Last Update : 05 11 2017 12:00:10 PM

प्रेम विवाह कराने का 7.50 लाख रुपए जुर्माना भर रहा दलित शिक्षक

प्रेम, धर्म और दोस्ती का पुल बना तो एक नया जीवन बसा, दो जान एक दिल हुए। पर उन दो जान ने मिलकर तीसरे के साथ जो बेवफाई की है, उसे इलाका भूलते नहीं भूल पा रहा है...

पूरी कहानी बता रहे हैं एपी मिश्र

जिला आजमगढ़, ब्लॉक अहरौला। इसी ब्लॉक का एक स्कूल था जहां चार साल पहले प्रेम हुआ। प्रेम हमेशा की तरह जांबाज हुआ। प्रेम को सुविधा, आसानी और सहूलियत से दुश्मनी है, इसलिए वह चुनौती और बगावत को साथ लेकर आया। जांबाजी ये कि लड़का हिंदू और लड़की मुस्लिम। लड़का राजपूत और लड़की खान। लड़की आजमगढ़ की और लड़का बलिया के कछार का।

लड़के का नाम अरविंद सिंह और लड़की तबस्सुम। राजपूत खानदान में पैदा हुए अरविंद सिंह जब स्कूल में पहली नौकरी पर 2012 में आए तो उन्होंने किसी कामकाजी मुस्लिम लड़की को पहली बार देखा। इससे पहले का उनका ज्ञान बस यही था कि मुस्लिम लड़कियां बड़ी होकर सिर्फ विवाह के काम आती हैं।

तबस्सुम शिक्षा मित्र थी और वह परमानेंट शिक्षक। इस तरह अरविंद सिंह तबस्सुम के बॉस थे और वह उनकी मातहत। बॉस और मातहत के साल—दो साल तो ऐसे ही गुजर गए। तबस्सुम मुस्कराते हुए उन्हें बस सर—सर कहती। सर ये बात, सर वो बात।

पर यहां एक पेंच था। अरविंद सिंह को लड़की की मुस्कान पसंद थी, पर उसका सर या सर जी कहना नहीं। कई महीनों की मेहनत के बाद अरविंद इसमें सफल रहे कि अब वह तबस्सुम के सर की बजाए, सुनिए जी हो पाए थे। तबस्सुम का 'सुनिए जी' अरविंद को बहुत ही मनभावन लगता और दूसरे हिंदू साथी शिक्षकों को बवाल की जड़।

पर अरविंद सिंह बवाल से डर रहे शिक्षकों से कहते, 'राजपूत हूं, राजपूत। मुझे क्या बवाल से डर। बवाल मेरे खून में हैं और बवालों के बवंडर में जीना मेरी फितरत।'

इस बीच अरविंद सिंह ने तबस्सुम की मुस्कान और उसकी उर्दू जुबान को अपना बना लिया था। वह उसमें जीने लगे थे। वह शायरियां लिखने और कहने लगे थे। उन्होंने सिबली इंटर कॉलेज आजमगढ़ के पास के कटरे से गालिब, मीर और गुलजार की नज्म की किताबें खरीद ली थीं। कैफी आजमी को भी ले आए थे, क्योंकि अक्सर ही उनकी चर्चा कर देती।

अरविंद सिंह अब दूसरों की नज्मों में अपनी घुलाकर दिल की कहानियां कहने लगे थे।

तबस्सुम कई बार गजलों में बहुत दूर गहरे डूबकर चली जाती, लेकिन जब भी अरविंद अपना ओरिजिनल वाला सुनाते तो वह कह पड़ती, 'आप बिलकुल निहरूआ स्टाईल के गजलकार हैं।' इस पर अरविंद खूब हंसते और धीरे—धीरे वह निरहुआ स्टाईल को ही अपनी तारीफ समझने लगे थे।

खैर प्रेम में क्या तारीफ, क्या फनकार, क्या बिदुषक!

