Last Update : 29 12 2017 11:56:41 AM

गोबिंदी को पक्का है आग एक बार फिर धधकेगी

सप्ताह की कविता में आज कुमारेन्‍द्र पारसनाथ सिंह की कविताएं

सड़क पर चप्पा खाकर मर जाने वाले पिल्ले/ मुझे आदमी से ज्यादा इन्कलाबी लगते हैं।/ ...उनके हिसाब में कम से कम क्यूबा या वियतनाम तो नहीं है (सूर्यग्रहण, 68)

चार दशक पूर्व मनुष्यता पर की गई इस उग्र टिप्पणी पर ध्यान दें, तो आज बहुत फर्क आया है क्या? आज आदमी मंगल पर जा चुका है। चाँद पर उसने पानी का पता लगा लिया है, अंतरिक्ष में वह लगातार छलाँगें लगा रहा है। पर इस धरती पर वह डग भर भी आगे बढ़ पा रहा है क्या? क्यूबा की जगह आज इराक है, म्‍यांमार है।

ऐसे में कोई कहाँ तक भाषा में आदमी होने की तमीज लाए। वह कुमारेंद्र की तरह क्यों नहीं बौखलाए - कविता घेराव में किसी बौखलाए हुए आदमी का संक्षित एकालाप है। क्यों नहीं वह आदमी और कुत्तों-भेडि़यों का फर्क मिटा दे। यहाँ 19वीं सदी के अमेरिकी दार्शनिक थोरो का कहना कितना सरल लगता है - ‘मेरा विचार है कि आदमी अपने पशुओं का उतना स्वामी नहीं होता जितना पशु उसके स्वामी बन जाते हैं और आदमी की अपेक्षा वे कहीं अधिक स्वतंत्र होते हैं।’ हाँ, आदमी अपने अंदर के पशु का गुलाम तो है ही, तभी तो बराबर हिंसा और आत्महिंसा का ग्राफ ऊपर बढ़ता जा रहा है।

हिन्दी कविता में आत्मालोचना का इतना तीखा स्वर मुक्तिबोध के बाद ऐसी सफाई से कुमारेन्द्र पारसनाथ सिंह में ही मिलता है - इसलिए एक बात साफ है/ कल कोई युद्ध नहीं होगा /आदमी तंग आकर अपना आइना तोड़ देगा। /और जो उससे भी चैन नहीं मिला /तो जाकर जानवरों के बीच रहना शुरू कर देगा…/फिर से कोई नई भाषा सीखेगा... अपने समय की तमाम विभीषिकाओं की बहुत साफ पहचान है कुमारेंद्र में इसलिए उनका एकालाप भी या तो बहुत उग्र है या फिर बुदबुदाहट है।

मैं कविताएँ लिखता नहीं बुदबुदाता हूँ गालियाँ - श्रीकांत वर्मा ने भी लिखा है पर वर्मा जी कभी उग्र नहीं होते। शायद उन्हें अपने समय की पहचान थी। इस सभ्यता के हत्यारेपन को वे रघुवीर सहाय की तरह पहचानते थे- ...भड़ककर जो उग्र हो उसे मार देती है। हत्यारी सत्ता के सामने जब असहाय पड़ते हैं कुमारेंद्र तो उनकी उग्रता बुदबुदाहट में बदल जाती है। यह लाचारी नहीं भय को ताकत में बदल डालने की कला है - उसे कोई भय नहीं कि उसे मालूम है, लोग सिर्फ चिल्लाते हैं अपना चिल्लाना... 

कुमारेंद्र ने अगर किसी का सर्वाधिक प्रभाव ग्रहण किया है तो वह हैं मुक्तिबोध। ‘सूर्यग्रहण’ एक तरह से ‘अंधेरे में’ की पुनर्रचना है। ग्रहणों का अंत होता है और कविता भी इसी विश्वास के साथ समाप्त होती है- ...मैं समझता हूँ अंधेरे का अंत समीप है। आइए पढते हैं कुमारेन्‍द्र पारसनाथ सिंह की कविताएं —कुमार मुकुल

