Last Update : 10 11 2017 10:56:25 AM

एक भारतीय कवि की भारतीय कविता

'सप्ताह की कविता' में आज हेमंत शेष की कविताएं

हेमंत शेष की कविताएं गवाह हैं कि अपनी समझ और दूसरों की नासमझी के दावों-प्रतिदावों के बाहर अपने ढंग से कविता पर काम करते रहने वाले लोग कविता को बचा पा रहे हैं। अब तो बाज़ आ जाना चाहिए हनुमान जी को पहाड़ उठाए रखने से।/ लपेट कर जनेऊ कान पर कहीं भी बैठा जा सकता हो ऐसी सहूलियत विलायत में कहां।

भारतीयता, परंपरा, पूजा-पाठ, गरीबी आदि के पंचमेल से चली आ रही भारतीय संस्‍कृति की विडंबनाओं को जिस तरह इन पंक्तियों मे उद्घाटित किया गया है, वह सहज है। यह सहजता हिंदी के अधिकांश कवियों के लिए दुष्‍प्राप्‍य है। बहुराष्‍ट्रीय बाजार के हमले से सभी त्रस्‍त हैं पर उसकी विद्रूपता पर हेमंत की तरह कितने हंस सकते हैं - आएगी अभी मेरी पत्‍नी …/ और कहेगी : स्‍वामी /लीजिए ये हैं आलू के वे गरमागरम परांठे जिन्‍हें/ अमुक-अमुक कम्‍पनी द्वारा निर्मित एल्‍यूमीनियम फाइल में/ मैंने पिछले साल पैक किया था।

जीवनस्थितियों से अक्‍सर दार्शनिक की तरह पेश आते हैं हेमंत, पर जीवन उनकी इस मुद्रा को तोड़कर अक्‍सर अपने रंग में उन्‍हें रंग डालता है। आलोक धन्‍वा एक कविता में लिखते हैं - कवि मरते हैं/ जैसे पक्षी मरते हैं /गोधूलि में ओझल होते हुए! 'एक चिडि़या का कंकाल' कविता में हेमंत दिखला पाते हैं एक चिडि़या की मृत्‍यु।

अपने समय संदर्भों की अच्‍छी समझ है हेमंत शेष को और यथार्थ पर पकड़ भी। इनके प्रयोग से वे अपनी कविताओं में अच्‍छा कंट्रास्‍ट पैदा कर पाते हैं। जैसे—आर्यसमाज मंदिर में अचानक शादी का क्‍या सामाजिक मनोविज्ञान है/ ...कहां लिखा है किस धर्मशास्‍त्र में कि शादी/ टी.बी. से पीडि़त बैंडवादकों की बेसुरी उपस्थिति में ही हो...

कविता केवल दृश्‍य में नहीं होती, न ज्ञान की पेंगें लड़ाने से वह अवतरित होती है, यह कवि की दृष्टि होती है जो जीवन के रोज ब रोज के प्रसंगों में उसका होना संभव करती है। वह दृष्टि हेमंत के पास है और उससे वे सामान्‍य सी बात में भी असर पैदा कर लेते हैं। आइए पढ़ते हैं हेमंत शेष की कविताएं -कुमार मुकुल

प्‍यार का क्‍या करें कविगण
भारत में प्रेम एक घटिया शब्‍द
बनाया जा चुका है और रहेगा।
इसे ही मुंबई का सिनेमा कहता है ‘प्‍यार’
रही सही कसर सस्‍ते उपन्‍यास-सम्राटों ने पूरी कर दी है।
स्थिति यह है कि अब प्रेम करने वाले भी प्रेमी कहलाने से डरते हैं।
पर विडम्‍बना देखिए
गाहे-बगाहे हमें भी
पूरी गंभीरता से करना पड़ता है
इसी शब्‍द का इस्‍तेमाल।
और तब हम भीतर से प्रेम को लेकर उतने चितिंत नहीं होते
जितने होते हैं इसके दु:खद पर्यायवाची से:
कुछ खास-खास मौकों पर
हूबहू प्रेमी की तरह दिखते हुए ‘प्‍यार’ शब्‍द से डरते,
भीतर से पर
महज
कवि रहते।

टपकती पेड़ से कांव-कांव छापती है
आकृति कौवे की
दिमाग के खाली कागज पर
मुझे किस तरह जानता होगा कौआ
नहीं जानता मैं
उस बिचारे का दोष नहीं, मेरी भाषा का है

जो उसे 'कौआ' जान कर संतुष्ट है
वहीं से शुरू होता है मेरा असंतोष
जहां लगता है - मुझे क्या पता सामान्य कौए की आकृति में
वह क्या है कठिनतम
सरलतम शब्द में भाषा कह देती है जिसे 'कौआ' !

