Last Update : 21 12 2017 02:40:03 PM

जानिए बीजेपी कैसे जीती सूरत में 16 में से 15 सीट

स्वतंत्र पत्रकार धनंजय कुमार का विश्लेषण

इस बार का गुजरात विधानसभा चुनाव कई मायनों में दिलचस्प रहा। खासकर, जिस सूरत शहर में पाटीदार आन्दोलन और जीएसटी की वजह से बीजेपी के खिलाफ सबसे ज्यादा नाराजगी थी, वहीं बीजेपी को सबसे ज्यादा सीटें मिलीं। बीजेपी ने 16 में से 15 सीटें जीतीं। यहाँ तक कि व्यापारियों के प्रतिनिधि के तौर पर जिस अशोक कोठारी को कांग्रेस के टिकट पर खड़ा किया गया था, वह भी इस आंधी में हार गए।

यह चुनाव परिणाम राजनीतिक प्रेक्षकों और विश्लेषकों के लिए भी बेहद चौंकाने वाले रहे। नरेन्द्र मोदी के गृहनगर की ऊंझा सीट, अमित शाह के गृहनगर की मानसा सीट और हिन्दू मतदाताओं का गढ़ रहे सोमनाथ की चारों सीटों पर बीजेपी हार गयी। सौराष्ट्र और कच्छ के इलाके में भी बीजेपी को करारी मात मिली, लेकिन सूरत, जहां उसे भारी विरोध का सामना करना पड़ रहा था, वहीं उसे निर्णायक जीत मिल गयी। सूरत में पांच छह सीटों का भी हेरफेर होता तो बाजी पलट जाती।

सूरत की वारछा, कामरेज, करंज और कतारगाम की पाटीदार बहुल विधानसभा सीटों पर भी बीजेपी को भारी मतों से जीत मिली, जबकि चुनाव की घोषणा के बाद पाटीदार सोसायटियों में बीजेपी प्रचार भी नहीं कर सकी थी। वहां विरोध में बैनर लगे थे। हार्दिक पटेल की रैलियों और रोड शो में सबसे अधिक भीड़ भी इन्हीं इलाकों में जुटी थी।

बावजूद इसके जब चुनाव परिणाम आये तो स्थिति उलटी हुई थी। सूरत की सोलह सीटों में से पंद्रह सीटें बीजेपी की झोली में थी और यही वो जीत रही, जिसने बीजेपी का लाज बचा ली। आखिर ऐसा क्यों हुआ?

आरक्षण की मांग के साथ उभरे पाटीदार आन्दोलन, आन्दोलन के दौरान अहमदाबाद में पुलिसिया कार्रवाई में 13 प्रदर्शनकारियों की पुलिस की गोली से मौत और उसके बाद आर्थिक सुधार के नाम पर नोटबंदी और जीएसटी जैसे कदम। किसान से लेकर व्यापारी तक सभी बीजेपी से खासे नाराज थे।

बीजेपी को इस बात का इल्म था कि ये नाराजगी इस बार बहुत भारी पड़ने वाली है, इसीलिए बीजेपी ने अचूक व्यूहरचना तैयार की और अपनी पूरी ताकत सूरत के व्यापारियों को लुभाने में झोंक दी।

जब चुनाव की घोषणा हुई तो हालात ऐसे थे कि बीजेपी के पटेल नेताओं का भी प्रचार कर पाना मुश्किल हो रहा था। हर जगह बीजेपी के नेताओं को भारी विरोध का सामना करना पड़ रहा था। जीएसटी लागू होने के बाद 21 दिनों तक कपड़ा मार्केट बंद रहा। सूरत के व्यापारियों की नाराजगी का तो यह आलम था कि ‘हमारी भूल कमल का फूल’ जैसा स्लोगन ट्रोल हो गया।

सूरत में हार्दिक पटेल की जबदस्त रैलियाँ हुईं और स्पष्ट तौर पर ऐसा लगने लगा था कि बीजेपी इस बार गयी, लेकिन बीजेपी के नेताओं ने बड़ी ही बारीकी से नाराजगी मिटाने का काम शुरू किया।

व्यापारियों की असली नाराजगी जीएसटी लागू होने से थी। उनके बार-बार डिमांड रखने के बाद भी सरकार ने उस पर कोई सुनवाई नहीं की। इस वजह से व्यापारियों का गुस्सा सातवें आसमान पर था, लेकिन जैसे ही चुनाव प्रचार शुरू हुआ अमित शाह से लेकर वित्त मंत्री अरुण जेटली तक व्यापारियों को मनाने आ पहुंचे।

जेटली दो बार सूरत आए और व्यापारियों से मिले और भरोसा दिलाया कि जीएसटी को सरल किया जाएगा। इनके अलावा सूरत के राजस्थानी व्यापारियों को अपने पक्ष में करने के लिए बीजेपी ने राजस्थानी नेताओं को भी सूरत बुलाया। इन नेताओं में केंद्रीय मंत्री और राज्य के कई मंत्री शामिल थे। लगातार दो दिनों तक राजस्थानी व्यापारियों से मुलाकात की और उन्हें समझाया और इसका ही असर रहा कि सूरत से चौंकाने वाले चुनाव परिणाम देखने को मिले।

ये तो तात्कालिक विश्लेषण हुआ, लेकिन गहराई में उतरें तो पाते हैं कि पाटीदार और व्यापारी बीजेपी के पारंपरिक वोट बैंक हैं। 80 के दशक में गुजरात के मुख्यमंत्री माधव सिंह सोलंकी ने जब खुद को मजबूत बनाने के लिए क्षत्रिय, दलित, आदिवासी और मुस्लिम का गठजोड़ बनाया था।

कहते हैं माधव सिंह सोलंकी यह गठजोड़ पटेलों को सबक सिखाने के मंसूबों के साथ बनाया था और गुजरात की सबसे बड़ी आबादी वाले पटेलों को दूर रखा था, लेकिन बीजेपी ने जब जीत की रणनीति बनाई तो पटेलों को ही सबसे आगे रखा और केशूभाई पटेल गुजरात के मजबूत नेता के तौर पर उभरे। बीजेपी की इस रणनीति ने न सिर्फ पटेलों के वोट जीते, बल्कि उनके दिल भी जीते। यही कारण रहा कि पटेल बीजेपी के पारंपरिक वोट बैंक बन गए।

लेकिन गुजरात की राजनीति में जब नरेन्द्र मोदी का उभार हुआ, तो पटेलों के वरिष्ठ नेता केशूभाई पटेल को हाशिये से भी बाहर धकेल दिया गया। हालांकि, बीजेपी में पटेलों का दबदबा बना रहा और सबसे ज्यादा मंत्री पटेल समुदाय से ही रहे, फिर भी पटेलों को लगने लगा था कि शाह और मोदी की जोड़ी उनके साथ छल कर रही है।

इसी वजह से हार्दिक पटेल को पटेलों का अपार जनसमर्थन मिला, लेकिन जब हार्दिक पटेल ने बीजेपी को हराने के लिए कांग्रेस से हाथ मिलाया तो माधव सिंह सोलंकी के दिए घाव फिर हरे हो गए।

लिहाजा हार्दिक पटेल की पुकार पर किसान पटेलों ने कांग्रेस को जरूर वोट दिए, लेकिन शहरों में बसे पटेलों ने बीजेपी पर ही ज्यादा भरोसा जताया। यही कारण रहा, पटेल बहुल सौराष्ट्र-कच्छ में कांग्रेस को ज्यादा सीटें मिलीं जबकि शहरों में बीजेपी को।

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Posted On : 21 12 2017 02:39:03 PM

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