Last Update : 30 10 2017 04:13:54 PM

मां की बदौलत हम दोनों बहनें बन पाईं गांव की पहली डबल ग्रेजुएट

'मेरे जीवन में मेरी मां' कॉलम के शुरुआत की पहली कड़ी में श्री प्रकाश शुक्ला ने अपनी मां की याद करते हुए 'मेरी मां ने मुझे हर बार पिता जैसा बनने से रोका', लिखा, जिसे पाठकों द्वारा काफी पसंद किया गया। जनज्वार लखनऊ टीम की पहल पर छत्तीसगढ़ के सहकार कम्युनिटी रेडियो के साथियों ने इसे रेडियो पर भी प्रसारित किया। इससे पहले जनज्वार ने 'हाउस वाइफ' कॉलम शुरू किया था, जिसका हजारों पाठक हर हफ्ते इंतजार करते हैं। इस बार 'मेरे जीवन में मेरी मां' कॉलम के लिए मुंबई से युवा पत्रकार भक्ति परब ने लिखा है। आज भक्ति की मां का जन्मदिन भी है। जनज्वार उनको जन्मदिन की शुभकामनाएं देता है और पाठकों से उम्मीद करता है कि एक मां का कर्मठ जीवन आपको ऊर्जावान बनने और बेहतर करने की प्रेरणा देगा संपादक

'मेरे जीवन में मेरी मां' में इस बार मुंबई से युवा पत्रकार भक्ति परब

ये उन दिनों की बात है जब कोंकण प्रांत में रहने वाले लोग मुंबई में अपने करीबियों से पैसे के लिफाफे का इंतजार करते थे। कुछ लोग घर के आसपास की खेतीबाड़ी और पड़ोसियों को खेती एवं रोजमर्रा के काम में हाथ बंटाकर कुछ पैसे जोड़ लेते थे। कुछ लोग अपनी सरकारी पेंशन का इंतजार करते हुए आंगन में घंटों बैठा करते थे।

ऐसे माहौल में गीता का जन्म हुआ। उसके पिताजी मुंबई में मिल मजदूर (कामगार/ वर्कर) थे। और माँ खेतीबाड़ी का काम संभाल के पड़ोसियों के घर काम माँगने जाती थी ताकि घर—गृहस्थी अच्छे से चला पाए।

इसलिए गीता को भी दो भाई और बहन का जनम होने के बाद खेल कूद में मगन रहना छोड़ अपनी माँ के कामों में हाथ बटाना पड़ा। मानो इठलाती चिरैया को किसी ने कड़ी सजा दे दी हो।

वहीं से गीता के जीवन संघर्ष की शुरुआत हो गई। सीखने की बात करें तो गीता बहुत तेज थी। खेतों का काम, घर के काम जैसे की खाना बनाना उसने छोटी—सी उमर में ही सीख लिया। इसी दरमियान सरकार की तरफ से गाँव में नहर बनवाने का काम शुरू हुआ तो गीता भी नहर के काम पर लग गई।

सिर पर मिट्टी से भरी टोकरी लेकर दूर जाकर उसे खाली करना होता था। शायद उसी नहर की मिट्टी ने गीता को कुछ जीने के पहलू सिखा दिए। इसलिए वो दिन—ब—दिन मन सें सक्षम और निडर होती गई।

गीता को पढ़ाई में काफी लगन थी। पाठशाला में गुरुजी (टीचर) उसकी सूझबूझ, समाज और पढ़ाई में लगाव देखकर एक दिन उससे बोले, बेटी बहुत अच्छी तरह से पढाई करना। तुम बहुत आगे जाओगी। उनकी यह बात गीता के सपनों में ही रह गयी। उसे 9वीं कक्षा के बाद पाठशाला छोड़नी पड़ी। क्योंकि उसकी माँ ने उसकी शादी तय कर दी थी।

गीता की माँ का भी दिल नहीं मान रहा था कि बेटी की इतनी जल्दी शादी करा दी जाए। पर चार बच्चों की जिम्मेदारी के आगे उसने सोचा की गीता की शादी के बाद जिंदगी संवर जाएगी। पर उस माँ को कहां पता था की वो अपनी बेटी को एक और नये संघर्ष में धकेल रही है।

