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माटी लाल हो रही

कल्पना झा ने यह कविता या यूं कहें कि मर्मांतक और हृदयस्पर्शी अभिव्यक्ति गोरखपुर में सरकारी लापरवाही की भेंट चढ़े उन दर्जनों मासूमों के लिए है, जिनकी मौत गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में आॅक्सीजन का स्टॉक खत्म होने से हो गई। व्यंग्यकार सुशील सिद्धार्थ जी के शब्दों में कहें तो यह यह कविता नहीं, संवेदना और सभ्यता का शोकगीत है....

कल्पना झा की कविता 'माटी लाल हो रही'

दूध के डब्बे में थोड़ा दूध अब भी बचा है
बोतल में बासी दूध के टुकड़े जमे हैं
छोटी गिलास छोटी प्याली पर उल्टी पड़ी है
तस्वीरों से झाँक रही उनकी किलकारी है
तबियत बिगड़ी है बबुआ की
लौटेगी मुन्नी जल्दी ही
आस टूटती नहीं इनकी
खिलौने वाली गुड़िया नहीं पी रही पानी
गुड्डा आकर पिलायेगा
वही अपने साथ नहलायेगा
अंचरा कब से भीग रहा
छुटकू तकिया कब से बिन लार के सूख रहा
पिपही नन्हीं फूँक के इंतज़ार में
किसी कोने में पड़ी सुबक रही
बंसुरिया छोटी उंगलियों को रो रही
छोटी हवाई चप्पल केवाड़ के पीछे दुबकी है रे
गेंद चौकिया के नीचे छुपी है
चार चार बित्ते के कपड़े रंग छोड़ रहे
लंगोट टंगे हैं कब से बाहर
दिठौना लगाने को कजरौटा भी खुला पड़ा है
हिसाब माँगते हैं सब तुमसे
माटी लाल हो रही है
कब्रगाह विरोध पर अड़े हैं
लकड़िया जलने को मना करती है
लपट उठना नहीं चाहती
तुमको शर्म मगर आती नहीं
तुमको आँसू मगर आते नहीं...

Posted On : 13 08 2017 11:20:08 AM

संस्कृति