Last Update : 07 05 2018 12:31:26 PM

दलित आंदोलन की रिपोर्टिंग बता देती है कितना जातिवादी है मीडिया

जनजीवन को दोनों बंद ने प्रभावित किया। एक बंद के जरिये अनुसूचित जाति एवं जनजाति को घेरे में लाया गया, जबकि दूसरे बंद में किसी को घेरे में नहीं लाया गया बल्कि सोशल मीडिया को इसके लिए दोषी बताया गया....

संजय कुमार का विश्लेषण

समाज, संप्रदाय और जनता से भेदभाव या पक्षपात करना यकीनन अपराध की श्रेणी में आता है। जब यह अपराध मीडिया करे तो सवाल उसके चरित्र पर उठना स्वाभाविक है। मीडिया ने कई ऐसे अवसर दिये हैं जिसमें अपराधी शब्द के आरोप से खुद विभूषित हुआ है। खबरों से खेलना और खबरों को अपने हिसाब से नचाते हुए पेश करना कई मीडिया के लिए कोई नई बात नहीं है।

धीरे-धीरे पीत पत्रकारिता ने अपनी पकड़ इतनी मजबूत बना ली है कि आम जनता भी उसके झूठ को सच मान लेती है। हां, जब कुछ स्वस्थ मीडिया इस झूठ पर से पर्दा हटाती है तो बाकी मीडिया के चेहरे को जनता पढ़ कर समझ लेती है। इससे एक दूसरे के चेहरे का बेनकाब होना और चरित्र अपराधी जैसा लगने लगता है।

मीडिया के भेदभाव, जातिवादी और अपराधी चेहरे को कई बार देखा गया है। इसका ताजा उदाहरण 2 और 10 अप्रैल के भारत बंद की खबरों के दौरान भी दिखा। बाबू वीर कुंवर सिंह, परशुराम, चन्द्रगुप्त मौर्य जैसे महापुरुषों की जयंती पर खबरों को लेकर जातीयता वाले चेहरे भी सामने आये, जो दुर्भाग्यपूर्ण है। अनुसूचित जाति एवं जनजाति के कई संगठनों ने भी बाबा साहेब भीम राव आंबेडकर की जयंती मनायी, लेकिन खबरें राजनीतिक रूप में ही आयी। अनुसूचित जाति एवं जनजाति के संगठन की खबरें दब गयी।

अच्छी बात है कि महापुरुषों की जयंती को भरपूर सम्मान दिया जाता है, दिया जाना भी चाहिये। लेकिन जाति रंग में दिया जाना और कवरेज भी उसी रूप में परोसना क्या उचित है? मीडिया ने कई दिनों तक खबरें छापकर जताने की कोशिश की कि हम इसके पोषक हैं और जात-पात के दायरे में ही है! लगातार कई दिनों तक खबरें दी जाती रहीं (संदर्भ के लिए पटना से प्रकाशित अखबारों को देखा जा सकता है-19 अप्रैल से कई दिनों तक)।

समाज के प्रति मीडिया का आपराधिक नजरिया भारत बंद में भी दिखा। पहले बात करते हैं दो अप्रैल की। अनुसूचित जाति एवं जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम में तत्काल गिरफ्तारी का प्रावधान हटाने के फैसले के विरोध में 2 अप्रैल को दलितों के भारत बंद का मीडिया आकलन सफलता-असफलता या दलितों के गोलबंदी पर कम, हिंसक पक्ष पर ज्यादा फोकस करते दिखा। मीडिया ने खबर को ऐसे छापा जैसे पहले कभी भारत बंद हुआ ही नहीं हो, न ही कभी घटनाएं घटी हों? खबरों के जरिये यह बताते नहीं थके कि दलित हिंसक होते है?