जब गीता को लड़का देखने उसके घर आया तब गीता के पास पहनने के लिए अच्छे कपड़े तक नहीं थे और लड़का ऐसे इतरा रहा था जैसे लंदन से आया हो। जबकि उसे मुंबई में नौकरी से निकाला गया था। दूसरी तरफ लड़के की माँ ने सब पहले से ही कुछ सोच रखा था। उसके दिमाग में कुछ और ही खिचड़ी पक रही थी।

गीता की शादी उस लड़के से कर दी गई। उसी दिन से गीता की नयी पहचान बनी, नया नाम मिला, सुहासिनी काशीराम परब। उस दिन एक कांड होना और भी बाकी था। गीता की सास ने उसे और अपने लड़के काशीराम को सामने बिठाकर कहा की आज से तुम दोनों गाँव की खेतीबाड़ी देखोगे और यहीं रहोगे।

बेटे की तरफ देखकर गीता की सास ने कहा मुंबई चलकर तुम क्या करोगे। तुम्हारे पास तो नौकरी भी नही है। यह सुनते ही गीता के पैरों तले की जमीन खिसक गयी। उसे ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके सिर पर बड़े जोर से डंडा मार दिया हो। आगे क्या होने वाला है वो उसे साफ दिखाई देने लगा। फिर भी वो टूटी नहीं। सास अपने साथ तीन बच्चों को लेके मुंबई चली गई। ससुर का तो उसकी शादी से पहले ही देहांत हो चुका था।

काशीराम को कुछ भी समझ नहीं आ रहा था कि वो घर-गृहस्थी कैसे संभालेगा। गीता के सामने भी काफी सवाल थे कि अब क्या होगा। उसे घर और खेती के सारे काम तो आते थे, लेकिन पैसा कहाँ से आएगा। खेती तो थी, पर इतनी भी नहीं की खुद के लिए रखकर बाकी का सारा अनाज बेचकर कुछ पैसे मिल जाएं।

काशीराम बचपन से ही मुंबई शहर में रहा था, जिस कारण उसे खेती का कोई भी काम आता नहीं था। गीता दिनभर खेती का काम करती रहती थी और काशीराम उसको देखते रहता था। इस तरह वो गाँव के लोगों में हंसी का कारण बन रहा था।

गीता से यह सब देखा न गया। वो कहते हैं ना जिंदगी ने आपको एक नींबू दिया है...चाहे उसे निचोड़के खाने का प्रयास करके मुँह खट्टा किया जाए और चाहे तो उसमें पानी-चीनी मिलाकर उसका शरबत बनाके पिया जाए। ये आपके हाथ में होता है। गीता ने भी वही किया।

उसी दिन से उसने अपने मन को समझाया यह रोने का समय नहीं है। वो मायके जाके अपने घरवालों को भी दुःख देना नहीं चाहती थी। इसलिए उसने सोचा खुद को न खोकर जिंदगी में आगे बढ़ना है। वो काशीराम से इस बारे में बात करती थी, तब भी वो कुछ बोल नहीं पाता था, क्योंकि गीता को अपनी जिम्मेदारी मानते हुए उसके लिए कुछ कर नहीं पा रहा था। यह बोझ उसके मन पर था।

काशीराम को ऐसे उदास देख गीता उसे समझाती थी, पर समस्या का कुछ हल निकल नहीं पाता था। एक दिन गीता ने कुछ सोचकर बड़ा फैसला लिया। वो अपने पति से बोली आप मुंबई में जाकर नौकरी कर लीजिए। मैं गाँव में सब संभाल लूंगी। अब से पहले भी गीता ही खेती—बाड़ी संभाल रही थी।

