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आरोप सही निकले तो सब लौटा दूंगी

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महुआ ने दिया प्रमाण सहित जवाब

‘मैं बोरिशाइल्ला’ की मूल लेखक मैं ही हूं. अपनी बात को साबित करने के लिए सभी तरह के प्रमाण मेरे पास मौजूद हैं. किसी को शक है तो मेरे घर आकर पांडुलिपियों की जांच करा सकता है. चाहे तो प्रयोगशाला में ले जाकर फोरेंसिक जांच द्वारा कागज, स्याही की प्राचीनता तथा हस्तलिपि की जांच भी करा सकता है. मैं सबको खुला आमंत्रण देती हूं...

‘पाखी’ पत्रिका के दिसंबर 2012 अंक में श्रवण कुमार गोस्वामी ने अपने लेख ‘महान लेखक...’ में मुझे कठघरे में खड़ा किया और आरोप लगाया कि मेरे पहले उपन्यास ‘मैं बोरिशाइल्ला’ का मूल लेखक मैं नहीं कोई और था और इस बात को उन्होंने कुछ इस अंदाज में कहा कि हिन्दी साहित्य की दुनिया में हलचल मच गयी. मेरे बारे में अपमानजनक टिप्पणियां भी ब्लॉग तथा फेसबुक पर नजर आने लगीं.

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महुआ माजी ‘‘मैं बोरिशाइल्ला’ की मूल पांडुलिपि दिखाते हुए

लोगों ने क्या-क्या कमेंट नहीं किये, जबकि 5 दिसंबर को ही मैंने पाखी के ब्लॉग पर यह लिख दिया था कि यदि किसी के पास चोरी जैसे आरोप के पक्ष में कोई प्रमाण है तो मेरी खुली चुनौती है कि वह अविलंब उसे सार्वजनिक करे. यदि ऐसा हुआ तो न सिर्फ मै. अब तक प्राप्त सम्मानों को लौटा दूंगी, बल्कि अपनी प्रकाशित पुस्तकें भी वापस ले लूंगी. कई दिन गुजर गये. आरोपी ने चुप्पी साध रखी है. पत्रकारों द्वारा बार-बार पूछे जाने पर भी न तो उन्होंने कोई प्रमाण दिया, न ही कोई संतोषजनक उत्तर. इसके बावजूद ब्लॉग तथा फेसबुक पर साहित्य चोरी के इल्जाम से संबंधित खबरें बनी रहीं. उन्हें हटाने की ईमानदारी भी नहीं बरती गयी.

मित्रो! मैं अपने पहले उपन्यास ‘‘मैं बोरिशाइल्ला’ की मूल पांडुलिपि की कुछ तस्वीरें आप लोगों के सामने रख रही हूं. सभी पांडुलिपियां सिर्फ और सिर्फ मेरी हस्तलिपि में हैं. मेरे अलावा किसी और की हस्तलिपि उनमें मौजूद नहीं है. उपन्यास के कई-कई ड्राफ्ट हैं. हजारों पृष्ठों में. कई सालों तक यह काम चला है.

पहले ड्राफ्ट के पहले पृष्ठ पर 4.10.2001 की तिथि पड़ी है. पांडुलिपि के शुरुआती ड्राफ्ट काफी गंदे हैं. गंदे यानी निर्माण की प्रक्रिया में किये गये कांट-छांट से भरे हुए. इसमें पृष्ठ-दर-पृष्ठ नये-नये तथ्यों से लैस होते हुए, क्रमशः बनते हुए, 'शेप’ में आते हुए, शेप’ बदलते हुए उपन्यास को देखा जा सकता है, अनुदित होते हुए नहीं.