फेक न्यूज के आदेश और आदेश की वापसी के बीच भारत बंद के दौरान हिंसा में मरने वाले के आंकड़े भी भ्रम पैदा करते दिखें। किसी ने 14 मारे, किसी ने दस तो किसी ने आठ। मीडिया की यह गैरजिम्मेदाराना व्यवहार, उसे कटघरे में खड़ा करता है।

देश समाज की मठाधीशी करने वाला मीडिया ने दलितों के विरोध की कल्पना शायद नहीं की हो, तभी तो विरोध के हिंसक पक्ष को लेकर कई पेज रंग दिये, जबकि दलित उत्पीड़न के सवाल पर भारतीय मीडिया चुप्पी साध लेती है। भारत बंद में दलितों का आक्रोश बिहार में भी दिखा, बल्कि ज्यादा दिखा।

बंद पर मीडिया रिपोर्ट का आकलन किया जाये तो दोनों बंद के दौरान मीडिया का नजरिया अलग अलग दिखा। दोनों बंद में हिंसा, आगजनी, तोड़फोड़ हुई, लेकिन खबर परोसने के अंदाज में बदलाव दिखा। चलिये खबरों को ही देखते हैं। दैनिक जागरण ने दो अप्रैल के भारत बंद को चार पेज में समेटा और लीड में लिखा, ‘बिहार में राजनीतिक संरक्षण के चलते हिंसक हुआ भारत, बंद के दौरान हिंसा में 11 की मौत’। प्रथम पेज पर आधा पेज भारत बंद के नाम रहा। इसमें दो हेडलाइन बनी।

एक-'राजधानी की सड़कों पर भी दिखा उत्पात', दूसरा-'और 'बंद की भेंट चढ़ गया नवजात’। दूसरे पेज को बंद पर सियासत नाम दिया। लीड शीर्षक दिया, ’सदन में भी गूंजा भारत बंद, सात मिनट ही चली विधानसभा’। इस पेज पर छह फोटो के साथ लगभग पूरा पेज बंद से जुड़ी खबर पर टिका दिया। तीसरा पेज भी बंद की खबरों से पटा रहा। बंद के विभिन्न आयामों को नौ फोटो में समेटा गया।

बंद से जनजीवन के प्रभावित होने की खबर को यहां प्राथमिकता दी गयी। पेज नंबर 12 पर देशभर में बंद के दौरान हुई हिंसा को फोटो के साथ खबर बनाया और लीड दिया, ‘मप्र के ग्वालियर-चंबल संभाग में 7 की गई जान’, वहीं, दैनिक जागरण ने 10 अप्रैल के भारत बंद को ज्यादा तरजीह नहीं दी। पहले पेज पर लीड खबर नहीं बनायी। तीन नंबर पेज पर आगजनी की फोटो के साथ खबर छापी,‘बिहार में सोशल मीडिया वाला बंद असरदार’।

पृष्ठ चार पर सात तस्वीर बंद पर थी। लगभग आधे पेज पर खबर लगी थी। मात्र दो पेज में मामले को समेट दिया। अब बात दैनिक हिन्दुस्तान की करें तो दो अप्रैल के भारत बंद को इसने ने छह पेज में खबरों को परोसा। लीड शीर्षक दिया, ‘दलित संगठनों का विरोध हिंसक हुआ 10 की मौत’। बाकी पेज को बंद की खबरों से ऐसे पाट दिया जैसे अब कि तब उसका पेट फट जायेगा। इसने भी अनुसूचित जाति एवं जनजाति के बंद को जातीय उन्माद में आंदोलन को बताते हुए हिंसा पर ज्यादा फोकस किया। जबकि 10 अप्रैल को हल्के में लिया, संपादकीय लिखा। 2 अप्रैल पर कोई संपादकीय नहीं दिया गया।

हिन्दुस्तान ने पहले पेज पर कोने में चार कॉलम में आगजनी की फोटो के साथ खबर लगायी, ‘बिहार में बंद के दौरान फायरिंग, आगजनी’। इसने भी खबर को लीड नहीं बनाया। पेज चार पर छह तस्वीरों के साथ खबर दी। संपादकीय, ‘सोशल मीडिया का बंद ’ में अखबार ने चिंता जतायी कि सिर्फ सोशल मीडिया के जरिये भारत बंद हो सकता है, तो चिंता की बात है। उस माध्यम से, जहाँ सच से ज्यादा बड़ा कारोबार फर्जी खबरों का है। हिन्दुस्तान ने दो पेज पर ही भारत बंद की खबर दी। लेकिन जिस प्रमुखता से 2 अप्रैल की खबर दी उसकी तुलना में 10 अप्रैल की खबर नहीं के बराबर थी।

