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अन्याय के 30 साल

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हमारे देश में दुनिया के तमाम उद्योगपतियों के मोटे मुनाफे के सामने इंसान को किस क़दर बौना और किस कदर सस्ता बना दिया गया है, पढ़िए वरिष्ठ पत्रकार राजकुमार केसवानी का महत्वपूर्ण विश्लेषण


तीस बरस गुज़र गए और आज भी इस कहानी का कोई अंत नज़र नहीं आता। शायद असल ज़िंदगी में शुरू होने वाली कहानियां असल ज़िंदगी के साथ ही ख़त्म होती हैं। कम से कम भोपाल की इस कहानी की हक़ीक़त यही है। इस कहानी का बीज तो ज़माना पहले पड़ चुका था लेकिन ज़माने पर यह ज़ाहिर हुई 1984 में। दो और तीन दिसम्बर की दरम्यानी रात।

रविवार की इस सर्द रात में जब तमाम लोग ठंड से कांपते रज़ाइयों में जा छुपे थे, उस वक़्त काली परेड मैदान पर कायम यूनियन कार्बाइड कारख़ाने में ज़मींदोज़ टैंक नम्बर 610 में मिथाईल आइसो साइनेट गैस उबल रही थी। इस उबाल में आख़िर एक ऐसी तेज़ी आई कि दुनिया की यह सबसे घातक गैस, टैंक और ज़मीन पर बने कांक्रीट स्लेब को फाड़कर बाहर को बह निकली। हवा की संगत में इसने धुएं की शक्ल इख़्तियार कर ली। देखते-देखते ही इस धुएं ने पूरे शहर को अपने आग़ोश में ले लिया।bhopal-gas-tragedy

वह एक रात थी जब शहर की लगभग पूरी आबादी एक साथ सड़कों पर निकल आई थी। उस पर कमाल यह कि सब के सब कमोबेश एक ही दिशा में भाग रहे थे। बिना किसी के बताए वे जान चुके थे कि मौत धुआं बनकर उनके जिस्म में दाख़िल होने की कोशिश कर रही है। लिहाज़ा जिस दिशा से गैस रिसी थी, उस तरफ़ सबकी पीठ थी। मगर मौत को पीठ दिखाना बेसूद साबित हुआ। उस एक रात में ही हज़ारों लोग इस ज़हरीली गैस के शिकार हुए। जो बच गए, वे बारी-बारी जा रहे हैं। अगर तीस बरस गुज़र चुके हैं तो कोई ताज्जुब नहीं कि मरने वालों की तादाद भी तीस हज़ार के आसपास पहुंचने को ही है। यह तादाद कहां तक जा पहुंचेगी, इसका अंदाज़ा किसी को नहीं है।

हमारे भारतीय समाज की यही त्रासदी है कि हर दौर की सरकारें हमें इस बात का अंदाज़ा ही नहीं होने देतीं कि हमारे साथ कब, क्या हो सकता है। भोपाल की गैस त्रासदी, जिसे दुनिया की सबसे बड़ी मानव निर्मित त्रासदी क़रार दिया गया है, इसी सच्चाई का एक सुबूत है। विकास के नाम पर किस तरह इंसानी ज़िंदगियों की अनदेखी होती है। यह त्रासदी इस शर्मनाक हक़ीक़त का एक नुमाया सुबूत है कि हमारे देश में दुनिया के तमाम मोटे उद्योगपतियों के मोटे मुनाफे के सामने इंसान को किस क़दर बौना और किस कदर सस्ता बना दिया गया है, यह त्रासदी सुबूत है उसी ग़लीज़ और गंदी सरकारी सोच का।

तीस बरस में न जाने कितनी बार, शायद कई हज़ार मर्तबा, इस बात को अख़बारों में, टीवी चैनलों पर दोहराया जा चुका है कि किस तरह यह हादसा हुआ। किस तरह लोग आज भी घरों और अस्पतालों में इस गैस से पीड़ित लोग आज भी इंसानी बयान की हदों से परे तकलीफ़ें झेलते हुए जीते और मरते हैं। बार-बार बताया जा चुका है कि शहर के पांच लाख से ज़्यादा लोग इसकी ज़द में आए और प्रभावित हुए। कुछ कम, कुछ ज़्यादा। जो कम प्रभावित हुए वे कम-कम मरे, जो ज़्यादा प्रभावित हुए वे बेहद मरे। इसलिए बेहतर होगा कि इन बातों को इतने भर पर ही छोड़ दिया जाए और उस तरफ़ देखा जाए, जिस तरफ़ देखना आज भी बेहद ज़रूरी है। जिसे हमेशा याद रखना उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है।

सबसे पहले आती है सरकार की भूमिका। बिना राज्य और केन्द्र सरकार की भूल-भुलैया वाले खेल में उलझे यह जानना ज़रूरी है कि इतने ख़तरनाक कारख़ाने को लगाने की इजाज़त सरकार ने ही दी। इसे मुनाफ़े के लिए बिना पुख़्ता सुरक्षा व्यवस्था पर ख़र्च किए कारख़ाना चलाने की अनदेखी सरकार ने ही की। जब गैस लीक हुई तो लोगों को मरने के लिए बेसहारा छोड़कर भागने वाली सरकार थी। लेकिन जब यूनियन कार्बाइड को बचाने की बारी आई तो यही भगोड़ी सरकार उसके बचाव में सामने आकर खड़ी हो गई।

