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बेतुकी ‘कार्रवाइयों’ तक सीमित होते माओवादी

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क्यों गौण होते जा रहे राजनीतिक मुद्दे?

सीपीआई (माओवादी) दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमिटी के प्रवक्ता और पिछले 25 वर्षों से माओवादी आंदोलन में सक्रिय रहे जीवीके प्रसाद उर्फ गुड्सा उसेंडी ने जब अपनी पत्नी के साथ इस वर्ष की शुरुआत यानी जनवरी के पहले हफ्ते में पार्टी छोड़ी, तो माओवादी समर्थकों से लेकर इस आंदोलन से उम्मीद करने वालों के बीच बहस उठ खड़ी हुई. कुछ ने माना कि यह पार्टी से जुड़ने और बिछुड़ने एक सामान्य प्रक्रिया है, जबकि ज्यादातर ने एक जिम्मेदार नेता के अलग होने को पार्टी में पसरी जड़ता, उससे उपजी तानाशाही और निराशा का परिणाम माना. 2012 में ओडि़शा में माओवादी पार्टी के राज्य सचिव रहे सब्यसाची पांडा भी पार्टी पर कुछ गंभीर सवाल उठाते हुए अलग हो गए थे और अब वह ‘आप’ पार्टी से जुड़ने की प्रक्रिया में हैं. बहरहाल, गुड्सा उसेंडी उर्फ जीवीके प्रसाद ने माओवादियों की कुछ हालिया गतिविधियों पर गंभीर सवाल उठाए हैं, जिससे पता चलता है कि जीवीके प्रसाद ने व्यक्तिगत पतन या राजनीतिक महत्वाकांक्षा के कारण पार्टी नहीं छोड़ी है, बल्कि माओवादी नेतृत्व में गहरे तक पैठी पड़ी राजनीतिक जड़ता और बासी पड़ चुकी हिंसा की गतिविधियों ने उन्हें अलग होने के लिए मजबूर किया. पढि़ए जनज्वार पर जीवीके प्रसाद की महत्वपूर्ण टिप्पणी -संपादक

जी.वी.के. प्रसाद

कुछ दिन पहले माओवादी पार्टी की दण्डकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी ने राजनीतिक बंदियों, खासकर आदिवासी बंदियों की रिहाई के मुद्दे पर 23 मार्च से विरोध सप्ताह और 29 मार्च को बंद का आह्वान किया था. राजनीतिक बंदियों की रिहाई को लेकर देश की कुछ अन्य जगहों में भी इस दरमियान जन संगठनों ने कुछ कार्यक्रम चलाए. एक अनुमान है कि आज देश के विभिन्न जेलों में 5 हजार से ज्यादा राजनीतिक बंदी हैं, जो कथित तौर पर माओवादी आंदोलन के साथ जुड़े हैं या जिन्हें अमूमन माओवादी बताया जाता है. इनमें सबसे ज्यादा संख्या आदिवासियों की है. यह भी किसी से छिपा हुआ नहीं है कि उनमें से अत्यधिक लोग बेकसूर ही हैं और माओवादियों के खिलाफ जारी सरकारी अभियान के दौरान ही उन्हें पकड़कर जेलों में डाला गया है.

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जीवीके प्रसाद उर्फ़ गुड्सा उसेंडी अपनी पत्नी संतोषी मरकाम के साथ

राजनीतिक बंदी की परिभाषा को लेकर भी बहसों का बाजार गर्म है. खासकर पिछले दिनों जब बंगाल में कुछ माओवादी बंदियों को राजनीतिक बंदी का दर्जा देते हुए एक अदालत ने फैसला सुनाया था, तब खूब बवाल मच गया था कि जिन्हें सरकार द्वारा देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया जाता है वो राजनीतिक बंदी कैसे? सवाल यह भी था कि क्या किसी प्रतिबन्धित संगठन से जुड़े व्यक्ति को राजनीतिक बंदी कहा जा सकता है?

लेकिन तमाम विरोधाभासी मतों के बावजूद सच यह है कि माओवादी आंदोलन भी एक राजनीतिक आंदोलन है. आखिर सशस्त्र संघर्ष के जरिए राजसत्ता पर काबिज होना उनका मकसद जो है. भले ही उनके तौर-तरीकों को लेकर असहमति हो सकती है और उनकी राजनीतिक दृष्टिकोण की आलोचना की जा सकती है, लेकिन इस बिना पर उसे राजनीतिक संगठन नहीं मानना तो कतई मुनासिब नहीं होगा. इस दृष्टि से देखा जाए तो भारत के मध्य और पूर्वी इलाकों में जारी संघर्ष के अंतर्गत जो भी आदिवासी या दलित जेलों में बंद किए जा रहे हैं, वो सब राजनीतिक बंदी ही होंगे. ऐसा ही मानना चाहिए, कानूनन उन्हें वह मान्यता मिले या न मिले.

