Last Update : 04 11 2017 03:51:31 PM

मां ने कहा, तु उसके साथ क्या करेगी जिसका दिल ही तेरे लिये नहीं धड़कता

यह मेरी जिंदगी का अजब संयोग था कि जब दादी ऐसा कर रही थीं, मेरी मां बहन की मौत की खबर सुनने पर लखनऊ से वहां पहुंच गईं और उन्होंने झटके से मुझे छीन लिया...

'मेरे जीवन में मेरी मां' कॉलम में इस बार लखनऊ से हेमलता वर्मा

जनज्वार का 'मेरे जीवन में मेरी मां' पढ़कर अपनी मां की सूरत आंखों के आगे नाचने लगी। मेरी मां, जिनकी 15 साल पहले ब्रेम हेमरेज से 58 साल की उम्र में मौत हो गई थी। हां, मुझमें वो हमेशा जिंदा हैं। जैसे सांस लेती हैं मुझमें वो।

मां ने मुझे अपनी कोख से जन्म नहीं दिया था। मैं उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जनपद के एक छोटे से गांव में जन्मी थी। मुझे मां की छोटी बहन ने पैदा किया था, जिनकी मेरे जन्म के तीसरे दिन ही मौत हो गई थी। घर में सभी लोग पिता सहित यही दुआ कर रहे थे कि मैं भी मर जाऊं, जब मुझे जन्म देने वाली मेरी मां की मौत हुई थी, तो मेरी दादी ने तो मेरा गला तक दबाने की कोशिश की, जिससे कि जन्मदात्री के कफन के साथ मुझे भी लपेट के मुझसे मुक्त हो जाएं।

पर यह मेरी जिंदगी का अजब संयोग था कि जब दादी ऐसा कर रही थीं, मेरी मां बहन की मौत की खबर सुनने पर लखनऊ से वहां पहुंच गईं और उन्होंने झटके से मुझे उनसे छीन लिया। घरवालों का मेरे प्रति रुख और बर्ताव देख मां इतना आहत हुईं कि उल्टे पैर मुझे अपने साथ उठाकर ले गईं। फिर कभी मैंने उस घर का रुख नहीं किया और न ही मेरी मां ने करने दिया, जो मेरी मौत की दुआ मांग रहा था। या कहूं कि वो टाइम से वहां नहीं पहुंचती तो शायद आज मैं यहां यह बताने के लिए नहीं होती।

मां बाद में बताती थीं कि जब तुझे लेकर वापस लखनऊ आ रही थी तो तेरे लिए दूध तक नहीं था और तू भूख के मारे लगातार चिल्ला रही थी। किसी तरह चीनी का पानी पिलाकर मुझे जिलाते हुए वे लखनऊ पहुंची थीं। अपनी जान लगा दी थी मां ने मुझे जिलाने के लिए, क्योंकि वापस आने पर मैं गंभीर रूप से बीमार हो गई थी।

बहुत हिम्मत वाली थी मेरी मां। मेरे पिता सब्जियों का ठेला लगाते थे और मां दाई का काम करती थी। बहुत मशहूर थीं मां अपने मोहल्ले में। बच्चे—बूढ़े सब उन्हें अच्छी तरह जानते थे। हर महिला दुआ करती थी कि उसकी डिलीवरी मेरी मां यानी शकुंतला देवी के हाथों से हो।

रोजी—रोटी के जुगाड़ और कुछ उनकी सामाजिक प्रवृत्ति के चलते मां दिन—रात खटती रहती थी। कोई भी मदद के लिए पुकारता तो मां एक पैर पर खड़ी हो जातीं। पिता बहुत सीधे थे। उनके सब्जी के ठेले से बमुश्किल घर का खर्च चल पाता।

हां, एक बात तो मैं मां के बारे में बताना ही भूल गई, जब वो मुझे अपने पास लेकर आईं तो उनकी शादी को मात्र सालभर का वक्त बीता था। उनके ससुराल में मुझे लेकर आने का बहुत विरोध हुआ, कहा कि अपने बच्चों पर कैसे ध्यान दे पाओगी। मां ने जब यह सुना तो प्रण कर लिया कि वो कोई बच्चा ही पैदा नहीं करेंगी। हां, पिता ने उनके इस निर्णय में उनका साथ जरूर दिया था। पिता ने भी मुझे कभी ऐसा महसूस नहीं होने दिया कि मैं उनकी औलाद नहीं हूं। मां के ससुराल वाले उनसे मुझे लेकर आने पर खासा नाराज थे, उन्हें घर और संपत्ति से अलग कर दिया गया था। पिता को भी इसका कभी कोई अफसोस नहीं हुआ, न ही उन्होंने जाहिर किया।

रोजी—रोटी के संघर्ष और अपनी गृहस्थी को बेहतर तरीके से चलाने के लिए ही उन्होंने दाई का काम सीखा था, जिसमें वो बाद में पारंगत हो गई थीं। मां खुद पढ़ी—लिखी नहीं थीं, न ही पिता ही पिता ने पढ़ाई की थी। मगर उनकी आंखों में मुझे लेकर हजारों सपने तैरते थे। हम जिस घर में रहते थे वहां से स्कूल खासी दूरी पर था, मगर मां मुझे लेने और छोड़ने खुद जाती थी। अभावों के बीच में भी वो हरसंभव कोशिश करती कि मुझे हर सुविधा मिले।

