Last Update : 06 02 2018 07:31:37 PM

किसानों के नाम पर जारी बजट की असलियत खोजी तो झट पता चली वित्त मंत्री की लफ्फाजी

बाजार के दाम और समर्थन मूल्य के अंतर को पाटने के लिए हजारों करोड़ के बजट की आवश्यकता थी लेकिन सरकार ने 950 करोड़ रुपए से घटाकर यह राशि 200 करोड़ रुपए कर दी है...

अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति (ए.आई.के.एस.सी.सी.) ने 2018-19 के बजट को किसानों के साथ वित्त मंत्री द्वारा किया गया भद्दा मजाक, धोखा, छलावा करार दिया है।

वित्त मंत्री की घोषणाओं को सफेद झूठ एवं महज चुनावी शुगूफा बताते हुए कहा कि इसका पर्दाफाश गांव-गांव में किया जाएगा तथा किसानों की संपूर्ण कर्जा मुक्ति और किसानों को लागत से डेढ़ गुना दाम दिलाने तथा केंद्र सरकार किसान विरोधी नीतियों के खिलाफ 12 फरवरी से 19 फरवरी के बीच राष्ट्रव्यापी अभियान चलाया जाएगा।

कहा कि कृषि संकट से किसानों को उबारने के लिए किसानों की संपूर्ण कर्जा मुक्ति को लेकर बजट में तो कोई प्रावधान किया ही नहीं गया है। यहां तक कि वित्त मंत्री ने किसानों की आत्महत्याओं को रोकने का उल्लेख तक करने की आवश्यकता नहीं समझी है।

देश की आबादी के 65 प्रतिशत किसानों को केवल 2.36 प्रतिशत बजट उपलब्ध कराने तथा लागत से डेढ़ गुना दाम देने की घोषणा के साथ आवश्यक बजट उपलब्ध न कराने, दामों की स्थिरिता के लिए बाजार में हस्तक्षेप हेतु गत वर्ष आवंटित 950 करोड़ की राशि को घटाकर 200 करोड़ किये जाने, भण्डारण, किसान पेंशन, प्राकृतिक आपदा, लागत कम करने (बीज, खाद, कीटनाशक, डीजल, पेट्रोल, बिजली, कृषि उपकरण), जलवायु परिवर्तन के लिए आवश्यक राशि आवंटित नहीं किये जाने से स्पष्ट हो गया है कि किसानों के साथ अन्याय, उपेक्षा और भेदभाव जारी है।

ऐसी स्थिति में प्रधानमंत्री द्वारा किसानों की आमदनी दुगुनी करने का वायदा मात्र जुमला बनकर रह गया है। फसल बीमा के लिए आवंटित राशि, बीमा कंपनियों को लाभ देने के लिए ही आवंटित की गई है, किसानों के लिए नहीं।

एनडीए ने 2014 के चुनाव में लागत से डेढ़ गुना समर्थन मूल्य देने की घोषणा की थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट में सरकार बाकायदा शपथपत्र देकर फरवरी 2015 में पलट गयी। कृषि मंत्री ने इस आशय का बयान जुलाई 2017 में संसद में भी दिया। पिछले 4 वर्षों में न्यूनतम समर्थन मूल्य में की जाने वाली औसत बढ़ोतरी से भी कम बढ़ोतरी की गई। राज्य सरकार द्वारा लागत एवं मूूल्य आयोग (सीएसीपी) को की गई लागत की कीमत संबंधी अनुशंसाओं में 30 से 50 प्रतिशत तक कटौती की गई।

मंदसौर में 6 जून, 2017 को पुलिस गोलीचालन के बाद अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति का गठन किया गया। समिति में शामिल 191 किसान संगठनों द्वारा देश के 19 राज्यों में दस हजार किलोमीटर की किसान मुक्ति यात्रा किये जाने के बाद 20-21 नवंबर को नई दिल्ली में आयोजित लाखों किसानों की किसान मुक्ति संसद तथा किसान मुक्ति सम्मेलनों से पैदा हुए माहौल, किसानों की जागरूकता, देशभर में स्वतः स्फूर्त किसान आंदोलनों ने सरकार को समर्थन मूल्य के बारे में मुंह खोलने के लिए मजबूर किया।