छत्तीसगढ़ के विभिन्न जेलों में आज करीब तीन हजार आदिवासी कैद हैं, ऐसा बताया जाता है. उनकी स्थिति बहुत ही दयनीय है और उन्हें कानूनी सहायता न के बराबर मिल रहा है. खासकर महिलाओं की हालत और भी खराब है. क्षमता से कई गुना ज्यादा कैदियों को जेलों में बंद किए जाने के चलते जेलों में घोर अव्यवस्था की स्थिति है. कई लोग बीमार पड़ रहे हैं और उन्हें इलाज की सुविधाएं भी ठीक से नहीं मिल पा रही हैं. बीच-बीच में विभिन्न जेलों में कुछ कैदियों की मौत तक की खबरें सुनने को मिली हैं.

छत्तीसगढ़ के जेलों में बंद आदिवासियों की दशा पर सबका ध्यान वर्ष 2012 से जाना शुरू हुआ. अप्रैल 2012 में माओवादियों ने सुकमा कलेक्टर एलेक्स पाल मेनन का अपहरण किया था. गौरतलब है कि उनकी रिहाई के बदले में माओवादियों ने माओवाद-समर्थक आदिवासियों की नहीं, बल्कि माओवादी नेताओं की रिहाई की मांग की थी. हालांकि वह मांग अधूरी ही रह गई. बहरहाल, उस समय मध्यस्थों के साथ हुए समझौते के तहत सरकार ने निर्मला बुच के नेतृत्व में एक कमेटी का गठन किया. इस कमेटी पर यह जिम्मेदारी थी कि जेलों में बंद कैदियों और उनके ऊपर लगे आरोपों की विवेचना करके उनकी रिहाई के लिए सरकार को अनुशंसा भेजे.

उस वक्त यह उम्मीद जगी थी कि इससे कम से कम ग्रामीण आदिवासियों की रिहाई का रास्ता तो साफ हो सकता है. यह भी गौरतलब है कि इसके पहले आदिवासियों की रिहाई के मुद्दे को लेकर राजधानी रायपुर में आदिवासी सर्व समाज की अगुवाई में एक उग्र प्रदर्शन हुआ था और उस दौरान प्रदर्शनकारियों की गिरफ्तारियां भी हुई थीं. जो भी हो, 2012 से छत्तीसगढ़ के जेलों में बंद आदिवासियों की रिहाई का मुद्दा शिद्दत के साथ सामने आया. लेकिन ऐसा जान पड़ता है कि दो साल बीतने के बावजूद भी इस दिशा में कोई सार्थक पहल नहीं हुई है. अभी भी कई आदिवासी छोटे-छोटे प्रकरणों में फंसकर सालों से जेलों में बंद हैं.

इस पृष्ठभूमि में माओवादियों के उपरोक्त आह्वान को देखा जाना चाहिए. हालांकि इस तरह का आह्वान पहला नहीं था, फिर भी यह इसलिए भी सुर्खियों में आया क्योंकि अपने वक्तव्य में माओवादी पार्टी के दण्डकारण्य प्रवक्ता ने जजों और जेल अधिकारियों को चेतावनी दी. 23 मार्च को राजनीतिक बंदियों की रिहाई को लेकर कुछ जन संगठनों की ओर से भी बयान आए थे, जिनमें सीआरपीपी (कमेटी फार रिलीज आफ पोलिटिकल प्रिजनर्स) यानी राजनीतिक बंदियों की रिहाई कमेटी प्रमुख है.

आंध्रप्रदेश में सीआरपीपी और पीडीएम (प्रगतिशील जनवादी आंदोलन) की अगुवाई में राजनीतिक बंदियों की रिहाई को लेकर एक राजनीतिक पहलकदमी ली गई. आसन्न चुनावों के मद्देनजर इन संगठनों ने सभी राजनीतिक पार्टियों से यह मांग करते हुए ज्ञापन सौंपा कि वो अपने घोषणापत्रों में बंदियों की रिहाई का मुद्दा शामिल करें. माओवादियों के कट्टर विरोधी रहे चंद्रबाबू नायडू की तेलुगुदेशम पार्टी समेत लगभग सभी पार्टियों ने इन संगठनों के नेताओं को यह आश्वासन दिया कि वो सत्ता में आएंगे तो इस मुद्दे को संजीदगी के साथ हल करेंगे. हालांकि यह मान लेना जल्दबाजी होगा कि वो इस आश्वासन को जरूर ही याद रखेंगे. लेकिन राजनीतिक तौर पर जो भी प्रक्रिया या पहलकदमी यहां हुई वह महत्वपूर्ण है. इस मसले को आंध्रप्रदेश में मीडिया का पूरा कवहरेज मिला और प्रदेश की जनता तक यह संदेश चला गया.

