विशेष लेख
आधिकारिक मीडिया या तो बड़े निजी आर्थिक हितों के हाथों में है जो भारत के संसाधनों की लूट लालच में जुटा हुआ है या सरकार के हाथों में है जिसका अपना साम्राज्यवादी हित है और जो भारत की वास्तविकता को आम बहस में लाने की खिलाफत में है...
यान मिर्डल
मैं भारतीय जनता के पक्ष में खड़े आंदोलन की अंतरराष्ट्रीय एकजुटता के बारे में कुछ कहना चाहता हूं। हम यहां एक कारण से इकट्ठा हुए है। यह कारण है भारत की जनता पर खुद भारत के राज्य द्वारा या कुछ छूट देकर इस बात को कहें तो भारतीय राज्य मशीनरी पर काबिज हिस्सों द्वारा चलाया जा रहा युद्ध। आप सभी एक भारतीय नागरिक के बतौर इस युद्ध को रोक देना चाहते हैं। हम और दूसरे भारत के बाहर के मित्र इस युद्ध की भयावहता के खिलाफ खड़ी भारत की जनता के साथ अंतरराष्ट्रीय एकजुटता आंदोलन बनाने का प्रयास कर रहे हैं।
ऐसा प्रयास भारत के अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप नहीं है। हम आपसे यहां भारत में यह नहीं कह रहे हैं कि आप अपने मामलों से कैसे निपटें। इसका निर्णय करना आप पर है। कोई भी विदेशी इसका सुझाव नहीं दे सकता है। हालांकि साम्राज्यवादी घेरे में बहुत सारे-सरकार, मीडिया, एनजीओ इस तरह का प्रयास कर रहे हैं।
यह मामला उसूल का है। आप लोग-हम नहीं, अपनी कार्यवाहियों में भारत की जनता के प्रति उत्तरदायी हैं। जैसा कि हमने अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ दक्षिण पूर्व एशिया की जनता के संघर्षों के दौरान की एकजुटता आंदोलन के दौरान कहा था, ‘कंबोडिया, लाओस और वियतनाम की जनता को अपने तरीकों से समर्थन दो।’
पर एक बात तो सच है जिसे 1624 में जान डन ने सूत्रबद्ध किया था और जिसे विभिन्न देशों के हम लोग दम और सामाजिक क्रूरताओं के खिलाफ, -स्पेन की जनता के खिलाफ छेड़े गये फ्रैंकों के युद्ध के दौरान उद्धृत और प्रयोग करते रहे हैं। यह उद्धहरण हमारी अंतरराष्ट्रीय एकजुटता का आधार है।
‘कोई भी आदमी अपने आप में एक द्वीप नहीं है, हरेक आदमी महाद्वीप का एक हिस्सा है, मूल का हिस्सा है... किसी भी इंसान की मौत मुझे भी विचलित कर देती है, कारण कि मैं इस मनुष्यता का हिस्सा हूं और इसीलिए यह जानने के लिए मत जाओ कि मौत का घडि़याल किसके लिए बजा है। यह तुम्हारे लिये है।’
इस समय भारत की जनता के खिलाफ चलाये जा रहे क्रूर युद्ध के बारे में कुछ भी छुपा हुआ नहीं है। 1980 में जब मैं आंध्र प्रदेश में था (देखें : इंडिया वेट्स, संगम बुक्स, हैदराबाद) उस समय मैंने खुद दलित व आदिवासियों के खिलाफ युद्ध को देखा और सुना। यही अब 2010 में छत्तीसगढ़ में हो रहा है (देखें : रेड स्टार ओवर इंडिया, सेतू प्रकाशनीय, कोलकाता)।
हालांकि इस युद्ध में भी कोई अनोखी बात नहीं है। जनता के खिलाफ इस युद्ध के पीछे आम आर्थिक कारण ही है। लालच और मुनाफा। यह एक ऐसा सच है जो भारत सरकार के आधिकारिक दस्तावेजों में भी दर्ज है। आप से देख सकते हैं : ‘कमेटी आन स्टेट एग्रेरियन रिलेशंस एंड अनफिनिशड टास्क आफ लैंड रिफार्म’, ग्रामीण विकास मंत्रालय, भारत सरकार भाग-1 (ड्राफ्ट रिपोर्ट, मार्च 2009), निष्कर्ष-‘कोलंबस के बाद आदिवासी जमीनों की सबसे बड़ी लूट।’
जैसा कि मैंने कहा कि भारत में इस युद्ध को लोग अच्छी तरह जान रहे हैं, लेकिन विदेशों में, हमारे देश में, जिसे भारत में जाना जा रहा है और रिपोर्ट किया जा रहा है, को गैर जानकारी में रखा जा रहा है या कुछ दबे-दबाये और चंद बातों से ही कुछ जान पा रहे हैं। इसका एक बहुत सामान्य सा कारण है।
