Last Update : 09 10 2017 01:58:31 PM

चार गांवों का कोठा बन गया उस औरत का शरीर

इस कॉलम में हम गांव की किसी सच्ची घटना को लेते हैं। इस बार की यह सच्ची घटना बिहार के आरा जिले के कोईलवर थाने के महाकमपुर गांव की है। यह वारदात पटना में मिले युवक ने बताई, जो खुद भी मौके पर मौजूद रहा।

एपी मिश्र

महेंद्र अपनी बीवी को एक हाथ से मार रहा था और दूसरे हाथ से उसके कपड़े नोच रहा था। मारने और कपड़े नोचने का तालमेल कुल 2—3 मिनट का रहा होगा। दो—तीन मिनट बाद एक भी कपड़ा महेंद्र की बीवी के शरीर पर नहीं रह गया। वह पूरे तौर पर नंगी हो चुकी थी।

आखिर में उसके शरीर पर कपड़े की निशानी के तौर पर सफेद ब्रा बची थी, जो उसके बालों और बांह के बीच फंसी हुई लटकी थी। उसे भी महेंद्र ने नोचकर जमीन पर फेंक दिया। ब्रा को नोचते और अपनी बीवी को गालियां देते हुए वह बड़बड़ा रहा था और बीच—बीच में उस पर घूंसों से या लात से, थप्पड़ से मार रहा था। वह भोजपुरी में खूब गालियां बक रहा था। उनमें कुछ गालियां ऐसी थीं जिन्हें मैंने पहली बार सुन रहा था।

जिस दिन की यह बात है, उस दिन नवंबर 1998 की कोई दोपहर रही होगी। अभी दीपावली नहीं बीती थी। यह बात मुझे इसलिए याद है कि दीपापली की तैयारियों के लिए मेरे घर की रंगाई हो रही थी। धनबाद की कोयला खदान में काम करने वाले मेरे बाबा गांव आ चुके थे। गांव में भोजपुरी गानों की रौनक बढ़ चुकी थी क्योंकि कोयला खदान से जब लोग आते तो अपने साथ हर बार कोई न कोई नए टेपरिकॉर्डर, रेडियो या टीवी ले आते।

मेरे घर भी जब बाबा गांव आते तो लगता कि घर में बैंक आ गया है। अब सबके पास पैसे होते, साल भर से धरी रखी गईं सबकी इच्छाएं पूरी होतीं और परिवार में हर आदमी खुशहाल रहता। साल भर के इन दिनों में घर में सिर्फ एक ही मालिक होते, जो मेरे बाबा होते, बाकि सालभर कुछ चाचियां, चाचा, पिताजी और कई बार एक—दो दिन के लिए आए रिश्तेदार भी घर में मालिक जैसा रौब गांठते।

पर पटना जंक्शन पर उतरते ही बाबा का असर मेरे घर में दिखने लगता और अपने आप ही बड़ी तेजी से घर में सभी बाबा के मातहत हो जाते। पूरे घर में कंपटीशन हो जाता कि कौन बाबा का सबसे बड़ा हितैषी, उनकी अनुपस्थिति में उनके बताए मूल्यों पर चलने वाला, परिवार के लिए त्याग करने वाला और सबसे बढ़कर खुद को दस मुश्किलों में डालकर परिवार के लिए महायोगदान करने वाला है।

मैं अपने घर की तुलना अपनी कंपनी बॉस से कर पाता हूं। मैं देखता हूं जैसा मेरा घर था करीब—करीब वैसी ही मेरी कंपनी है और जैसे मेरे बाबा थे मेरा मैनेजर करीब—करीब वैसा ही है। यहां भी सभी इसी ताक में रहते हैं कि कैसे साबित करें कि उनसे बढ़कर कंपनी के लिए त्याग करने वाला कोई दूजा नहीं हुआ और मेरे घर में भी यही था।

उस समय मेरी उम्र करीब 13 रही होगी और आज जबकि मैं यह किस्सा बता रहा हूं मैं 35 का होने वाला हूं। घटना के करीब 20 साल बीतने के बाद मुझे बहुत कुछ उसी तरह याद है, जैसा वह घटा था।

मेरा घर गांव के कुछ अच्छे घरों में से एक था, जो रंगने के बाद किसी कोठी जैसा दिखता, इसलिए रोज कुछ बच्चे—बूढ़े हमारे घर की रंगाई देखने के लिए खड़े रहते। मैं भी उस रंगाई को देख रहा था तभी महेंद्र के चीखने, चिल्लाने और गालियां देने की आवाज आई थी। चूंकि बड़े इन गालियों के अभ्यस्त थे, एक—दूसरे को देते रहते थे, इसलिए उन्होंने ज्यादा ध्यान नहीं दिया, पर हम चार—पांच बच्चे एक साथ जहां से आवाज आ रही थी, पहुंच गए।