अब यह देखा जाए कि छत्तीसगढ़ में, जिसे आज माओवादी आंदोलन का केन्द्रबिंदु कहा जा रहा है, राजनीतिक या आदिवासी बंदियों की रिहाई को लेकर ‘बंदी अधिकार सप्ताह’ के तहत राजनीतिक पहलकदमी किसी प्रकार हुई. पहले तो एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी गई और पोस्टर-पर्चे चिपकाने की खबरें मीडिया के जरिए मिलीं. इस प्रचार से लोगों की सहानुभूति कुछ हद तक मिली भी होगी, लेकिन अधिकार सप्ताह के अंत में ़माओवादियों द्वारा किरंदुल के पास एक दर्जन से ज्यादा गाडि़यों को जलाने के साथ-साथ रेल पटरियों को उखाड़ दिया गया जिससे माल गाड़ी पलट गई. बंद के दौरान कई जगहों पर सड़कें काटी गईं और पेड़ गिरा दिए गए.

यहां सवाल यह है कि क्या एक राजनीतिक मुद्दे को लेकर जब कार्यक्रम तय किया जाता है, तो क्या उसमें गाडि़यों को जलाना और रेल पटरियों को उखाड़ना जरूरी है? इससे लोगों के बीच क्या संदेश जाता है या गया होगा? जेलों में बंद आदिवासियों की दशा पर न सिर्फ स्थानीय आदिवासियों की, बल्कि शहरी व पढ़े-लिखे लोगों की सहानुभूति हासिल करने में तथा उसे एक आंदोलन की शक्ल देने में ऐसी ‘साबोटेज’ (तोड़फोड़) की कार्रवाइयों से क्या किसी भी हद तक मदद मिलेगी? क्या इस मुद्दे पर राजनीतिक गोलबंदी करने के कोई और उपाय नहीं थे?

माओवादी नेतृत्व उपरोक्त सवालों का जवाब देना चाहे या न चाहे, लेकिन सच यह है कि ऐसी कार्रवाइयों को अंजाम देकर उनका संगठन अपने द्वारा उठाए वाजिब राजनीतिक मुद्दों को खुद ही गौण बना रहा है. जिन मुद्दों को लेकर, खासकर चुनावों के समय, विभिन्न राजनीतिक पार्टियों तक का या फिर उनके कुछ धड़ों का ही सही, समर्थन जुटाया जा सकता है और जिसे व्यापक जन आंदोलन का रूप दिया जा सकता है उसे संगठन ऐसी चंद बेतुकी और घिसीपिटी ‘लड़ाकू कार्रवाइयों’ तक सीमित कर रहा है.

अपहरण की घटनाओं के संदर्भ में माओवादी संगठन ने यह समीक्षा की थी कि ऐसी गंभीर कार्रवाई के साथ अन्य राजनीतिक मांगों को गड्ड-मड्ड नहीं करना चाहिए, तो फिर आदिवासी बंदियों की रिहाई जैसे गंभीर राजनीतिक मुद्दे को लेते समय पेड़ गिराने, सड़कें काटने, पटरियों को उखाड़ने जैसी ‘लड़ाकू कार्रवाइयों’ को जोड़ना कहां तक उचित होगा? क्या इससे व्यापक जनता की राजनीतिक गोलबंदी करने की उसकी क्षमता और करने में उसकी दिलचस्पी पर सवालिया निशान खड़ा नहीं होगा?

आज जरूरत है माओवादी नेतृत्व इसकी गहराई में जाकर ईमानदारी से आत्ममंथन करे. खासकर मौजूदा हालात में जब देशभर में यह आंदोलन एक कठिन दौर से गुजर रहा हो, ऐसे सवालों को नजरंदाज करना एक खतरनाक भूल हो सकती है.

(जीवीके प्रसाद उर्फ गुड्सा उसेंडी सीपीआई (माओवादी) के पूर्व प्रवक्ता हैं.)

Last Updated on Monday, 31 March 2014 11:48