Last Update : 16 10 2017 06:58:25 PM

मैं ब्याह दी गयी सेक्स के एक मानसिक रोगी के साथ

अय्याश बन चुका था वह। एक बार जब मैं घर पर नहीं थी तो पड़ोस में रहने वाली महिला के बाथरूम में घुस गया था वह जबर्दस्ती और उसके स्तन नोचते हुए उसने उसका ब्लाउज तक फाड़ डाला था...

हाउसवाइफ के लिए नोएडा से गुरप्रीत

रहती आजकल नोएडा में हूं, वैसे उत्तर प्रदेश के मेरठ की रहने वाली हूं। सत्रह साल पहले सत्रह साल की उम्र में ब्याह दी गई या पिता ने अपने सर का बोझ हलका कर लिया था। अब 34 की हो चुकी हूं, मगर लगता है इसी जनम में न जाने कितने जनम जी लिए हैं।

मायके में भी सुविधाओं का अभाव झेला हमेशा। न कभी ढंग का खाने को मिला, न तन ढकने को कपड़े। पिता ने इस लालच में एक दुहाजू के साथ ब्याह कर दिया क्योंकि उन्हें मेरी एवज में कुछ पैसे मिल चुके थे, जिससे शायद उनके दिन कुछ फिरे हों, मगर मैं अभावग्रस्त जीवन से दूसरे नरक में धकेली जा रही थी, जिसका अंदाजा शायद पिता को भी न रहा होगा।

हां, तो मैं बता रही थी मेरी शादी पहले से शादीशुदा आदमी से की गई, जिसकी उम्र शादी के वक्त तकरीबन 35 साल रही होगी, मुझसे दोगुनी उम्र का था। ससुराल वालों के मुताबिक उसकी पहली पत्नी पेट से थी तो बच्चा जनते वक्त बच्चे और उसकी दोनों की मौत हो गई। एक बेटी थी, जिसे मैंने दिल से अपनाया।

जब शादी हुई थी तो पति एक कंपनी में काम करता था। प्यार तो क्या कहूं क्योंकि दिन के उजाले में तो उसने मुझसे कभी सीधे मुंह बात नहीं की। मगर रात को अपने जिस्म की आग ठंडी करने बिना मेरी मर्जी जाने शुरू हो जाता था। यहां तक कि जब मुझे महीना आया होता था, उन दिनों में भी वह मुझ पर रहम नहीं करता। मैं परे धकेलती तो मुझ पर लात—घूंसे जरूर बरसाने शुरू कर देता। हां, एक बात तो बताना ही भूल गई, शराब बहुत पीता था।

जब मैंने एक बार यह जानना चाहा कि तुम इतनी शराब क्यों पीते हो, तो उसने जो कहा वह बहुत दिलचस्प और हास्यास्पद था। बोला, मुझे अपनी पहली बीवी की याद बहुत आती है, इसलिए उसे भुलाने के लिए मैं शराब पीता हूं। मैं तुझे उसकी जगह पर सहन नहीं कर पाता, इसलिए भी पीता हूं। जब मैंने यह पूछा कि तो रात को मेरा जिस्म क्यों नोचते हो, तो वह बोला शराब में तु मुझे वही नजर आती है इसलिए।

है ना दिलचस्प। हां, तो मैं कह रही थी शुरू में वह एक कंपनी में काम करता था। आमदनी भी ठीकठाक थी। परिवार में एक बिनब्याही ननद, दो देवर और सास—ससुर और मेरी सौत की बिटिया थी। जो मुझे आज भी अपनी जान से प्यारी है।

उसकी शराब पीने की लत दिनोंदिन बढ़ती जा रही थी और मुझ पर जुल्मोसितम की भी। अब तो वो दिनदहाड़े भी शराब पीकर आने लगा था, छोटी बच्ची के सामने भी मेरे कपड़े उतारना शुरू कर देता। खैर, 4 साल बाद मैं उसके बेटे की मां बन चुकी थी। मगर वह अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ रहा था, शराब में डूबा रहता।

