Last Update : 26 12 2017 04:54:12 PM

झारखंड सरकार ने नक्सल खात्मे के नाम पर किया मजदूर संगठन को प्रतिबंधित

आदिवासियों को भड़काने का आरोप लगाया चर्चित विद्रोही कवि वरवर राव पर, कहा भोली—भाली जनता को सरकार को सरकार के खिलाफ कर रहे थे गोलबंद

अंजनी कुमार, राजनीतिक कार्यकर्ता 

झारखंड सरकार के आदेश पर नक्सल खात्मे के नाम पर मजदूर संगठन समिति को प्रतिबंधित कर दिया गया है। झारखंड के राज्यपाल के आदेश पर सरकार के संयुक्त सचिव की ओर से ‘गृह, कारा और आपदा प्रबंधन विभाग’ के लिए एक अधिसूचना जारी कर यह बात कही गई।

20 दिसम्बर 2017 को जारी अधिसूचना के आधार पर अपराध विधि संशोधन अधिनियम 1908 की धारा 16 के अंतर्गत ‘मजदूर संगठन समिति’ को सीपीआई-माओवादी का अग्र संगठन घोषित करते हुए उसे अवैध घोषित कर दिया गया।

अधिकसूचना में इस संगठन को लोक शांति के घातक बताया गया है। इस संगठन से संबंधित किसी भी गतिविधि को गैरकानूनी घोषित किया गया। अधिसूचना में कहा गया है कि इस संगठन ने आरडीफ के अध्यक्ष वरवर राव को बुलाया और भोले-भाले आदिवासियों एवं ग्रामीणों को राज्य में लोकतांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ गोलबंद करने का प्रयास किया था।

अधिसूचना जारी होने के पहले ही झारखंड के डीजीपी डी.के. पाण्डेय के हवाले से 20 दिसंबर को स्थानीय अखबारों में बयान छप चुका था कि ‘मजदूर संगठन समिति’ राज्य की आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा बन सकता है, इसलिए इसे प्रतिबंधित कर दिया जाय। इससे स्पष्ट होता है कि इसकी तैयारी पहले ही कर ली गयी थी। नवम्बर के पूरे महीने में इस मजदूर संगठन की हर गतिविधि को न सिर्फ रोका गया, बल्कि इनके शांतिपूर्ण कार्यक्रमों को भी शांति व्यवस्था भंग करने का आरोप लगाया जा रहा था।

गौरतलब है कि मजदूर संगठन समिति एक पंजीकृत यूनियन है, जिसकी पंजीयन संख्या 3113/89 है। यह संगठन कोयला खदान, थर्मल पाॅवर, फैक्टरी, खेत और पारसनाथ की धर्मनगरी के संगठित और असंगठित मजदूरों में काम करती है। यह मजदूरों और गरीब लोगों के लिए मधुबन, गिरीडीह में अस्पताल बनवाया, जहां मजदूर और गरीब लोग अपना मुफ्त इलाज करा सकते हैं।

यह संगठन अन्य जगहों पर भी मजदूरों के सेवार्थ कल्याणकारी कार्यक्रम चलाता रहा है। इसके साथ ही मजदूरों के हक के लिए रैली और सभा आयोजित कर मजदूरों को उचित हक की लड़ाई करती रही है। मजदूरों में काम करने के लिए उन्होंने मुख्यतः सेमिनार, सभा, रैली, विचार गोष्ठी, वर्कशाॅप को माध्यम बनाया है।

हालांकि मजदूर संगठन को प्रतिबंधि करने का यह अधिकार श्रम विभाग और उसके रजिस्ट्रार को है। ट्रेड यूनियन एक्ट के तहत प्रतिबंध की निम्नलिखित प्रावधान है:

पंजीकृत ट्रेड यूनियन को रद्द करने का प्रावधान : एक ट्रेड यूनियन का पंजीकरण का सर्टिफिकेट रजिस्ट्रार द्वारा वापस या रद्द किया जा सकता-

—यदि ट्रेड यूनियन इस संदर्भ में आवेदन करता है जिसे तय किये तरीके से इसकी सत्यता की जांच की जा सकती है, या

— रजिस्ट्रार इस बात से मुतमईन हो कि हासिल किया गया सर्टिफिकेट फ्राॅड या गलती से हासिल कर लिया गया है या ट्रेड यूनियन अब अस्तित्व में नहीं है या जानबूझकर और रजिस्ट्रार के द्वारा इस एक्ट के तहत दिये गये नोटिस का उलघंटन कर रहा है। या फिर ऐसी नीति का जबरदस्ती लागू कर रहा हो जो प्रावधानों के साथ मेल न खा रहा हो या सेक्शन 6 के अनुरूप् किसी भी प्रावधान की नियमावली को मानने से इन्कार किया हो;

