरों को शापिंग बना रहे मालिकों की पहली शर्त युवाओं में विवेक और संवेदना नहीं रहने देना है।

लेकिन निजीकरण की इस प्रक्रिया में समाज के वंचित और दलित तबकों की शिक्षा का क्या होगा?
इसको समझने के लिए स्कूली शिक्षा को समझना होगा। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश के कुल 18 फीसदी छात्र ही 12वीं कक्षा तक पहुंच पाते हैं। यह प्रतिशत दलित और आदिवासी छात्रों के मामले क्रमशः 8 और 6 फीसदी है, जबकि पिछड़े और अल्पसंख्यक 9 से 10 फीसदी हैं। यानी 92 फीसदी दलित छात्र, 94 फीसदी आदिवासी और 90 फीसदी अल्पसंख्यक-पिछड़े छात्र उच्च शिक्षा के दरवाजे तक तो दस्तक ही नहीं दे पाते। यह भयावह स्थिति तब है जबकि शिक्षा के क्षेत्र में सरकार अभी व्यापक आधार मुहैया कराये हुए है और मनमानी फीस वसूलने वाले निजी संस्थान बहुत कम हैं। इन आंकड़ो से साफ है कि सरकार देश की व्यापक आबादी को उच्च शिक्षा से वंचित रखने की साजिश कर रही है।

अगर सरकार शिक्षा बिल लाती है तो गरीब छात्रों के पास पढ़ने के क्या विकल्प होंगे, तो क्या वो स्कूल नहीं जायेंगे ?
सरकार उन्हें स्कूल नहीं राष्ट्रीय कौशल विकास मिशन में शामिल करेगी। पढ़ाई के लिए पूंजी निवेश नहीं कर पाने वाले छात्रों को इस मिशन के तहत व्यावसायिक और हुनरमंद शिक्षा दी जायेगी। कोई दूसरी पास हो या पांचवीं सरकार को इससे मतलब नहीं होगा। देश की बहुतायत आबादी (जो पहले से ज्यादा होगी) अनपढ़ गुलाम कामगारों के रूप में तब्दील होती चली जायेगी और नीति नियंता स्टार प्राप्त निजी विश्वविद्यालयों से निकलेंगे। इस गैरलोकतांत्रिक कानून को अगर हमने समय रहते लागू होने से नहीं रोका तो रोबोट मजदूरों की नयी पीढ़ी तैयार होते देखेंगे।  

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