सरकार ने एक कानून बनाकर गैस पीड़ितों से कार्बाइड के ख़िलाफ कानूनी कार्यवाही का अधिकार छीनकर अपने हाथ में ले लिया। और अधिकार लेकर एक दिन, 14-15 फरवरी 1989 को गुपचुप तरीके से सुप्रीम कोर्ट के सामने एक समझौते का मसविदा पेश कर दिया। इस समझौते के मुताबिक यूनियन कार्बाइड को 3.3 बिलियन डालर (लगभग 4500 करोड़ रुपए) के क्लेम के बदले महज़ 470 मिलियन डालर मतलब 715 करोड़ रुपए का मुआवज़ा देना था और बदले में उसके ख़िलाफ मुआवज़ा दावे के साथ ही साथ लापरवाही से हत्या करने वाला आपराधिक केस भी समाप्त होना था। इस समझौते को अदालत की मान्यता भी मिल गई और हज़ारों हत्याओं की ज़िम्मेदार कम्पनी चंद रुपए देकर बरी हो गई। यह अलग बात है कि इस समझौते को बाद में चुनौती दी गई तो आपराधिक प्रकरण फिर से चलाया गया लेकिन मुआवज़ा राशि जस की तस ही बनी रही।

एक शर्मनाक लेकिन हमेशा याद रखने लायक बात यह है कि यह मुआवज़ा राशि चुकाने के बाद यूनियन कार्बाइड कार्पोरेशन अमेरिका ने अपने शेयर धारकों को बधाई देने वाले अंदाज़ में बताया था कि इस समझौते के नतीजे में कम्पनी पर बेहद मामूली वितीय भार आया है। और जानते हैं कितना था वह वितीय भार? मात्र 50 सेंट प्रति शेयर, मतलब आधा डॉलर। मतलब कोई 8 रुपए। जी हां, 1989 में डाॅलर का मूल्य मात्र 16 रुपए था।

जब इस रकम का बंटवारा गैस पीड़ितों के बीच हुआ तो पांच लाख दावेदारों में से 90 प्रतिशत लोगों के हिस्से में आया 25-25 हज़ार रुपए। वह भी इसलिए कि मुआवज़ा बांटने के लिए अदालतें बनाने और अदालतें बनने के बाद फ़ैसले होने में इतने बरस लग गए कि तब तक गैस पीड़ितों की उम्र भले ही कम होती चली गई हो, लेकिन डालर की कीमत लगातार बढ़ती जा रही थी। 16 रुपए वाला डाॅलर 2002 के आते-आते 45-46 रुपए तक जा पहुंचा था। सरकार और कार्बाइड के बीच हुए इस समझौते पर तूफ़ानी तेज़ी से अदालत की मंज़ूरी की मुहर लगाने वाले सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश आर.एस. पाठक रिटायरमेंट के बाद हाॅलैंड के इंटरनेशनल कोर्ट में जज की कुर्सी पर जा बैठे। इस नियुक्ति को इसी नाजायज़ और नापाक समझौते पर मुहर लगाने का इनाम माना जाता है।

अदालतों का रुख इस मामले में हमेशा कभी नरम, कभी गरम का रहा है। जब-जब किसी इंसाफ-परस्त जज के आगे मामला आया तो उसने ज़ख्मों पर मरहम रखने का काम किया। और कभी-कभी, किसी-किसी ने कानूनी कील-कांटों से गैस पीड़ितों के ज़ख्म कुरेदने का काम किया। 1996 में इसी नतीजे में भोपाल के कातिलों के ख़िलाफ भारतीय दंड विधान की धारा 304–II के अंतर्गत दर्ज अपराध की धारा को बदलकर 304-ए में बदल दिया। इसका मतलब था अपराध की गंभीरता और सज़ा दोनों में कमी। पहली धारा में जहां दस साल की सज़ा का प्रावधान है, वहीं दूसरी धारा में मात्र दो साल की सज़ा।

इसी आपराधिक निर्णय का नतीजा था कि अपराध के 26 साल बाद, 7 जून 2010 को जब भोपाल जिला न्यायालय में मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी मोहन तिवारी ने एक बंद कमरे में फ़ैसला सुनाया तो इन सात मुलज़िमों में से हर एक को दो-दो बरस की सज़ा सुनाई गई। अगर आप ज़रा सा हिसाब लगाएं तो भोपाल में हुई 25 हज़ार मौतों में से हर मौत के लिए महज़ 35 मिनट की सज़ा। घायल और अपंग हुए बकाया पांच लाख के लिए कितनी सज़ा हुई? इसका जवाब मेरे पास नहीं है।

लेकिन इस बात का जवाब मेरे पास ज़रूर है कि इन तमाम रसूख़दार अपराधियों को फ़ैसले फौरन बाद ही ज़मानत देकर बाइज़्ज़त रवाना कर दिया गया। 25-25 हज़ार रुपए की ज़मानत पर। मतलब हर मरने वाले के पीछे एक रुपया।

रही बात मुख्य अभियुक्त वारेन एंडरसन की, तो वह तो हिंदुस्तान की किसी अदालत में हाज़िर हुए बिना ही पिछले दिनों इस दुनिया से ग़ैर हाज़िर हो गया। उसे शायद पता नहीं होगा कि हिंदुस्तानी अदालतों से भागकर अमेरिका में छिपने वाले इस गुनहगार का ऊपर सबसे बड़ी अदालत में भी इंतज़ार हो रहा था। अब शायद सारे फ़ैसले वहीं होंगे।

वरिष्ठ पत्रकार राजकुमार केसवानी को भोपाल गैस त्रासदी की सबसे पहली और बेहतरीन रिपोर्टिंग के लिए प्रसिद्ध रामनाथ गोयनका पत्रकारिता पुरस्कार से पुरस्कृत किया जा चूका है. लेख दैनिक भास्कर से साभार.