संयोग से उन पृष्ठों के बीच ‘कोलकाता नेशनल लाइब्रेरी’ की कुछ रसीदें तथा कार्ड भी मिल गये हैं. उनमें 30 अगस्त से 1 सितंबर 2002 की तारीख पड़ी है. मेरी कार्ड संख्या E3935 तथा रसीद की क्रम संख्या 37436 है जिसकी छायाप्रति मैं इस पत्र के साथ संलग्न कर रही हूं. उपन्यास लेखन के दौरान बांग्लादेश से संबंधित तथ्यों का अध्ययन करने नेशनल लाइब्रेरी के अलावा जिन-जिन पुस्तकालयों में गयी, उन सबके प्रमाण मेरे पास हैं.

शनिवार, 8 दिसंबर 2012 को मैंने अपने घर पर कुछ पत्रकारों को बुलाकर यह सब दिखाया है जो दैनिक भास्कर में भी छपा है. उपन्यास के कई पात्रों से लिये गये साक्षात्कार भी दिखाये हैं जिनमें केष्टो से लिये गये पहले साक्षात्कार के 50 पृष्ठ भी शामिल हैं. इस साक्षात्कार का जिक्र मैंने राजकमल प्रकाशन के ‘प्रकाशन समाचार’ में किया था, जिसका हवाला देकर गोस्वामी जी ने मुझसे ये पूछा है कि जिनसे-जिनसे साक्षात्कार लिये, वे कौन थे?

अब मैं उन्हीं से पूछती हूं कि क्या टालस्टाय ने अपने महान उपन्यास ‘वार एंड पीस’ के हजारों पात्रों के वास्तविक नाम अपने पाठकों को बताये थे? आदरणीय गोस्वामी जी, यदि आप खुद को एक उपन्यासकार मानते हैं तो क्या आपको पता नहीं कि उपन्यास यथार्थ और कल्पना के सम्मिश्रण से बनता है. एक पात्र में कई-कई पात्रों के जीवन की घटनायें जोड़ी जा सकती हैं.

‘‘मैं बोरिशाइल्ला’ में सैकड़ों पात्र हैं, न जाने कितने-कितने जीवित पात्रों के जीवन की घटनाओं से प्रेरित होकर उन्हें गढ़ा गया है. दूध में पानी मिलाने के बाद क्या आप उन्हें अलग से चिन्हित कर पायेंगे? फिर भी आवश्यकता पड़ने पर मैं उपन्यास के विभिन्न पात्रों से लोगों को मिलवा सकती हैं. उपन्यास में केष्टो के ननिहाल में जो दंगे का दृश्य दिखाया गया है, वह दरअसल मेरी मां के ननिहाल की घटना है.

दंगाइयों से जान बचाने के लिए तालाब में कूद पड़े दोनों बालक मेरी मांग की मौसी के परिवार के थे जिनमें एक जीवित बच गया था. (इन बातों का मैं प्रमाण भी दे सकती हूं.) ऐसे ही तमाम यथार्थ और काल्पनिक पात्र उपन्यास में भरे पड़े हैं. उपन्यास में केष्टो (यथार्थ और कल्पना के सम्मिश्रण से बना मुख्य पात्र, जिसमें कई चरित्रों का समावेश है) का इस्तेमाल एक वट-वृक्ष की तरह करके मैंने उसमें सैकड़ों शाखा, प्रशाखा तथा पत्तियां जोड़ी हैं. गोस्वामी जी यदि खुद उपन्यासकार हैं तो इस सामान्य सी बात को क्यों नहीं समझ पा रहे हैं या फिर जान-बूझकर समझना ही नहीं चाहते.

मित्रो! गोस्वामी जी के लेख को पढ़कर लगता है कि उनकी यह दृढ़ धारणा या मान्यता है कि उपन्यास के लिए जो व्यक्ति साक्षात्कार देता है, उसे ही मूल लेखक माना जाना चाहिए, क्योंकि कहानी तो उसी की है. उपन्यासकार तो सिर्फ उसे दर्ज कर रहा है अर्थात घटनाओं को आर्ट के फार्म में ढालने वाले व्यक्ति को उपन्यास का मूल लेखक नहीं, बल्कि ‘साहित्य चोर’ माना जाना चाहिए.