मेरी आठवीं तक की पढ़ाई बहुत अच्छे से संपन्न हुई। इसी साल पिता को टीबी ने जकड़ लिया, और हमारा घर उनकी बीमारी से तबाह हो गया। मां ने जो थोड़ी—बहुत बचत मेरे भविष्य के लिए की थी, उनके जेवर, इस बीच वो जो एक जमीन का टुकड़ा खरीद चुकी थीं, सब पिता की बीमारी में चला गया और पिता भी। मेरे सर से 13 साल की उम्र में पिता का साया उठ चुका था। मां भी बुरी तरह टूट गई पिता की मौत से।

इस बीच मां ने दाई वाला काम लगभग छोड़ दिया। अब मेरे सामने सवाल खड़ा हो गया था कि घर खर्च कैसे चले। पढ़ाई का सपना तो सपना ही रह गया था। पास के एक प्राइवेट स्कूल में मैंने पढ़ाना शुरू कर दिया, और शाम को बगल वाली आंटी से सिलाई सीखना शुरू कर दिया। इस तरह एक साल बीत गया, अब मुझे सिलाई भी आ चुकी थी तो स्कूल की नौकरी छोड़ एक फैक्ट्री में काम करना शुरू कर दिया। अब तक मां पिता की मौत से थोड़ा उबर चुकी थीं।

पिता की मौत को भुला मेरे भविष्य की चिंता कर रही थीं। उन्हें चिंता थी कि उनकी बेटी पढ़ाई करे। मां ने मेरे नौकरी करते हुए ही मेरा दसवीं का प्राइवेट फॉर्म जबर्दस्ती भरवाया। फैक्ट्री में काम करते हुए मैं बीमार पड़ गई, वहां के कपड़ों की धूल से मुझे एलर्जी हो गई थी। मां ने नौकरी छुड़वा दी। फिर से मां अपनी पुरानी रौ में लौट चुकी थीं। वो मुझसे कहती कि मैं सिर्फ अपनी पढ़ाई पर ध्यान दूं। इस तरह मैंने 10वीं पास कर ली। अब मैं 16 साल की हो चुकी थी। मां को मेरी शादी की चिंता सताने लगी थी, हालांकि वो यह भी चाहती थी कि मैं पढ़—लिखकर अपने पैरों पर खड़ी हो जाऊं, मगर आस—पड़ोस के लोगों के तानों, सिर से पिता का साया उठ जाने के बाद वो मेरे हाथ पीले कर निश्चिंत भी होना चाहती थीं।

पड़ोस में रहने वाली चाची ने अपने भतीजे का रिश्ता बताया, जिसकी बिजली विभाग में नौकरी तभी लगी थी, तो मां को लगा कि मेरी बेटी की जिंदगी संवर जाएगी। उन्होंने बिना ज्यादा जांच—पड़ताल के मेरा रिश्ता तय कर दिया। खैर, शादी कर दी गई मेरी। शादी के बाद पता चला कि मेरा पति अपनी भाभी की बहिन से शादी करना चाहता था, मगर उनकी मां चूंकि उस लड़की को पसंद नहीं करती थी तो शादी नहीं होने दी गई।

पति शादी के बाद भी अपनी भाभी की बहिन को ही दिलोजान से प्यार करता था। शुरुआत मैं तो मैंने मां को कुछ नहीं बताया, मगर जब सालभर बाद लोग किसी खुशखबरी को लेकर सवाल करने लगे तो मैंने रोते हुए मां को बताया कि पति से मेरा कोई शारीरिक संबंध नहीं है। अपनी भाभी की बहिन के साथ वो पत्नी के रिश्ते को जीते हैं। घर में भी एक मौन स्वीकृति ही थी उन दोनों के रिश्ते को लेकर।

यह सुनकर मेरी मां पत्थर हो गईं। कहां तो उन्होंने मेरे सुनहरे भविष्य की कामना कर मुझे ब्याहा था उस घर में, मगर असलियत सुनकर वो मेरे भविष्य के लिए और ज्यादा चिंतित हो गईं। अब मैं नाममात्र की ब्याहता थी, क्योंकि पति शादी का रिश्ता किसी और से निभा रहा था।

खैर, उन्होंने मेरे पति को घर बुलाया और उससे इस सिलसिले में बात की। जब पति ने मां से माफी मांगते हुए कहा कि मैं दिल से अपनी भाभी की बहिन को पत्नी मान चुका हूं और हम दोनों उस रिश्ते को जीते हैं, तो मां मेरे भविष्य को लेकर एक निर्णय ले चुकी थीं। उनका कहना था कि जब तक कोई आपको दिल से नहीं स्वीकारे, तब उस रिश्ते को सिर्फ समाज को दिखाने के लिए निबाहने का कोई फायदा नहीं। मां की सहमति से शादी के सिर्फ डेढ़ साल बाद मेरा तलाक हो चुका था और मेरे पति की अपनी भाभी की बहिन से शादी।