आधिकारिक मीडिया या तो बड़े निजी आर्थिक हितों के हाथों में है जो भारत के संसाधनों की लूट लालच में जुटा हुआ है या सरकार के हाथों में है जिसका अपना साम्राज्यवादी हित है और जो भारत की वास्तविकता को आम बहस में लाने की खिलाफत में है। यह मौजूदा समय की एक आम बात है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति के किसी भी अध्ययन में गुजरी शताब्दी में यह दिखता ही है कि मीडिया छोटे से छोटे सवाल पर भी बमुश्किल ही आजाद रहा है। और जब यह युद्ध, दूसरे देशों पर कब्जा या साम्राज्यवाद जैसे बड़े और निर्णायक सवालों का हो तब तो मीडिया ताकतवरों का मुंह और मंच बन जाता है जहां युद्ध को भड़काया जाता है और लूट-शोषण का पक्ष लिया जाता है।
कुछ पत्रकार और लेखक तो रहे ही हैं और आज भी इस दिशा में प्रयास करते हुए काम करने वाले हैं ही जो सही सूचनाओं को हासिल कर बड़े मीडिया माध्यमों से फैलाने में सफलता हासिल कर रहे हैं। हम इससे परिचित हैं, लेकिन मालिकों का हित साधने वाले संपादकीय दरबान सतर्क हैं। ईमानदार रिपोर्टर चंद लोग रहे हैं और आज भी कम ही हैं। जब भी हालात कठिन बनते है। उनका मुंह बंद कर दिया जाता है।
आप एक प्रसिद्ध और लोकप्रिय अमेरिकी लेखक एडगर स्नो को याद करिये। उन्हें ‘शीत युद्ध के समय कामिक्स का अनुवाद करके जीविका चलानी पड़ी। उन्हें अमेरिका के बड़े मीडिया ने चिन्हित कर किनारे फेंक दिया था, क्योंकि वे बातों से अच्छी तरह वाकिफ और विद्वान न थे।
भारत में युद्ध के बारे में जानकारी है। शासक वर्ग का जनता के खिलाफ चलाये जा रहे इस युद्ध पर आ रहे कुछ विमर्श और रिपोर्ट में अपना हित है, लेकिन भारत से बाहर एक आम सन्नाटा है। इसका कारण भारत सरकार द्वारा भारत के चारों ओर खड़ा किया गया प्रतिबंधन घेरा नहीं है। इसकी तो तब तक जरूरत नहीं है जब तक कि साम्राज्यवादी देशों के आधिकारिक मीडिया के दरबान यह काम कर रहे हैं।
मैं उन लोगों को नहीं जानता जो भारत से रिपोर्टिंग कर रहे हैं। जब वे लोग धरोहरों और लोककला और भारत के आर्थिक व वैज्ञानिक विस्तार के बारे में बताते हैं, बहुधा दिलचस्प होता है। मैं जितना जानता हूं उनकी रिपोर्ट का यह सबसे अच्छा हिस्सा है। मेरा भरोसा है कि वे सभी सम्मानित लोग हैं। लेकिन हम देख सकते हैं कि वे रिपोर्टर ही अपने देश-साम्राज्यवादी देशों के लोगों को भारत की जनता मसलन आदिवासी और दलितों की वास्तविक हालात के बारे में रिपोर्ट नहीं करते हैं। हो सकता है कि इसमें रिपोर्टरों की दिलचस्पी न बनती हो, लेकिन मेरा मानना है कि इसके पीछे गृहदेश में बैठे संपादकों द्वारा इसकी अनुमति न देना है।
इन्हीं कारणों से भारत की जनता के साथ अंतरराष्ट्रीय एकजुटता आंदोलन इंटरनेट और स्वतंत्र पत्रिकाओं-अखबारों जो सरकारों द्वारा या एकाधिकारी पूंजी द्वारा समर्थित न हो, के माध्यम से सूचनाओं को विस्तारित करना मुख्य मुद्दा मानता है। अमेरिका और दूसरी सरकारें इंटरनेट की सापेक्षिक आजादी को छीनने का प्रयास कर रही हैं। फिर भी हम अपने लोगों के बीच सूचना विस्तारित करने के माध्यम की तरह इसका प्रयोग कर सकते हैं।
इसमें आप सभी का सहयोग चाहिए। हमें और आपको भी आधिकारिक रिपोर्टरों पर भरोसा नहीं करना चाहिए। इस सबके बावजूद भी कि वे कुछ अलग करना चाहते हैं और ईमानदारी से रिपोर्ट करते हैं, वे ऐसा ही गाने के लिए नौकरी पर रखे गये हैं जिन गानों के लिए उन्हें तनख्वाह दी जाती है। यदि वे ईमानदार हैं और इतने मजबूत हैं कि दरबानों पर पार पा जाते हैं, यह अच्छा है। यदि नहीं तो जरूरी है कि हम दूसरे रास्तों का प्रयोग करें।