ऐसे में गोस्वामी जी अवश्य ही भिखारी ठाकुर, महात्मा गांधी जैसे ऐतिहासिक पात्रों पर लिखे गये उपन्यासों का मूल लेखक भी उन्हें ही मानते होंगे जिन्होंने साक्षात्कार दिये हैं या जिनके बारे में लिखा गया है.

गोस्वामी जी के तमाम आरोपों को दृढ़ता से खारिज करते हुए मैं यही घोषणा करती हूं कि ‘‘मैं बोरिशाइल्ला’ उपन्यास की मूल लेखक मैं ही हूं और अपनी बात को साबित करने के लिए सभी तरह के प्रमाण मेरे पास मौजूद हैं. यदि किसी को शक है तो मेरे घर आकर पांडुलिपियों की जांच करा सकता है. चाहे तो प्रयोगशाला में ले जाकर फोरेंसिक जांच द्वारा कागज, स्याही की प्राचीनता तथा मेरी हस्तलिपि की जांच भी करा सकता है.

मैं सबको खुला आमंत्रण देती हूं और हिंदी साहित्य की दुनिया के उन तमाम मित्रों से जिन्होंने अपने ब्लॉग तथा फेसबुक पर मेरे बारे में ‘साहित्य चोर’ से लेकर तमाम तरह की अश्लील टिप्पणियां कर रखी हैं, विनम्र अनुरोध करती हूं कि पहले सच्चाई जांच लें फिर चाहे इल्जाम लगायें, सजा सुनायें.

इतना रहम तो हत्या के अपराधियों पर भी किया जाता है. हिंदी साहित्य की सेवा करके बेशक मुझ बांग्लाभाषी स्त्री से बहुत बड़ा गुनाह हो गया है, तभी तो हमारे शहर के कुछ साहित्यकार ही मुझ पर कई वर्षों से प्रहार किये जा रहे हैं. पहले सोचा था, दूसरे उपन्यास के आ जाने पर उन लोगों का व्यवहार बदल जायेगा, मगर अब लगता है कि यह अग्निपरीक्षा मुझे तब तक देती रहनी पड़ेगी, जब तक मैं हिंदी में लिखने का दुस्साहस करती रहूंगी.

वैसे इन दिनों एक नयी प्रवृत्ति देखी जा रही है. कुछ लोग, जो अपनी रचनाओं के जरिये कभी वृहत पाठक वर्ग तक नहीं पहुंच पाये होते हैं, दूसरों पर इस तरह के झूठे और मनगढ़ंत आरोप लगातार रातोंरात चर्चे में आने का प्रयास करते हैं.

मेरे दूसरे उपन्यास ‘मरंगगोड़ा नीलकंठ हुआ’ को लेकर भी गोस्वामी जी के मन में भारी दुश्चिंताएं घर कर गयी हैं. वे हैरान हैं कि आरंभ में मैंने जब उपन्यास के पात्रों, स्थान आदि को काल्पनिक कहा, तो फिर कैसे अंत में कुछ पुस्तकों, पत्रिकाओं, लेखों आदि के नाम दे दिये? गोस्वामी जी! क्या आप हिंदी के अलावा किसी दूसरी भाषा के उपन्यासों के बारे में कोई जानकारी रखते हैं?

अंग्रेजी के मशहूर लेखक अमिताभ घोष के उपन्यास ‘सी ऑफ़ पॉपीज’ के पृष्ठों को जरा उलट-पुलटकर देख लीजिये. आरंभ में सभी पात्रों, स्थान, घटनाओं आदि को उसमें काल्पनिक कहा गया है और अंत में विभिन्न व्यक्तियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए विभिन्न पुस्तकों, दस्तावेजों आदि का उल्लेख भी किया गया है, जिनकी मदद से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अत्यंत चर्चित तथा ‘मैन बुकर पुरस्कार’ के लिए नामांकित उपन्यास ‘सी ऑफ़ पॉपीज’ को गढ़ा गया है. बांग्ला में इस तरह के प्रयोग सुनील गंगोपाध्याय जैसे बड़े लेखक वर्षों पहले कर चुके हैं.