मीडिया की नजर में 2 अप्रैल का भारत बंद, प्रतिकार नहीं बल्कि हिंसा को बढ़ावा देने और देश-समाज को तोड़ने जैसा था। दैनिक भास्कर ने सात पेज पर खबर छापी दी ‘भययुक्त भारत-दलित संगठनों का भारत बंद 4 राज्यों में 14 की मौत’,। फोटो ऐसे छापा जैसे अमूमन सांप्रदायिक दंगों के दौरान छपती है। दूसरे पेज पर दस फोटो के साथ छापा, चौराहों पर बंद समर्थकों का कब्जा। तीसरे पेज के आधे पृष्ठ चार फोटो के साथ खबर दी गयी,‘ बंद समर्थकों के खिलाफ राजधानी में 26 एफआईआर, 35 गिरफ्तार। इसके अलावा अन्य पेजों पर भी बंद की खबरें थीं। यनी आंदोलन के पीछे राजनीतिक दल थे, इस आकलन के लिए अखबार को पुरस्कार देना चाहिये।

देखिये 10 अप्रैल के अखबार को, दूसरे भारत बंद को दूसरी लीड बनाया। जगह-जगह टेªन रोकने और दो गुट में झड़प की खबर, हिंसा करते भीड़ की तस्वीर देते हुए शीर्षक बनाया,’ भारत बंद के दौरान बिहार के शहरों में उपद्रव, फायरिंग’। जहां अन्य ने लिखा आरक्षण के खिलाफ भारत बंद, समर्थक उतरे सड़क पर वहीं भास्कर ने पेज चार पर खबर दी, ‘एससी-एसटी एक्ट में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के समर्थन में उतरे लोग, बंद समर्थकों ने की डीएम के काफिले पर रोड़ेबाजी, एसडीओ और एसडीपीओ की गाड़ियों पर भी किया हमला’।

दो अप्रैल के भारत बंद पर प्रभात खबर का नजरिया दूसरे पत्रों जैसा ही रहा। इसने खबर को लीड बनाया, ‘भारत बंद के दौरान हिंसा, नौ की मौत, बिहार में कई रेलवे स्टेशनों पर हुई तोड़फोड़’। दूसरे पेज पर पटना की ग्यारह तस्वीर लगायी। शीर्षक दिया,’ बंद से ठहर सी गयह राजधानी। तीसरा पेज पूरा बंद की भेट चढ़ा दिया गया। आगजनी की तस्वीर के साथ जन जीवन प्रभावित की खबर प्रमुखता से दी गयी। वहीं 10अप्रैल के भारत बंद को प्रभात खबर ने पहले पेज के लायक भी नहीं समझा। हां, अंदर खबरें भर दी। तीसरे पेज पर लीड बनाया, ‘भारत बंद का बिहार में रहा व्यापक असर, पुलिस फायरिंग,तोड़फोड़ और आगजनी’।

'भारत बंद के दौरान सड़क जाम में फंसी महिला की मौत’ खबर लालगंज से लगायी। पृष्ठ चार और पांच पूरी तरह से को बंद के हवाले अखबार ने किया। प्रभात खबर एक मात्र अखबार रहा, जिसने 10 अप्रैल के भारत बंद पर पूरे दो पेज दिए। तोड़फोड़, आगजनी और अस्त-व्यस्त जनजीवन पर कई तस्वीरें छापी। पेज छह एवं दस पर आधे में बंद की खबर दी। इस तरह से 2 और 10 अप्रैल के भारत बंद पर प्रभात खबर ने पांच-पांच पेज खबर परोस कर बैसेंस करने की कोशिश की।

