Last Update : 09 02 2018 08:55:13 PM

पुरुष से भिन्न एक स्त्री का एकांत

'सप्ताह की कविता' में आज युवा कवि निर्मला पुतुल की कविताएँ

निर्मला पुतुल की कविताएँ अपने अस्तित्व की तलाश में भागती एक स्त्री की कविताएँ हैं- 'मैं होती हूँ स्वयं एक घर /जहाँ रहते हैं लोग निर्लिप्त /गर्भ से लेकर बिस्तर तक के बीच...' स्त्री-पुरुष में भिन्नता है, इसे मानती हैं पुतुल और इस भिन्नता के साथ स्त्री के स्वतंत्र अस्तित्व को जानने की माँग करती हैं। वह पूछती हैं- 'क्या तुम जानते हो/ पुरुष से भिन्न एक स्त्री का एकांत... /घर, प्रेम और जाति से अलग एक स्त्री को /उसकी अपनी ज़मीन के बारे में बता सकते हो तुम...'

‘क्या तुम जानते हो’ कविता की ये पंक्तियाँ वरिष्ठ कवि आलोक धन्वा की बहुचर्चित कविता ‘ब्रूनो की बेटियाँ’ की याद दिलाती हैं। आलोक लिखते हैं- जला दी गई स्त्रियों के बारे में-
'वे इतनी सुबह काम पर आती थीं /उनके आँचल भीग जाते थे ओस से और तुरंत डूबे चाँद से... /वे किस देश के लिए आती थीं इतनी सुबह?' सवाल वही है कि स्त्री का घर है कोई या देश या दुनिया?

पुतुल की तमाम कविताएँ इस दुनिया को बदल देने की इच्छा से लिखी गई कविताएँ हैं? बदलाव की यह बेचैनी कई-कई रंग-रूपों में प्रकट होती है। ‘बाह्यमुनी’ कविता में वह लिखती हैं-  'तुम्हारे हाथों बने पत्तल पर भरते हैं पेट हज़ारों /पर हज़ारों पत्तल भर नहीं पाते तुम्हारा पेट।' यह बहुत पुराना सवाल है कि घरों में उनको बनाने वाले क्यों नहीं रहते या सड़कें बनाने वाले खुद किन पगडंडियों पर चलते हैं? धूमिल की एक कविता बहुत पहले इस सवाल को पहचान के स्तर तक ले जा चुकी है कि वह तीसरा आदमी कौन है, जो न रोटी बेलता है न खाता है बल्कि उससे खेलता है।

पुतुल की ज़मीन नई है, जो भाषा को नया औजार दे रही है, एक नई उम्मीद जगा रही है जो कविता का मुख्य काम है। हिंदी के युवा कवि मनोभ्रंशजनक स्थितियों से उपजी अपनी कविताओं से बाहर निकलें। ‘वे’ और ‘थे’ वाली शैली का मनोबुझौवल बहुत हुआ अब समय आ रहा है फिर चीज़ों को सीधा नाम लेकर पुकारने का। पिछली सदी के अंतिम दशक में पाश की कविता ने हिंदी कविता को उद्वेलित किया था। उससे थोड़े अलग ढंग से पुतुल की कविताएँ भी वही काम कर रही हैं।

वे बताती हैं कि आज भी कविता की तमाम संभावनाएँ जीवित हैं। हाइटेक हो चुकी हिंदी कविता को वे फिर से बता रही हैं कि अभी भी जीवन के लिए प्रकृति के पास वैसा ही विपुल वैभव है। पुतुल की कल्पना में ‘आज भी यह प्रकृति रंग भर रही है?’ हिंदी की युवा कविता के सामने एक चुनौती की तरह हैं ये कविताएँ कि वो भी बहती बयार के खिलाफ अपने कदम उठाएँ कि ‘चाँद पर नाव’ चलाकर और ‘मिट्टी के फल’ खाकर हिंदी कविता का काम नहीं चलने वाला। कि 21वीं सदी में स्त्रियाँ झाडू-पोंछा के अलावा ढेर सारे काम कर रही हैं। वह किन्हीं ‘अधम कोनों’ तक सीमित नहीं हैं। आइए पढते हैं निर्मला पुतुल की कविताएं - कुमार मुकुल