इसी बीच गीता ने अपनी पहली संतान को जनम दिया। उसके पति ने भी मुंबई जाकर बडी कठिनाइयों का सामना करके एक ट्रेवल एजेंसी में नौकरी हासिल की थी। गीता गाँव में अपनी बच्ची के साथ अकेले रहने लगी। रात को उसे बहुत डर लगता था तब वो पड़ोस में की अपनी सास के उमर की एक आंटीजी को घर पे बुला लिया करती थी। उस आंटी को भी गीता और उसकी बेटी से काफी लगाव हो गया था। मानो वो उसकी मुँहबोली माँ हो।

अब गीता के सामने नयी समस्या थी की गाँव में अपनी अलग पहचान बनाना। उसके ससुराल यानी परब खानदान का गाँव में कुछ नामोनिशान नहीं था, क्योंकि उसकी सास और सभी परिजन मुंबई में ही रहते थे। धीरे—धीरे गीता अपने मिलनसार स्वभाव सें गाँव के लोगों में घुलमिल गयी। लेकिन उसकी ये खुशी ज्यादा देर तक टिकी नहीं। गाँव के कुछ लोग चाहते थे कि परब खानदान यहाँ कुछ कर पाएं। उनकी जमीन हड़पना चाहते थे गांव के कुछ लोग।

कुछ लोग जरूर गीता की मदद करते थे। गीता उनके पास जाकर उनसे विनती करती कि हमारे खेत में हल चलाने के लिए आ जाएंगे, तो मैं भी आप के खेत में काम करने आ जाऊंगी। गीता पिछले 40 सालों से इसी तरह खेती—बाड़ी संभाल रही है। धीरे धीरे उसने घर के कुछ हिस्से, दीवारें गिरने की कगार पर थीं, उसने उन्हें ठीक कराया। बारीश में घर की छत से पानी टपकता था, वो ठीक कराया।

पूरा घर नया बनवाया। घर में पीने के पानी के लिए बहुत दूर जाना पड़ता था, तो उसने अपने पति और दोनों देवरों के साथ पैसे जोड़कर घर के पास कुआँ बनवाया। उसके इर्द—गिर्द केले, नारियल, काजू, कटहल, अमरूद और तरह—तरह के फल—फूलों के पौधे लगाए। सुंदर वाटिका बनाई। ये सब करते हुए शादी के दस साल गुजर गए।

इसी बीच उसने दूसरी बेटी को और बेटे को जनम दिया। अब गीता का संसार पूरा हो चुका था। घर में खुशहाली आने लगी थी। तीनों बच्चे स्कूल जाने लगे थे। पति मुंबई से गाँव आता जाता रहता था। अब गीता का एकमात्र यही सपना था की बच्चों को अच्छी शिक्षा देनी है और अपने पैरों पर खड़ा होना है।

इसी बीच उसने दूसरी बेटी को और बेटे को जनम दिया। अब गीता का संसार पूरा हो चुका था। घर में खुशहाली आने लगी थी। तीनों बच्चे स्कूल जाने लगे थे। पति मुंबई से गाँव आता जाता रहता था। अब गीता का एकमात्र यही सपना था की बच्चों को अच्छी शिक्षा देनी है और अपने पैरों पर खड़ा होना है।

मगर गीता के जीवन की ये खुशियाँ गाँव के कुछ लोगों को रास नहीं आईं। उन्होंने अपने पासे फेंकने शुरू कर दिए। कभी उसके बच्चों को कहते की बेटा स्कूल जाना बुरी बात है। माँ को खेती के काम में मदद करो। बच्चे बहक जाते थे तो गीता उनसे कहती थी, बच्चो पढाई से बढकर कुछ नहीं, खेत का काम मैं संभाल लूंगी। आप पढाई पर ध्यान दो।

जब बच्चे स्कूल जाते थे तब कभी कभार गीता घर पर अकेली रहती थी। उसे भी गाँव के कुछ दुष्ट लोग भड़काने में लग जाते थे। उससे कहते थे कि अब तेरी दोनों जेठानियां गाँव नहीं आने वाली। तू अकेली कम—पढ़ी लिखी इसी तरह गाँव में रह जाएगी। तेरा पति भी मुंबई से वापस कभी नहीं आएगा।