मेरी कोई राजनीतिक धारणा नहीं है। स्वीडिश सरकार को यदि मुझे लताड़ने के लिए कोई बहुत कड़ा शब्द नहीं मिलता है तो मुझे पूर्वाग्रही कह सकती है। मैं एकजुटता आंदोलन का हिस्सा भी हूं। हालांकि भारतीय जनता के समर्थन में बना अंतरराष्ट्रीय एकजुटता आंदोलन एक ही जैसे लोगों का नहीं है। यह एक हद तक बहुविध और विस्तारित आंदोलन है। यही इसकी ताकत है। यह कोई पार्टी नहीं है। इसके भागीदार धार्मिक या सामाजिक सवालों पर एकमत नहीं हैं। यह भी जरूरी नहीं है कि सभी लोगों की वैसी ही साम्राज्यवाद पर या भारतीय राज्य के चरित्र की एक ही व्याख्या जैसा हो जैसा कि मेरी समझ है। लेकिन वे सभी भारत की जनता के समर्थन की जरूरत के विशिष्ट मुद्दे पर एकराय हैं।
इस बात को याद रखना महत्वपूर्ण है। भारत की जनता के साथ खड़े एकजुटता आंदोलन का आधान बहुत व्यापक होना चाहिए। आप कह सकते हैं कि पिछली शताब्दी में युद्ध, साम्राज्यवाद और औपनिवेशिक दमन के खिलाफ राजनीतिक काम में गतिविधियों के दौरान हमने गलतियां कीं और खुद को कमजोर साबित किया। इराक की जनता के खिलाफ अमेरिकी युद्ध के खिलाफत में हुए प्रदर्शनों -स्टाकहोम व इस्तानबुल में मैंने भी हिस्सेदारी की। ये विरोध-प्रदर्शन मेरे जीवन में देखे गये सबसे बड़े प्रदर्शन थे। लेकिन तब भी हमारी सरकार और वे पार्टियां भी जो खुद को ‘वामपंथी’ कहती हैं, इराक को तबाह करने को समर्थन करती रहीं।
हां, हम इतने मजबूत नहीं थे कि उन्हें ऐसा करने में बाधा बन सकें। इसके लिए हमारी आलोचना हो सकती है। लेकिन इन्हीं दशकों में हम सफल भी हुए हैं। हमने ‘स्टाकहोम अपील’ को लेकर 1952 में सोवियत यूनियन के खिलाफ अमेरिका के नाभिकीय युद्ध करने की संभावना को रोकने का विश्वस्तरीय अभियान चलाया।
अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ दक्षिण पूर्व एशिया में सशत्र संघर्ष कर रही जनता के पक्ष में हमने अपने देशों में जनसमर्थन निर्माण का महत्वपूर्ण काम किया। स्वीडन में सरकार ने हम लोगों के खिलाफ 20 दिसंबर 1967 को घुड़सवार पुलिस को भेजा, लेकिन हम लोगों को इतना विशाल जनसमर्थन मिला कि दो हफ्तों बाद ही ठीक वही सरकार जिसने हम लोगों के खिलाफ पुलिस को पीटने के लिए भेजा था, ओल्फ पामे अमेरिकी युद्ध के खिलाफ जन प्रदर्शनों में आगे-आगे चली। स्वीडन सरकार की यह नहीं अवस्थिति (‘जिसे तुम हरा नहीं सकते, उनके साथ हो जाओ’) एकजुटता आंदोलन का ही परिणाम था और इससे दक्षिण पूर्व एशिया की लड़ रही जनता को काफी सहयोग मिला।
स्वीडन भारत से काफी दूर का एक देश है। फिर भी वहां भारत की जनता के पक्ष में एकजुटता आंदोलन की लोकप्रियता बढ़ रही है। प्रदर्शन, अध्ययन समूहों, मीटिंगों, पर्चा और साहित्य द्वारा उभर रहा एकजुटता आंदोलन ‘दूसरों’ के लिए भाव के साथ होने वाली गतिविधियां नहीं हैं। मैंने जान डल को उद्धृत किया क्योंकि उन्होंने सच्चाई को व्यक्त किया है। एकजुटता आंदोलन उस समय मजबूत बनता है जब इसके भागीदार मनुष्य की इस सच्चाई से चेतन हो कि कोई भी इंसान खुद में द्वीप नहीं होता। भारत की जनता के अधिकारों की रक्षा करना स्वीडन की जनता की रक्षा करना है।
विश्वप्रसिद्ध लेखक यान मिर्डल द्वारा दुनियाभर के जनांदोलनों के समर्थन में भारतीय राज्य द्वारा जनता पर चलाये जा रहे युद्ध का प्रतिरोध करो सम्मेलन में 6 फरवरी को दिल्ली में दिए गए पहले भाषण हिन्दी अनुवाद.



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आनंद स्वरुप वर्मा
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