शराब के लिए उसने घर तक गिरवी रख दिया, जिसे टाइम पर न चुका पाने से हम किराए के कमरे पर आ गए। अब तक ननद और देवरों की शादी हो चुकी थी। सबने उसके व्यवहार को देख उससे किनारा कर लिया था। सिर्फ बेटी—बेटा और मैं उसके साथ थे।

अब तो उसने काम पर जाना बिल्कुल बंद कर दिया था। समझ में नहीं आ रहा था क्या करूं, सो नोएडा के सेक्टर 12—22 के आसपास के कुछ घरों में काम पकड़ लिया। और तो कुछ आता न था, तो घरेलू काम के अलावा मेरे पास कोई विकल्प नहीं था। मेरे बाई का काम करने की बात पर उसने मुझे बहुत मारा। लेकिन धीरे—धीरे मेरी कमाई पर ही पलने लगा क्योंकि शराब के नशे में धुत जब वह कंपनी में पहुंचने लगा तो शिकायत जाने पर पहले तो उसे वार्निंग मिली, बाद में निकाल दिया गया। अब नौबत ये आ गई कि जिन घरों में मैं काम करती, उनसे वह एडवांस में उगाही कर शराब में उड़ाने लगा।

खैर, किसी तरह मेरी जिंदगी की गाड़ी चल रही थी। मार खाना तो आम बात हो गई थी और पति बिल्कुल शराब में डूबा रहता। घर में रहने पर बेटी और बेटे को भी वह बहुत मारता। सच कहूं तो अय्याश बन चुका था वह। एक बार जब मैं घर पर नहीं थी तो पड़ोस में रहने वाली महिला के बाथरूम में घुस गया था वह जबर्दस्ती और उसके स्तन नोचते हुए उसने उसका ब्लाउज तक फाड़ डाला था।

महिला चिल्लाई तो पड़ोस में रहने वाली एक बुजुर्ग महिला आई और उसने महिला की इज्जत बचाई। क्योंकि किराए के कमरे में बहुत सारे लोगों को एक ही बाथरूम साझा करना पड़ता था, तो मैंने जब पूछा कि ये तुमने क्या किया तो उसने कहा कुंडा खुला था और वह नहाने जा रहा था, इसे नहीं पता था कि पहले से ही वहां कोई और था।

ये घटनाएं तो जैसे जीवन का हिस्सा बन गई थीं। मैं उससे छुपकर भी एक—दो घरों में काम करती थी और उन मालकिनों से कहती थी कि वे मेरे पैसे अपने पास ही रखें। जब मुझे जरूरत पड़ेगी मैं ले लिया करूंगी। उस पैसे का इस्तेमाल मैं बच्चों के स्कूल फीस और अन्य जरूरतों के लिए करती थी और कुछ पैसा इकट्ठा भी हो गया था कि मुई मोदी जी की नोटबंदी ने तो जैसे मुझ पर बज्रपात ढा दिया।

पढ़ी—लिखी नहीं थी, और कभी जरूरत भी नहीं पड़ी कि बैंक एकाउंट खुलवाउं, मगर अब मेरे सामने संकट था कि जो पैसा इकट्ठा था उसका क्या करूं। जिनके घरों में काम करती थी उनसे बहुत मिन्नत की कि मेरा पैसा बदलकर मुझे नया पैसा दे दें, कुछ कम करके ही पैसा दे दें। मगर कोई तैयार नहीं हुआ।

थक—हारकर मुझे ये राज अपने शराबी पति से साझा करना पड़ा कि मेरे पास कुछ बचत है, जिसे आप अपने बैंक में जमा कर लीजिए। ये सुनकर एक तरफ जहां उसकी बांछें खिलीं, वहीं उसने मुझे शंकित निगाहों से देखा। बोला, 'रंडीगिरी करती है क्या जो तेरे खसमों ने ये पुराने नोट तुझे ईनाम में दे दिए। बोल कहां—कहां बेचकर आती है जिस्म।'