कभी वो गीता से पैसे भी माँगते थे, लेकिन वो देती नहीं थी। क्योंकि वो पैसे उसे बच्चों की पढाई और घर के बाकी कामों के लिए रखने होते थे। इस तरह गाँव के लोग गीता को परेशान करने लगे। उनकी आँखें गीता द्वारा खड़े किए गए परब खानदान को देखकर खुली की खुली रहती थी, इसलिए वो सोच में पड़ गये थे कि एक अकेली औरत ने हमारी नाक के नीचे से इतना बड़ा घर बनवाया।

नारियल से लेकर पपई तक सभी प्रकार के काम आने वाले वृक्ष खड़े किये। गीता ने फिर भी उनके सामने हार नही मानी तो वे लोग अपनी करीबियों के जरिए मुंबई में गीता के दोनों देवर और जेठानियों को भड़काने लगे। उसी दौरान गीता के सबसे छोटे देवर की एक सड़क हादसे में मौत हो गयी। उसके बाद उसी देवर के चार साल के बेटे की मौत हुई। उसकी जेठानी ने उन दोनों की मौत का जिम्मेदार गीता को ठहराया।

कोंकण में कई ऐसे लोग है जो अंधश्रद्धालू है। उसी बीच गाँव मे अपने तीन बच्चों के साथ में रहने वाली गीता के मन ये डर बैठ गया कि उसके पति को कुछ हो गया तो।वो तो रात के 11 बजे काम से लौटते हैं। असल में गीता अब ज्यादा कुछ नहीं चाहती थी वो अब अपने पति को अपने साथ देखना चाहती थी। दिनभर पति को लेकर तरह—तरह के ख्याल उसके दिमाग में आते रहते थे और एक दिन उसकी दिमागी हालत बिगड़ गयी।

गीता अपना मानसिक संतुलन खो बैठी। बड़ी बेटी तब 8वीं कक्षा में थी। उसे अपनी मां की मानसिक हालत को लेकर कुछ कुछ समझ में आ रहा था। वो जब स्कूल जाती थी तब बाकी के बच्चे आपस में बातें करते थे। कहते, अरे इसकी माँ पागल है। उसको दिमाग का दौरा पड़ा है, लेकिन वो उनसे चीख—चीखकर कहना चाहती थी कि मेरी माँ की इस हालत के जिम्मेदार आप सब हो।

गीता मानसिक रूप से पूरी तरह बीमार हो चुकी थी। डॉक्टर के इलाज का भी कुछ असर नहीं हो रहा था। वो दवाइयों खाने से इनकार करती थी। तभी गीता के पति और बच्चों ने मिलकर फैसला किया कि बड़ी बेटी पढने के लिए मुंबई जायेगी और उसका पति उसके साथ रहेगा। बेटियों ने अपने पापा को अच्छी तरह से समझाया कि वो नहीं थे, तब गाँव में क्या—क्या हुआ। लेकिन माँ सहती रही, क्योंकि उसे हमें अपने पैरो पर खडा करना था। मां आपको तकलीफ नही देना चाहती थी। अब हमारी बारी है कि हम माँ के लिए कुछ करें।

इस हालत में भी गीता के दिमाग में यही चलता था कि उसके पति हमेशा गाँव में रहने के लिए आ गये तो बच्चों की पढाई रुक जायेगी। मुझे बीमारी के कारण वो अपने साथ मुंबई लेकर गये तो सास को दिया वचन टूट जाएगा। उसके दिमाग में सास का वचन गूंजने लगता, तुम हमेशा यहीं रहोगी। इस घर को कभी भी ताला लगने नही दोगी।

अभी भी गीता सास के उस वचन को अच्छी तरह निभा रही है। उसके विवेक ने उसको नयी जिंदगी दी और उस गाँव की मिट्टी और घर से अंजान होने से बचाया। आज भी गीता पूरी ईमानदारी के साथ खेती का काम करती है। तीनों बच्चों को सही सलामत इस दुनिया में लाने के लिए उसे तीन बार सिजेरियन के कष्ट से गुजरना पड़ा। सिजेरियन के कारण उसका वजन बढ़ता गया, शरीर का प्रेशर पांव पर पड़ने की वजह से अब उसके घुटने दर्द करते हैं।