राष्ट्रीय सहारा ने भी दो अप्रैल के भारत बंद को लेकर खूब परचम लहराया और लीड में लिखा,‘ देशव्यापी बंद ने ली 14 लोगों की जान’। इसने भी 7 पेज पर खबर दी। दूसरा पूरा पेज और तीसरे पेज आधा पर खबर परोसा गया। फोटो को भी लहराया गया। पृष्ठ 6,7,9 पर जहाँ खबरें रही, वहीं बंद में हिंसा की तस्वीर से पृष्ठ 15 को पाट दिया गया। पृष्ठ नौ पर खबरें हिंसक रही और ये शीर्षक भी, ‘भारत बंद के दौरान उपद्रव, तोड़फोड़ व आगजनी’, ‘मुजफ्फरपुर में अघेषित कफ्र्यू का रहा नजारा’, ‘गया में बच्चे भी उतरे सड़क पर’ एवं ‘बंद के दौरान वाहनों व साइकिलों पर बरसते रहे डंडे’।

वहीं 10 अप्रैल के भारत बंद को राष्ट्रीय सहारा ने असरदार तो बताया लेकिन नजरिया नहीं एक जैसा नहीं रख पाया। प्रधानमंत्री के बिहार आगमन की वजह से किसी ने लीड नहीं बनायी। राष्ट्रीय सहारा ने पांच पृष्ठ पर खबर छापी। पहले पेज के निचले हिस्से में बॉक्स में छापा, ‘पटना छोड़ अन्य जगहों पर असरदार रहा भारत बंद’। पेज दो पर बंद के नजारे को छह फोटो के साथ समेटा। एक ओर हिंसा करते फोटो दिया तो दूसरी ओर सूनी सड़के दिखाया। पृष्ठ छह और सात पर भारत बंद की खबरें छह फोटो के साथ दिया।

बंद के दौरान आगजनी, रेल रोकते और बंद कराते की तस्वीर दिखी और शीर्षक लगाया भारत बंद रहा असरदार, दुकानें स्वतः स्फूर्त बंद’। पेज 11 पर बिहार के जिलों में हिंसक घटनाओं को दिया गया। 2 अप्रैल के भारत बंद की तुलना में अखबार का नजरिया अलग था। पूरे पेज पर खबर नहीं दी गयी। न ही 2 अप्रैल के भारत बंद की तरह 10 अप्रैल के बंद के दौरान हुई हिंसा की तस्वीरों को एक अलग पेज पर दिया गया।

दो अप्रैल के बंद को आज ने लीड में छापा, ‘भारत बंद का व्यापक असर’। चार, पांच और सात पेज बंद की खबर से अटे-पटे थे। दूसरी खबरों को सांस लेने की जगह नहीं थी। बंद के दौरान हिंसा और जनजीवन की परेशानी की दास्तां थी। आज ने कुल चार पेज रंगे, जबकि 10 अप्रैल के बंद को आज ने जैकेट छापने की वजह से तीन नंबर पेज के निचले हिस्से में आगजनी की तस्वीर के साथ छापा, ‘भारत बंद का मिला जुला असर’ तीन कॉलम में छोटी सी खबर लगायी। 2, 3 एवं 7 पृष्ठ पर भी खबर लगी। शीर्षक लगाया, जातिगत आरक्षण समाप्त हो, गरीब सवर्णो को भी मिले लाभ’। इसने भी पूरा पेज नहीं दिया।

देश के दूसरे क्षेत्र की खबर नहीं दी गई, हालांकि आज ने भी संपादकीय लिखा, ‘फिर हिंसक ‘बंद’। संपादकीय में 2 और 10 अप्रैल के बंद की तुलना की गई और दोनों बंद के दौरान हिंसा की बात कहीं गयी। दोनों भारत बंद की खबरों पर पटना के अंग्रेजी अखबार भी हिन्दी के साथ रहे। दो से चार पेज में सब समेट दिया। दो अप्रैल के बंद पर द टाइम्स ऑफ इंडिया ने शीर्षक बनाया, ‘9 die as massive dalit protest across contry turns violent’,द टेलीग्राफ ने हेडलाइन बनाया, ‘8 dead as dalit anger erupts across states’, वहीं द हिन्दुस्तान टाइम्स ने ‘8 killed during bandh clashes’ शीर्षक बनाया।