क्या तुम जानते हो
क्या तुम जानते हो
पुरुष से भिन्न
एक स्त्री का एकांत

घर-प्रेम और जाति से अलग
एक स्त्री को उसकी अपनी ज़मीन
के बारे में बता सकते हो तुम।

बता सकते हो
सदियों से अपना घर तलाशती
एक बेचैन स्त्री को
उसके घर का पता।

क्या तुम जानते हो
अपनी कल्पना में
किस तरह एक ही समय में
स्वयं को स्थापित और निर्वासित
करती है एक स्त्री।

सपनों में भागती
एक स्त्री का पीछा करते
कभी देखा है तुमने उसे
रिश्तों के कुरुक्षेत्र में
अपने... आपसे लड़ते।

तन के भूगोल से परे
एक स्त्री के
मन की गाँठें खोलकर
कभी पढ़ा है तुमने
उसके भीतर का खौलता इतिहास

पढ़ा है कभी
उसकी चुप्पी की दहलीज़ पर बैठ
शब्दों की प्रतीक्षा में उसके चेहरे को।

उसके अंदर वंशबीज बोते
क्या तुमने कभी महसूसा है
उसकी फैलती जड़ों को अपने भीतर।

क्या तुम जानते हो
एक स्त्री के समस्त रिश्ते का व्याकरण
बता सकते हो तुम
एक स्त्री को स्त्री-दृष्टि से देखते
उसके स्त्रीत्व की परिभाषा

अगर नहीं
तो फिर जानते क्या हो तुम
रसोई और बिस्तर के गणित से परे
एक स्त्री के बारे में....

अखबार बेचती लड़की
अखबर बेचती लड़की
अखबार बेच रही है या खबर बेच रही है
यह मैं नहीं जानती
लेकिन मुझे पता है कि वह
रोटी के लिए अपनी आवाज बेच रही है

अखबार में फोटो छपा है
उस जैसी बदहाल कई लड़कियों का
जिससे कुछ-कुछ उसका चेहरा मिलता है
कभी-कभी वह तस्वीर देखती है
कभी अपने आप को देखती है
तो कभी अपने ग्राहकों को

वह नहीं जानती है कि आज के अखबार की
ताजा खबर क्या है
वह जानती है तो सिर्फ यह कि
कल एक पुलिस वाले ने
भद्दा मजाक करते हुए धमकाया था
वह इस बात से अंजान है कि वह अखबार नहीं
अपने आप को बेच रही है
क्योंकि अखबार में उस जैसी
कई लड़कियों की तस्वीर छपी है
जिससे उसका चेहरा मिलता है!

वह जो अक्सर तुम्हारी पकड़ से छूट जाता है
एक स्त्री पहाड़ पर रो रही है
और दूसरी स्त्री
महल की तिमंजिली इमारत की खिड़की से बाहर
झांक कर मुस्कुरा रही है
ओ, कविगोष्ठी में स्त्रियों पर
कविता पढ़ रहे कवियो!
देखो कुछ हो रहा है
इन दो स्त्रियों के बीच छूटी हुई जगहों में,
इस कहीं कुछ हो रहे को दर्ज करो
कि वह अक्सर तुम्हारी पकड़ से छूट जाता है
एक स्त्री गा रही है
दूसरी रो रही है
और इन दोनों के बीच खड़ी एक तीसरी स्त्री
इन दोनों को बार-बार देखती कुछ सोच रही है
ओ, स्त्री विमर्श में शामिल लेखको
क्या तुम बता सकते हो
यह तीसरी स्त्री क्या सोच रही है?
एक स्त्री पीठ पर बच्चा बांधे धान रोप रही है
दूसरी सरकार गिराने और बनाने में लगी है
ओ आदिवासी अस्मिता पर बात करने वाली
झंडाबरदार औरतो
इन पंक्तियों के बीच
गुम हो गयी उन औरतों का पता
जिनका नाम तुम्हारी बहस में शामिल नहीं है!

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Posted On : 09 02 2018 08:55:13 PM

संस्कृति