सरकार की कलई तब खुल गई जब वित्त मंत्री द्वारा कहा गया कि उसने रबी में ही अपने न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) वायदे को पूरा कर दिया है, जबकि वस्तुस्थिति यह है कि सरकार द्वारा लागत की परिभाषा ही बदल दी गई है। सरकार ने रबी में सी-2 के आधार पर लागत का आकलन करने की बजाय ए-2 + एफएल पर आकलन किया है। यह किसानों के साथ क्रूर मजाक है जिससे यह स्पष्ट होता है कि खरीफ में भी किसानों को स्वामीनाथन कमीशन की सिफारिशों के मुताबिक लागत से डेढ़ गुना समर्थन मूल्य नहीं मिलेगा।

सरकार एक बार फिर किसानों को बेवकूफ बनाना चाहती है। किसान संगठनों का संघर्ष डा स्वामीनाथन द्वारा की गई सिफारिश के मुताबिक किसानों को समग्र लागत की कीमत सी-2+50 प्रतिशत दिलाना है जिसका वायदा प्रधानमंत्री ने सैकड़ों सभाओं में किया था।

ऐसे समय में जबकि न्यूनतम समर्थन मूल्य भी किसानों को नहीं मिल रहा है तथा अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के आकलन के मुताबिक केवल खरीफ (2017) में न्यूनतम समर्थन मूल्य तथा बाजार मूल्य के बीच 32,700 करोड़ रुपए का अंतर पाया गया है, जिसे हम किसानों की लूट मानते हैं। बाजार के दाम और समर्थन मूल्य के अंतर को पाटने के लिए बाजार में हस्तक्षेप हेतु हजारों करोड़ के बजट की आवश्यकता थी लेकिन सरकार द्वारा यह राशि 950 करोड़ रुपए से घटाकर 200 करोड़ रुपए कर दी गयी है।

सरकार ने बजट में राष्ट्रीय कृषि विकास योजना की राशि 4500 करोड़ रुपए से घटाकर 3600 करोड़ रुपए कर दी है। मनरेगा के लिए 80 हजार करोड़ की आवश्यकता थी लेकिन केवल 54 हजार करोड़ रुपया ही आवंटित किया गया है। आपदा राहत फंड में भी कटौती की गई है।

अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति ने रमेश चंद्र कमेटी की सिफारिशों के आधार पर लागत की कीमत की गणना किये जाने की सरकार से मांग की है।

अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति का मानना है कि किसानों के संपूर्ण कर्जा मुक्ति के लिए बजट आवंटन करने की बजाय सरकार ने उद्योगों के नॉन परफोर्मिंग एसेट को खत्म करने का बजट में वायदा किया है। गत 4 वर्षों में भी सरकार हज़ारों करोड़ो रुपए की छूट गिने-चुने औद्योगिक घरानों को देती रही है।

अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति ने 12 फरवरी से 19 फरवरी के बीच देश भर में जनपद एवं तहसील स्तर तक उक्त मुद्दों को लेकर समिति में शामिल सभी संगठनों के द्वारा धरना-प्रदर्शन-सम्मेलन-प्रेसवार्ता-आमसभाएं आयोजित करने का ऐलान किया।

देशभर में किसान मुक्ति सम्मेलनों के पूरा हो जाने पर बजट सत्र के दौरान संपूर्ण कर्जा मुक्ति बिल एवं किसान (कृषि उपज लाभकारी मूल्य गारंटी) अधिकार बिल संसद में किसानों की ओर से पेश किया जाएगा तथा इन दोनों मुद्दों को लेकर संसद में लोकसभा अध्यक्ष को याचिका भी सौंपी जाएगी।

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Posted On : 06 02 2018 07:31:37 PM

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