Last Update : 03 11 2017 04:18:40 PM

श्मशान शहर के बीच आ गए हैं

'सप्ताह की कविता' में इस बार वरिष्‍ठ कवि गोविंद माथुर की कविताएं

समकालीन कविता में जब जीवनानुभवों को किनारे कर तपाकी विचारों की खेती उफान पर है, ऐसी कविताओं से गुजरना, जो स्‍लोमोशन फिल्‍म की तरह हौले से आपको स्‍पर्श, भाव, चित्रों की जीवंत दुनिया में लेकर चली जाती हों, बड़ी राहत देता है। वरिष्‍ठ कवि गोविंद माथुर के कविता संग्रह 'मुड़ कर देखता है जीवन' से गुजरना ऐसे ही आत्‍मीय अनुभवों से गुजरना है।

गोविंद माथुर को पढते हुए हिन्‍दी के कवियों में त्रिलोचन की याद आती है। बच्‍चों के से सरल ढंग से बातों को ऐसे रखना कि वे कविता नहीं लगें पर जो जीवन की प्‍यास को जगा दें कि जैसे नदी में नहाते बच्‍चे पानी से बाहर नहीं आना चाहते, पाठक भी इन कविताओं से बहराना नहीं चाहता, कि कोई कला तो नहीं, पर जीवन ही है पूरा जैसे अपने विविध प्रसंगों के साथ - अगर तुम्‍हारा कैनवास बड़ा हो/ तुम दिखा सकते हो/ आम का अचार और प्‍याज/ सूखी रोटियां और ठंडा पानी

गोविन्‍द माथुर की कविताओं में उदासी एक अंतरधारा की तरह बहती रहती है। यह उदासी बहुत संक्रामक है। जैसे एक अजाना बच्‍चा राह चलते आपकी उंगलियां पकड़ कर चलने लगे और आप उसे दुखी ना करने के लिए उसके रास्‍ते में उसके साथ चलने लगते हैं। बच्‍चे की तरह ये कविताएं भी आपके साथ हो लेती हैं, आपको साथ ले लेती हैं। यहां स्‍त्री-पुरूष के बीच लंबे विकासक्रम ने जो फांक पैदा कर दी है उससे पैदा उदासी के रंग हैं। उदासी की इस अंतरधारा के बावजूद अपने मतभेदों को कवि पूरी ताकत के साथ अभिव्‍यक्‍त करता है, सहज संकोची ढंग से ही पर उसकी सच्‍ची जिद उससे उसका सच कहलवा कर रहती है - बचपन में सिखाया गया था/ मनुष्‍य को किसी बात पर/ गर्व नहीं करना चाहिए... इसलिए कवि भारतीय, हिन्‍दू, कायस्‍थ, जयपुरिया या कवि कुछ भी होने पर गर्व नहीं करता।

बाजार आधारित व्‍यवस्‍था ने कैसे मनुष्‍य की भाव-भंगिमा पर उसके मुखौटे को तरजीह दी है कि वही उसकी पहचान का आधार बन गया है -मेरा होना कोई महत्‍व नहीं रखता/ महत्‍वपूर्ण है पर होने का प्रमाणपत्र। ऐसे समय में जब केदारनाथ सिंह की कविताएं शैली लाघव (ट्रिक) के कारण महान बताई जाती है, कोई इस तरह सीधा लिखकर भी कवि हो सकता है क्‍या - पेट्रोल में नहीं/ आग हर चीज में लगी हुई थी/ ...अगर नहीं थी आग/ तो चूल्‍हे में नहीं थी। आइए पढ़ते हैं गोविन्‍द माथुर की कुछ कविताएं - कुमार मुकुल

ईश्वर तो है कहीं अयोध्या में
मैं मूर्ख अज्ञानी
पता नहीं अब तक
क्या-क्या पढ़ता रहा
न जाने किस
अंधकार में भटकता रहा
खोजता रहा
ईश्वर को अपने अन्दर

ईश्वर न तो मेरे अन्दर है
और न सर्वव्यापी
ईश्वर तो है कहीं
अयोध्या मथुरा या काशी में

हे महापुरुषों
हे पथप्रदर्शकों
मैं आपका आभारी हूँ
कि आपने मुझे पहचान दी
कि आपने मुझे राह दिखाई
कि आपने मुझे
ईश्वर का पता बता दिया।

डर
शमशान शहर के बीच आ गए हैं
फिर भी डरा हुआ रहता हूँ
डर है कि निकलता ही नहीं

दिखने में तो कोई दुश्मन नहीं लगता
फिर भी पता नहीं
मन ही मन
किसी ने पाल रखी हो दुश्मनी

ये सही है कि
मैंने किसी का हक नहीं मारा
किसी कि ज़मीन-जायदाद नहीं दबाई
किसी को अपशब्द नहीं कहे
फिर भी मुझे शक है
किसी भी दिन सामने आ सकता है दुश्मन

सच और खरी-खरी कहना
हँसी-हँसी में कटाक्ष करना
झूठी प्रशंसा नहीं करना
इतना बहुत है
किसी को दुश्मन बनाने के लिए

सुझाव भी सहजता से नहीं लेते
आलोचना तो बिलकुल बर्दाश्त नहीं करते
किसी भी दिन मार सकते है चाक़ू

सोचता हूँ चुप रहूँ
पर कुछ भी नहीं बोलने को भी
अपमान समझते है लोग।

वह आदमी कुछ नहीं बोलता
वह आदमी कुछ नहीं बोलता
रहता है एकदम चुप
सुनता है सबकी
वह पैदा हुआ है केवल सुनने के लिए

सारे आदर्श ढोने है उसे
देश की अखंडता का भार है उस पर
नैतिकता ढूँढी जाती है उसमें
ईमानदार होना है केवल उसे

अशिक्षित और निरीह
बने रहना है उसे
ताकि देश के कर्णधार
राजनीतिज्ञ, पूंजीपति और विद्वान
दिखा सके उसे राह
वह पैदा हुआ है केवल राह देखने के लिए

धर्म और जातिवाद से ऊपर
उठकर जीना है उसे
सामाजिक कुरीतियों से लड़ना है
गर्व करना है अपनी भाषा पर
देश की अस्मिता और संस्कृति को
बचाना है केवल उसे
क्योंकि वह एक महान देश का
आम नागरिक है।

Posted On : 03 11 2017 04:17:46 PM

संस्कृति