गोस्वामी जी के आरोप अनंत हैं. लगता है किस्तों में सबका जवाब देना पड़ेगा. आज के लिए इतना ही... मगर एक सवाल हिंदी साहित्य जगत से... कुछ लोगों द्वारा मुझ पर लगातार चरणबद्ध तरीके से किया जा रहा चौतरफा हमला उनकी मंशा की तरफ इशारा करता है कि मैं हतोत्साहित होकर लिखना ही छोड़ दूं. जिस समय साहित्य प्रेमियों की तेजी से घटती संख्या पर हिंदी के शुभचिंतक घनघोर चिंता जता रहे हैं, उस समय लेखिकाओं पर किये जा रहे ऐसे हमले क्या हिंदी के हित में है? 

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Last Updated on Monday, 10 December 2012 14:46

Comments  

 
0 #6 sahitya aalochak 2012-12-12 16:44
chori kie gaye sahitya ki bhi dubara puri pandulipi likhi jati he.
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0 #5 राकेश सिन्हा 2012-12-12 15:44
क्या इस विवाद को इतना को इतना खींचने की जरुरत थी। कल तक जिस महुआ मांझी को दस-बीस साहित्यकार, दस बीस चाटुकार और इतने ही उनके अपने तरफदार जानते थे, लेकिन जनज्वार ने जिस तरह उनका पक्ष-विपक्ष छाप उन्हें महत्वपूर्ण बनाया है, उससे लगता है कि जनज्वार साहित्यिक पेड न्यूज की गिरफ्त में है। पाठक कमेन्ट से भी समझ सकते हैं हैं कैसे सभी यही कहते हैं कि मैंने उनकी किताब तो पढ़ी नहीं, पर लगता है कि उनके साथ अपराध हुआ है। ये लगता है कहने वाले हैं, उन्होंने हिंदी साहित्य को डस्टबीन बना है।
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0 #4 MUKESH KUMAR JAIN 2012-12-12 15:05
महुआ जी , इस प्रकरण को पढने के बाद यह मान लेने में कोई संकोच नहीं कि आप के लिखे हुए ने प्रभावित तो किया है. जब मन में पूर्वाग्रह होता है तो, वह दृष्टि को प्रभावित करता है और हम पूर्वाग्रह युक्त निष्कर्ष पर पहुचते हैं. मैंने आपके उपन्यास नहीं पढ़े है. लेकिन बहस से इतना तो समझ में आता है है कि इस की जड़ में उपन्यास की सामग्री नहीं कुछ और है. आप के सबूत पुख्ता है
और आप को इन चर्चाओं से बिचलित नहीं होना चाहिए वल्कि मजा लेना चाहिए. दोनों उपन्यासों के लिए आपको बधाई.
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-1 #3 सुनीता भास्कर 2012-12-12 08:41
ओह्ह..शानदार स्पस्तीकरण है..अगर आप सही हैं तो यह वाकई बड़ा अन्याय होगा महुवा जी....हिंदी के लिए भी और महिला लेखिकाओं की पांत के लिए भी.......
आभार अजय इन्हें अपना पक्ष रखने का प्लेटफार्म देने के लिए
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0 #2 Shashi Bhooshan Dwiv 2012-12-11 20:43
क्या इसी दिन के लिए पाण्डुलिपि संभाल कर रखी हुई थी ? जय हो!
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0 #1 uma 2012-12-10 14:42
फिर भी आवश्यकता पड़ने पर मैं उपन्यास के विभिन्न पात्रों से लोगों को मिलवा सकती हैं. - yah dava adhbhut hai, sunkar gudgudi ho rahi hai. yah kaam to police valon ka ****a hai, ab aap bhi mahua ji. badi nadan -------badi nadan
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