Last Update : 03 11 2017 05:55:23 PM

गुजरात में मोदी जी की नींद किसी और ने नहीं 'विकास' ने उड़ा रखी है

राष्ट्रवाद के नाम पर कुलीन हिन्दुत्व और पूँजीपति गठजोड़ को समृद्ध करना तथा कमजोर पिछड़े व दलितों को मुस्लिम विरोध की भांग खिलाकर कर्मकाण्ड में व्यस्त रखना संघ का एजेण्डा रहा है...

शशांक यादव
एमएलसी, उत्तर प्रदेश

प्रधानमंत्री मोदी जी एक बार फिर जुमलेबाजी में महारत हासिल करते दिखे। गुजरात चुनावों में विकास के पागल होने के सोशल मीडिया के आक्रमण से परेशानी महसूस करते ही उन्होंने आक्रमण का नया मोर्चा खोला और गुजरात का चुनाव वंशवाद बनाम विकासवाद पर लाने की जोरदार कोशिश जारी है, लेकिन इसी के साथ उन्होंने एक बहुत महत्वपूर्ण बहस को भी जन्म दे दिया।

यह सही है कि लोकतंत्र में राजा रानी के पेट से पैदा नहीं होता है और हर लोकतांत्रिक इकाई यही चाहती है कि नेतृत्व में बहुमत की राय का प्रभाव हो। लोकतंत्र कब भीड़तंत्र में बदलता है, इसके उदाहरण पूरी दुनिया में फैले हैं। नेता कब देवता का रूप ले लेता है, पता ही नहीं चलता है। मीडिया प्रचारतंत्र और व्यक्तित्व का मोहपाश ऐसा मायाजाल रचना है कि तर्क पीछे छूट जाता है।

गुजरात चुनावों के संदर्भ में यह मजेदार ढंग से सामने आ रहा है। कांग्रेसी सेना को संजीवनी गांधी परिवार से ही मिल पाती है, यह फिर साबित हो गया। राहुल गांधी के आक्रामक होते ही कांग्रेस में दम नजर आने लगा।

दूसरी तरफ भाजपा नमो बुद्धाय की तर्ज पर नमो-नमो करते मोदी जी चालीसा पढ़ने पर मजबूर हो गयी। पहली बार मोदी जी खुद 22 साल के भाजपा शासन के बाद खुद राज्य चुनावों में प्रत्याशी नहीं हैं। 22 साल के अपने कार्यकाल की जिन उपलब्धियों को वो गुजरात मॉडल के रूप में प्रचारित कर रहे थे, वह एक के बाद एक करके जमीन पर औंधे मुँह गिरकर साबित कर रही हैं कि सिर्फ बड़े पूँजीपतियों की रक्षा करने के लिए विकास का जुमला गढ़ा गया।

टाटा की नैनो कार को हजारों करोड़ रुपये की राजकोषीय सहायता ऋण चर्चा में है तो दूसरी तरफ छोटे व्यापारियों का गुस्सा आसमान पर है। युवा बेरोजगारी का दंश झेल रहा है। नोटबन्दी, जीएसटी, गिरती अर्थव्यवस्था, कुपोषण, सीमा उल्लंघन, चीन की हेकड़ी व उना का दलित उत्पीड़न, सब जनता में चर्चा का विषय बन चुके हैं। युवा आक्रोश जिग्नेश, अल्पेश और हार्दिक के रूप में ज्वालामुखी बन रहा है।

ऐसे माहौल में मोदी जी ‘मैं गुजरात हूँ, मैं विकास हूँ’ का नारा दे रहे हैं। कांग्रेस नेतृत्व को वंशवाद का प्रतीक बनाया जा रहा है, लेकिन हजारों साल पहले प्लूटो की अवधारणा थी, जो पहले रिपब्लिक, फिर दि लाॅज और अन्त में स्टेट्समेन के रूप में सामने आयी, जिसके जरिए प्लूटो यही कहना चाहते थे कि जनता की भलाई में यकीन रखने वाला तानाशाह ज्यादा फायदेमन्द होता है।