10 अप्रैल के भारत बंद पर अंग्रजी अखबार भी हिन्दी के रास्ते पर चले। द टेलीग्राफ ने पृष्ठ 10 पर पांच फोटो के साथ खबर दी, minister faces brunt of frings bandh. वहीं द हिन्दुस्तान टाइम्स ने पेज 3 पर आगजनी और बंद कराते लोगों की चार फोटो के साथ शीर्षक लगा, ‘Clashes in Bihar,prohibitory orders at Ara’।

खैर, मीडिया ने 2 अप्रैल के भारत बंद को खूब छापा, जमकर छापा पूरे के पूरे पेज पर हिंसा की खबर फोटो के साथ आयी। किसी ने एक तो किसी ने दो-दो पेज पूरा झोंका। 10 अप्रैल की खबर पर केवल प्रभात खबर ने समान मापदण्ड अपनाया।

अंग्रेजी और हिन्दी अखबारों ने साबित कर दिया कि दलित हिंसक होते हैं। अखबारों के आकलन से साफ है कि बिहार की राजधानी पटना से छपने वाले सभी अखबारों ने दो अप्रैल के बंद में अनुसूचित जाति एवं जनजाति के गोलबंदी से डर कर धारदार शीर्षक बनाये। लेकिन हिंसा के पीछे के कारणों पर को फोकस नहीं कर पाये।

बयानों में अनुसूचित जाति एवं जनजाति के संगठनों ने हिंसा को नकारा भी। इस खबर को एक-आध ने ही छापा, वह भी अंदर के पेज में। चर्चे में यह खबरें भी आई कि अनुसूचित जाति एवं जनजाति के आंदोलन को बदनाम करने की पूरजोर कोशिश हुई थी। इस पर स्वस्थ मीडिया ने झांकने की कोशिश की और वह तस्वीर सामने आयी, जिसने बंद को बदनाम करने की पहल की।

इस नजरिये के पीछे अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लोग मानते हैं कि यह प्रमाणिक है कि देश का मीडिया सवर्णों के कब्जे में है और इसमें बिहार अछूता नहीं है। ऐसे में उन्होंने भी अनुसूचित जाति एवं जनजाति के विरोध को हिंसक स्वरूप देने में कोई कसर नहीं छोड़ी। देखा भी गया है कि बिहार में हुए जनसंहारों में अनुसूचित जाति एवं जनजाति को मारने वाले छूट जाते हैं लेकिन उस हिंसा पर कई पेज रंगे नहीं मिले थे।

अनुसूचित जाति एवं जनजाति के आंदोलन को भययुक्त करार दिया गया। किसी मीडिया ने अनुसूचित जाति एवं जनजाति के आक्रोश के सार्थक पक्ष पर कलम नहीं चलाई। चलाई भी तो आम भाषा में। अपने शीर्षक में मीडिया ने पूरा फोकस मरने वालों एवं हिंसा पर रुख बताने की पूरजोर कोशिश की कि इन सब के लिए अनुसूचित जाति एवं जनजाति ही जिम्मेदार है। नतीजा भी दिखा सोशल मीडिया पर घटना के लिए समाज का एक वर्ग अनुसूचित जाति एवं जनजाति को दोषी मानता दिखा।

अनुसूचित जाति एवं जनजाति के गोलबंदी और सड़क पर उतर कर विरोध जताने के एतिहासिक पहल से मीडिया के सभी माध्यमों पर पड़ा। मीडिया हाउस में जहां अनुसूचित जाति एवं जनजाति का दखल नहीं के बराबर है, ऐसे में द्विज तिलमिला उठे। कंप्यूटर के की बोर्ड उनके आक्रोशित शब्दों से दबाव महसूस करने लगे। जो अपने अखबार में नहीं कर सके, उन्होंने सोशल मीडिया पर आर्थिक आरक्षण का सवाल दे मारा।

बिहारी मीडिया ने पहली बार अनुसूचित जाति एवं जनजाति को इतना बड़ा कवरेज दिया। चाहे इसे नकारात्क रूप में ही क्यों न देखा जाये? वहीं आरक्षण के विरोध में हुए बंद को मीडिया ने असरदार, हिंसक, आगजनी वाला तो बताया लेकिन खबरों में वह तल्खी नहीं दिखी, जो 2 अप्रैल वाले में थी। जबकि घटनाएं दोनों भारत बंद में लगभग एक समान रहीं।