बुढ़ापे की तरफ बढ़ती गीता को कुछ और बीमारियों ने भी घेर लिया है, मगर वह कभी आराम के साथ बैठी हुई नजर नहीं आएगी। उसके चेहरे पर हमेशा प्रसन्नता रहती है। गीता, उसके पति और तीन बच्चे कुछ दिन गाँव में, कुछ दिन मुंबई में ये सिलसिला पिछले 40 सालों से जारी है।

जिस गीता ने किसी को एक गलत शब्द नहीं कहा, उसकी कीमत अब सबको पता चली है, मगर अब उससे जलन रखने वाले लोगों को गीता के बारे मे बातें बनाने को नया टॉपिक मिल गया है। गीता की दो बेटियों की उम्र 20 से ज्यादा हो गयी है, लेकिन उनकी शादी नहीं हुई है। इसे लेकर तमाम बातें लोग करते रहते हैं, मगर गीता ने सोच लिया है कि उसे कमजोर नहीं पड़ना है, न ही दूसरों की बातों पर कान देना है।

यही गीता यानी सुहासिनी काशीराम परब मेरी माँ है। और माँ का साथ देने वाले मेरे पापा, ये दोनों हम तीनों भाई—बहनों के लिए प्रेरणा की मिसाल हैं। इसलिए मंदिर जाने का भी मन नहीं करता। बस इनकी जो ख्वाहिशें और सपने जो उन्होंने हमें देखकर बुने हैं, उन्हें पूरा करने के लिए जी जान लगाएंगे। हम पाँचों अलग—अलग सोच रखते हैं। साथ आते हैं तो वैचारिक झगड़ा होता है, लेकिन सोच एक दूसरे की भलाई की ही होती है।

आज जिंदगी के इतने हंसी लम्हे खो जाने के बाद सोचती हूँ मेरी माँ, पापा कभी गलत नहीं थे। इसलिए नहीं कि वो मेरे माँ, पापा हैं। मेरे चाचा—चाचियों की भी कोई गलती नहीं थी। लोग भी वैसे ही थे, जैसे की आमतौर पर सब गांवों में होते हैं। लेकिन कमबख्त वो सिचुएशन ही विलेन थी, जो हमारी माँ के जीवन में दुःख के बादल ले आई।

सुहासिनी मेरी माँ, उसके नाम में ही हँसने का जिक्र है। मराठी शब्द सुहासिनी का मतलब जिसके मुखडे पे हमेशा प्रसन्नता रहती है और सदा हंसती खिलती रहती है। मेरी माँ बिलकुल ऐसी ही है। जीवन में कितने भी उतार चढ़ाव आए, कितनी भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, वो सब कठिनाइयों को हँसके भगा लेती है।

आज हम दोनों बहनें शहर में किसी के भी सहारे के बिना अपने दम पर खड़ी हैं। डबल ग्रेजुएट होने वाली हम बहनें गाँव की पहली लड़कियां हैं। माँ ने हम तीनों भाई—बहनों के जरिए अपनी पढाई का सपना पूरा किया। मेरा छोटा भाई भी अब पढ़ लिखकर गाँव की खेती को बिजनेस का रूप देना चाहता है। इसका सारा श्रेय मेरी माँ को जाता है। गाँव के बाकी बच्चों को भी माँ पढाई के लिए प्रोत्साहित करती रहती हैं।

मां ने हमें पढ़ाया, दुनिया से लड़ने के काबिल बनाया। इसके लिए हम माँ के हमेशा ऋणी रहेंगे। ईश्वर से यही दुआ मांगेंगे की वो सदा मुस्कराती रहे।

(युवा पत्रकार भक्ति परब सकाल मीडिया ग्रुप से जुड़ी हैं। वह अभी—अभी कोंकण क्षेत्र के अपने गांव से अपनी मां के पास से लौटी हैं और यह लेख उन्होंने जनज्वार के लिए खासतौर पर अपनी मां की कर्मठता को याद करते हुए लिखा है।)

Posted On : 30 10 2017 01:59:00 PM

जनज्वार विशेष