जब मैंने उससे यह कहा कि ये पैसे मेरी मेहनत के हैं तो उसका पारा और चढ़ गया, बोला तेरी हिम्मत कैसे हुई मुझसे छुपाकर कुछ करने की। उस दिन तो उसने हद ही पार कर दी। बहुत मारा मुझे, बेटी बीच—बचाव करने आई तो उसे भी मारा, जिससे उसका हाथ टूट गया। और हां, मेरा लगभग 35 हजार रुपया भी डकार गया वो।

वो पैसा जिसे मैंने पाई—पाई जोड़कर इकट्ठा किया था, उसने शराब में उड़ा दिए। लेकिन उस दिन मैंने यह जरूर तय कर लिया कि अब कुछ भी हो जाए इस आदमी के साथ अब नहीं रहूंगी।

एक नया जोड़ा जिनके वहां मैं काम करती थी, उन्होंने जब मेरी चोटें देखीं और पूछा तो मैंने उन्हें सबकुछ बताया तो उन्होंने मेरी काफी मदद की। उनको मैंने पूरा घटनाक्रम बताया। जिंदगी की लंबी दास्तान सुनाई। अच्छा—बुरा सब बताया। सेक्स लाइफ के बारे में भी बताया। फिर उन लोगों ने कुछ सवाल पूछे, कुछ लक्षण बताए। तब जाकर मेरी आंख खुली। मुझे पहली बार पता चला कि सेक्स के सनकी एक तरह के रोगी होते हैं और उनका इलाज होता है। मेरा पति सेक्स का मानसिक रोगी था।

मैंने अपनी जिंदगी की पूरी कहानी याद की तो लगा कि मैं एक मानसिक रोगी के साथ रहती थी, जबकि मुझे पहले कभी लगा ही नहीं कि वह मानसिक रोगी है। मुझे हमेशा यही लगा कि सबके मर्द ऐसे ही हैं। मेरा वाला थोड़ा ज्यादा है, क्योंकि मैं जबसे पैदा हुई, जहां रही, जहां गई झोपड़ी या महल, सब जगह औरतें पिट रही थीं, गालियां सुन रही थी और दब के रह रही थीं।

इसलिए मैं इसे अपनी जीवन गति समझ के काट रही थी कि औरत के लाइफ होता ही ऐसा है। इसमें कुछ नया नहीं है। पर मैं उस नए जोड़े के साथ रहकर महसूस किया औरत क्या है, मर्द क्या है, मन का रोग क्या है, रिश्ते कैसे होते हैं, किसके साथ रहना चाहिए और किसके साथ नहीं।

खैर! उस नए जोड़े ने अपने घर की छत पर बने स्टोर रूम में रहने के लिए पनाह दी, जिसके बदले मैं उनके घर का काम कर दिया करती हूं, क्योंकि वो दोनों नौकरी करते हैं। इसके अलावा बेटे—बेटी जब स्कूल जाते हैं और शाम के टाइम कुछ घरों में झाड़ू—पोछा और खाना बनाकर हम तीनों का गुजारा कर रही हूं।

अब नहीं चाहती कि उस जहन्नुम में वापस लौटूं, जिसने मुझे जीते जी नरक दिखाया। सोचती हूं थोड़ा पैसा जुट जाए तो अलग किराए पर रहने लगूंगी। पर एक बात बार—बार खटकती है कि क्या हमारे समाज में ज्यादातर मर्द मानसिक रोगी हैं, सेक्स या किसी और चीज के, क्योंकि मैंने अपनी याद में एक मर्द नहीं देखा जो अपनी औरत पर हाथ न उठाता हो।        (फोटो प्रतीकात्मक)

Posted On : 16 10 2017 05:27:26 PM

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