अरविंद सिंह की मूंछें क्रिकेट खिलाड़ी शिखर धवन जैसी थीं जो तबस्सुम को बहुत पसंद थीं। कई बार तबस्सुम ने तारीफ में कहा भी तुम इसमें बिल्कुल किसी गर्वीले खान की तरह लगते हो। अरविंद को तारीफ का 'गर्वीला; पसंद था पर खान नहीं, लेकिन खुद को वह सिनेमा के हीरो रणवीर सिंह जैसा फील करते थे।

तबस्सुम जब खानों की तारीफ में कसीदे पढ़तीं तब अरविंद सिंह का सोया राजपूत जाग उठता। बताते कि बलिया के कछार में कैसा जलवा होता है उनके परिवार का। इस बीच वह यह बताना नहीं भूलते कि बंदूकें उनके घर में खिलौनों जैसे रखी जाती रही हैं।

बलिया जिले के राजपूतों के एक गांव के रहने वाले अरविंद खानदान के पहले शिक्षक थे और पहले प्रेमी भी। उनके घर में दो ही चीजें प्रतिबंधित थीं। एक प्रेम और दूसरा झुकना। वह बताते कि प्रेम इसलिए करना प्रतिबंधित था कि उसमें झुकना पड़ता। पर तबस्सुम के लिए वह झुके।

झुकने की शर्त ये आई कि तबस्सुम ने कहा अब कर लो मुझसे निकाह, समय बहुत कम है। अब्बा मेरी शादी की बात चलाने लगे हैं। मैं गांव की पहली मुस्लिम लड़की हूं जिसकी 23 की उम्र में शादी नहीं हुई है।

इस जिम्मेदारी को अरविंद सिंह ने बहुत गंभीरता से लिया, क्योंकि वह प्रेम का आनंद पाने के लिए तीन साल पहले ही वादा कर चुके थे कि जिएंगे तो तबस्सुम के साथ, नहीं तो कत्ल की रात मंजूर करेंगे। हालांकि इन वर्षों में अरविंद सिंह ने तबस्सुम से कई बार दूर जाने की कोशिश की, पर तबस्सुम दोहराती रहती, 'अगर भगे तो काट डालूंगी और खुद को जिबह भी।'

इस काट डालने के चक्कर में प्रेम गहराता गया। रातें जवान होती रहीं और दिन खुशनुमा। पैसा अरविंद सिंह और तबस्सुम दोनों की जेबों में था, इसलिए हर कठिनाई जीवन में हाशिए पर जाती रही और 2016 की मई में वह दिन आ गया जब दोनों ने शादी करने की ठान ली, क्योंकि अब बगैर शादी रहना मुश्किल था, कभी भी बच्चा ठहर सकता था।

पर इलाका आजमगढ़। जाति राजपूत और खान। लड़का बलिया का और लड़की आजमगढ़ की। शादी कर भी लें तो रहें कहां। बहुत सोचा, बहुत सोचा! उपाय निकला। तय हुआ कि कुछ भी हो जाए हम साथ रहेंगे। एक—दो जानकारों से पूछा, प्रेम के परिचितों से पूछा, जिन्हें अनुभव थे, उन्होंने कहा यहां से भाग जाओ, इसी में भलाई है। अन्यथा लाश गिरेगी या लव करोगे, इसकी गारंटी नहीं है।

अरविंद और तबस्सुम ने भागने का प्लान बना लिया। पर कोई बीए पास बेरोजगार तो थे नहीं, उन्हें सुविधाएं और सहूलियतें जीने की आदत थी। होने वाले दंपति को लगा कि कहीं भी जाएं, महीने का खर्चा 20 हजार तो लगेगा ही। फिर क्या करें? बहुत जोड़ घटा कर एक डेढ़ लाख से ज्यादा नहीं हो रहा था। इसमें काम चलता नहीं?

तभी उत्तर प्रदेश सरकार की योजना एक योजना बुझते प्रेम के दिए को लहकाने का काम की। योजना का नाम था सुमंगल योजना। ग्रामीण बैंक से बगैर ब्याज के अपनी सैलरी के 15 गुना पर्सनल लोन कोई भी शिक्षक ले सकता है, जिसका उपयोग शादी, घर की मरम्मत या किसी और निजी उपयोग में हो सकता है। दोनों ने जोड़ा—घटाया तो समझ में आया कि अरविंद को सैलरी के अगेंस्ट 7.50 लाख रुपए का लोन मिल सकता था।

लेकिन यहां भी मुश्किल थी। मुश्किल ये था कि लोन बगैर किसी शिक्षक के गवाही के संभव नहीं था। चलो शिक्षक तो मिल जाता पर अरविंद को एक ऐसे शिक्षक की जरूरत थी जो गवाही भी दे दे और चुप भी रहे, रायता न फैलाए। वह नहीं चाहते थे कि उनकी इस योजना का किसी को संदेह हो और तबस्सुम उनकी जिंदगी सिर्फ तारीखें बनकर रह जाए।