महेंद्र अपनी बीवी को अंधाधुंध मारे जा रहा था। कई बार मेरे बाबा गाय को ऐसे ही पीटते थे जब वह दूध पर लात मारकर बाल्टी गिरा देती थी। पगहे में बांधकर पीटी जा रही मेरी गाय पिटते वक्त चुपचाप खड़ी हो जाती थी और फिर बाबा अपने आप थककर बैठ जाते थे। बाद में गाय की चोट लगी जगहों पर दादी घी लगातीं और बाबा को कहतीं कि तुम्हें मरते वक्त कीड़े पड़ेंगे। पर बाबार हार्ट अटैक से एक मिनट में मर गए और सबने कहा कि अच्छे लोगों की मौत ऐसे ही होती है, जब वे चलते—फिरते यमराज के दरबार में पहुंच जाते हैं।

महेंद्र की बीवी के शरीर के कई हिस्सों से खून बह रहा था, पर वह ज्यादा रो नहीं रही थी। वह मेरी गाय की तरह चुपचाप पीटी जा रही थी। उसके मुंह से सिर्फ हूं—हूं की आवाज आ रही थी। ऐसी आवाजें मैंने जवान होने के बाद तब सुनीं, जब मेरा थानों में जाना हुआ। वहां थर्ड डिग्री के इस्तेमाल के बाद आरोपी इसी तरह की आवाज निकालते हैं, शायद उनमें चिल्लाने की ताकत नहीं बच जाती।

महेंद्र की बीवी मार का कोई विरोध भी नहीं कर रही थी। महेंद्र रह—रह कर अपनी बीवी को बाल पकड़कर नचा देता और हर बार हाथ में आए बालों को हिकारत से जमीन पर फेंक देता। इस बीच वह फिर उसे खड़े होने के लिए बोलता। फिर उसकी योनी में तेजी से हाथ मारता और बोलता — इतनी चढ़ी है तेरी जवानी रंडी... और फिर उसके चूतड़ पर कस के लात मारता और वह जमीन पर बेतरतीब हो गिरती।

महेंद्र जहां अपनी बीवी को मार रहा था वहां कभी—कभार मदारी वाले मजमा लगाया करते थे। दूसरे बच्चों ने बताया, महेंद्र अपनी बीवी को खेतों की ओर से मारते हुए लेकर आ रहा था।

इस बीच कई बड़े और महिलाएं आ गयीं। महेंद्र के घर से उसकी मां और पड़ोस की महिलाएं आ गयीं। उन्होंने उसको महेंद्र के हत्थे से छुड़ाया, कपड़े डाले। वह चलने की हालत में नहीं थी तो परिवार वाले किसी तरह ढककर उसे खींचते हुए ले जाने लगे। पर महेंद्र जिद पर अड़ा रहा। उसने उसे अपने घर नहीं जाने दिया।

कपड़ों से ढकी बीवी जमीन पर मरी गाय की तरह पड़ी हुई थी। दो—तीन महिलाएं उसे घेर के बैठे हुई थीं, कुछ महेंद्र को गालियां दे रहीं थी और बाकी लोग जानना चाह रहे थे हुआ क्या?

लोगों ने कहा कि तु तो आज खाने भी नहीं आया, फिर ये सब क्या? पड़ोस की महिलाओं ने धिक्कारते हुए बताया कि अभी घंटे भर पहले तो तेरी बीवी गयी ही थी तुझे खाने के लिए बुलाने फिर ऐसा क्या हो गया? ऐसा क्या कर दिया जो तुमने नंगा कर दिया, अब कहां मुंह दिखाएगी?

मुझे याद है कि मैंने पहली बार किसी महिला को नंगे देखा था। मैं बहुत देर तक नंगे शरीर को समझ नहीं पाया। मैंने योनी पहली बार देखी थी। आज मैं समझ पाता हूं कि वहां घने बाल थे। अन्यथा मुझे याद है मैंने अपने भाई को बताया था कि उसके मर्द ने पेट के नीचे बहुत तेज—तेज मारा था और वहां बिल्कुल काला हो गया था।

अबदतक गांव के दर्जनों लोग जुट गए थे। महेंद्र नथुना फुलाए मेरे घर के पीछे के ऊंचे पत्थर पर बैठा था। उसके चेहरे पर गर्व का भाव था और जैसे उसने कुछ जीत लिया हो। इस बीच कुछ मेरे कुछ पट्टीदार भी आ गए और मेरे चाचा लोग भी। वे लोग महेंद्र को मारने को हुए तो उसने खूंखार होते हुए बोला, 'रुक जाओ बाबूसाहब। आपके घर में ऐसा होता तो आप लोग घर में ही औरत को जिंदा गाड़ देते, चूं भी न होती।'

महेंद्र धोबी का आत्मविश्वास देख मारने वाले हाथ रुक गए। मामले की गंभीरता की भनक सबको लग गयी। तय हुआ पंचायत होगी। बच्चों, महिलाओं को हटाया गया। हम लोग भी हट गए पर बाद में जो पता चला वह कुछ यों था...