सेक्शन 6 के अनुसार रजिस्ट्रार द्वारा कम से कम दो महीने पहले लिखित में उन कारणों को ट्रेड यूनियन को चिन्हित करना और देना है जिस आधार पर पंजीकरण वापस लेने या रद्द करने का प्रस्ताव है या ट्रेड यूनियन द्वारा ऐसा ही प्रस्तावित किया गया हो।’

डीजीपी का जो बयान अखबार में आया उसमें उनके हवाले से कहा गया है कि यह संगठन दवा, कंबल बंटवाकर सहानुभूति बटोर रहा है और छोटे मोटे विवादों का निपटारा भी कर रहा है। इस संगठन पर लेवी वसूलने और इनके पदाधिकारियों पर ‘नक्सल गतिविधि’ करने का आरोप लगाया गया।

डीजीपी ने जिन नामों का उल्लेख किया है उसमें से कुछ लोग मजदूर संगठन समिति के सदस्य नहीं हैं और न ही इस तरह की गतिविधि में उनकी कभी गिरफ्तारी हुई है। दामोदर तुरी ने इस संदर्भ में बाकायदा प्रेस कांफ्रेस कर इसके बारे में औपचारिक बयान भी दिया है।

मजदूर संगठन समिति के महासचिव बच्चा सिंह पर भी इस तरह के न तो आरोप सिद्ध हुए और न ही अब इस तरह की गतिविधि का कोई आरोप है। पुलिस ने यदि गुपचुप केस दर्ज कर रखा हो तो यह अलग बात है जैसा कोबाड गांधी से लेकर हजारों लोगों के खिलाफ इस तरह की षडयंत्रकारी कार्यवाही किया जा रहा है।

दरअसल झारखंड सरकार और पुलिस के आला अफसर डोली मजदूर मोतीलाल बास्के को झूठे मुठभेड़ में मारकर पुरस्कार तो बटोर चुकी है, लेकिन जब मजदूर संगठन समिति के नेतृत्व में शिबू सोरन से लेकर अन्य विपक्षी दल इस झूठी मुठभेड़ की जांच की मांग कर रहे हैं तो प्रतिबंध लगाने की राजनीति की जा रही है। आज तक मोतीलाल बास्के की पत्नी के द्वारा दिया गया ज्ञापन और दोषियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं किया गया है। जबकि सर्वोच्च न्यायधीशों ने प्रावधान दे रखा है कि एनकाउंटर के दौरान हुई मौतों पर एफआईआर दर्ज की जाए।

झारखंड में नक्सल खात्मा अभियान और ‘मोमेंटम झारखंड’ को जनवरी 2018 तक पूरा कर लेने के तहत गांवों को उजाड़ने, सीपीआई-माओवादी के खिलाफ सेना और पुलिस का संयुक्त अभियान चलाने का डंका भाजपा की रघुबर दास सरकार और पुलिस के अफसरों द्वारा पीटा जा रहा है।

सेना के उतरने, पहाड़ों को घेरने, हैलीपैड बनाने, सैकड़ों गांवों को खाली कराने की खबरें झारखंड के अखबारों में रोज छप रही हैं। और, इस खबर से देश का राष्ट्रीय मीडिया पूरी तरह बेखबर है। रघुबर दास की भाजपा सरकार को डर है कि ‘मजदूर संगठन समिति’ इसका खुलकर विरोध करेगी और जनता में प्रचार अभियान चलायेगी।

मजदूर संगठन समिति के हवाले से कहा जा रहा है कि हमारा संगठन सिर्फ तीन जिलों में नहीं पूरे झारखंड में मजदूरों को संगठित करने वाला संगठन बन चुका है। बोल्शेविक क्रांति के सौ साल मनाने के दौरान पूरे झारखंड में कार्यक्रम हुए और उसमें हजारों लोगों ने शिरकत की। साफ है कि ‘मजदूर संगठन समिति’ की राजनीति भाजपा की फासीवादी राजनीति के खिलाफ जाती है।

संगठन कार्यकर्ताओं के मुताबिक हम खुलकर माक्र्सवाद-लेनिनवाद की बात करते हैं। दूसरे यह भी कि हमारा संगठन आदिवासी और मजदूर को संगठित कर रहा है जो झारखंड राज्य की मुख्य आबादी है। यह कार्य भी आरएसएस-भाजपा जैसे संगठन को नागवार गुजर रहा है। हमने संगठन के माध्यम से अवैध खदानों, ठेकेदारों की लूट और माफिया-रंगदारों पर नियंत्रणकारी प्रभाव डालना शुरू कर दिया था।

मजदूर संगठन समिति के कार्यकर्ता कहते हैं कि हमारे संगठन पर लगाया गया यह प्रतिबंध लूट-खसोट की आय और राजनीति करने वालों की सेवा करने के लिए लगाया गया है। यह प्रतिबंध जनता को उसके संगठन से वंचित कर उसे और भी कमजोर और भूखमरी की तरफ ठेलने के लिए लगाया गया है।

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Posted On : 26 12 2017 04:14:22 PM

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