Last Update : 10 08 2017 08:12:28 PM

और मैं उपभोग की आवश्यक वस्तु बनती गयी

जनज्वार की रीलांचिंग के वक्त जब टीम की बैठक हुई थी तब एक कॉलम पर त्वरित सहमति बनी थी वह था, 'हाउस वाइफ।' सभी साथियों ने कहा था अगर हम इसमें सफल हो सके तो यह कमाल की बात होगी। हम उन औरतों की बातें और जीवन अनुभव सामने ला सकेंगे जो कभी पत्रकारिता में चर्चा का विषय नहीं बनतीं। पर जिद थी कि वह औरतें लिखें जिन्होंने भोगा है, जिन्होंने जिया है और जो लिखने की हकदार हैं। इसी कारण इतनी देरी हुई और उम्मीद है कि इस साप्ताहिक कॉलम को हम हर बार 'हाउस वाइफ' के नए अनुभवों के साथ लेकर आएंगे — संपादक

'हाउस वाइफ' कॉलम में अपना पहला अनुभव साझा कर रही हैं अनामिका साहा

मैं हमेशा से कुछ लिखना चाहती थी। मैंने पांचवी से 12 तक कविताएं लिखती रही। मगर डिग्री कोर्स के दौरान मैंने कॉमर्स ले लिया। कॉमर्स मैंने पिता के दबाव में लिया। इस पढ़ाई शुरू करने के बाद दो बातें हुईं। एक तो उसके बाद मैंने दबाव में जीना सीख लिया और दूसरी कविताएं लिखनी छूट गयीं।

कॉमर्स की पढ़ाई पहला मील का पत्थर था जहां से मैंने दबाव में कोई काम किया था। मैं विज्ञान या आर्ट्स पढ़ना चाहती थी, पर मेरे पिता को लगता था कि कॉमर्स पढ़ने के बाद तुरंत नौकरी मिल जाएगी और नौकरी वाली लड़की की शादी आसान होगी।

पर ऐसा नहीं हो सका। खैर्! अब दबाव में जीना मेरी एक जीवन पद्धति बन गयी है। सोचती हूं दूसरी औरतें शायद इतना दबाव में नहीं रहती होंगी, पर सबकी कहानियां सुन लगता है औरतों के लिए बहुत कम कुछ बदला है।

अब, जनज्वार वालों ने मुझसे हाउस वाइफ पर लिखने को कहा है तो चलो इसे लिख के देखती हूं। वैसे इस वेबसाइट से जुड़ने और लिखने तक पहुंचने की यात्रा भी बड़ी दिलचस्प है, पर उसे फिर कभी बताउंगी।

मैं पिछले 12 वर्षों से एक हाउस वाइफ की लाइफ जीती हूं, लगभग अचर्चित सी। मुझे परिवार में बच्चे से लेकर बूढ़े तक तब याद करते हैं, जब उन्हें जरूरत होती है। अगर मैं उनकी जरूरत के अतिरिक्त उनके आसपास या उनके बीच मौजूद रहती हूं तो वे मुझे वहां से जाने के लिए बोल देते हैं। उन्हें लगता है मैं यों ही उनके बीच हूं। नहीं रहूं तब भी किसी को कोई फर्क नहीं पड़ेगा।

जैसे मेरा 6 साल का बेटा — अगर वह दोस्तों के साथ है और मैं उसके आसपास हूं तो वह कहता है, मम्मी जाओ न हमलोग खुलकर बात नहीं कर पाते। 11 साल की बेटी के साथ कई बार बैठ जाती हूं तो वह कह देती हर वक्त सिर पर चढ़ी रहती हो। कभी हमें अपनी निगाह से दूर भी कर लिया करो।

पति के मित्रों के सामने थोड़ी देर बैठ जाउं तो वह मुझे तरह—तरह के काम बताते रहते हैं या कुछ ऐसा बोल देंगे कि वहां बैठना मुझे अच्छा नहीं लगेगा।

इसी तरह सास—ससूर के साथ है, वह लोग भी मुझे तभी इंटरटेन करते हैं जब जरूरत रहती है। कई बार मैं सास की सहेलियों के साथ बैठ कुछ बात करना चाहती हूं तो सास कहती हैं, ऐसे इनके साथ नहीं बैठते। जाओ चाय—वाय की जरूरत होगी तो बुला लेंगे।

मैंने इन लोगों का जिक्र इसलिए किया कि यह सभी लोग मुझसे इस तरह तभी पेश आते हैं जब मैं इनके साथ आना चाहती हूं, अन्यथा जब यह हमारे साथ होना चाहते हैं तो जैसे मन करता है वैसे आते हैं, जब मन करता है तब आदेश देते हैं और ऐसे पेश आते हैं मानो मेरे बिना यह हो नहीं सकते।

पर जब मैं अपने लिए इनके पास जाती या होती हूं तो यह मुझे टाल देते हैं या नहीं होने देते।

टीवी और कार्टून ने बच्चों को बोलना सीखा दिया है। मैं कई बार महसूस करती हूं कि आज के बच्चे पहले के लोगों के मुकाबले आदर—सत्कार के शब्दों का खूब इस्तेमाल करते हैं, पर उस इस्तेमाल की गंभीरता उनमें न के बराबर है, यहां तक कि कई बार वह इन नाजुक और संवदेनशील शब्दों का मजाक उड़ाने के अंदाज में बोलते हैं। मैंने कई बार अपने बच्चों और पड़ोसियों के बच्चों को लेकर यह बात महसूस किया है।

उदाहरण अभी याद नहीं आ रहा पर आप सोचें तो आपको भी लगेगा कि मैं क्या कहना चाहती हूं।

मैं काम से कभी नहीं ऊबती। लगभग उसी में जीती हूं। पर अब एक उम्र बीत जाने और पति के सामने थोड़ी साहसी होने के बाद महसूस करती हूं कि पूरे परिवार में मेरी उपयोगिता एक ऐसे मशीन की है जो हमेशा जरूरत की भरपाई को तैयार रहता है।

उस मशीन का काम इतना बड़ा हो गया है कि मैं इनके घूमने को अपना घूमना, इनके मनोरंजन को अपनी तफरी, इनकी चाहत को अपने सपने और इनकी खातिरदारी को अपना जीवन मानने लगी हूं।

पर संतोष और खुशी इस बात की है कि मैं अभी एक बार जीना चाहती हूं, क्योंकि मैं जानती हूं कि परिवार के लिए मैं क्या हूं, मेरी चेतना अभी मरी नहीं है।

'इस बार इतना ही, इससे आगे की बात कभी और'

(यह अनुभव आपको कैसा लगा, हमें editorjanjwar@gmail.com पर ईमेल कर बताएं। अगर आप हाउस वाइफ हैं तो हमें editorjanjwar@gmail.com पर अपना लिखा मेल करें। जो महिलाएं टाइप नहीं कर सकतीं वह हमें हाथ से लिखकर और फिर फोटो खींचकर मेल कर सकती हैं।

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Posted On : 10 08 2017 01:58:30 PM

जनज्वार विशेष