महेंद्र धोबी और गांव के एक चमार जाति के युवा हरिकिशुन ने किसी बाबूसाहब का खेत बटाई पर लिया था। खेत में उन्होंने बैगन की खेती की थी। बैगन जानवर चर सकते हैं या कोई चोरी कर सकता है, इसलिए कोई न कोई उसकी देखरेख करता था। दिन में महेंद्र देखता था और रात को दूसरा बटाईदार। रात को दूसरा बटाईदार इसलिए देखता था क्योंकि उसका घर खेत के बगल में ही था। देखरेख के लिए उन्होंने मचान बना रखा था।

दिन में महेंद्र की बीवी खाना बनाने के बाद खेत में आ जाती थी। फिर महेंद्र बीवी को खेत देखने के लिए छोड़कर खाने चला आता था। इस बीच करीब आधे घंटे महेंद्र की बीवी खेत में रहती। आज भी वह महेंद्र को खाने के लिए बोलने गयी थी। पर वह ताड़ गया था। उसने पंचों को बताया कि कई दिनों से उसे लग रहा था कि उसकी बीवी किसी के साथ फिट है।

तब पंचों में से किसी ने मजा लेते हुए पूछा था, 'लेकिन तुझे कैसे पता चला? हमें पता होता तो उतनी दूर कहां जाना पड़ता।'

महेंद्र बोला, 'मैं उसी दिन ताड़ गया था जिस दिन से यह मुझसे खेत में मिलने चिकनी—चुपड़ी होकर आने लगी थी। कुछ खिली—खिली रहने लगी थी आजकल। इसको उससे प्रेम जो हो गया था। मुझसे इसका काम नहीं चलता या मैं पूरा नहीं नहीं पड़ता न। तो आज मैं खाने के लिए जाने की बजाय बैगन के खेत में ही छुप गया।'

पंचों में से किसी एक ने पूछा, 'फिर।'

महेंद्र — फिर क्या। मैं जैसे ही छुपा, उसके पांच मिनट बाद मेरे साथ वाले बटाईदार हरिकिशुन चमार के साथ हुमाहुंच शुरू गया। लेकिन मैं भी पुराना खिलाड़ी। पूरा सबूत इकट्ठा करके ही वार करता हूं। देखता रहा पूरा तमाशा। उपर—नीचे का सारा खेल। जब सारा काम हो गया तो खेत से बाहर निकला। आग तो शरीर में ऐसे लगी थी कि सोचा पहले दरांती से एक ही बार में गला खच्च कर दूं इसका।'

तो किया क्या तुमने, जब वह चला ही गया तो?

महेंद्र — मैं बैगन के खेत से जैसे ही निकला ये बोली, बड़ी जल्दी आ गए आज आप। खाना नहीं खाए क्या। मैंने इसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया। और पूछा अभी क्या कर रही थी तुम। उसने कहा कुछ नहीं खेत देख रही थी।

बीवी के इतना बोलते ही मैं झट से उसकी ओर लपका और साड़ी उठाकर गच्च से उसकी योनी में हाथ डाल दिया। उसकी योनी वीर्य से लबालब थी। उसी लबालब हाथ से मैंने एक तमाचा उसे दिया और पूछा ये क्या है रांड।

जब एक पंच ने पूछा पर तुमने हरिकिशुन को रंगे हाथों क्यों नहीं पकड़ा।

महेंद्र बोला, उसको मैं पकडूं ही क्यों, जब मेरी बीवी ही उसके साथ अपने मन से सो रही है। इसलिए मैं इसको न अपने घर जाने दूंगा और न यह आज से मेरी बीवी है। मैं इसे जान से ही मारने वाला था तब तक आपलोग आ गए। तो बस मैं चाहता हूं यह मेरी जिंदगी से चली जाए।'