राजपूत जाति में पैदा अरविंद सिंह का राजपुताना दिमाग चला, उन्हें अपना एक दलित शिक्षक दोस्त याद आया जो इनसे दबता भी था और इनके बचपन का दोस्त भी था। उसका नाम दिमाग में आते ही लग गया कि अब भागने का कार्यक्रम असफल नहीं होगा, दुनिया कोई ताकत उनको तबस्सुम जुदा नहीं कर पाएगी।

जैसा कि अरविंद को उम्मीद थी वह वैसा ही निकला। उन्होंने जाति, धर्म, इलाका, दोस्ती, प्रेम और जान देने तक की बातें बताकर दलित दोस्त को मना लिया। पर वह कहता रहा, 'बाबुसाहब हम घर के पहले नौकरीशुदा हैं। परिवार चलता है मेरी कमाई से। पहली बार खानदान में बच्चे मांटेसरी स्कूल देखे हैं और मैंने मोटरसाइकिल, इसलिए धोखा न देना, मैं मर जाउंगा। बाकि आपकी दोस्ती के लिए जान भी हाजिर है।'

पर अरविंद सिंह ने दलित शिक्षक से और भी ज्यादा दिल को चीर देने वाली बातें कर उसे मना लिया। दोस्ती की ऐसी दुहाइयां दीं कि वह पिघल गया। वैसे भी प्रेम में रत जोड़े अपने प्रेम को छोड़ हर चीज के प्रति असंवेनशील हो जाते हैं। वे अपने फैसले के दिनों में सबसे ज्यादा दुनिया की संवदेनशीलता, दोस्ती की भलमनसाहत और रिश्तेदारों के सहयोग का दोहन करते हैं।

अरविंद सिंह और तबस्सुम ने भी वही किया। दलित शिक्षक ने उनकी बातों में आकर खुशी—खुशी 7.50 लाख रुपए के लोन के लिए गवाही दे दी। घर की मरम्मत के लिए लोन लिया गया। पैसा अरविंद सिंह के खाते में आया, मोबाइल पर मैसेज दिखा, मैसेज देख प्रेमी युगल जोड़ा आश्वस्त हुआ और फुर्र हो गए।

आजमगढ़ और बलिया की दुनिया से दूर कहीं और...जहां सिर्फ हो मोहब्बत और सुकून।

अब उनको फुर्र हुए डेढ़ साल से ज्यादा हो चुके हैं। वह अपनी दुनिया में कैसे हैं, नहीं पता, पर उस दलित दोस्त की दुनिया कैसी है, यह सबको पता है। ग्रामीण बैंक हर महीने गवाही देने वाले शिक्षक से अरविंद सिंह के 7.50 लाख रुपए कर्ज की वसूली शुरू कर चुका है। हर महीने दोस्त के प्रेम की किस्त दलित शिक्षक के वेतन से जाने लगी है।

अपनी सैलरी से प्रेम की किस्त कटवा रहा अरविंद सिंह का दलित दोस्त चार बार उनके बलिया स्थित गांव जा चुका है। घर वाले कहते हैं, कौन अरविंद सिंह। यहां कोई अरविंद सिंह नहीं रहता। उसका रिश्ता उसी दिन खत्म हो गया था जिस दिन वह विवाह कर भागा। अगर उसने गांव की धरती पर पांव रखा तो काट डालेंगे और दुबारा आए तो तुम्हें भी काट डालेंगे। ये कहने के साथ ही घर वाले दलित दोस्त को लड़का भगाने में दोषी भी मानते हैं।

वहीं आजमगढ़ में तबस्सुम के खानदान वाले मुसलमानों से भी अरविंद का दोस्त बचता—फिरता है। तबस्सुम के घर वाले मानते हैं कि हिंदू के साथ बेटी के भागने से इज्जत गयी है और भगाने वाला हमारे आसपास ही डोल रहा है।

पर प्रेम विवाह को सफल बनाने वाले अरविंद के दोस्त की असली मुश्किल ग्रामीण बैंक ने कर रखी है, जो हर महीने उसकी कमाई से कुछ हजार काट ले रहा है। बैंक का कहना है कि जिसको लोन दिलाया वह भाग गया, उसकी भरपाई गवाह से की जाएगी।

इन सबके बीच प्रेम विवाह कराने वाले शिक्षक की त्रासदी यह कि राह चलते लोग न सिर्फ उसका मजाक उड़ाते हैं, बल्कि उसे एक तरह का गुनहगार भी मानते हैं जिसने दो धर्मों, दो परिवारों को मुश्किल में डाला है!!!

पर आप बताइए, आप क्या मानते हैं, कैसे सोचते हैं? (फोटो — प्रतिकात्मक)

Posted On : 05 11 2017 11:55:52 AM

समाज