अनुसूचित जाति एवं जनजाति के प्रति मीडिया का यह नजरिया अपराधी सा दिखा। यह पहला अवसर नहीं है। यह अकसर होता है। सवाल उठता है कि क्या घटना को दो चश्मे से देखना स्वस्थ पत्रकारिता का पोषक है? अनुसूचित जाति एवं जनजाति के मुद्दे पर जैसे समाज बंटा दिखा वैसे ही मीडिया भी। 2 अप्रैल के बंद की खबर से अखबार ऐसा पटा था कि अन्य खबरों को सांस लेने की जगह नहीं थी। वहीं 10 अप्रैल के बंद की खबरों को ऐसे डाला गया जैस मामूली खबर हो। जनजीवन को दोनों बंद ने प्रभावित किया। एक बंद के जरिये अनुसूचित जाति एवं जनजाति को घेरे में लाया गया, जबकि दूसरे बंद में किसी को घेरे में नहीं लाया गया बल्कि सोशल मीडिया को इसके लिए दोषी बताया गया।

अनुसूचित जाति एवं जनजाति के प्रति मीडिया का यह कथित प्रेम सही मायने में दिखता तो बेहतर होता। रोजाना दलित उत्पीड़न की खबर को 2 अप्रैल की तरह परोसे तो दलित उत्पीड़न करने वाले बेनकाब होंगे। लेकिन मीडिया को अपने एजेंडे से फुरसत कहां? रोज रोज वहीं नेताओं के बयान दायें-बायें छापते रहते हैं।

हद तो यह है कि किसी आईएएस अधिकारी का वेतनमान बढ़ता है तो खबर बनती है, और जब नामी नेता के विधायक पुत्र अपनी शादी का कार्ड नेताओं को बांटने जाते हैं तो फोटो के साथ सभी मीडिया प्रमुखता से खबर बना डालता है। भारत बंद (2 और 10 अप्रैल 2018) पर मीडिया हर उस घटना की तरह बेनकाब हुई जैसे होती रहती है। खासकर प्रिंट मीडिया।

दुर्घटना आदि की खबर में अकसर यह पिट जाती है। ताजा उदाहरण 3 मई 2018 का है, बिहार के मुजफ्फपुर से दिल्ली जा रही एक बस के पलटने और आग लगने की घटना होती है। मीडिया मरने वालों की संख्या ऐसे बताती चली की जैसे उसकी कोई जवाबदेही नहीं हो। किसी ने 37 तो किसी ने 32 तो किसी ने 12 मार दिये, जबकि हादसे में एक भी आदमी नहीं मरा।

यही नहीं इस खबर के पीछे मीडिया ऐसे पागल हुई कि खबर के दायरे में आम-खास को भी ले लिया। प्रधानमंत्री का शोक संदेश ट्वीटर पर आया तो बिहार के मुख्यमंत्री व उपमुख्यमंत्री ने शोक में मौन भी रख दिया। खबर की पुष्टि किये बिना ऐसे परोसना अपराध है?

लोग मरे नहीं लेकिन मीडिया ने शव गिना दिये। शोक की लहर दौड़ाने पर मजबूर कर दिया। खबर से डराने के बाद जब खबर में मरने वालों की बात गलत साबित हुई तो माफी तक नहीं मांगी, बल्कि देश को धोखे में रखा। खबरों को डरावने अंदाज में पेश करना, जताता है कि मीडिया कहीं न कहीं से आपराधिक छवि की भूमिका में आ गयी है।

अब सवाल वहीं है मीडिया के चरित्र का। झूठ को सच और सच को झूठ बनाना। बिना पुष्टि के गलत खबर चला देना। घटना में कोई मरा या नहीं। लेकिन शव गिना देना, आदि-आदि। जाहिर है यह सब आपराधिक चरित्र साबित करता है?

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Posted On : 07 05 2018 12:31:26 PM

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