वही पत्थर
हां, वही पत्थर
जो कभी टूटता था महाकवि के हृदय पर
मैं भी शमशेर बहादुर सिंह के पत्थर को थोड़ा बहुत जानता हूँ

अगर एक कवि हूँ –
जानना ही चाहिए मुझे अन्य को भी अपनी ही तरह

अगर महाकवि होने की आकांक्षा में हूँ तो
अब तक कभी का टूट जाना था
पहले
शमशेर बहादुर सिंह से पहले वही पत्थर
मेरे हृदय पर।

निमिष के लिए एक कविता
बचपन में बच्चा
एक नसीहत है.
प्रौढ़ चेहरों में बदलते हुए
पत्थरों के लिए
क्षमा में सबकुछ
भूलना उसकी सम्पत्ति है
जिस आदत के लिए
तरस जाना हमारी नियति
एक बच्चे को याद रखने के पाठ सौंपते हुए
हम क्रूरता और बेवकूफी
दोनों को साधते हैं
उसकी अर्थ भरी मुस्कान के विवेक से
डरते हुए
हमें किसी दिन
बंद कर देना चाहिए यों बिना परिश्रम
बड़े होना
और कहलाना।

एक भारतीय कवि की भारतीय कविता
(सालासर-मन्दिर की यात्रा की याद में)
संभावना यह है कि जीवित हूं मैं। पर जरूरी नहीं सही ही हो यह बात।
मैं यह बात लिख रहा होऊं हो सकता है-
किसी बावड़ी के गहरे हरे पानी की उतनी ही गहरी धुंध में डूबा।
पूर्वजन्मों से वे अलाव जल रहे होंगे अब भी
उस गांव में जिस में मेरा जन्म नहीं हुआ ।
बजा रहा है कौन शंख आरती का
किस हवन वेदी का है यह धुआं पीले चावल किस ने कहां रख दिए
जैसे पूछ रहा हो एक मुरझाया हुआ निमंत्रण पत्र।

बहुत पहले से दिख जाती है ध्वजा मन्दिर की। मूर्तियां शिखर की कुछ बाद में।
काला एक कुत्ता सिकोड़ कर कान ऊंघता रहता है चांदी मढ़ी सीढ़ियों पर।
चबाती हुई गाय- गैंदे और गुलाब की करूणाजनक मालाओं को।
पत्तल दोनों में गंधाती है जूठन।
क्या पता यही सोचते हों दुकानों में पीतल के थालों में सोए हुए लड्डू कि
अब तो बाज़ आ जाना चाहिए हनुमान जी को पहाड़ उठाए रखने से।
लपेट कर जनेऊ कान पर कहीं भी बैठा जा सकता हो ऐसी सहूलियत विलायत में कहां।

पड़ते ही कान में स्वर आरती का खुल जाती है नींद
जैसे हर पाठशाला के हर गणित में दो और दो हमेशा चार।
पर अब यह असम्भव है। अफवाहों से पसीजता है मुहल्ला। खिचड़ीबाजरे की। रस्सी। पानदान।
काका। बाबा। काले-उड़द। श्मशान। धोती। मुर्गा बनता विद्यार्थी। रंजना।
सब मेरे स्वप्न में कुछ यों और इस कदर निर्बन्ध- जैसे वह मुफ्त का माल हो।
जूठन की अंग्रेजी बनी ही नहीं।
इस कविता का अंग्रेज़ी अनुवाद थोड़ा अटपटा सा दिखेगा लक्ष्मीनारायण जी।
मैं सोचता हूं चुप रहता हूं सोता जागता हिलता डुलता खांसता हूं
किस ने उडाई बेपर की कि मैं मर गया
मैं हूं तो बावड़ी के किनारे पानी की हरी गहराई को प्रशंसा पूर्वक देखता हुआ
आप समझ ही गए होंगे इसी बावड़ी के किनारे वह मंदिर भी है
बहुत पहले से दिख जाती है जिसकी ध्वजा।

Posted On : 10 11 2017 10:54:04 AM

संस्कृति