राहुल बनाम मोदी जी की बहस में यह तो स्पष्ट है कि राहुल के साथ गाँधी परिवार की विरासत, शहादत और आपातकाल सब जुड़ा है, लेकिन एक दोष से कांग्रेस मुक्त है कि उसने भाजपा से कभी हाथ नहीं मिलाया है।

दूसरी तरफ विकासवाद का नारा देने वाले मोदी जी मन की बात करते-करते पार्टी और संगठन से दस फुट ऊपर खड़े हो चुके हैं। यशवन्त सिन्हा के लेख के बाद जबर्दस्त दबाव में आयी भाजपा सिर्फ मोदी जी नाम पर भरोसा कर रही है।

भाजपा का नेतृत्व कार्यकर्ताओं के बीच से आता है, लेकिन जिस आरएसएस की जमीन से पौधा पनप रहा हो, उसके भूत, वर्तमान और भविष्य की भी जनता में जानकारी होती है। राष्ट्रवाद के नाम पर कुलीन हिन्दुत्व और पूँजीपति गठजोड़ को समृद्ध करना तथा कमजोर पिछड़े व दलितों को मुस्लिम विरोध की भांग खिलाकर कर्मकाण्ड में व्यस्त रखना संघ का एजेण्डा रहा है।

दूसरी तरफ कांग्रेस का बैंक राष्ट्रीयकरण, मनरेगा, सूचना का अधिकार, ग्रामीण विकास, योजना आयोग और संस्थागत लोकतंत्र कांग्रेस के अन्दर चल रहे समाजवादी विचारधारा के जिन्दा रहने के सबूत हैं।

भ्रष्टाचार के आरोपों ने कांग्रेस को कलंकित किया, लेकिन कांग्रेस के खिलाफ कांग्रेस के चुने हुए अधिकारी सीवीसी, सीएजी और चुनाव आयोग के कांग्रेस पर हमले होते रहे, और संस्थायें जिन्दा रहीं।

दूसरी तरफ पूँजीपतियों का एजेण्डा ढो रही भाजपा ने पहले योजना आयोग को खत्म करके संघीय ढांचे पर चोट पहुँचायी। चुनाव आयोग का गुजरात नाटक पूरी दुनिया देख रही है।

रिजर्व बैंक की स्वायत्तता रघुराम राजन को हटाकर उर्जित पटेल के जरिए नोटबन्दी के निर्णय से घायल की गयी मीडिया पर नियन्त्रण, पत्रकारों की हत्या पर खामोशी, प्रस्तावित श्रम कानून और राजस्थान में प्रेस सेंसर बिल साबित कर रहे हैं कि राष्ट्रवाद और धर्म की आड़ में पूँजीवादी एजेण्डा चल रहा है और प्रधानमंत्री भी कहीं न कहीं बड़े पूँजीपतियों के पैरोकार दिखाई पड़ते हैं।

ऐसे में भारतीय मतदाता, जिसके लोकतंत्र का विकास 90 साल के गहन भाईचारे पर आधारित साम्प्रदायिकता विरोधी, राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन द्वारा हुआ है और हिन्दू महासभा और आरएसएस के अंग्रेज प्रेम को आम जनता देख चुकी है।

जिस जनता का चिंतन सूर, तुलसी, कबीर और रहीम जैसे युग पुरुषों की छाया में हुआ हो, वह साम्प्रदायिकता बनाम भाईचारे की लड़ाई में आसानी से कट्टर बनने वाला नहीं है। वंशवाद में लाख बुराई हमें उसका डीएनए मालूम होता है, ठीक उसी तरह जैसे लोकतंत्र के नाम पर तानाशाही की ओर बढ़ रहे मोदी जी जी की भाजपा व आरएसएस से केमेस्ट्री का डीएनए अब गली-गली दिख रहा है।

मुद्दा सामाजिक न्याय, भाईचारा और साम्प्रदायिकता विरोध के साथ पूँजीपतियों के चंगुल से आजादी का है, जिसे गुजरात समझ भी रहा है और रास्ता भी दिखा रहा है।

Posted On : 03 11 2017 05:55:23 PM

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