राम ओर राम के बीच
राम और राम के बीच गायब राम ही होता है,
लड़ता रह जाता है नाम उसका। भीतर से ताला
बंद कर लेता है अल्ला और ईसा बाहर सूली
पर चढ़ता है। नदी पर बांध देने वाला घुटने भर
पानी में डूबता है, अपने आप टूटता पहाड़ तोड़ने वाला।
और जो नया-नया रास्ता निकालता है, टकराता जा
रहा है दिशाओं से- हदों से, रास्ता अपना बंद कर
लेता है, घुटता है मन के अंधेरे में सूरज जबकि
ठीक उसके सर पर चमकता है। आदमी जहाँ आदमी
नहीं रह जाता, सबसे बड़ा शत्रु पहले आदमी का
होता है। वैसे आदमी कभी कम नहीं था किसी से,
कम नहीं है। मगर आदमी, आदमी वह कहाँ है?

वह नदी में नहा रही है
वह नदी में नहा रही है
नदी धूप में
और धूप उसके जवान अंगों की मुस्‍कान मे
चमक रही है।
मेरे सामने
एक परिचित खुश-बू
कविता की भरी देह में खड़ी है
धरती यहां बिल्‍कुल अलक्षित है-
अंतरिक्ष की सुगबुगाहट में
उसकी आहट सुनी जा सकती है।
आसमान का नीला विस्‍तार
और आत्‍मीय हो गया है।
शब्‍द
अर्थ में ढलने लगे हैं।
और नदी
उसकी आंखों में अपना रूप देख रही है।
आसमान के भास्‍वर स्‍वर उसके कानों का छूते हैं,
और वह गुनगुना उठती है।
उसके अंदर का गीत
(एक नन्‍हा पौधा)
सूरज की ओर बांहे उठाए लगातार बढता जा रहा है।

हरिजन टोली
हरिजन टोली में शाम बिना कहे हो जाती है।
पूरनमासी हो या अमावस
रात के व्यवहार में कोई फ़र्क नहीं पड़ता।
और जब दिन के साथ चलने के लिए
हाथ-पैर मुश्किल से अभी सीधे भी नहीं हुए रहते,
सुबह हो जाती है।

कहीं रमिया झाड़ू-झंखा लेकर निकलती है
तो कहीं गोबिंदी गाली बकती है।
उसे किसी से हँसी-मजाक अच्छा नहीं लगता
और वह महतो की बात पर मिरच की तरह परपरा उठती है।
वैसे, कई और भी जवान चमारिनें हैं,
हलखोरिनें और दुसाधिनें हैं,
पर गोबिंदी की बात कुछ और है-
वह महुवा बीनना ही नहीं,
महुवा का रस लेना भी जानती है।

उसका आदमी जूता कम, ज़्यादातर आदमी की जबान
सीने लगा है। मुश्किल से इक्कीस साल का होगा,
मगर गोबिंदी के साल भर के बच्चे का बाप है।
क्या नाम है?- टेसू! हाँ, टेसुआ का बाप
गोबिंदी टेसुआ और उगना के बीच बँटी है
मगर टेसुआ के करीब होकर खड़ी है।

उस बार टोले के साथ-साथ उसका घर भी जला दिया गया था,
और फगुना के बच निकलने पर
उसका एक साल का बालू आग में झोंक दिया गया था।

इस बार गोबिंदी टेसू को लेकर अपने उगना पर फिरंट है,
पर उगना कुछ नहीं सुनता
दीन-दुनिया को ठोकर मार दिन अंधैत देवी-देवता पर थूकता है,
बड़े-बड़ों की मूँछें उखाड़ता-फिरता है-
और लोगों को दिखा-दिखाकर आग में मूतता है।

गोबिंदी को पक्का है :
आग एक बार फिर धधकेगी,
और उसके टेसू को कुछ नहीं होगा-
सारी हरिजन टोली उसकी बाँह पकड़ खड़ी होगी,
और उस आग से लड़ेगी।

जनपक्षधर पत्रकारिता को सक्षम और स्वतंत्र बनाने के लिए आर्थिक सहयोग दें। जनज्वार किसी भी ऐसे स्रोत से आर्थिक मदद नहीं लेता जो संपादकीय स्वतंत्रता को बाधित करे।
Posted On : 29 12 2017 11:56:41 AM

संस्कृति