इसके बाद पंचों को फैसला हुआ। संस्कार, औरत धर्म और परंपराओं का हवाला दिया गया। महेंद्र की बीवी को हरिकिशुन चमार के साथ संबंध बनाने का दोषी मानते हुए उसे घर से बेदखल कर मायके आरा जिले के श्रीपालपुर भेज दिया गया। बीवी का मायका श्रीपालपुर ससुराल महाकमपुर से 3 किलोमीटर की दूरी पर था। सूचना देने के बाद मां—बाप आए और बेटी को लादपाद कर घर ले गए।

बिहार के आरा जिले का मेरा यह गांव महाकमपुर अब एक बेवफा बीवी से खाली हो चुका था। खाली होने की इस खुशी में और बाकी महिलाओं के सम्मान की रक्षा में हमारे गांव के सभी जातियों के मर्दों ने उस बेवफा बीवी का सर्वस्वीकार्य नया नाम 'चोदक्कड़ी' रखा। चोदक्कड़ी एक भोजपुरी शब्द है जिसका आशय संभोग की अति इच्छा रखने वाली औरत से है।

महेंद्र की बीवी को अब महेंद्र के नाम से पहचाने की जाने की जरूरत नहीं रह गयी। अब वह पूरे इलाके में चोदक्कड़ी के नाम से चर्चित हो गयी। आसपास के गांवों के चपल लौंडे उस गांव का नाम इसी नाम से पुकारने लगे तो कुछ संस्कारी लोग उस गांव का नाम लेने से पहले राम—राम कहने लगे।

संस्कारी समाज तो समभाव से संस्कारी है, इसलिए मायके ने भी महेंद्र की बीवी को लेकर ससुराल से ज्यादा फर्क नहीं रखा? मां—बाप ने अपनी इज्जत बचाते हुए बेटी को श्रीपालपुर की बारी में बसा दिया। महेंद्र की बीवी के पिता आमों के पेड़ खरीदने का काम करते थे, इसलिए उन्होंने एक मचान बनाकर बेटी को वहीं रहने के लिए छोड़ दिया।

हमारे महान सामाजिक संस्कार बताते हैं कि अपनी इच्छा से (अगर वह उसका पति नहीं है तो) किसी आदमी के साथ संभोग करने के बाद औरत खुला दरवाजा हो जाती है, जिसमें कोई भी घुस सकता है। चोदक्कड़ी के लिए भी यह नियम अपनाया गया। चोदक्कड़ी ने भी अपनी यही स्थिति मानी और वह चार गांवों श्रीपालपुर, डुमरिया, भोपतपुर और चनवा के बीच की इकलौती 'नगरवधू' बनी। जो स्त्री किसी एक को चुनी थी, उसको गांव के लोगों ने सबके लिए सौंप दिया, एक बीवी को गांव के संस्कारों, परंपराओं की रक्षा के लिए रंडी बना दिया।

ऐसे में गांव के लोगों ने सर्वसम्मति से एक रेट तय कर दिया। अब वहां जब जिसको जैसे मौका मिलता आता और अपने गांव के महान संस्कारों के मुताबिक चोदक्कड़ी के साथ संभोग कर चला जाता। यहां आने वालों में सभी जाति के लोग शामिल थे, पर जातीय वर्चस्व और उत्पीड़न यहां भी देखा गया। यहां भी ब्राम्हणों, राजपूतों ने अपना कब्जा रखा, दूसरी जातियों को कम ही मौका मिलता। चमार तो बिल्कुल प्रतिबंधित रहे, पर उन्हें हमेशा गुमान रहा कि पहला भोग तो हमारे ही वंशज ने लगाया है।

इन पंक्तियों के लेखक ने पूरी वारदात सुनने के बाद वारदात सुनाने वाले से पूछा, 'क्या औरत से भी इस बारे में पूछा गया कि हुआ क्या था, वह ऐसा क्यों कर रही थी या कुछ भी उसकी राय? इसके जवाब में उनका कहना था, 'इसमें पूछना क्या था, सबकुछ आइने की तरह साफ है। कोई और कहता फिर पूछने का मतलब बनता, लेकिन यहां तो उसका मर्द ही था जिसने रंगे हाथों पकड़ा था।'

मैंने फिर दोहराकर पूछा, 'कभी किसी ने कहा हो कि वह ऐसा बता रही थी या यह कह रही थी। ऐसी कोई भी बात जो उसने इस बारे में कही हो? अब तो 20 साल बीत चुके। एक बार अपराधी का भी पक्ष जानना चाहिए।'

उन्होंने और जोर देकर कहा, 'महाराज, कोई जरूरत होती तब तो। यहां क्या पूछना है। तय है कि वह अपराधी है।' (फोटो प्रतीकात्मक)

(इस लिखे पर किसी सुझाव, शिकायत के लिए हमें editorjanjwar@gmail.com पर मेल करें।)

Posted On : 09 10 2017 01:58:31 PM

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