अब मां एक ऐसी मां थीं जिसकी जवान तलाकशुदा बेटी घर में बैठी थी। डिप्रेशन में चली गई थी मैं इस घटना के बाद, मगर मां की कोशिशों के बाद मैं नॉर्मल हुई। मां ने मुझे दोबारा से पढ़ाई के लिए प्रोत्साहित किया, मेरा बारहवीं का फॉर्म भरवाया। मैं दोबारा से नौकरी करने लगी। सुबह स्कूल में पढ़ाने जाती और शाम को कपड़े सिलने का काम करती। इसी तरह चल रही थी मेरी जिंदगी। अब मैं मां की कोशिशों से बीए कर चुकी थी।

इस बीच मां ने एक घर खरीद लिया था। अब हम अपने घर में थे। मां दुगुनी मेहनत से काम करने लगी थी, क्योंकि घर खरीदने के लिए उसने कर्ज जो लिया था। वो चाहती थी कि अगर उसे कुछ हो जाए तो कम से कम मेरे सिर पर एक छत तो हो और मैं अपने पैरों पर ढंग से खड़ी हो जाउं। मेरे भविष्य की चिंता उसे खाए जाती थी। मैंने सरकारी नौकरी के लिए प्रयास शुरू कर दिए थे। मां खुद सरकारी नौकरियों के आवेदन पत्र लेकर आतीं, उन्हें भरवातीं। 21 साल की होते—होते मेरी एक बैंक में नौकरी लग गई।

मां फिर से मेरा घर बसाना चाहती थी, पर मैं इसके सख्त खिलाफ थी। क्योंकि मैं जिस अनुभव से गुजरी थी, वह तोड़कर रख देने वाला था। शादी से नाम से ही चिढ़ने लगी थी मैं। इस बीच मां ने सरकारी अध्यापक विजय वर्मा को मेरे लिए पसंद कर लिया। अनाथ विजय से मां को खासा लगाव और विशेष सहानुभूति थी, और विजय भी मां को बहुत मानते थे।

मेरे लाख मना करने के बावजूद मां शादी के लिए अड़ गईं। वो बार—बार कहतीं कि अगर मुझे कुछ हो गया तो तुम्हारा क्या होगा, कौन होगा तुम्हारा सहारा। मेरी चिंता उन्हें खाए जाती थी। खैर, विजय वर्मा से मेरी शादी कर दी गई।

विजय वाकई बहुत सुलझे हुए इंसान थे, मां को बहुत पसंद करते थे। किराए के कमरे में रह रहे विजय को किसी तरह मां घर में रहने को राजी कर पाई। अब मैं और विजय मां के साथ थे। पहली बार जिंदगी कुछ खुशनुमा नजर आने लगी थी।

दो साल बाद में एक बेटी की मां बन चुकी थी। उसके पांच साल बाद एक बेटा हुआ। मेरा संसार अब पूरा हो चुका था मां की बदौलत, मगर वक्त ने तो अभी शायद मेरी मां और मेरे और इम्तहान लेने थे।

बेटी 10 साल की हुई तो पता चला कि उसे कैंसर हो गया। मां की जान बसती थी गुड्डी में। कलेजे पर लगाकर घूमती उसे। कहां—कहां नहीं गई उसे मां, हर मजार, मंदिर, हॉस्पिटल जो जहां कहता हम उसे लेकर जाते, मां साथ—साथ जाती। 2 साल तक हर दर पर भटकने के बावजूद गुड्डी नहीं बची। मैं बुरी तरह टूट चुकी थी, मां भी। मगर वो अब भी मेरा संबल थी। मैंने तो बेटे की तरफ भी देखना छोड़ दिया था। पागलों जैसी हालत थी, मां ही घर संभालती, बेटे को भी।

मुझे नहीं पता था मां के रहते हुए कि कब घर में कौन सा काम हो रहा है, घर कैसे चल रहा है। गुड्डी की मौत एक हादसा थी जिंदगी का, जिसे ताउम्र नहीं भूल पाउंगी। मां नहीं होती तो शायद मर गई होती मैं भी तब। खैर, उतार—चढ़ाव भरी जिंदगी चलती रही। नानी के हाथों पला—बढ़ा बेटा जयंत अब 25 साल का हो गया है।

जब जयंत 10 साल का था, मां एक दिन उसके कपड़े धोकर बाथरूम से निकल रही थीं कि फिसल गईं। सिर पर गहरी चोट आई उसके, ब्रेन हेमरेज हो चुका था। मात्र 2 दिन के भीतर वो हमें छोड़कर जा चुकी थीं। मगर मुझमें अब भी वो जिंदा हैं, मुझे जीने और हर मुश्किल से लड़ने की ताकत देती हुईं।  (फोटो प्रतीकात्मक)

Posted On : 02 11 2017 04:46:26 PM

जनज्वार विशेष